Jai bajrang bali

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15/03/2025

जय श्री राम 🙏🚩
राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम

16/10/2024

जय श्री राम

11/12/2022
19/08/2020

जय श्री राम,

08/07/2017

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07/12/2016

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05/12/2016

4⃣📋शांतिधाम की निवासी शांत स्वरुप आत्मा 📋
पृथ्वी, जल,वायु,तेज और आकाश इन पाँच तत्त्वों से भी परिचित हैं, किन्तु अखण्ड ज्योति महत्त्व का बना शांतिधाम ,परमधाम अपने असली रूप में अपरिचित ही रहा हैं।यहाँ आत्मा अशरीरी, मुक्त अवस्था में रहती है इसलिए इसे मुक्तिधाम भी कहते है ।इसी परमधाम से आत्माये असल में इसी शांतिधाम की मूल निवासी हैं- यह धारनारूप में जान लें तो एक बेहद की राष्ट्रभावना "वसुधैव कुटुम्बकम्"की भावना से एक नयी मानवता का जन्म हो सकता हैं। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय युद्धों को हम सदा के लिए विदाई दे सकते है और विश्व में शान्ति की पूर्ण स्थापना हो जायेगी।
मैं आत्मा शान्तिधाम की निवासी हूं और शान्ति के सागर परमात्मा की अमर संतान हूं। परमात्मा की मैं आत्मा रचना हूं। अतः उनके गुण, स्वरुप तथा शक्ति का वरदान मुझे सहज ही विरासत (वर्से) के रूप में प्राप्त हो जाता हैं।जैसे बिजली एक शक्ति है और उसके प्रयोग से रौशनी ,शक्ति आदि प्राप्त करते है ,उसी प्रकार शांति भी एक शक्ति है।शांति सागर की स्मृति से शान्ति की गहरी अनुभूति की जा सकती है।यह दिव्य शान्ति की शक्ति हमारे अंग अंग को शीतल बना देती है।यह शीतलता ही हमे सुख-शान्ति ,आनंद आदि का अनुभव कराती है,जिससे जीवन का सर्वांगीण विकास साधती हम आत्माए सम्पूर्ण बन जाती है।
जैसे शरीर के विकास के लिए पोषक तत्त्वों की शक्ति की आवश्यकता रहती है वैसे ही आत्मा के विकास के लिए शान्ति की शक्ति की जरूरत है ।इसी शक्ति से सत्कर्म, पुण्यकर्म करने की सुसंस्कारमय वृत्ति बनती है। अशांति जन्य विस्मृति से हमारा असली धर्म- स्वरुप लुप्त प्रायः हो जाता है।उसी प्रकार जैसे शेर का बच्चा भेड़ो के साथ रहकर अपने आपको भेड ही समझने लगता है,परंतु जब उसे अपने असली स्वरुप का पता चलता है तो वह एक सेकंड में शेर की तरह चलने लगता है।उसी प्रकार "शांति- सागर की मैं अमर,शांत संतान हूँ"-इस बात की स्मृति आते ही शान्ति का स्वरूप व स्थिति का सहज अनुभव होने लगता है।
विश्व में शान्ति की स्थापना के लिए सरलतम तरिका यही है की शान्ति के सागर परमात्मा को शान्तिधाम में बुद्धि-योग द्वारा याद करें-इसी से शान्ति की पावन शक्ति का आविष्कारन होगा।
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03/12/2016

2⃣📋शांति का स्रोत कौन?📋
सुख-शांति का दाता कौन? यह बहुत जटिल प्रश्न है।यही करण हैं की शांति के लिए अधिकांश मनुष्य प्रभू की भक्ति वा पूजा करते है और शांति की याचना करते हैं।जब किसी की मृत्यु होती है तो भी शान्ति प्रार्थना करते हैं और कहते है-हे प्रभू ! इस आत्मा को शान्ति देना ।
प्रत्येक देश तथा भाषा मे शांति सम्मेलन या धर्म सम्मेलन भी होते रहते है ।अशांति के निवारण के लिए अनेक पुरुषार्थ हो रहे है।विद्वान,पंडित तथा लंबे लंबे भाषण कर एक दो को अशांति के उत्तरदायी घोषित करते है। शान्ति स्थापना के लिए अनेक योजनाये भी बनाते हैं,फिर भी शान्ति मृगजल-समान...
दूर ही दूर भासनामात्र रह गयी हैं अथवा कहे ज्यों ज्यो दवा की,रोग बढता ही गया ।
विज्ञान की शक्ति भी मानव की सुख सुविधाओं एवं शान्तिसेना में संलग्न हैं। परन्तु चलचित्र, दूरदर्शन आदि का मनोरंजन भी मानव को स्थाई सुख वा शान्ति नही दे सकता। आज सभी महसूस करने लगे हैं क़ि विनाशी व्यक्ति व वस्तु से अल्पकाल की ही शान्ति मिल सकती है,सदकाल की नहीं।साथ ही मानव तथा मानव प्रेरित कार्य मनुष्य को शांति नहीं दे सकते। क्योंकि जो स्वयं अशान्त हैं वह अन्य को शान्ति कैसे देगा ?
हाँ, परमात्मा अविनाशी है और वही अविनाशी शान्ति के दाता हैं - इस बात को लगभग सभी मानते हैं। ऐसी मान्यता, गायन- पूजन भी आखिर क्यों हैं ? दुनिया यह नही जानती। जो जैसे कर्तव्य करता हैं, उसके आधार पर उसका गायन- पूजन भी आखिर क्यों है ? दुनिया यह नही जानती। जो जैसे कर्तव्य करता है, उसके आधार पर उसका गायन और पूजन चलता है । परमात्मा को सुख- दाता और शान्ति का सागर कहते हैं। तो जरूर उनका यह गायन और पूजन उनके ऐसे कर्तव्यों के आधार पर ही होगा। निश्चित रूप से परमात्मा से किसी काल में सभी को ऐसे अविनाशी सुख शान्ति की अनुभूति हुई हैं।
अब विचारनीय बात यह हैं की परमात्मा ही सच्चे सुख और शांति के एकमात्र दाता कैसे है और यह अविनाशी सुख- शान्ति कब और कैसे प्राप्त होती हैं ?
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02/12/2016

1⃣📋अशन्ति के कारण📋
एक समय इस सृष्टी पर सुख-शान्ति का पूरा साम्राज् था। आज घर घर मे मानासिक तनाव जनित अशान्ति का वातावरण हैं।परिनामस्वरूप आज का मानव दिल के दौरे का शिकर हैं-साथ ही अन्य भी अनेक नये नये रोगों से आक्रांत भी। डॉक्टरों का कहना है की 92%रोग मानसीक तनाव और अशांति के कारण होते हैं। यही कारण है की आज अनिद्रा, शक्तिहीनता,दुर्घटनाग्रस्तता और गरीबी बढ रही है। साथ ही औद्योगिक अशन्ति के फलस्वरूप तालाबन्दि,हड़ताल,बेरोजगारी,वस्तुओ का आभाव् ,संग्रहखोरी की सीमाएं पार हो रही हैं।
आज भाई,भाई के साथ धन के लिए झगड़ते हैं । पारिवारिक सन्हेपूर्ण शान्ति के साथ पर अशांति, कलह-क्लेश का वातावरन बढ़ रहा हैं,जिससे दिल के तथा घर के टुकड़े हो रहे है।
धार्मिक अन्धविश्वास एव् कट्टरता को लेकर धर्मयुध्द का बाजार भी आज गर्म हैं।इतिहास साक्षि हैं-जितने युद्ध आज तक हुए हैं उनमे 78%धर्म के नाम पर हुए हैं।इस प्रकर धर्मसत्ता और राज्यसत्ता की लालसा ने काफी अशांति बढाई हैं।आज राज सिंहासन् भी कांटो का सिंहासन् बन गया हैं।
धन्य-धान्य से भरी-पूरी इस धरती पर अब अकाल,महंगाई तथा आनाचार की वृद्धि हो रही हैं।अनेक समस्याओ से घिरा हताश-निराश मानव आत्महत्या की ओर प्रेरित होता हैं। अपराधो की वृद्धि के साथ कैदीयो-अभियुक्तो की संख्या भी बढ रही हैं।
विघ्यान् की सुख-सुविधाये भी एक तरफ वरदानी, तो दूसरी तरफ अभिशाप की निमित्त बन रही हैं।आज जब अणुयुद्ध की विकरालता, विनाश के तांडव नृत्य की तैयारिया हो रही हैं, तब कौन शांति की सेज पर चैन की नींद ले सकता है?
इस प्रकार हम अशन्ति के करनो को एव् लक्षणो को तो जानते हैं,पर इनके निवारण का सही मार्ग नही जानते। अब हम तटस्थ बुद्धि से सोचे की
सुख-शांति का दाता कौन है? अशांति की दुविधा मे शांति की मन -भावनी हवा कौन ला सकता हैं?
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