05/12/2016
4⃣📋शांतिधाम की निवासी शांत स्वरुप आत्मा 📋
पृथ्वी, जल,वायु,तेज और आकाश इन पाँच तत्त्वों से भी परिचित हैं, किन्तु अखण्ड ज्योति महत्त्व का बना शांतिधाम ,परमधाम अपने असली रूप में अपरिचित ही रहा हैं।यहाँ आत्मा अशरीरी, मुक्त अवस्था में रहती है इसलिए इसे मुक्तिधाम भी कहते है ।इसी परमधाम से आत्माये असल में इसी शांतिधाम की मूल निवासी हैं- यह धारनारूप में जान लें तो एक बेहद की राष्ट्रभावना "वसुधैव कुटुम्बकम्"की भावना से एक नयी मानवता का जन्म हो सकता हैं। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय युद्धों को हम सदा के लिए विदाई दे सकते है और विश्व में शान्ति की पूर्ण स्थापना हो जायेगी।
मैं आत्मा शान्तिधाम की निवासी हूं और शान्ति के सागर परमात्मा की अमर संतान हूं। परमात्मा की मैं आत्मा रचना हूं। अतः उनके गुण, स्वरुप तथा शक्ति का वरदान मुझे सहज ही विरासत (वर्से) के रूप में प्राप्त हो जाता हैं।जैसे बिजली एक शक्ति है और उसके प्रयोग से रौशनी ,शक्ति आदि प्राप्त करते है ,उसी प्रकार शांति भी एक शक्ति है।शांति सागर की स्मृति से शान्ति की गहरी अनुभूति की जा सकती है।यह दिव्य शान्ति की शक्ति हमारे अंग अंग को शीतल बना देती है।यह शीतलता ही हमे सुख-शान्ति ,आनंद आदि का अनुभव कराती है,जिससे जीवन का सर्वांगीण विकास साधती हम आत्माए सम्पूर्ण बन जाती है।
जैसे शरीर के विकास के लिए पोषक तत्त्वों की शक्ति की आवश्यकता रहती है वैसे ही आत्मा के विकास के लिए शान्ति की शक्ति की जरूरत है ।इसी शक्ति से सत्कर्म, पुण्यकर्म करने की सुसंस्कारमय वृत्ति बनती है। अशांति जन्य विस्मृति से हमारा असली धर्म- स्वरुप लुप्त प्रायः हो जाता है।उसी प्रकार जैसे शेर का बच्चा भेड़ो के साथ रहकर अपने आपको भेड ही समझने लगता है,परंतु जब उसे अपने असली स्वरुप का पता चलता है तो वह एक सेकंड में शेर की तरह चलने लगता है।उसी प्रकार "शांति- सागर की मैं अमर,शांत संतान हूँ"-इस बात की स्मृति आते ही शान्ति का स्वरूप व स्थिति का सहज अनुभव होने लगता है।
विश्व में शान्ति की स्थापना के लिए सरलतम तरिका यही है की शान्ति के सागर परमात्मा को शान्तिधाम में बुद्धि-योग द्वारा याद करें-इसी से शान्ति की पावन शक्ति का आविष्कारन होगा।
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