Bk Hindi Murlis

Bk Hindi Murlis Divine Knowledge

09/04/2023

09-03-2023 प्रात:मुरली ओम् शान्ति 09.03.94 "बापदादा" मधुबन

न्यारा-प्यारा, वन्डरफुल, स्नेह और सुखभरा अवतरण - शिव जयन्ती


आज त्रिदेव रचता बाप अपने पूज्य सालिग्राम बच्चों से मिलने आये हैं। जैसे बिन्दु ज्योति स्वरूप बाप की पूजा होती है, यादगार मनाते हैं तो बाप के साथ-साथ आप सालिग्राम आत्माओं की भी पूजा होती है। बाप एक त्रिमूर्ति शिव गाया और पूजा जाता है और आप सालिग्राम आत्मायें अनेक हो। पूजा दोनों की होती है क्योंकि बाप ने सभी बच्चों को अपने समान पूज्य बनाया है। कभी भी सालिग्राम को देखते हो तो क्या अनुभव करते हो? ये हम ही हैं ऐसे लगता है? तो बाप ने बच्चों को समान तो क्या लेकिन अपने से भी श्रेष्ठ पूज्य बनाया है। बच्चों की पूजा डबल रूप में होती है। बाप की पूजा एक ही शिवलिंग के रूप में होती है। आप बच्चों की सालिग्राम के रूप में भी होती है और देव आत्माओं के रूप में भी होती है। बाप से भी ज्यादा डबल रूप की पूजा के अधिकारी आत्मायें आप हो। जैसे डबल विदेशी कहलाते हो तो डबल पूज्य भी हो। डबल ताजधारी भी आप बनते हो। निराकार बाप नहीं बनते। कहाँ-कहाँ भक्त लोग शिव के प्रतिमा को ताज डाल देते हैं क्योंकि ताजधारी बनाया है इसलिये कहाँ-कहाँ ताज दिखा देते हैं। लेकिन बाप कभी भी रत्न जड़ित सोने-चाँदी के ताजधारी नहीं बनते क्योंकि ताज धारण होता है प्रैक्टिकल में, मस्तक में। तो निराकार बाप को मस्तक है क्या! शरीर ही नहीं है तो ताज क्या धारण करेंगे! लेकिन स्नेह के कारण ताज दिखा देते हैं। तो बाप ने बच्चों को अपने से भी आगे रखा है। इतनी खुशी और इतनी श्रेष्ठ स्मृति रहती है? बापदादा को अपनी जयन्ती मनाने की खुशी नहीं है लेकिन आप सबकी भी जयन्ती है, इसलिये बच्चों के जयन्ती की खुशी है क्योंकि बाप अकेला कुछ नहीं कर सकता और आप भी अकेले कुछ नहीं कर सकते। चाहे कहीं-कहीं कोई-कोई बच्चों को थोड़ा आ जाता है कि मैं ही करने वाला हूँ लेकिन सिवाए बाप के सफलता नहीं मिलती। तो न बाप अकेला कुछ कर सकता, न बच्चे अकेले कुछ कर सकते हैं। अगर बाप बच्चों से मिलन मनाने भी साकार में चाहे वा आकार में भी चाहे तो ब्रह्मा का आधार लेना ही पड़ता है। ब्रह्मा के बिना भी कुछ कर नहीं सकता। माध्यम के बिना साकार मिलन नहीं मना सकता। तो कितना प्यार बाप का बच्चों से है और बच्चों का बाप से है! एक-दो के बिना कुछ नहीं कर सकते। अगर बाप को किनारा किया, साथ नहीं रखा तो अकेले कुछ कर सकते हो? बाप कर सकता है? बाप भी नहीं कर सकता। तो ये बाप और बच्चों का साथ-साथ दिव्य जन्म लेना, साथ-साथ विश्व परिवर्तन करना और साथ-साथ अपने स्वीट होम में जाना - ये ड्रामा की अविनाशी नूँध है। इसको कोई बदल नहीं सकता। तो यह नूँध अच्छी है ना! प्यारी लगती है ना! तो आज सब बाप का बर्थ डे मनाने आये हो या अपना? बाप कहेंगे आपका और बच्चे बाप को कहेंगे कि आपका।

ये दिव्य अवतरण, जिसको शिव जयन्ती वा शिवरात्रि कहते हैं, कितना आत्माओं के लिये स्नेहभरा, सुखभरा अवतरण है। सतयुग में भी ऐसा बर्थ डे नहीं मनायेंगे। आत्मायें, आत्माओं का बर्थ डे मनायेंगी लेकिन इस समय आत्मायें परम आत्मा का बर्थ डे मनाती हैं। सारे कल्प में ऐसा न्यारा और प्यारा, वन्डरफुल बर्थ डे, जो एक ही समय पर बाप का भी हो और बच्चों का भी हो। ऐसा कभी होता है क्या? अगर तारीख एक भी होगी तो वर्ष का या मास का या डेट का अन्तर होगा। लेकिन ये अवतरण दिवस कितना वन्डरफुल है जो बाप और बच्चों का साथ-साथ है।

इस यादगार दिवस पर विशेष भक्त लोग भी दो विशेषताओं से ये दिवस मनाते हैं। दो विशेषतायें कौन-सी हैं? एक विशेष व्रत धारण करते हैं और दूसरा स्वयं को समर्पित न करते हुए और किसी को बलि चढ़ाते हैं। तो बलि चढ़ाना और व्रत धारण करना ये दोनों विशेषता इस दिवस की हैं। अनेक प्रकार के व्रत धारण करते हैं। चाहे कोई भोजन का करते हैं, कोई जागरण का करते हैं, कोई दूर-दूर से पैदल करते हुए चलने का करते, कितना भी थक जायें लेकिन व्रत अपना पूरा करते हैं। चाहे कितने दिन भी लग जायें, कितना समय भी लग जाये लेकिन व्रत नहीं छोड़ते। तो यह यादगार किससे कॉपी की? आपका है ब्राह्मण जीवन का व्रत और भक्तों का है एक दिन का व्रत। आपने भी जब ब्राह्मण जन्म वा दिव्य बर्थ लिया तो क्या व्रत लिया? सदा अज्ञान नींद से जागरण का व्रत लिया ना कि थोड़ा-थोड़ा नींद करेंगे यह व्रत लिया? वा थोड़े-थोड़े झुटके खा लेंगे ऐसे तो नहीं किया? तो आप सभी ने भी शिव जयन्ती वा दिव्य बर्थ डे पर जागरण का व्रत लिया इसलिये भक्त भी यादगार रूप में जागरण करते हैं। और आप सबने भी शुद्ध भोजन का व्रत लिया इसलिए भक्त लोग भी, कुछ भी हो जाये, चाहे बीमार भी हो जाते हैं तो भी अन्न के व्रत को तोड़ेंगे नहीं। तो आप सब भी कोई भी मन के आगे, तन के आगे, परिस्थितियाँ आ जाये तो व्रत तोड़ते हो क्या? कभी कुछ मिक्स खा लिया ऐसे करते हो क्या? कोई देखता तो है नहीं, चलो खा लिया! अपना नियम पक्का रखते हो ना? कि कच्चे हो? कभी-कभी देखकर के थोड़ी दिल होती है? एक ही जैसा खाना खाते-खाते कभी दूसरा भी खाने की दिल होती है? अच्छा, इसमें अमेरिका, आस्ट्रेलिया, यूरोप, एशिया वा रशिया सभी पक्के हो ना? या थोड़ा-थोड़ा कच्चे हो?

तो डबल विदेशी सभी पास हो गये! और भारत वाले तो पास हैं ही ना! भारत वालों को फिर भी सहज है। डबल विदेशियों को इसमें डबल मेहनत भी है। लेकिन पास हो इसकी मुबारक। तो एक बर्थ डे की मुबारक, दूसरी पास होने की मुबारक और तीसरी कभी भी हलचल में न आए सदा अचल रहना, इसमें पास हो? इसमें कह देते हैं क्या करें! समटाइम। आज बापदादा ने डबल विदेशियों के लिये बहुत रमणीक भाषा इमर्ज की, क्योंकि डबल विदेशी एंज्वाय ज्यादा पसन्द करते हैं ना! कुछ होना चाहिये, कुछ एंज्वाय हो, ऐसे शान्त शान्त क्या रहें! तो बापदादा शिवरात्रि पर इन शब्दों का सभी से दृढ़ व्रत कराते हैं। व्रत लेने के लिये तैयार हो? या जब सुनेंगे तब कहेंगे कि ये तो थोड़ा, थोड़ा मुश्किल है! पहले तो ‘मुश्किल' शब्द संकल्प में भी नहीं लायेंगे - यह व्रत लेने के लिये तैयार हो? तो बापदादा ने देखा कि जब तक संकल्प में दृढ़ता नहीं तब तक सफलता नहीं होती। संकल्प होता है लेकिन दृढ़ नहीं होता तो कमजोरी आती है। बहुत करके कमजोरी के यही शब्द कहते हैं कि क्या करें! व्हाट। तो अभी व्हाट नहीं कहना लेकिन व्हाट के बजाय क्या कहेंगे? फ्लाय (उड़ना)। तो जब भी व्हाट शब्द आये तो ब्राह्मण डिक्शनरी में व्हाट के बजाए फ्लाय शब्द है। दूसरा शब्द क्या बोलते हो? व्हाई (क्यों), तो व्हाई को क्या करेंगे? बाय-बाय। सदा के लिये बाय-बाय करेंगे या थोड़े टाइम के लिये? और तीसरा शब्द क्या बोलते हैं? हाउ। तो हाउ (कैसे) नहीं, नो (ऐसे), जानते हैं, कैसे नहीं, नो अर्थात् जानने वाले। जब त्रिकालदर्शी बन जायेंगे, जानने वाले बन जायेंगे तो फिर हाउ कहेंगे क्या? हाउ कहना माना हौव्वा आना। तो हौव्वा अच्छा लगता है क्या? इसीलिये यही शब्द हैं जो कमजोरी लाते हैं। यही शब्द हैं जो व्यर्थ संकल्प का गेट खोलते हैं। सोचो! जब भी व्यर्थ संकल्पों की क्यू लगती है तो किस शब्द से लगती है? इन्हीं शब्दों से लगती है ना! या क्यों होगा, या क्या वा कैसे होगा। ये कैसे हुआ! ये कैसे कहा! ये क्यों कहा! अब क्या करें!... कैसे करें! तो कमजोरी के या व्यर्थ संकल्पों के गेट ये शब्द हैं। इसको डिक्शनरी में चेंज कर दो। फिर क्या होगा? आप भी चेंज हो जायेंगे ना! तो भक्त लोग आपको ही कॉपी कर रहे हैं। आपकी बेहद की बात है और उन्होंने हद के रूप में यादगार रखा है। तो यह दृढ़ व्रत रखना यही शिव जयन्ती वा शिवरात्रि मनाना है। मनाना अर्थात् बनना। ऐसे नहीं, सिर्फ केक काट लिया, लाइट जला ली, दीपक जला लिया, तो ये मनाना नहीं, ये मनोरंजन भी आवश्यक है लेकिन इसके साथ-साथ कुछ काटना है और कुछ जलाना भी है।

एक तरफ दीपक वा मोमबत्ती जलाते हो, दूसरा केक काटते हो, तीसरा झण्डा लहराते हो, चौथा गीत गाते हो, पांचवा डांस भी करते हो। और क्या करते हो? मीठा बांटते और खाते हो। तो अभी ये 6 बातें ही करनी पड़ेंगी। पहले तो दृढ़ संकल्प का अपने मन में दीप जलाओ कि अब से दृढ़ता द्वारा सफलता को पाना ही है। देखेंगे, पता नहीं, पता नहीं, नहीं। होना ही है, करना ही है, गे शब्द नहीं, है। और दूसरा केक कौन-सा काटेंगे? केक पूरा नहीं खाया जाता, काटकर खाया जाता है। तो क्या काटेंगे? जो भी सम्पन्न बनने में या सम्पूर्ण बनने में कोई भी संकल्प मात्र भी रुकावट हो उसको अब से काट लो, खत्म। और जो कमजोरी हो उसके बजाय शक्ति धारण करने का केक मुख में डालो। पहले काटो, फिर मुख में खाओ। समझा! झण्डा कौन-सा लहरा-येंगे? ये तो यादगार के रूप से झण्डा लहराते हैं लेकिन अपने दिल में बाप को हर संकल्प, बोल और कर्म द्वारा सदा प्रत्यक्ष करने का झण्डा दिल में लहराओ। कोई भी संकल्प, बोल और कर्म ऐसा नहीं हो जो बाप को प्रत्यक्ष करने का नहीं हो क्योंकि सबके दिल में बाप के स्नेह के कारण यही संकल्प है कि बाप को प्रत्यक्ष करना है। तो कैसे करेंगे? सदा अपने संकल्प, बोल और कर्म द्वारा दिल में प्रत्यक्ष करने का झण्डा लहराओ और सदा खुश रहने की डांस करते रहो। कभी खुश, कभी उदास यह नहीं। जब उदास होते हो तो उस समय भी अपना एक फोटो निकालो। और जब खुश होते हो तो भी फोटो निकालो। फिर दोनों फोटो साथ रखो। फिर देखो अच्छा क्या है? मैं ये हूँ या वो हूँ? तो सदा हर्षित रहने का, खुश रहने का डांस करो। कुछ भी हो जाये, कोई कितना भी खुशी चुराने की कोशिश करे क्योंकि माया किसी के द्वारा ही तो करायेगी ना! कुछ भी हो जाये, कितना भी कोई किसी भी प्रकार से खुशी कम करने या खुशी गुम करने का प्रयत्न करे लेकिन जब तक जीना है तब तक खुश रहना है। यह पक्का व्रत लिया है ना। क्या नहीं कर सकते हो! विल पॉवर है ना! तो जिसके पास विल पॉवर है वो क्या नहीं कर सकता! अगर आप मास्टर सर्वशक्तिमान् नहीं कर सकेंगे तो और कौन करेगा! कोई और पैदा होने वाले हैं या आप ही हो? माला के मणके आपको ही बनना है या औरों का इंतज़ार कर रहे हो? फर्स्ट डिवीजन में आना है ना! कि सेकेण्ड भी चलेगा? तो यह दृढ़ संकल्प अर्थात् व्रत लो कि जब तक जीना है तब तक खुश रहना है। और जो खुश रहेगा वो खुशी की मिठाई बांटता रहेगा। उस मिठाई से तो सिर्फ मुख मीठा होता है और इससे मन, तन, दिल सब खुश हो जाते हैं। तो यह मीठा बांटना है। और गीत सदा क्या गाते हो? मीठा बाबा, प्यारा बाबा, मेरा बाबा यही गीत गाते हो ना! सदा यह गीत ऑटोमेटिक बजता रहे। ऐसे नहीं, सेल खत्म हो जायें तो गीत खत्म हो जाये। बैटरी स्लो हो जाये। नहीं। जब बैटरी स्लो होती है, तो पता है कैसे गीत गाते हो? सबको अनुभव तो है ना। फिर क्या होता है? मेरा है तो बाबा, तो तो आ जाता है। सिर्फ मेरा बाबा नहीं कहेंगे, मेरा है तो बाबा। मिक्स हो गया ना। बैटरी स्लो होती है तो आवाज़ स्लो हो जाता है और उसमें तो तो शब्द एड हो जाता है। मेरा बाबा फ़लक से नहीं, मेरा है तो बाबा।

तो शिवरात्रि मनाना अर्थात् ये दृढ़ व्रत लेना। ऐसी शिवरात्रि मनाई ना? या सोचकर पीछे जवाब देंगे! अच्छा, बहुत होशियार हो, अभी-अभी सोच लिया। डबल विदेशी हो इसीलिये डबल होशियार हो। अच्छा!

डबल विदेशियों ने मधुबन में कौन-सी विशेष सेवा की? क्या किया? ब्रह्मा बाबा को प्रत्यक्ष किया। स्टैम्प का फंक्शन मनाया। विशेष योग भी लगाया ना। पॉवरफुल योग लगाया तो विघ्न विनाशक हो गये ना। चाहे मधुबन निवासियों के योग ने, चाहे डबल विदेशियों के योग ने, चाहे चारों ओर ब्राह्मण बच्चों के योग ने कमाल की ना क्योंकि चारों ओर सबका यह एक ही संकल्प था कि ब्रह्मा बाप को प्रत्यक्ष करना ही है। फिर कोई ने भाग-दौड़ की सेवा की, कोई ने मंसा सेवा की, कोई ने वाचा सेवा की, लेकिन जिन्होंने जो भी योगयुक्त होकर सेवा की ऐसे सेवाधारियों को सफलता की मुबारक। कितनी खुशी हुई! क्योंकि ब्रह्मा बाप से सबका दिल का अति सूक्ष्म प्यार है। सभी ने ब्रह्मा बाप को देखा है या जानते हो? क्या कहेंगे देखा है या जाना है? जो कहते हैं हमने देखा है वह हाथ उठाओ। जो कहते हैं जाना तो है लेकिन अभी देखना है वो हाथ उठाओ। (थोड़े लोगों ने उठाया) अच्छा, अनुभव किया है? ब्रह्मा हमारा बाप है यह अनुभव किया है? क्योंकि अनुभव भी एक आंख है, जैसे स्थूल आंखों से देखा जाता है तो सबसे बड़ी आंख है अनुभव। अनुभव की आंख से देखा तो भी देखा कहेंगे। अगर अनुभव भी नहीं किया और अव्यक्त रूप से, अव्यक्त स्थिति द्वारा देखा नहीं तो फिर अपना नाम दादियों को नोट कराना तो वो अनुभव करा देंगी। रह नहीं जाना क्योंकि दूसरों को स्टैम्प द्वारा ब्रह्मा बाप का अनुभव करा रहे हो और खुद नहीं करो तो अच्छा नहीं है ना। इसलिये जब ब्रह्मा बाप के चित्र के आगे बैठते हो तो चित्र से चैतन्यता के मिलन की, अनुभव की अनुभूति नहीं होती है! रूहरिहान का रेसपॉन्स नहीं मिलता है? मिलता है ना। तो बाप है तभी तो सुनता है और देता है। फिर भी इस अनुभव से वंचित नहीं रह जाना। समझा! तो सभी ने जो सेवा की, विशेष भारतवासियों ने ज्यादा सेवा का चांस लिया तो बापदादा नाम नहीं लेते हैं लेकिन सभी अपने सेवा के रिटर्न में नाम सहित मुबारक स्वीकार करें। डबल विदेशियों को भी सेवा का चांस मिल गया। अच्छा लगा ना! नाच रहे थे ना! अच्छा!

चारों ओर के ब्राह्मण जन्म के दिव्य जन्म के अधिकारी आत्माओं को, सदा बाप और आप साथ-साथ रहने वाले समीप आत्माओं को, सदा डबल पूज्य स्वरूप के स्मृति में रहने वाले समर्थ आत्माओं को, सदा दृढ़ संकल्प वा दृढ़ व्रत को निभाने वाले सफलता के अधिकारी आत्माओं को, सदा खुश रहने वाले और औरों को भी खुश करने वाले खुशनसीब बच्चों को, त्रिदेव रचता बाप की और ब्रह्मा बाप की विशेष बर्थ डे की मुबारक भी हो और याद-प्यार भी। साथ-साथ सर्वश्रेष्ठ आत्माओं को नमस्ते।

वरदान:- अपनी श्रेष्ठ स्थिति द्वारा भटकती हुई आत्माओं को श्रेष्ठ ठिकाना देने वाले लाइट स्वरूप भव

जैसे स्थूल रोशनी (लाइट) पर परवाने स्वत: आते हैं, ऐसे आप चमकते हुए सितारों पर भटकी हुई आत्मायें फास्ट गति से आयेंगी। इसके लिए अभ्यास करो - हर एक के मस्तक पर सदा चमकते हुए सितारे को देखने का। शरीरों को देखते भी न देखो। सदा नज़र चमकते हुए सितारे (लाइट) तरफ जाये। जब ऐसी रूहानी नज़र नेचुरल हो जायेगी, तो आपकी इस श्रेष्ठ स्थिति द्वारा भटकती हुई आत्माओं को यथार्थ ठिकाना मिल जायेगा।

स्लोगन:- सेवा के महत्व को जान कोई न कोई सेवा में बिजी रहने वाले ही आलराउन्ड सेवाधारी हैं।

19/11/2021

20-11-2021 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - सबको एक बाप का ही परिचय दो, एक बाप से लेन-देन रखो, बाप को ही अपना सच्चा पोतामेल दो''

प्रश्नः- बच्चों से अब तक भी अनेक प्रकार की भूलें होती रहती हैं, उसका कारण क्या है?

उत्तर:- मुख्य कारण है - योग में बहुत कच्चे हैं। बाप की याद में रहते तो कभी कोई बुरा काम हो नहीं सकता। नाम रूप में फँसेंगे तो योग लग नहीं सकता। तुम पतित से पावन बनने की धुन में रहो। निरन्तर शिवबाबा की याद में रहो, तुम्हारा आपस में जिस्मानी प्यार नहीं होना चाहिए।

गीत:- जले न क्यों परवाना...

ओम् शान्ति। यह भक्ति मार्ग के गीत गाये हुए हैं। आखरीन यह सब बन्द हो जायेंगे, इनकी दरकार नहीं। गायन भी है एक सेकेण्ड में बाप से वर्सा मिलता है। तुम जानते हो - बेहद के बाबा से जीवनमुक्ति का वर्सा मिलता है। जीवन-मुक्ति अर्थात् इस दु:खधाम से मुक्त, भ्रष्टाचारपने से मुक्त। फिर क्या बनेंगे? उसके लिए एम ऑब्जेक्ट तो बहुत अच्छी समझाने की है। बाबा ने रात्रि को भी समझाया कि कोई भी आते हैं तो पहले परिचय दो ऊंच ते ऊंच भगवान का। पूछते हैं - यहाँ का उद्देश्य क्या है? तो पहले-पहले परिचय देना है बेहद के बाप का। अब वह कहते हैं मुझे याद करो तो तुम पावन बनेंगे। गाते भी हैं हे पतित-पावन आओ। तो बाप को जरूर कोई अथॉरिटी होगी ना। कोई तो पार्ट मिला हुआ होगा। उनको कहते हैं - ऊंचे ते ऊंचा बाप। वह भारत में ही आते हैं। भारत को ही आकर ऊंच ते ऊंच बनाते हैं। वैकुण्ठ की सौगात ले आते हैं। मनुष्य सृष्टि में ऊंचे ते ऊंच हैं देवी-देवतायें, सूर्यवंशी घराना, जो सतयुग में राज्य करते थे। सतयुग स्थापन करने वाला ऊंचे ते ऊंचा भगवान ही है। उनको कहते भी हैं हेविन स्थापन करने वाला, हेविनली गॉड फादर। वह बाप है, उनके लिए कभी ऐसे नहीं कह सकते कि बाप सर्वव्यापी है। सर्वव्यापी कहने से बाप का वर्सा गुम हो जाता है। कितनी मीठी बातें हैं, बाप माना वर्सा। जरूर अपने बच्चों को ही वर्सा देंगे। सभी बच्चों का बाप एक ही है। वह आकर सुख-शान्ति का वर्सा देते हैं, राजयोग सिखलाते हैं। बाकी तो सभी आत्मायें हिसाब-किताब चुक्तू कर वापिस चली जायेंगी। अभी पुरानी दुनिया खत्म होने वाली है। उसके लिए यह महाभारत लड़ाई है। अनेक धर्मो का विनाश, एक धर्म की स्थापना होनी है। बुद्धि भी कहती है जरूर कलियुग के बाद सतयुग आना चाहिए। देवी-देवताओं की हिस्ट्री रिपीट। गाया भी हुआ है ब्रह्मा द्वारा स्थापना करते हैं। ऊंच ते ऊंच पद प्राप्त कराते हैं।

बाप कहते हैं - बच्चे यह अन्तिम जन्म पवित्र बनो। अब मृत्युलोक मुर्दाबाद और अमरलोक जिंदाबाद होना है। तुम सब पार्वतियां हो, अमरकथा सुन रही हो। बच्चे और बच्चियां दोनों अमर बनेंगे ना। इसको अमरकथा कहो, तीजरी की कथा कहो। अक्सर करके मातायें ही कथा सुनती हैं। क्या अमरपुरी में पुरुष नहीं होंगे? दोनों ही होंगे, यह बाप ही समझाते हैं कि भक्ति मार्ग के शास्त्र क्या कहते हैं और बाप क्या कहते हैं? यह भी कहते हैं भक्ति का फल भगवान देने आते हैं। बरोबर सतयुग में इन देवी-देवताओं का ही विश्व पर राज्य था। इन्हों को फल किसने दिया? कोई भी साधू-संन्यासी आदि तो दे न सकें। यह भी जानते हो भक्ति भी सब एक जैसी नहीं करते। जो बहुत भक्ति करेगा उनको फल भी जरूर ऐसा ही मिलेगा। जो पूज्य थे वही पुजारी बनें फिर पूज्य बनेंगे। भक्ति का फल तो मिलेगा ना। यह बातें भी सब समझानी होती हैं। पहले-पहले त्रिमूर्ति पर समझाना है। ऐसा नहीं कि पहले सीढ़ी के चित्र पर ले जाओ। यह है डीटेल की बातें। पहले-पहले परिचय देना है बाप का। वह है ऊंचे ते ऊंचा। फिर ब्रह्मा विष्णु शंकर का फिर लक्ष्मी-नारायण का। बाकी भक्ति मार्ग के चित्र तो ढेरों के ढेर हैं। पहले-पहले यह बोलो कि बेहद का बाप है - जिससे हम बेहद स्वर्ग का वर्सा लेते हैं। ऊंचे ते ऊंचा भगवान वर्सा भी ऊंचे ते ऊंचा देते हैं। भारत में शिव जयन्ती भी मनाई जाती है, जरूर हेविनली गॉड फादर ने आकर हेविन स्थापन किया होगा। बाप ही स्वर्ग स्थापन करते हैं फिर 5 हजार वर्ष के बाद नर्क हो जाता है। राम को भी आना पड़ता है, तो समय पर रावण को भी आना पड़ता है। राम वर्सा देते, रावण श्राप देते हैं। ज्ञान अर्थात् दिन पूरा हो रात हो जाती है। दिन में सिर्फ सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी। यह बातें नटशेल में समझाने की बहुत सहज हैं। पहले-पहले ऊंचे ते ऊंच बाप का परिचय दे पक्का कराना चाहिए। मूल बात ही यह है। सतयुग में देवी-देवता घराना था। सतोप्रधान थे फिर सतो-रजो-तमो में आये। यह है चक्र। एक ही चीज़ कायम नहीं रह सकती। तुम बच्चों की बुद्धि में यही याद रहे कि ऊंचे ते ऊंच बाप को याद करना है। इस याद में बहुत कच्चे हैं। बाबा भी अपना अनुभव बताते हैं तो याद ही घड़ी-घड़ी भूल जाती है क्योंकि इनको बहुत ख्यालात रहते हैं। तब तो कहा जाता है जिनके मत्थे मामला, वह याद में कैसे रह सकें। बाबा का सारा दिन ख्यालात चलता रहता है। कितनी बातें सामने आती हैं। बाबा को सुबह उठकर बैठने में जास्ती मजा आता है। नशा भी रहता है। बस, यह स्थापना होने के बाद हम विश्व का महाराजा बनूँगा फिर से। जैसे बाबा अपना अनुभव बताते हैं कि पहली-पहली मुख्य बात है - बाप का परिचय। और जो भी बातें कोई कहे बोलो, इससे कोई फायदा नहीं। हम तुमको परिचय देते हैं ऊंचे ते ऊंच बाप का। वही ऊंचे ते ऊंच वर्सा देते हैं विश्व का मालिक बनने का। आर्य समाजी लोग देवताओं के चित्रों को नहीं मानते। तुम्हारे पास चित्र देखते हैं तब ही बिगड़ते हैं। जिसको वर्सा लेना होगा वह शान्ति से आकर सुनते रहेंगे। मुख्य बात ही एक है ऊंचे ते ऊंचे भगवान की। ऊंचे ते ऊंचा ब्रह्मा विष्णु शंकर को नहीं कहेंगे। ऊंचे ते ऊंच बाप से ही वर्सा मिलता है। वही पतित-पावन है। यह बात पक्की कर लो। गॉड इज वन। बाप माना वर्सा। भारत में आकर वर्सा देते हैं। ब्रह्मा द्वारा नई दुनिया की स्थापना, शंकर द्वारा विनाश। इस महाभारत लड़ाई से ही स्वर्ग के गेट खुलते हैं। पतित से पावन बनते हैं। बेहद के बाप से ही भारत को वर्सा मिल रहा है। दूसरी कोई बात नहीं। यहाँ है एक बात। बाप कहते हैं - मुझे याद करो तो तुम्हारी खाद निकले। यह एक बात जब समझें तब और कुछ समझाना। यह जो इतने चित्र हैं, यह हैं रेजगारी। हम कहते हैं ज्ञान अमृत पीकर पवित्र बनो। वह कहते हैं विष चाहिए। उस पर भी यह चित्र हैं, तब कहते हैं अमृत छोड़ विष काहे को खाये। यह रूहानी नॉलेज स्प्रीचुअल फादर ही देते हैं। वह बाप सर्वव्यापी कैसे होगा। तुम बाप को सर्वव्यापी मानते हो तो भल मानो, हम अब नहीं मानेंगे। आगे हम मानते थे। अब बाप ने बताया है यह भूल है। बाप से वर्सा मिलता है। अब भारत नर्क है, उसको फिर हम स्वर्ग अर्थात् पवित्र गृहस्थ आश्रम बनाते हैं। आदि सनातन देवी-देवताओं का पवित्र गृहस्थ आश्रम था। अभी है अपवित्र विशश दुनिया। बाप कहते हैं मुझे याद करो। ऊंचे ते ऊंच शिवबाबा, क्रियेटर है, उनसे वर्सा मिलता है। अभी कलियुग में हैं ढेर मनुष्य, सतयुग में तो बहुत थोड़े मनुष्य हैं। तो उस समय बाकी सब शान्तिधाम में हैं। तो जरूर अब लड़ाई लगेगी तब तो मुक्ति में जायेंगे। यह सब बातें बच्चों की बुद्धि में रहनी चाहिए। बच्चों को सर्विस जरूर करनी है। सर्विस से ही ऊंच पद पायेंगे। ऐसे नहीं आपस में नहीं बनी तो शिवबाबा को भूल जाना या शिवबाबा की सर्विस करना छोड़ देना है। फिर तो यह पद भ्रष्ट हो जायेगा। फिर यह सर्विस करने के बदले डिससर्विस कर देंगे। आपस में लून-पानी होकर सर्विस को छोड़ देना, इस जैसा बुरा काम कोई नहीं। बाबा को याद करो तो कमाई भी होगी। अब ज्ञान मिला है होली बनो और बाप को याद करो। धुरिया कहा जाता है ज्ञान की रिमझिम को। ज्ञान और विज्ञान कहा जाता है। विज्ञान है योग, ज्ञान है सृष्टि चक्र का। होली-धुरिया, मनुष्य कुछ समझते नहीं हैं। बाप को याद करना और ज्ञान सबको सुनाना। बाबा बार-बार समझाते हैं कि ऊंचे ते ऊंच बाप को सर्वव्यापी कह नहीं सकते। नहीं तो खुद किसको याद करते हैं? बाप कहते हैं - निरन्तर मुझे याद करो। परन्तु रचयिता को नहीं जानते तो मिलेगा क्या! न जानने के कारण सर्वव्यापी कह देते हैं। तो ऊंचे ते ऊंचा सिद्ध कर समझाओ तो सर्वव्यापी की बातें बुद्धि से निकल जाएं। हम सब ब्रदर्स हैं। बाप हर 5 हजार वर्ष के बाद आकर वर्सा देते हैं। सतयुग में देवी-देवता होंगे। बाकी सब मुक्ति में जायेंगे। सबको बाप का परिचय देते रहो। क्राइस्ट की प्रेयर करते हैं - बोलो क्राइस्ट तो सबका फादर नहीं है ना। सबका फादर तो निराकार है, जिसको ही आत्मा पुकारती है - ओ गॉड फादर, क्राइस्ट उनका सन गाया हुआ है। सन से वर्सा कैसे मिलेगा? क्राइस्ट तो रचना है। ऐसे कोई भी शास्त्र में लिखा हुआ नहीं है कि क्राइस्ट को याद करने से आत्मा तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जायेगी। एक गीता में ही है कि मामेकम् याद करो। गॉड फादर का शास्त्र है ही गीता। सिर्फ बाप का नाम बदली कर कृष्ण का नाम लिख दिया है। यह भूल कर दी है। ऊंचे ते ऊंचा बाप है, वही सुख-शान्ति का वर्सा देते हैं। शिव का चित्र सबको अपने पास रखना है। शिवबाबा यह वर्सा देते हैं फिर 84 जन्मों में गँवा देते हैं। सीढ़ी पर समझाना है - पतित-पावन बाप ही आकर पावन बनने की युक्ति बताते हैं। वह कहते हैं कृष्ण भगवानुवाच, तुम कहते हो शिव भगवानुवाच। फर्स्ट फ्लोर में ऊंचा बाप रहता है फिर सेकण्ड फ्लोर में सूक्ष्मवतन। यह है थर्ड फ्लोर। सृष्टि यहाँ है, पीछे सूक्ष्मवतन में जाते हैं। वहाँ ट्रिब्यूनल बैठती है, सजायें मिलती हैं। सजायें खाकर पवित्र बन चले जाते हैं ऊपर। बाप सब बच्चों को ले जाते हैं। अब है संगम। इसको 100 वर्ष देने चाहिए। बच्चे पूछते हैं बाबा स्वर्ग में क्या-क्या होगा? बाबा कहते बच्चे वह आगे चलकर देखना। पहले तुम बाप को जानो, पतित से पावन बनने की धुन में रहो। स्वर्ग में जो होना होगा सो होता रहेगा। तुम पावन ऐसा बनो जो बाप का पूरा वर्सा मिल जाए नई दुनिया का। बाकी बीच में क्या होता है, यह भी आगे चलकर देखना है। तो यह बातें सब याद रखनी चाहिए। न याद रहने के कारण समय पर समझते नहीं, भूल जाते हैं। बच्चों को कर्म भी अच्छे करने हैं। बाप की याद में रहने से बुरा काम होगा ही नहीं। बहुत बुरे कर्म भी करते हैं। ऐसे थोड़ेही सिर्फ इसी ब्राह्मणी का अच्छा लगता है। वह ब्राह्मणी गई तो खुद भी खलास। ब्राह्मणी के कारण मर जाते हैं। गोया बाप से वर्सा लेने से मरे। यह भी बदकिस्मती कही जाती है।

कई बच्चे एक दो के नाम रूप में फँस मरते हैं। यहाँ तुम्हारा जिस्मानी प्यार नहीं होना चाहिए। निरन्तर शिवबाबा को याद करना है। कोई से भी लेना-देना नहीं है। बोलो, हमको क्यों देते हो? तुम्हारा योग तो शिवबाबा से है ना। जो डायरेक्ट नहीं देते, उनका शिवबाबा के पास जमा नहीं होता है। ब्रह्मा द्वारा स्थापना होती है तो उनके द्वारा सब कुछ करना है। बीच में कोई खा गया तो शिवबाबा के पास तो जमा नहीं हुआ। शिवबाबा को देना है तो थ्रू ब्रह्मा। सेन्टर भी थ्रू ब्रह्मा ही खोलो। आपेही सेन्टर खोलते हैं तो वह थोड़ेही सेन्टर हुआ। बापदादा दोनों इकट्ठे हैं। इनके हाथ आया गोया शिवबाबा के हाथ आया। कितने सेन्टर्स हैं जिनका कोई समाचार ही नहीं। लिखना चाहिए शिवबाबा आपके सेन्टर का यह पोतामेल है। सेठ के पास पोतामेल आना चाहिए ना। बहुतों का शिवबाबा के पास जमा नहीं होता है। यह भी अक्ल नहीं है, भल ज्ञान बहुत है परन्तु युक्ति नहीं आती है। बस हमने सेन्टर खोला। तुमने जिसको दिया, उसने सेन्टर खोला। वह शिवबाबा ने थोड़ेही खोला। वह सेन्टर फिर ज़ोर भी नहीं भरता है। सेन्टर खोलना हो तो शिवबाबा के थ्रू। शिवबाबा हम यह देते हैं, इसमें लगा देना। बच्चे भूलें बहुत करते हैं। योग में बहुत कच्चे हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) ज्ञान के साथ-साथ अपना भविष्य बनाने की युक्ति भी सीखनी है। एक बाप से वर्सा लेना है। किसी देह-धारी के पीछे बदकिस्मत नहीं बनना है।

2) आपस में किसी बात के कारण बाप की सर्विस नहीं छोड़ना है। सवेरे-सवेरे उठकर अपने आपसे बातें करनी है। याद करने की मेहनत करनी है।

वरदान:- अनुभव की विल पावर द्वारा माया की पावर का सामना करने वाले अनुभवीमूर्त भव

सबसे पावरफुल स्टेज है अपना अनुभव। अनुभवी आत्मा अपने अनुभव की विल-पावर से माया की कोई भी पावर का, सभी बातों का, सर्व समस्याओं का सहज ही सामना कर सकती है और सभी आत्माओं को सन्तुष्ट भी कर सकती है। सामना करने की शक्ति से सर्व को सन्तुष्ट करने की शक्ति अनुभव के विल पावर से सहज प्राप्त होती है, इसलिए हर खजाने को अनुभव में लाकर अनुभवीमूर्त बनो।

स्लोगन:- एक दो को देखने के बजाए स्वयं को देखो और परिवर्तन करो।

19/11/2021

19-11-2021 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - सर्विस के साथ-साथ याद की यात्रा को भी कायम रखना है, इस रूहानी यात्रा में कभी ठण्डे नहीं होना''

प्रश्नः- बच्चों की दिल अगर रूहानी सर्विस में नहीं लगती तो उसका कारण क्या है?

उत्तर:- अगर रूहानी सर्विस में दिल न लगे तो जरूर देह-अभिमान की ग्रहचारी है। चलते-चलते देह अभिमान के कारण जब आपस में रूठ पड़ते हैं तो सर्विस ही छोड़ देते हैं। एक दो की शक्ल देखते ही सर्विस के ख्याल उड़ जाते हैं इसलिए बाबा कहते इस ग्रहचारी से सम्भाल करो।

गीत:- हमारे तीर्थ न्यारे हैं....

ओम् शान्ति। इस गीत की लाइन ने बच्चों को खबरदार कर दिया। क्या कहा? बुद्धि में यह याद रखना है कि हम तीर्थ यात्रा पर हैं और हमारी यह यात्रा सबसे न्यारी है। इस यात्रा को भूलो मत। यात्रा पर ही सारा मदार है और तो जिस्मानी यात्राओं पर जाकर फिर लौट आते हैं और जन्म-जन्मान्तर यात्रा करते ही आते हैं। हमारे तीर्थ वह नहीं हैं। अमरनाथ में जाकर फिर मृत्युलोक में चले आना। तुम्हारी वह यात्रा नहीं है और सब मनुष्यों की वह यात्रायें हैं। तीर्थ पर जाकर, चक्र लगाकर फिर आए पतित बन जाते हैं। किसम-किसम की यात्रायें हैं ना। देवी के मन्दिर भी अथाह हैं। विकारियों के साथ कितने यात्रा पर जाते हैं। तुम बच्चों ने तो प्रण किया हुआ है - निर्विकारी रहने का। तुम निर्विकारियों की यह यात्रा है। निर्विकारी बाप जो एवर-प्योर है, उनको याद करना है। पानी के सागर को विकारी वा निर्विकारी नहीं कहेंगे। और न उनसे निकली हुई गंगायें ही निर्विकारी बनायेंगी। मनुष्य मात्र इतने तो पतित बन पड़े हैं, कुछ भी समझते ही नहीं। वह जिस्मानी यात्रायें हैं - अल्पकाल क्षणभंगुर की यात्रायें। यह यात्रा बड़ी है। तुम बच्चों को उठते बैठते यात्रा का ख्याल रखना है। यात्रा पर जाते हैं तो धन्धाधोरी गृहस्थ व्यवहार आदि सब भूलना होता है। अमरनाथ की जय... बस ऐसे कहते जाते हैं। मास दो मास तीर्थ यात्रा कर फिर आकर गंद में पड़ते हैं। फिर जाते हैं गंगा स्नान करने। उनको यह पता ही नहीं है कि हम रोज़ पतित होते हैं। गंगा जमुना पर रहने वाले भी रोज़ पतित होते हैं। रोज़ गंगा पर जाकर स्नान करते हैं। एक तो नियम होता है, दूसरे फिर बड़े दिनों पर जाते हैं समझते हैं कि गंगा पतित-पावनी है। ऐसे तो नहीं खास उस एक दिन पर गंगा पावन बनाने वाली बनती है, फिर नहीं रहती। जिस दिन मेला लगता है उस दिन वह पतित-पावनी बन जाती है। नहीं। वह तो है ही है। रोज़ भी जाते हैं स्नान करने। मेले पर भी खास दिन जाते हैं। अर्थ नहीं। गंगा जमुना चीज़ तो वही है। उसमें मुर्दे भी डाल देते हैं।

अभी तुम बच्चों को रूहानी यात्रा पर रहना है। बस अब हम जाते हैं घर। इसमें गंगा स्नान करने वा शास्त्र पढ़ने की कोई बात ही नहीं। बाप आते भी एक ही बार हैं। सारी दुनिया भी पतित से पावन एक ही बार बनती है। यह भी जानते हैं सतयुग है नई दुनिया, कलियुग है पुरानी दुनिया। बाप को आना है जरूर। नई दुनिया की स्थापना और पुरानी दुनिया का विनाश करने। यह उनका ही काम है। परन्तु माया ने ऐसा तमोप्रधान बुद्धि बना दिया है जो कुछ भी समझते नहीं। प्रदर्शनी में कितने ढ़ेर बड़े आदमी आते हैं। संन्यासी भी आयेंगे फिर भी समझेंगे कोटों में कोई। तुम लाखों करोड़ों को समझाते हो तब कोई विरला आता है। बहुतों को समझाना होगा। आखरीन तुम्हारी यह समझानी और चित्र आदि सब अखबारों में भी पड़ेंगे। सीढ़ी भी अखबार में पड़ेगी। कहेंगे यह तो भारत के लिए ही है और धर्म वाले कहाँ जायेंगे। कयामत का समय भी गाया हुआ है। कयामत अर्थात् वापिस जाने का। पुरानी दुनिया का विनाश नई दुनिया की स्थापना होगी तो जरूर सब वापिस जायेंगे ना। सबका विनाश होना है। नई दुनिया स्थापन हो रही है। यह बातें कोई नहीं जानते सिवाए तुम बच्चों के। तुम जानते हो नर्कवासियों का विनाश, स्वर्गवासियों की स्थापना हो रही है। कल्प-कल्प ऐसा ही होता है। अभी जो थोड़ा बहुत टाइम है, इसमें भी बहुतों को समझानी मिलती जायेगी। मेले होते रहेंगे। सब तरफ से लिखते रहते हैं हम मेला करें, प्रदर्शनी करें। परन्तु साथ-साथ अपनी याद की यात्रा भी भूलनी नहीं चाहिए। बच्चे बिल्कुल ही ठण्डे चल रहे हैं। यात्रा ऐसे करते हैं जैसे बूढ़े। जैसे ताकत ही नहीं, कुछ खाया ही नहीं है। बाबा का कितना ख्याल चलता रहता है। ख्यालात करते-करते नींद ही फिट जाती है। विचार सागर मंथन तो सबको करना चाहिए ना। बच्चे जानते हैं हमको बेहद का बाप पढ़ाते हैं। तो बच्चों को कितना अपार खुशी होनी चाहिए। इस पढ़ाई से हम विश्व के मालिक बनते हैं। कोई-कोई की तो चलन ऐसी है - जैसे केकड़े हैं। केकड़ों को बाप देवता बनाते हैं। फिर भी चलन मुश्किल किसकी सुधरती है। इस सीढ़ी के चित्र में बड़ी अच्छी नॉलेज है। परन्तु बच्चे इतना काम नहीं करते। यात्रा ही नहीं करते। बाप को याद करें तो बुद्धि का ताला भी खुलता जाए। गोल्डन बुद्धि बनती जाए। तुम बच्चों की पारसबुद्धि होनी चाहिए, बहुतों का कल्याण करना चाहिए। तुम सतोप्रधान से अब तमोप्रधान बने हो, फिर सतोप्रधान बनना है। बाप कहते हैं मुझे याद करो। कृष्ण को भगवान नहीं कहा जा सकता। उनको तो कहते हैं सांवरा-श्याम। बाप ने सांवरे की आत्मा को बैठ फिर समझाया है। यह आत्मा जानती है कि बाबा हमको विश्व का मालिक बनाते हैं तो खुशी में कितना दिमाग पुर (भरपूर) होना चाहिए। इसमें घमन्ड की कोई बात नहीं। बाप कितना निरहंकारी है। बुद्धि में कितनी खुशी रहती है। कल हम हीरे जवाहरों के महल बनायेंगे। नई दुनिया में राजधानी चलायेंगे। यह तो बिल्कुल पतित दुनिया है। इस दुनिया के मनुष्य तो कोई काम के नहीं, कुछ नहीं जानते हैं। यह भी दिखाना चाहिए - हीरे जैसा जीवन था। वही फिर 84 जन्म ले कौड़ी मिसल बन जाते हैं। यह सीढ़ी का चित्र नम्बरवन है। फिर दूसरे नम्बर में है त्रिमूर्ति।

तुम कहते हो - निकट भविष्य में श्रेष्ठाचारी भारत बन जायेगा। श्रेष्ठाचारी दुनिया में बहुत थोड़े मनुष्य होंगे, अभी कितने ढेर मनुष्य हैं। महाभारत लड़ाई भी सामने खड़ी है। सब आत्मायें मच्छरों सदृश्य जायेंगी। आग भड़क रही है। जितना कोशिश करते हैं सुधारने की, उतना ही बिगड़ते जाते हैं। बाप बच्चों को राजयोग सिखला रहे हैं। बच्चों को कितना नशा चढ़ाते हैं। कोई-कोई तो यहाँ से बाहर निकले, सारा ज्ञान उड़ जाता है। स्मृति कुछ भी रहती नहीं। नहीं तो शौक हो कि जाकर सर्विस करें। बाप भी गुण देख सर्विस पर भेजेंगे ना। इसमें बड़े हर्षित रहेंगे। सर्विस में खुशी का पारा चढ़ेगा। अच्छे-अच्छे पुराने बच्चे आपस में रूठ पड़ते हैं थोड़ी-थोड़ी बात में। ऐसे थोड़ेही इन बातों के कारण तुमको सर्विस नहीं करनी है। सर्विस तो खुशी से करनी चाहिए। जिसके साथ बनती नहीं है, उसकी शक्ल देखने से ही सर्विस का ख्याल उड़ जाता है। सर्विस में दिल नहीं लगती है तो किनारा कर लेते हैं। फिर तो ज्ञानी और अज्ञानी में कोई फ़र्क नहीं रहा। देह-अभिमान की ग्रहचारी आकर बैठती है। यह है पहले नम्बर की बीमारी। बाप कहते हैं - बच्चे देही-अभिमानी बनो। आत्मा ही सब कुछ करती है ना। आत्मा ही विकारी और निर्विकारी बनती है। स्वर्ग में निर्विकारी थी। रावणराज्य में आत्मा ही विकारी बनी है। यह भी ड्रामा ऐसा बना हुआ है इसलिए पुकारते हैं हे पतित-पावन आओ। जो निर्विकारी थे, वही पतित विकारी बने हैं। यह किसकी भी बुद्धि में नहीं है कि हम ही निर्विकारी थे, अब विकारी बने हैं। हम आत्मा मूलवतन की रहने वाली हैं। वहाँ तो हम आत्मा निर्विकारी होंगे। यहाँ शरीर में आकर पार्ट बजाते-बजाते विकारी बने हैं। यह बाप बैठ समझाते हैं। आत्मा शान्तिधाम से आती है तो जरूर पवित्र ही होगी फिर अपवित्र बनी है। पवित्र दुनिया में 9 लाख होते हैं। फिर इतनी सब आत्मायें कहाँ से आई? जरूर शान्तिधाम से आई होंगी। वह है पीसफुल इनकॉरपोरियल वर्ल्ड। वहाँ सब आत्मायें पवित्र रहती हैं फिर पार्ट बजाते-बजाते, सतो-रजो-तमो में आती हैं। पावन से पतित होना है। फिर बाप आकर सबको पावन बनायेंगे। यह ड्रामा चलता ही रहता है। ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त का राज़ बाप के सिवाए और कोई बतला न सके। उस बाप को कोई जानते ही नहीं हैं। ऋषि-मुनि भी नेती-नेती कह गये। हम भगवान को और उनकी रचना को नहीं जानते हैं। फिर कहते भी हैं - गॉड फादर इज़ नॉलेजफुल। वह परमात्मा सर्व आत्माओं का बाप, बीजरूप है। वह है आत्माओं का बीजरूप और यह प्रजापिता ब्रह्मा है मनुष्य सृष्टि का बीजरूप। वह निराकार बाप इसमें प्रवेश कर मनुष्यों को समझाते हैं, मनुष्य द्वारा। उनको मनुष्य सृष्टि का बीजरूप नहीं कहेंगे। वह है आत्माओं का पिता और यह ब्रह्मा है मनुष्य सृष्टि का प्रजापिता, जिस द्वारा बाप आकर ज्ञान देते हैं। शरीर अलग, आत्मा अलग है ना। मन-बुद्धि चित आत्मा में है। आत्मा आकर शरीर में प्रवेश करती है, पार्ट बजाने के लिए।

तुम जानते हो कोई शरीर छोड़ते हैं तो जाकर दूसरा पार्ट बजायेंगे, इसमें रोने से क्या होगा। गया सो गया फिर थोड़ेही आकर हमारा मामा, चाचा बनेगा। रोने से क्या फायदा। तुम्हारी मम्मा गई, ड्रामा अनुसार पार्ट बजा रही है। ऐसे बहुत जाते हैं। कोई कहाँ जाए जन्म लेते हैं। यह समझ में आता है जैसा-जैसा आज्ञाकारी बच्चा होगा उतना जरूर अच्छे घर में जन्म लिया होगा। यहाँ के जायेंगे ही अच्छे घर में। नम्बरवार तो होते हैं ना। जैसा जो कर्म करते हैं - ऐसे घर में जाते हैं। पिछाड़ी में तुम जाकर राजाई घर में जन्म लेते हो। कौन राजाओं के पास जायेंगे, वह खुद समझ सकते हैं ना। फिर भी दैवी संस्कार तो ले जाते हैं ना। इसमें बड़ी विशाल बुद्धि से विचार सागर मंथन करना होता है। बाप ज्ञान का सागर है। तो बच्चों को भी ज्ञान का सागर बनना है। नम्बरवार तो होते ही हैं। समझा जाता है - आगे चल उन्नति होती जायेगी। हो सकता है जो आज काम नहीं कर सकते हैं, वह कल बहुतों से तीखे चले जाएं। ग्रहचारी उतर जाए। कोई पर राहू की ग्रहचारी बैठती है तो गटर में गिर पड़ते हैं। हडगुड ही टूट जाते हैं। बेहद के बाप से प्रतिज्ञा कर फिर गिरते हैं तो धर्मराज द्वारा सजायें भी बहुत मिलती हैं। यह बेहद का बाप, बेहद का धर्मराज है, फिर बेहद की सजा मिलती है। कोई बात में आनाकानी करेंगे या उल्टा काम करेंगे तो सजा जरूर खायेंगे। समझते नहीं कि हम भगवान की अवज्ञा करते हैं। इतनी सब बातें बाप समझाते रहते हैं। श्रीमत पर चलो, सर्विस में मददगार बनो। योग की यात्रा पर रहो। चित्रों पर समझाने की प्रैक्टिस करेंगे तो आदत पड़ जायेगी। नहीं तो ऊंच पद कैसे मिलेगा। अज्ञानकाल में कोई का बच्चा बड़ा सपूत होता है, कोई तो बड़े कपूत भी होते हैं। यहाँ भी कोई-कोई तो झट बाबा का काम कर दिखाते हैं। तो बच्चों को सर्विस बेहद की करनी है। बेहद की आत्माओं का कल्याण करना है। पैगाम देना है - मनमनाभव। बाप को याद करने से तुम्हारी बुद्धि तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जायेगी। अभी है कलियुगी तमोप्रधान दुनिया की इन्ड। अब सतोप्रधान बनना है। आत्माओं की भी वहाँ नम्बरवार दुनिया है ना, जो फिर नम्बरवार आकर पार्ट बजाते हैं। आयेंगे भी नम्बरवार ड्रामा अनुसार। अभी सब आत्मायें रावण राज्य में दु:खी हैं। सो भी समझते थोड़ेही हैं। अगर किसको कह दो तुम पतित हो तो बिगड़ पड़ेंगे। बाप समझाते हैं यह है ही विशश वर्ल्ड। बाप कहते हैं - तुम अपना राज्य-भाग्य ले लेंगे। बाकी सब विनाश हो वापिस चले जाने वाले हैं। यह तो गाया हुआ है महाभारत लड़ाई लगनी है, जिससे सब धर्म खलास हो बाकी एक धर्म रहेगा। यह लड़ाई के बाद स्वर्ग के द्वार खुलते हैं। कितनी अच्छी रीति बच्चों को समझाते हैं। आगे चल तुम्हारी बातें सुनते रहेंगे और आते जायेंगे। सूर्यवंशी चन्द्रवंशी जो पतित बन गये हैं वही आकर नम्बरवार अपना वर्सा लेंगे। प्रजा तो ढेर बनेंगी। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) भगवान की आज्ञाओं की अवज्ञा कभी नहीं करनी है। बेहद सेवा में सपूत बच्चा बन मददगार बनना है।

2) ज्ञान धन की गुप्त खुशी से बुद्धि को भरपूर रखना है। आपस में कभी भी रूठना नहीं है।

वरदान:- सर्व शक्तियों की सम्पत्ति से सम्पन्न बन दाता बनने वाले विधाता, वरदाता भव

जो बच्चे सर्व शक्तियों के सम्पत्तिवान हैं - वही सम्पन्न और सम्पूर्ण स्थिति के समीपता का अनुभव करते हैं। उनमें कोई भी भक्तपन के वा भिखारीपन के संस्कार इमर्ज नहीं होते, बाप की मदद चाहिए, आशीर्वाद चाहिए, सहयोग चाहिए, शक्ति चाहिए - यह चाहिए शब्द दाता विधाता, वरदाता बच्चों के आगे शोभता ही नहीं। वे तो विश्व की हर आत्मा को कुछ न कुछ दान वा वरदान देने वाले होते हैं।

स्लोगन:- हर आत्मा को कोई न कोई प्राप्ति कराने वाले वचन ही सत वचन हैं।

Address

Hyderabad
500004

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Bk Hindi Murlis posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Place Of Worship

Send a message to Bk Hindi Murlis:

Share