Jai Ram Ji Baba

Jai Ram Ji Baba नगर होशंगाबाद में बहे नर्मदा नीर,
रामदास जी के दर्शन से निर्मल होत शरीर।
दर्शन तो दुर्लभ हैं, दहरी लो प्रणाम,
अब स्वामी ऐसी बनी राम भजे से काम,

Ramdas or Ramji me do mat jano koi jo karaj Hari se bne soyee Ramdas ji se hoi

🙏जय गुरु महाराज 🙏
16/07/2026

🙏जय गुरु महाराज 🙏

🙏 जय गुरु साहेब 🙏
16/07/2026

🙏 जय गुरु साहेब 🙏

28/06/2026
🙏 जय गुरु महाराज 🙏
28/06/2026

🙏 जय गुरु महाराज 🙏

ॐ श्री श्री 1008 संत शिरोमणि राम जी बाबा जी की समाधि ॐ ।। जय गुरु महाराज ।।।। जय श्री रामजी बाबा ।।🌅🙏 रात दिवस की गम नही...
23/05/2026

ॐ श्री श्री 1008 संत शिरोमणि राम जी बाबा जी की समाधि ॐ

।। जय गुरु महाराज ।।
।। जय श्री रामजी बाबा ।।

🌅🙏 रात दिवस की गम नहीं जहाँ शाहिब सदा हजूर 🙏 🌅


Jai Ram Ji Baba

28/02/2026
गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागू पांय। बलिहारी गुरु आपने जो ,गोविंद दियो बताये।। 🙏🙏
19/02/2026

गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागू पांय।
बलिहारी गुरु आपने जो ,गोविंद दियो बताये।। 🙏🙏

🔹 पंक्ति:हरिजन हंसा एक है, बगुला कोट हजार ।हरि जन हंसा मोती चुगे, बग मच्छी चुन खाय ।।अर्थ:सच्चा भक्त (हरिजन) हंस के समान...
17/02/2026

🔹 पंक्ति:
हरिजन हंसा एक है, बगुला कोट हजार ।
हरि जन हंसा मोती चुगे, बग मच्छी चुन खाय ।।

अर्थ:
सच्चा भक्त (हरिजन) हंस के समान होता है — वह बहुत दुर्लभ है, एक ही मिलता है।
लेकिन बगुले जैसे दिखावटी लोग हजारों मिल जाते हैं।
हंस मोती चुनता है — यानी सच्चा साधक केवल सार, नाम, सत्य और भक्ति को ग्रहण करता है।
जबकि बगुला मछली खाता है — यानी वह माया, लोभ, दिखावा और विषय-विकार में लगा रहता है।
👉 बाहर से दोनों सफेद दिखते हैं, पर स्वभाव और चयन से पहचान होती है।

🔹 पंक्ति:
हरिजन हंसा होय के, घर-घर माँगे भीख ।
राज द्वारे वे फिरें, क्यों न होत फजीत ।।

अर्थ:
यदि कोई अपने आपको संत या हरिजन कहे, लेकिन घर-घर जाकर मान-सम्मान, धन या लालच माँगे —
तो वह हंस नहीं, बल्कि बगुले जैसा है।
जो व्यक्ति राज-द्वारों (अमीरों, सत्ता, प्रतिष्ठा) के चक्कर लगाता है,
उसकी अंत में फजीहत (अपमान) ही होती है, क्योंकि उसका उद्देश्य भक्ति नहीं, स्वार्थ है।

✨ सच्चा भक्त दुर्लभ होता है, दिखावे वाले बहुत मिल जाते हैं।
✨ हंस केवल मोती चुनता है — अर्थात् सत्य, नाम और भक्ति को ग्रहण करता है।
✨ बगुला विषय-विकारों में लगा रहता है — बाहर से साधु, भीतर से आसक्ति।
✨ भक्ति में स्वार्थ नहीं, समर्पण चाहिए।
🌺 सार यही — वेश नहीं, अंतःकरण ही पहचान है। 🌺
॥ जय राम जी बाबा ॥

✨ संदेश (सार):
सच्चा संत दुर्लभ होता है, दिखावटी बहुत होते हैं।
पहचान वेश से नहीं, विवेक और आचरण से होती है।
जो केवल परमात्मा का सार ग्रहण करे वही "हंस" है।
जो लोभ-मान में लगे, वह साधु नहीं, केवल रूपधारी है।
भक्ति में स्वार्थ आया तो पतन निश्चित है।

श्रीमत् परिब्राजकाचार्य श्री 108 श्री स्वामी रामदासजी की वाणी                            साखीकहें रामदासजी.... शरण साई क...
16/02/2026

श्रीमत् परिब्राजकाचार्य श्री 108
श्री स्वामी रामदासजी की वाणी
साखी

कहें रामदासजी....

शरण साई के आइया, नीरा निकट हजूर । बिना पेड़ को वृक्ष है, जाके डार न मूर ।।1।।
शरण सांई के आइया, बाहर भीतर सार। रात दिवस पहिरे वामें, समझे नहीं लगार ।।2।।
एक वृक्ष के फल हैं सारा कोई खाटा कोई मीठा । पेड़ बिहूना वृक्ष है गुरू परतापों दीठा ।।३।।
बटक बीज को पेड़ है, गिना न अनभे सोय । तीन लोक वामें बसें, बड़ा अचम्भा मोय 11411
मुक्ता मंजन कोट रवि, ऐसा है करतार । यही साख समझी नहीं गयो जमारो हार ।।5।।
झल झलात हम देखिया, कोट सूर्य उजियार। या साखी समझे तो, तिरत न लागे वार 116।1
हेरत हेरत हेरिया, मनुवाँ गयो हिराय। रात दिवस के हेरतें, पूरण ब्रह्म दिखाय ।।7।।
चालत चालत चालिया, जहाँ चन्द्र नहीं सूर। रात दिवस की गम नहीं, जहां साहिब सदा हजूर । 1811
चालत चालत चालिया, जहाँ चन्द्र नहीं सूर । रात दिवस की गम नहीं, जहाँ कोटक उगिया सूर 19/1
ब्रह्म की बातें कहें, बिखिया सेती आस । वे नर ऐसे जायेंगे, ज्यों तरूवर को पात । । 10 ।।
बह की बातें कहैं, बिखिया सेती हेत । वे नर ऐसे जायेंगे, ज्यों मूली का खेत ।।11।।
हरि जन ऐसा चाहिए, जो निरमोही होय । निरमोही हो जो भजे, संत कहावै सोय ।।12 ।।
एक अचरज हम देखिया, कल में भक्त कहावे सोय । पेट कारण जग जाँचिया, बड़ा अचम्भा मोय ।।13 ।।
बिन पहिचाने जग जाँचिया, धनी पहिचाने नाहिं। धनी पहिचाने रिघ सिद्ध मिले, विरले संतकल माहिं । 11411 हरिजन हंसा एक है, बगुला कोट हजार । हरि जन हंसा मोती चुगे, बग मच्छी चुन खाय ।।1511
हरिजन हंसा होय के, घर-घर माँगे भीख । राज द्वारे वे फिरें, क्यों न होत फजीत ।।16 ||
वृक्ष माहि जो बीज है, बीज वृक्ष के मांहि । आलम डूबी ब्रह्म में, अन्धे को सूझत नाहिं ।।17।।
कहते कहते जुग गया, कासे कहुँ समझाय । अन्धे को सूझत नहीं, दिया कपाट लगाय ।।18 ।।
बांह गहे की कहत हूँ, शरण गहे की लाज । साहिब तुमरे पास हैं, तारे ध्रुव प्रहिलाद ।। 19।। ।।

इति श्री स्वामी रामदासजी कृत साखी सम्पूर्णम् ।।🙏🙏

।। जय गुरु महाराज ।।
।। जय श्री रामजी बाबा ।।
🌅🙏 साहिब म्हारो अबको जन्म सुधारो 🙏 🌅

Jai Ram Ji Baba NARMADAPURAM नर्मदापुरम्

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