16/02/2026
श्रीमत् परिब्राजकाचार्य श्री 108
श्री स्वामी रामदासजी की वाणी
साखी
कहें रामदासजी....
शरण साई के आइया, नीरा निकट हजूर । बिना पेड़ को वृक्ष है, जाके डार न मूर ।।1।।
शरण सांई के आइया, बाहर भीतर सार। रात दिवस पहिरे वामें, समझे नहीं लगार ।।2।।
एक वृक्ष के फल हैं सारा कोई खाटा कोई मीठा । पेड़ बिहूना वृक्ष है गुरू परतापों दीठा ।।३।।
बटक बीज को पेड़ है, गिना न अनभे सोय । तीन लोक वामें बसें, बड़ा अचम्भा मोय 11411
मुक्ता मंजन कोट रवि, ऐसा है करतार । यही साख समझी नहीं गयो जमारो हार ।।5।।
झल झलात हम देखिया, कोट सूर्य उजियार। या साखी समझे तो, तिरत न लागे वार 116।1
हेरत हेरत हेरिया, मनुवाँ गयो हिराय। रात दिवस के हेरतें, पूरण ब्रह्म दिखाय ।।7।।
चालत चालत चालिया, जहाँ चन्द्र नहीं सूर। रात दिवस की गम नहीं, जहां साहिब सदा हजूर । 1811
चालत चालत चालिया, जहाँ चन्द्र नहीं सूर । रात दिवस की गम नहीं, जहाँ कोटक उगिया सूर 19/1
ब्रह्म की बातें कहें, बिखिया सेती आस । वे नर ऐसे जायेंगे, ज्यों तरूवर को पात । । 10 ।।
बह की बातें कहैं, बिखिया सेती हेत । वे नर ऐसे जायेंगे, ज्यों मूली का खेत ।।11।।
हरि जन ऐसा चाहिए, जो निरमोही होय । निरमोही हो जो भजे, संत कहावै सोय ।।12 ।।
एक अचरज हम देखिया, कल में भक्त कहावे सोय । पेट कारण जग जाँचिया, बड़ा अचम्भा मोय ।।13 ।।
बिन पहिचाने जग जाँचिया, धनी पहिचाने नाहिं। धनी पहिचाने रिघ सिद्ध मिले, विरले संतकल माहिं । 11411 हरिजन हंसा एक है, बगुला कोट हजार । हरि जन हंसा मोती चुगे, बग मच्छी चुन खाय ।।1511
हरिजन हंसा होय के, घर-घर माँगे भीख । राज द्वारे वे फिरें, क्यों न होत फजीत ।।16 ||
वृक्ष माहि जो बीज है, बीज वृक्ष के मांहि । आलम डूबी ब्रह्म में, अन्धे को सूझत नाहिं ।।17।।
कहते कहते जुग गया, कासे कहुँ समझाय । अन्धे को सूझत नहीं, दिया कपाट लगाय ।।18 ।।
बांह गहे की कहत हूँ, शरण गहे की लाज । साहिब तुमरे पास हैं, तारे ध्रुव प्रहिलाद ।। 19।। ।।
इति श्री स्वामी रामदासजी कृत साखी सम्पूर्णम् ।।🙏🙏
।। जय गुरु महाराज ।।
।। जय श्री रामजी बाबा ।।
🌅🙏 साहिब म्हारो अबको जन्म सुधारो 🙏 🌅
Jai Ram Ji Baba NARMADAPURAM नर्मदापुरम्