Shuddh Dhamma & Vipassana meditation

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विपश्यना - आत्मशुद्धि और शांति का मार्ग
विपश्यना ध्यान की प्राचीन कला है, जो आत्म-जागरूकता और आंतरिक शांति प्रदान करती है। यह विधि मानसिक संतुलन, नकारात्मकता से मुक्ति और जीवन में सच्ची खुशी पाने का वैज्ञानिक तरीका है। वर्तमान में जिएं, शांति पाएं।

12/04/2025

हिंदी प्रवचन - पांचवां दिन

आज साधना के पांच दिन पूरे हुए। हम अन्तर्मुखी होकर अपने ही शरीर-स्कंध को देख रहे हैं, चित्त-स्कंध को देख रहे हैं। यह जो सिर से पाव तक चक्कर लगा रहे हैं, कोई रूढ़ि नहीं पूरी कर रहे हैं। अपने आपको देखने का अभ्यास कर रहे हैं। अपने मन और शरीर के स्वभाव को देख रहे हैं। देख रहे हैं कि मन कितना राग-रंजित है, कितना द्वेष दूषित है और शरीर पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा है?

यह जो मनुष्य जीवन को दुखी बनाने वाला रोग है, उसे समझें, उसके कारण को समझें। जीवन में दुख तो है ही। किसी को इस बात का दुख है तो किसी को उस बात का। जीवन जगत की यह पहली सच्चाई है। विना कारण के कुछ होता नहीं। दुख के पीछे कोई कारण है, यह दूसरी सच्चाई है। यदि कारण दूर कर लिया तो दुख दूर हो ही गया। यों दुख दूर करने का एक तरीका है। यह तीसरी और चौथी सच्चाइयों हैं। जीवन जगत की ये चार सच्चाइयां हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण सच्चाइयां है।

चित्त की चेतना के बारे में हमने चर्चा की कि चेतना का एक खंड विज्ञान, जानने का काम करता है। दूसरा खंड संज्ञा, पहचानने का काम करता है। तीसरा खंड वेदना संवेदनशील होने का काम करता है और चौथा खंड, संस्कार, प्रतिक्रिया करने का काम करता है। अनुभूतियों के स्तर पर इस सारी प्रक्रिया को समझना है। जबतक जीवित हैं, सारे शरीरस्कंध पर कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी कारण से, कोई-न-कोई संवेदना होती ही रहती है। इंद्रियों के दरवाजों पर बाहर की कोई चीज टकराती है तो संवेदना होती है। भीतर मन और शरीर के टकराव से संवेदना होती है। जो अंतर्मन की गहराइयों में इन संवेदनाओं की वजह से राग-द्वेष की जो प्रतिक्रियाएं हो रही हैं, यदि हमने उसे जाना ही नहीं, यदि उसका दर्शन ही नहीं किया तो उसे दूर कैसे कर सकेंगे?

जीवन-जगत में दुख है, यह स्पष्ट है। इस सच्चाई को स्वीकार करना है। लेकिन मात्र स्वीकार करना काफी नहीं है। इस सच्चाई का दर्शन करना है। जब हम सच्चाई का दर्शन कर लेते हैं, तो यह सच्चाई आर्य सच्चाई बन जाती है। जबतक दुख को भोगते हैं, दुख का संवर्धन ही करते हैं, दुख को बढ़ाते ही हैं। जब दुख के दर्शन करने लगते हैं, तो दुख दूर होने लगता है। दुख सत्य, आर्य सत्य, बन जाता है। आर्य सत्य इस माने में कि देखने वाले को आर्य बना देगा, निर्मल बना देगा, संत बना देगा, मुक्त बना देगा, शुद्ध बना देगा, बुद्ध बना देगा।

इस साधना में हमें इस सच्चाई का अनुभव करना है और उसे साक्षीभाव से देखना है। घंटे भर एक ही आसन में बैठे रहने से बड़ा दुख अनुभव होता है, बड़ी पीड़ा होती है। इस पीड़ा को देखना है। साक्षीभाव से देखते-देखते यह पीडा कम होती जायेगी और ऐसी स्थिति आयेगी कि विल्कुल समाप्त हो जायेगी। परंतु यदी इस पीड़ा को भोगते रहे, पीड़ा में कराहते रहे, तो पीड़ा न कम होगी, न मिटेगी। उसका संवर्धन ही होगा।

जब से मनुष्य जन्म लेता है, अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्याकुल रहता है। आयश्यकताओं की कोई सीमा नहीं है। बीमार होता है तो दुखी होता है। बूढ़ा होता है तो दुखी होता है। मरता है तो दुखी होता है। देखता है कि जीवन में दुख-ही-दुख है। सारा जीवन क्या चलता है? जो प्रिय है उसका वियोग हुआ जा रहा है, प्रिय व्यक्ति, प्रिय वस्तु, प्रिय स्थिति। जो अप्रिय है उसका संयोग हुआ जा रहा है। अनचाही होती रहती है, मनचाही नहीं होती। जो कामना करता है, वह पूरी नहीं होती, तो दुखी होता है। यह जीवन-जगत की सच्चाई है। तीव्र इच्छा यानी तृष्णा अपने आप में व्याकुलता है। तृष्णा माने जो अपने पास है, उससे तृप्ति नहीं और जो नहीं है, उसे पाने के लिए व्याकुल हैं। साधना करते-करते स्वयं अनुभव होगा कि तृष्णा कैसे जागती है। शरीर में जो पीड़ा हो रही है, वह अपने आप में इतनी दुखदायी नहीं, लेकिन उसे दूर करने की तृष्णा कई गुना दुखदायी होती है। जीवन भर यही करते आए हैं। जो अप्रिय है उसे दूर धकेलना चाहते हैं, जो प्रिय है, उसे अपनी ओर समेटना चाहते हैं। तृष्णा का दुख इस धकेलने समेटने का ही दुख है। यह सत्य है। लेकिन वह महापुरुष इस सच्चाई पर ही नहीं रुक गया। और गहराइयों में उतरा तो देखता है, 'सद्धित्तेन पञ्युपादानखन्धा दुक्खा'। यह जो पांचों स्कंधों के प्रति उपादान यानी आसक्ति पैदा कर ली, यह दुख है। ये पांच स्कंध क्या है? एक रूपस्कंध यानी परमाणुओं का स्कंथ, भौतिक कलापों का स्कंध यह सारा शरीर, जिसे मैं' कहता है, मेरा' कहता है, उसके प्रति गहरा चिपकाव है, आसक्ति है। इसी तरह चित्त के चार स्कंध विज्ञान, संज्ञा, वेदना और संस्कार। इनके प्रति गहरा चिपकाय है। जैसे कलापों का अपना स्वभाव है, वैसे ही इन चित्त स्कंधों का अपना स्वभाव है और वे अपने स्वभाव के अनुसार निरंतर काम करते रहते हैं। लेकिन इनके साथ इतना गहरा चिपकाव पैदा कर लिया है कि मैं जान रहा हूं, मैं पहचान रहा हूं, मैं संवेदनशील हो रहा हूं, मैं प्रतिक्रिया कर रहा हूं। व्यवहार-जगत में तो ऐसा कहना ही पड़े, लेकिन हमें वास्तविकता को समझना है, सत्य को समझना है, देखना है। इसके साथ जितनी आसक्ति पैदा की है, उतना ही दुख है। आसक्ति और दुख दोनों पर्यायवाची हैं। जहां आसक्ति वहां दुख। जितनी आसक्ति उतना दुख। यह प्रकृति का अटूट नियम है।

हम चार तरह की आसक्तियों को अपने भीतर संजोए बैठे हैं। इन्हें दिन-रात बढ़ाए जा रहे हैं। एक तृष्णा की आसक्ति है। तृष्णा अपने आप में व्याकुलता बढ़ाती है, परंतु इसके साथ इतना चिपकाव पैदा कर लिया कि तृष्णा रहनी ही चाहिए। जिस किसी वस्तु, व्यक्ति, स्थिति के प्रति तृष्णा जागी तो जबतक वह नहीं प्राप्त होती, बड़ी बेचैनी होती है, व्याकुलता होती है। परंतु प्राप्त होने पर शीघ्र ही फीकी लगने लगती है। अब दूसरी के प्रति तृष्णा जाग उठती है। यह मिली तो तीसरी, चौथी... अंत ही नहीं है इस तृष्णा का। बिना पेंदी की बाल्टी है, जी कभी भरती ही नहीं। जीवन भर यही चलता है। तृष्णा कायम रहनी ही चाहिए, क्योंकि उसके साथ गहरी आसक्ति है।

एक अन्य आसक्ति है में के प्रति, मेरे के प्रति। जानते ही नहीं कि में क्या है, मेरा क्या है। फिर भी इस में के खिलाफ, मेरे के खिलाफ, कोई एक शब्द नहीं कहे। किसी ने कुछ कहा तो बड़ी व्याकुलता होती है, बड़ा दुख होता है। जिसे मेरा कहा, उसका विछोह होते ही दुख होता है। आसक्ति जो है। आसक्ति दुख ही लाति है।

एक अन्य आसक्ति होती है, अपने दर्शन के प्रति अपनी परंपरागत मान्यता के प्रति। इस आसक्ति को लेकर मनुष्य खूब बहस करता है, विवाद करता है, लड़ता है, झगड़ता है, व्याकुल रहता है।

एक और आसक्ति अपने-अपने कर्म-कांडों के प्रति होती है। यह आसक्ति भी कम व्याकुल नहीं करती।

इन चार आसक्तियों पर ध्यान देंगे तो देखेंगे कि जब-जब दुख होता है, इन चारों में से कोई न कोई आसक्ति ही उसका कारण होती है। परंतु वह महापुरुष, जी सम्यकसंबुद्ध बना, उसे तो कारण की जड़ों तक पहुँचना था। अनुसंधान चालू रहा। कार्य-कारण शृंखला की एक-एक कड़ी का निरीक्षण करते हुए जड़ों तक जा पहुंचा। जीवन में दुख तो है ही।

'जाति-पत्यया-जरा-मरणं-सोक-परिदेव-दुक्खदोमनस्तुपायासा सम्भवन्ति।'

जन्म हो गया तो बुढ़ापा, बीमारी, मृत्यु आयेगी ही। शोक, बेचैनी, परेशानी आयेगी ही। पर जन्म क्यों हुआ? बिना कारण तो इस जगत में कुछ भी नहीं होता। जन्म के लिए माता-पिता का संयोग आवश्यक है, जो प्रकृति का एक नियम है, लेकिन इसके अतिरिक्त यह समझें कि जीवन-धारा किस प्रकार चलती है-

'भव पच्चया जाति' । यह भव-भव-भव कुछ बनता ही जा रहा है। मृत्यु के साथ बात समाप्त नहीं होती। मृत शरीर में भी परिवर्तन होता जा रहा है और यह चेतना की धारा तुरंत किसी दूसरे शरीर से जुड़ जाती है। फिर क्षण क्षण बनती है, बिगड़ती है। इस प्रकार यह क्रम चलता ही रहता है। तो यह भव क्यों होता है? अनुभूतियों से देखने पर एकदम समझ में आ गया-

'उपादान पच्चया भवो'। यह आसक्ति ही भव का कारण है। जितनी गहरी आसक्ति होगी, उतना गहरा भव कर्म होगा। तो यह उपादान क्यों होता है? उसका क्या कारण है? अनुभूतियों द्वारा तुरंत मालूम हुआ-

'तण्हा पच्चया उपादानं।' तृष्णा यानी यह राग और द्वेष ही उपादान के कारण हैं। तृष्णा क्यों पैदा होती है? स्पष्ट हुआ-

'वेदना पच्चया तण्हा'। सारे शरीर स्कंध पर जहां संवेदना होती है, वहां तृष्णा जगती है। सुखद संवेदना हो तो राग और दुखद संवेदना हो तो द्वेष। वेदना होने का क्या कारण है?-

'फस्स पच्चया वेदना' । वेदना स्पर्श से होती है। इन छह इंडियों के द्वारों पर इनके विषयों से स्पर्श होते ही संवेदना होती है। तो यह स्पर्श क्यों होता है?-

'सळायतन पच्चया फस्स'। यह छह इंद्रियों के दरवाजे खुले रहते हैं, इन पर स्पर्श होता है। तो यह छह इंद्रियां कहां से आयी? बात स्पष्ट हो गई-

'नाम-रूप पच्चया सळायतनं' ! नाम रूप की वजह से ये छह इंद्रिया आयी । यह नाम-रूप क्या है? नाम यानी मन और रूप यानी शरीर। इन दोनों की मिली-जुली जीवन-धारा जैसे ही शुरू हुई, छह इंद्रियों को लेकर ही शुरू हुई। तो यह नाम-रूप क्यों हुआ?-

'विश्आण पच्चया नाम-रुपे'। विज्ञान से नाम-रूप हुआ। यह विज्ञान यानी चेतना जो एक जीवन समाप्त होते ही उसके साथ समाप्त हो जाती है, पर अगले जीवन में फिर किसी अन्य शरीर के साथ नयी उत्पन्न हो जाती है। समाप्त होते ही अगले क्षण नया विज्ञान उत्पन्न हो जाता है। उसका स्वभाव है क्षण-प्रतिक्षण उत्पन्न होकर आगे बढ़ना। यह विज्ञान क्यों होता है?-

'सहार पच्चया विड्वाणं' हर संस्कार नया विज्ञान पैदा करता है। जैसे-जैसे साधना की गहराइयों में जायेंगे, मालूम होगा कि हर संस्कार नया विज्ञान यानी अगले क्षण की नई चेतना पैदा करता है। ये संस्कार कैसे बनते हैं?

'अविजा पच्चया सद्वारा'। अविद्या से ही संस्कार बनते हैं। अविद्या का अर्थ है अज्ञान, बेहोशी, विमूढ़ता। इस प्रकार सारा रहस्य खुल गया। जड़ तक बात समझ में आ गयी।

'अविज्ञ्जा-पच्चया सद्वार ,
सद्वार-पच्चया विड्वाणं,
विड्वाणं पच्चया नाम-रुपे
नामरूप-पच्चया तळायतनं,
सळायतन-पच्चया फस्सो,
फस्स-पच्चया वेदना,
वेदना-पच्चया तण्हा,
तण्हा-पच्चया उपादानं,
उपादान-पच्चया भव,
भव-पच्चया जाति,
जाति-पच्चया-जरामरणं-सोक-परिदेव-दुक्ख-दोमनस्सुपायासा सम्भवन्ति। एबमे तस्स केवलस्स, दुक्खक्खन्धस्स समुदयो होति।'

देख लिया कि किस प्रकार यह दुख का पहाड़ खड़ा होता है। सारा खेल समझ में आ गया। यह अविद्या, यह बेहोशी ही दुख का मूल कारणा है। इस अविद्या को जड़ से काटें:

'अविजाय त्वेव असेस विराग-निरोधा सहार-निरोधो,
सहार-निरोधा किआण-निरोधो,
विड्आण-निरोधा नाम-रूप-निरोधी,
नामरूप-निरोधा सजावतन-निरोधी,
सळायतन-निरोधा फस्स-निरोधो,
फरस-निरोधा वेदना-निरोधी,
वेदना-निरोधा तण्हा-निरोधी,
तण्हा-निरोधा उपादान-निरोधी,
उपादान निरोधा भव-निरोधी,
भव-निरोधा जाति-निरोधो,
जाति-निरोधी जरामरणं-सोक-परिदेव-दुक्ख-दोमनस्सुपायासा निरुज्जान्ति । एवमेतस्स केवलस्स दुक्खक्खन्धस्स निरोधी होती 'ति ।'

कारण का निवारण समझ में आ गया। कितना भी बड़ा दुखों का पहाड़ क्यों न खड़ा कर लिया हो, सारा का सारा समाप्त ही जायेगा। अविद्या को जड़ से उखाड़ना सीखें। कैसे उखाड़ें? दुख को देख लिया। दुख के कारण को देख लिया, अविद्या की शृंखला देख ली। जीवित हैं तो नाम-रूप की धारा चलेगी ही। इंद्रियां भी अपना काम करेंगी ही। स्पर्श भी होगा ही। संवेदना भी होगी ही। और जब-जब संवेदना होगी, पुराने स्वभाव के कारण तुष्या जागेगी। सुखद होगी तो राग की, दुखद होगी ती द्वेष की। बस, वहीं रोक लगानी होगी। वेदना तो हो, लेकिन 'वेदना-पच्चया तण्हा' के स्थान पर 'वेदना-पच्चया पन्या' हो, प्रज्ञा जागे। हर वेदना के साथ प्रज्ञा जागेगी तो अविद्या के कारण जो दुख-चक्र चल रहा था, वह पलट जायेगा 'धर्म-चक्र में।

क्या है धर्म-चक्र? जब-जब वेदना जागे, हर वेदना प्रज्ञा जगाए-अनित्य है, नश्वर है। देख तो सही इसे। राग मत पैदा कर। द्वेष मत पैदा कर। हर संवेदना के साथ जितनी देर प्रज्ञा जगती है, नए संस्कार नहीं बनते। इतना ही नहीं, पुराने संस्कार भी कटने लगेगे।

'खीणं पुराणं नवं नत्थि संभर्व'। नया नहीं बनने पायेगा और पुराना क्षीण हो जायेगा। उस महापुरुप ने प्रकृति के इस कानून को, विधान को, देख लिया। नया बनाना बंद किया तो पुराना क्षीण पड़ने लगा। क्षीण होते-होते एक ऐसी अवस्था पर पहुंच गया कि सारे पुराने भव-संस्कार क्षीण हो गए। प्रज्ञा को जगाते जगाते चित्त नितातं निर्मल हो गया। नितातं विमुक्त हो गया। शुद्ध-बुद्ध हो गया। उस समय जो हर्ष के उद्गार निकले, वे बड़े महत्व के है:-

'अनेक जाति-संसारं,सन्धाविस्सं अनिब्बिसं । पुनप्पुनं । काहसि। विसहितं । गहकारकं गवेसन्तो, दुक्खा जाति महकारकविद्रोसि, पुन मेहं न सव्वा ते फासुका भग्गा, गहकूटं विसङ्कारगर्त चित्तं, तण्हानं खयमागा'।

कितनी बार जन्म लिया इस संसार में गिनती ही नहीं। जन्म लेता गया और बीना रुके [मृत्यु की ओर] दौड़ लगाता गया। इस कायारूपी घर बनाने वाले की खोज करते हुए पुनः पुनः दुखमय जीवन में पड़ता रहा। अब घर बनाने वाले को देख लिया। अब नया घर नहीं बना सकेगा। सारी कड़ियां भग्न हो गयीं। घर का शिखर टूट गया। घर बनाने की सारी सामग्री तोड़-फोड़कर फेंक दी गयी। चित्त पूर्व संस्कारों से विहीन हो गया। भविष्य के लिए कोई तृष्णा नहीं रह गई। तृष्णा का समूल नाश हो गया। विमुक्त हो गया। हर व्यक्ति ऐसा कर सकता है। हर व्यक्ति इस अवस्या तक पहुँच सकता है। पर काम करना होगा। काम स्वयं ही करना होगा।

आठ अंग का आर्य पथ, शुद्ध धर्म का पंथ। कदम-कदम चलते हुए, दुर्जन होवे संत ॥

पंचशील पालन भला, निरमल भली समाधि। प्रज्ञा तो जागी भली, दूर करे भव व्याधि ॥

मन के करम सुधार ले, मन ही प्रमुख प्रधान। कायिक वाचिक करम तो, मन ही की संतान ॥

मन ही दुर्जन मन सुजन, मन बैरी मन मीत। जीवन में मंगल जगे, जब मन होय पुनीत ॥

जैसी चित्त की चेतना, फल वैसा ही होय। दुर्मन का फल दुखद ही, सुखद सुमन का होय ॥

जबतक मन में राग है, जबतक मन में देष। तबतक दुख ही दुःख है, मिटे न मन के क्लेश ॥

11/04/2025

हिंदी प्रवचन - चौथा दिन

साधना का चौथा दिन पूरा हुआ। चौथा दिन बड़े महत्व का दिन है। तीन दिन से इसी के लिए परिश्रम कर रहे थे। अनेक साधकों ने आज पहली बार अपने भीतर सत्य की धर्म-गंगा में डुबकी लगायी।

जब से जन्म लिया, आंखें खोली, बाहर-बाहर ही देखा। बहिर्मुखी, बहिर्मुखी, सारे जीवन बहिर्मुखी ही रहा। कहीं धर्म के नाम पर कोई काम किया भी तो बाहर-बाहर का ही बाहरी वेश-भूषा, बाहरी बनाव-शृंगार, बाहरी दिखावा, बाहरी आडंबर। थोड़ा और आगे बढ़ा तो बाहरी- बाहरी कर्मकांड। इन्हीं में सारा जीवन बिता दिया। यदि कोई कुछ और आगे बढ़ा तो अध्यात्म के नाम पर बूद्धि-विलास करने लगा। केवल दार्शनिक ऊहापोह, दार्शनिक वाद-विवाद, अध्यात्म का अर्थ ही नहीं समझा, धर्म का अर्थ ही नहीं समझा। अध्यात्म कहते हैं अपने भीतर की सच्चाइयों को स्वानुभूति द्वारा जानने को। धर्म कहते हैं धारण करने को। पर न कभी भीतर देखकर सच्चाई का अनुभव किया, न उसे धारण किया। सत्य के अनुसंधान का कार्य ही नहीं किया, खोज का कार्य ही नहीं किया। भीतर जो अमृत भरा है, उस तक पहुंचा ही नहीं, उसे चखा ही नहीं।

आज जो कदम उठाया है, यह नन्हा सा कदम है इस लंबी यात्रा का, जिस पर हम चलना चाहते हैं। अंतर्मुखी होने का पहला कदम है, इसलिए बड़े महत्व का है। अंतर्मुखी दो प्रकार से हो सकते हैं एक तो आंखें बंद करके बैठ गए और लगे किसी कल्पना का ध्यान करने, कल्पना-ही-कल्पना। कल्पना बड़ी प्रिय लगती है, बड़ी सुखद, पर सच्चाई से कोसों दूर। दूसरे अंतर्मुखी होते हैं कल्पना से मुक्त, सत्य-दर्शन के लिए। हमें यही करना है।

भारतवर्ष बड़ा पुराना देश है। इस देश में साधना की अनेक विधियां उत्पन्न हुई, पनपीं, बिगड़ी, नष्ट हुई, लुप्त हुई। यह एक अलग विधि है- भारत की लुप्त हुई पुरातन साधना विधि। इसे समझें। किसी पूर्वाग्रह से, पूर्व बुद्धि लेप से, शंका में न उलझें।

आज हम समझेंगे कि इस साधना का यह पहला कदम क्या है? कैसा है? नए-नए साधकों के समक्ष कई प्रश्न आते हैं। कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जो समान रूप से सभी नए साधकों के समक्ष आते हैं। पहले उनका समाधान कर लें।

एक प्रश्न यह उठता है कि सिर से पांव तक की यह यात्रा किसी एक क्रम से ही क्यों करें? आवश्यक नहीं कि जो क्रम हमने बताया है उसी क्रम से करें। किसी क्रम से करें, लेकिन क्रम से अवश्य करें, ताकि शरीर का कोई अंग छूट न जाय। इस शरीर स्कंध के बारे में हम सत्य की खोज कर रहे हैं। इस खोज में किसी अंग को अछूता नहीं रखना है। किसी अंग को मुर्छित नहीं छोड़ना है।

एक प्रश्न यह उठता है कि जी सिर से पांव तक की यात्रा है, यह ऊपरी स्तर पर ही करें या भीतर भी? आगे जाकर तो यह यात्रा भीतर तक करनी ही है। फिलहाल ऊपरी ऊपरी स्तर पर संवेदना को देखें। जब सारे शरीर में संवेदना महसूस होने लगे तो भीतर तक देखना आसान हो जायेगा। यदि किसी को अभी भीतर तक महसूस होने लगा तो बहुत ठीक, अन्यथा इसके लिए आतूर न हों।

एक प्रश्न यह उठता है कि यह जो सिर से पांव तक चक्कर लगाते हैं. उसमें कितना समय लगना चाहिए? उसके लिए कोई समय निर्धारित नहीं है। निर्भर करता है साधक की मनःस्थित्ति पर। कभी-कभी मन कमज़ोर होत्ता है, चंचल होता है, तो बड़ा स्थूल होता है। जहां पहुंचे वहां कुछ महसूस ही नहीं हुआ तो एक-दो मिनट रुककर आगे चलता है। इस तरह रुकते-रुकते यात्रा में आधा घंटा भी लग जाय, एक घंटा भी लग जाय। हमें अपना काम करना है। जो समय लगता है, लगे। जब मन सजग है, स्थिर है तो जहां पहुंचा वहीं कुछ महसूस हुआ और तुरंत आगे बढा तो समय कम लगेगा। लेकिन अब जबकि काम शुरू ही किया है तो एक पूरी यात्रा में कम-से-कम दस मिनट तो लगने ही चाहिए, ताकि कोई अंग छूटने न पाए। जहां कहीं कुछ महसूस न हो उस स्थान पर एक-दो मिनट के लिए रुके तो बड़े धीरज के साथ निरीक्षण करें। यदि संवेदना नहीं मालूम हो तो व्याकुल न हों। संवेदना उत्पन्न करने का व्यर्थ प्रयत्न नहीं करना है। कोई कृत्रिम संवेदना नहीं लानि है। जैसी स्थिति है उसे साक्षीभाव से देखना है। हमारे शरीर के प्रत्येक अंग में कुछ-न-कुछ हो ही रहा है। शांत चित्त से उसे देखना है। धीरे-धीरे स्थूल मन सुक्ष्म होने लगेगा और सूक्ष्म मन संवेदनशील होने लगेगा।

हमें अपने शरीर के अंग-प्रत्यंग में जो कुछ स्वभाव से हो रहा है, उसे देखना है। यदि मौसम के कारण शरीर पर प्रभाव पड रहा है तो उसे देखेंगे। शरीर पर गर्मी है तो गर्मी को देखेंगे, पसीना है तो पसीने को, भारीपन है तो भारीपन को। कहीं कोई रोग या बीमारी के कारण दर्द है, तो दर्द को देखेंगे। अबतक भोक्ता होकर भोगते आए हैं। अब उसे साक्षीभाव से, तटस्थभाव से, देखेंगे। न अच्छा मानेंगे, न बुरा मानेंगे। जिस स्थान पर जैसी संवेदना हो रही है, उसे जानना है। बस, केवल जानना है। प्रतिक्रिया नहीं करनी है। कदम-कदम सच्चाई के सहारे, तथ्य के सहारे चलेंगे। प्रारंभ में बड़े स्थूल तथ्य ही सामने आते हैं, ये प्रकट सत्य हैं, भासमान सत्य हैं। किसी अंग में बड़े जोर की पीड़ा महसूस हो रही है। यह घनीभूत पीड़ा इस क्षण की सच्चाई है। शरीर का अमुक भाग ठोस है, यह इस क्षण का प्रकट सत्य है, भासमान सत्य है। उसे साक्षीभाव से देखेंगे। उसके टुकड़े होने लगेंगे, विघटन-विश्लेषण होने लगेगा। अंततः यह प्रतीत होगा कि यह पीड़ा, यह सघनता केवल तरंगे-ही-तरंगे है। इस तरह प्रकट, भासमान, सत्य से हम परमार्थ सत्य की ओर बढ़ेंगे। घनीभूत सत्य का बिना विघटन विश्लेषण किये, बिना टुकड़े टुकड़े किये, हम परम सत्य तक नहीं पहुँच पायेंगे। यदि हमें सूर्य के दर्शन करने हैं तो जबतक घने-घनेन बादल छाये रहेंगे, सूर्य के दर्शन नहीं कर सकेंगे। जैसे ही घने बादल बिखर जायेंगे सूर्य-दर्शन का प्रयत्न नहीं करना पड़ेगा। अपने आप हो जायेगा। जबतक चित्त पर राग, द्वेष, मोह के धने घने बादल छाये रहेंगे, परम सत्य का साक्षात्कार नहीं हो सकेगा।

इस समय ठोस सत्य हमारे सामने आया है, उसे स्वीकार कर साक्षीभाव से देखना है। कुदरत के कानून को देखना है। कुदरत का कानून, प्रकृति के नियम, सर्वव्यापी है, सब पर लागू होते है। सजीव, निर्जीव, अणु-अणु पर लागू होते है। जिस समय इसका साक्षात्कार हो जाता है, मनुष्य अपने आप इस कानून के अनुसार ढल जाता है। यह साधना इसीलिए कर रहे हैं कि हम अपनी-अपनी अनुभूतियों के स्तर पर प्रकृति के इस विधान को समझें, परम सत्य को जानें और उसके अनुसार अपने जीवन को ढालें। यही धर्म है।

सारे संसार में प्रतिक्षण कुछ बदल रहा है, कोई घटना घट रही है। कोई बीज धरती में बोया गया तो वह फूट रहा है, अंकुरित हो रहा है। एक नन्हा सा पेड़ फूट रहा है, उसमें से कोई डाल निकल रही है, शाखा निकার रही है, टहनी निकल रही है, पत्ता निकल रहा है, विकसित हो रहा है. फूल निकल रहा है, फल निकल रहा है, विकसित हो रहा है। पेड़ बढ़ रहा है। यह सच्चाई है कि कुछ-न-कुछ बनता ही जा रहा है। इसलिए इस संसार को भव संसार कहा गया । वैसे व्यवहार जगत में कहना पड़ता है कि अमुक प्राणी है, जीव है, भूत्त है लेकिन वास्तव में ऐसा कुछ है ही नहीं। केवल भव है, भव है। ऐसा कुछ भी नहीं है, जी बन बनाकर तैय्यार हो गया हो और उसमें अब कोई परिवर्तन नहीं होगा। सब कुछ बदल ही रहा है। वह सच्चाई जब अनुभूति के स्तर पर जानेंगे, तब वास्तव में एक महत्वपूर्ण सत्य का दर्शन होगा।

साधना के अभ्यास में एक और सच्चाई सामने आती है कि जो बदल रहा है, वह अकस्मात, अकारण, नहीं बदल रहा। उसके पीछे एक या अनेक कारण हैं। बिना कारण के कुछ होता ही नहीं। किसी कारण से ही कोई कार्य संपन्न होता है, जो अगले कार्य का कारण बन जाता है। यह कार्य-कारण, कारण-कार्य की शृंखला अनवरत गति से चलती रहती है। ज्यों-ज्यों गहराइयों में उत्तरते जायेंगे एक और सच्चाई स्पष्ट होने लगेगी। जैसा कारण होता है वैसा ही कार्य सम्पन्न होता है। प्रकृति का नियम है जैसा बीज, वैसा फल। यदि कड़वा नीम बोयेंगे तो कड़वा फल ही पायेंगे। मीठा आम बोयेंगे तो मौठा फल ही पायेंगे। यह प्रकृति का अटूट नियम है। इसके विपरीत हो ही नहीं सकता। जैसा बीज, वैसा ही फल। तो अपने कर्म-बीजों के प्रति सजग रहना सिखे। समझे कि कर्म क्या हैं? किसे कर्म-बीज कहे? कर्म तो शरीर, वाणी और मन से भी होता है। कौन-से कर्म को महत्व दें? सामान्यतय लोग शरीर के कर्म की ही प्रमुख मानते हैं, वाणी के कर्म को उससे हल्का और मन के कर्म को कोई महत्व ही नहीं देते। लेकिन जिस व्यक्ति को सम्यक सम्बोधि प्राप्त होती है, जिसने अनुभूतियों के स्तर पर कुदरत के कानून को समझा, वह जान लेता है कि न शरीर का कर्म फल देता है, न वाणी का कर्म। मन का कर्म ही फल देता है। शरीर और वाणी के कर्म तो मन के कर्म के ही बाह्य प्रक्षेपण है, बाह्य प्रकटीकरण हैं। हर कर्म पहले मन में शुरू होता है। फिर बढ़ते-बढ़ते तीव्र होगा तो वाणी पर उतर आयेगा। और अधिक तीव्र होगा तो शरीर पर उतर आयेगा। जो शरीर या वाणी का दुष्कर्म है, वह मन के दुष्कर्म की ही संतान है। इसी प्रकार जो शरीर या वाणी का सत्कर्म है वह भी मन के सत्कर्म की ही संतान है। यह कुदरत का कानून किसी के उपदेश से नहीं मान लेना है। किसी पुस्तक में लिखा है, इसलिए नहीं मान लेना है। अनुभूतियों से जानकर मानना है कि जैसी चित्त की चेतना होती है, वैसा ही फल होता है।

ये सारी बातें अनुभूतियों में उतरेंगी तो कुदरत के कानून को थिक से समझेंगे और तब अपने चित्त पर पहरा लगायेंगे। जो व्यक्ति अपने चित्त की चेतना पर पहरा लगाने लगा, उसको अपनी वाणी पर, शरीर पर पहरा लगाने की आवश्यकता नहीं। यदि चित्त की चेतना सुधरी हुई है तो वाणी से, शरीर से जो कर्म होंगे, कल्याणकारी ही होंगे।

साधना आरंभ करते-करते हमने अपने शरीर और चित्त स्कंध के बारे में कुछ कुछ सच्याइयों को अनुभूति के सहारे देखा था। सांस को देखते-देखते भी चित्त की बात थोड़ी समझ में आने लगी थी। अब काया को देखते देखते, काया की संवेदना को देखते देखते, चित और वित्तवृत्तियों की बात और अधिक समझ में आने लगेगी। यह समझने लगेंगे कि यह मन या चित्त क्या है? इसकी चेतना क्या है? कैसे काम करती है? चित्त की चेतना के चार मोटे-मोटे स्तंभ, चार मोटे-मोटे हिस्से हैं। उन दिनों की भाषा में चित्त के पहले खंड को विज्ञान, दूसरे को संज्ञा, तीसरे को वेदना और चौथे खंड को संस्कार कहा गया।

उन दिनों विज्ञान का अर्थ था केवल जानना। अंग्रेजी में अनुवाद करें तो इसे कॉन्यासनेस कह सकते हैं। ये जो आंखें हैं, नाक है, जीभ है, कान है, त्वचा है ये इंद्रियां अपने आप में बिल्कूल निर्जीव हैं। जबतक चेतना का यह विज्ञान-खंड इनके साथ नहीं लगता, तबतक ये काम नहीं कर सकतीं। इसके साथ विज्ञान खंड के जुड़ते ही जानकारी होती है किसी वस्तु, पदार्थ, गंध, रस, शब्द आदि की। बस, केवल जानकारी होती है। जैसे ही जानकारी हुई, चेतना का दूसरा खंड संज्ञा उत्पन्न होता है, जिसका काम पहचानने का है। यह पहचान अबतक के अनुभवों के आधार पर, याददाश्त के आधार पर, होती है। पहचान होती है तो मुल्यांकन होता है। शब्द आए तो पहचाना ये प्रशंसा के हैं, वे गाली के हैं। जैसे ही पहचाना और मूल्यांकन कर लिया, चेतना का तीसरा खंड उत्पन्न होता है, जिसे वेदना कहां गया। वेदना अर्थात् संवेदना सुखद भी होती है दुखद भी। जैसे ही दुखद या सुखद संवेदना होती है उसके प्रति तुरंत प्रतिक्रिया होती है, जिसे संस्कार कहा गया। यह चेतना का चौथा खंड है।

सुखद संवेदना हुई। प्रिय लगी। उसके प्रति राग जागा। दुखद संवेदना हुई। अप्रिय लगी। उसके प्रति द्वेष जागा। आंख, नाक, कान, जीभ, त्वचा और मन ये जो हमारी छः इंद्रिया हैं, इन पर ज्योंही संबंधित विषय टकराते हैं, त्योंही त्वरित गति से जानने, पहचानने, मूल्यांकन करने, संवेदनशील होने और संस्कार बनाने का कार्य होता है। सदेव यही करते रहते हैं राग के संरकार बनाते हैं, द्वेष के संस्कार बनाते हैं। इसी आदत के बाहर निकलना है। ठीक तरह से समझ लेना बाहिए कि कर्म-संस्कार के बीज कहां बनते हैं, कैसे बनते हैं? चित्त का पहला हिस्सा विज्ञान जानने का काम करता है, वह कर्म का बीज नहीं बन बनता। इसी प्रकार वित्त का दुसरा हिस्सा संज्ञा जो पहचानने का काम करता है, यह भी बीज नहीं बनता। चित्त का तीसरा हिस्सा वेदना भी बीज नहीं बनता। चित्त का चौथा हिस्सा संस्कार जो प्रतिक्रिया करता है, वहीं बीज बनता है। कोई भी संपर्क चाहे आंख, नाक, कान, जीभ, त्वचा अथवा मन से हो, उसका प्रभाव शरीर पर होगा ही, और तब प्रतिक्रिया होगी, संस्कार बनेगा। यह संस्कार शरीर की संवेदना के आधार पर ही बनेगा।

जब संवेदना को देखना आ जायेगा तो उसके प्रति न राग पैदा करेंगे, न द्वेष पैदा करेंगे, न मोह पैदा करेंगे। केवल दृष्टाभाव से उसे देखेंगे।

संवेदना सुखद हो या दुखद, यह नश्वर है, भंगुर है। उसे दृष्टाभावसे देखना है। घंटे भर की साधना में एक क्षण भी ऐसा आया तो अभ्यास करते-करते वही एक क्षण अनेक क्षण बन जायेगा। अनेक सेकेंड बन जायेंगे, अनेक मिनट बन जायेंगे। ऐसी स्थिति भी आयेगी ही, जब जो कुछ हो रहा है उसको जानेंगे और जानकर प्रतिक्रिया नहीं करेंगे। राग नहीं पैदा करेंगे, द्वेष नहीं पैदा करेंगे। इस तरह बदलाव होगा स्वभाव राग और द्वेष के कर्म बांधने का।

सिर से पांव तक सारे शरीर में चक्कर लगाते रहना और जहां-जहां सुखद या दुखद जो भी संवेदना हो रही है, उसे जानकर निरलिप्त, तटस्थ रह जाना है। जो कुछ हो रहा है उसे भोगे नहीं, मात्र देखें। जितना जितना द्रष्टाभाव पुष्ट होता चला जायेगा, उत्तना-उतना पुराना भोक्ताभाव का स्वभाव, राग-रंजित, द्वेष-दूषित और मोह-विमुधित रहने का स्वभाव टूटता चला जाएगा और वीत-रागता, वीत-द्वेषता और वीत-मोहता दूढ़ होती चली जायेगी। प्रज्ञा पुष्ट होगी। जहां प्रज्ञा पुष्ट होगी यानि प्रज्ञा में स्थित होंगे, वहां अनासक्त होंगे ही। जीवन-मुक्त होंगे ही।

वाणी तो वश में भली, वश में भला शरीर। पर जो मन वश में करे, वही शूर वह वीर ॥

शील समाधि ज्ञान ही, मंगल का भंडार। सब सुख साधनहार है, सब दुख मेटनहार ॥

शील धर्म पालन भला, निर्मल भली समाधि। प्रज्ञा तो जाग्रत भली, दूर करे भव व्याधि॥

शीलवान के ध्यान से, प्रज्ञा जाग्रत होय। अंतर की गांठें खुलें, मानस निरमल होय ॥

शीत समाधि ज्ञान की, बहे त्रिवेणी धार। डुबकी मारे सो तिरे, हो भव सागर पार ॥

गंगा जमुना सरस्वती, शील समाधि ज्ञान। तीनों का संगम हुआ, प्रगटे पद निर्वाण ॥

11/04/2025

हिंदी प्रवचन - तिसरा दिन

आज हमारी साधना के तीन दिन पूरे हुए। कल दोपहर को विपश्यना दी जायेगी। तब तक के लिए स्मृति का अभ्यास करना है और समाधि को पुष्ट करना है। मन को और अधिक सूक्ष्म तथा तीक्ष्ण बनाना है।

ध्यान के स्थान को जरा छोटा करना होगा। अब नासिका के नीचे ऊपर वाले होंठ तक का जो स्थान है, उस पर जो संवेदना मालूम ही, उसे महत्व देंगे। उसे देखेंगे।

संवेदना शब्द को लेकर कभी-कभी साधकों के मन में एक भ्रम, एक भ्रांति पैदा होती है? क्योंकि ध्यान के नाम पर हमने बहुत से बौद्धिक लेप लगा लिये हैं तो हमें किसी अलौकिक अनुभूति की अपेक्षा होती है। लेकिन यह विधि अपने आप में निराली है। यहां किसी के आलोकिकता के पीछे नहीं दौड़ना है। जो स्वाभाविक है, नैसर्गिक है, वास्तविक है, बस, केवल उसे ही देखना है।

कल हमने धर्म के आठ अंगों में से छः अंगों की चर्चा की थी। शील की चर्चा हुई, जिसमें शरीर और वाणी के दुष्कर्मी से बचने की बात थी। समाधि की चर्चा हुई, जिसमें मन को वश में करने की बात आयी। पर हमेशा मन के साथ जोर-जबरदस्ती करके, उसे दमन करते हुए कोई व्यक्ति दुखों से छुटकारा नहीं पा सकता। हर दमन हमारे मन में एक नई गांठ, एक नया तनाव पैदा करता है। दमन द्वारा एक बार वाणी और शरीर के दुष्कमों से तो बच जाते हैं क्योंकि मन अपने वश में आ गया, पर यह सही समाधान नहीं है। प्रारंभ तो अवश्य उससे होता है, पर जरा सा ही। हमें आगे बढ़ना है और उसी को प्रज्ञा कहते हैं। प्रज्ञा के क्षेत्र में गहराइयों से गुजर जायेंगे तो मन को दबाने की जरूरत नहीं होगी।

आज प्रज्ञा के क्षेत्र को बौद्धिक स्तर पर समझेंगे, धर्म के शेष दो अंग प्रज्ञा के अंतर्गत आते है 'सम्मा संकप्पो' यानि सम्यक संकल्प और 'सम्मा दिट्ठि' यानी सम्यक दृष्टि। संकल्प का अर्थ है- चिंतन, मनन। हमारे मन में जी विचार चलते हैं, संकल्प विकल्प चलते हैं वे सम्यक होने चाहिए, सही होने चाहिए। जब साधना का अभ्यास प्रारंभ किया तब भी विचार चलते थे और अब भी चलते हैं। हर साधक ने अनुभव किया होगा कि जब कार्य शुरू किया तब विचार बहुत अधिक राग-रंजित, द्वेष-दूषित और मोह-विमूदित थे। सांस के प्रति साक्षीभाव लाते लाते, स्मृति का अभ्यास करते करते, अनुभव हुआ होगा कि दूषित विचारों से थोड़ा-थोड़ा छुटकारा होने लगा है। दूषित विचार कम होने लगे हैं।

प्रज्ञा के क्षेत्र का दूसरा अंग है सम्यक दृष्टि, सम्यक दर्शन। दर्शन शब्द आज बड़ा भ्रामक हो गया है। पच्चीस सौ वर्ष पहले भी दर्शन शब्द का दुरुपयोग होने लगा था। ध्यान के क्षेत्र में, अध्यात्म के क्षेत्र में, जिस सही अर्थ का प्रयोग होना चाहिए, यह तो लुप्त हो गया और दर्शन का अर्थ होने लगा अमुक अमुक मान्यताएं, परंपराएं। हर संप्रदाय की अपनी भिन्न-भिन्न दार्शनिक मान्यताएं होती हैं। हर संप्रदाय अपनी इन दार्शनिक मान्यताओं को महत्व देता है और मानता है कि यही सम्यक दर्शन है। बस, यहीं विवाद खड़े हो गये। दर्शन का सही और वास्तविक अर्थ लुप्त हो गया। दर्शन का सही अर्थ है जो बात, जो वस्तु जैसी है, उसे वैसे ही उसके गुण-धर्म-स्वभाव में देखें। यही सम्यक दर्शन है।

प्रज्ञा के तीन सोपान हैं श्रुतमयी प्रज्ञा, चिंतनमयी प्रज्ञा और भावनामयी प्रज्ञा।

श्रुतमयी प्रज्ञा का अर्थ है वह ज्ञान, जो हमने सुन लिया अथवा शास्त्रों में पढ़ लिया। बड़ा उपयोगी है यह ज्ञान। इसका अपना लाभ है। इससे प्रेरणा मिलती है, मार्ग-दर्शन मिलता है। लेकिन किसी बात को केवल श्रद्धापूर्वक मान लेना मात्र काफी नहीं है। इस ज्ञान से मार्ग दर्शन से प्रेरणा लेकर आगे कदम बढ़े, तभी लाभ होता है, अन्यथा केवल सुना या पढ़ा हुआ ज्ञान अंध-श्रद्धा का रूप ले लेता है।

चिंतनमयी प्रज्ञा का अपना महत्व है। चिंतन-मनन करना मनुष्य का स्वभाव है, उसका अपना प्राकृतिक धर्म है। वह हर बात अपनी बुद्धि की कसौटी पर कसकर देखेगा। जो कुछ सुना है, पढ़ा है, उस पर चिंतन-मनन करके यह निश्चय करना कि कौन-सी बात युक्तिसंगत है, न्याय-संगत है, तर्क-संगत है, धर्म-संगत है? तब ही उसे स्वीकार करना। लेकिन इससे भी अगला कदम है और वह नहीं उठा तो यह स्थिति भी खतरनाक हो जायेगी। सिर पर एक दंभ सवार हो जायेगा कि मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया सारे शास्त्र पढ़ लिये, उन शास्त्रों को तर्क-वितर्क से समझ लिया। मैं बड़ा प्रज्ञावान हो गया। यह भी बड़ी भ्रांतिमय स्थिति है। जबतक अपनी अनुभूति के स्तर पर अपने ज्ञान की वृद्धि नहीं होगी, सही माने में लाभ नहीं होगा।

अतः श्रुतमयी और चिंतनमयी प्रज्ञा से लाभ लेकर अगला कदम उठाना है, भावनामयी प्रज्ञा के क्षेत्र में प्रवेश करना है। अपनी अनुभूतियों के बल पर जो प्र
प्रज्ञा बढ़ रही है वह कल्याणकारिणी प्रज्ञा है। उसी से मनोबल सधता है, पुरानी गांठें खुलती हैं, नई गांठें नहीं बंधतीं। हम जो साधना कर रहे हैं उसका यही लक्ष्य है कि प्रत्येक साधक की भावनामयी प्रज्ञा जाग्रत हो।

हर परंपरा के महापुरुषों ने जो बात कही, अपने अनुभवों से कही। पर वह हमारे काम की तभी होगी जबकि वह सारा अनुभव हमारे जीवन में उत्तरे। जो अनुभूति होती है, उसे शब्दों में पूरी तरह नहीं उतारा जा सकता। कुछ तो अनुभूतियां ऐसी हैं, जो इंद्रियातीत हैं। अंतिम सत्य की अनुभूति हैं, परम सत्य की अनुभूति हैं। इन अनुभूतियों को शब्दों में उतारना नितांत असंभव है, क्योंकि शब्दों की अपनी सीमा होती है, भाषा की अपनी सीमा होती है। इसलिए सत्य की खोज में निकले साधक के लिए यह आवश्यक है कि सत्य को अपनी अनुभूति के स्तर पर जाने। यही भावनामयी प्रज्ञा है।

इस प्रकार सत्य की खोज आरंभ करते हैं तो अंतर्मुखी होकर जिस सच्चाई का पहले दर्शन करते हैं, वह हमेशा स्थूल, ठोस, ही होती है। स्थूल सत्य का दर्शन होता है, घनीभूत सत्य का दर्शन होता है। घनीभूत सत्य को देखते-देखते उसके टुकड़े होने लगते हैं तो फिर सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और फिर सूक्ष्मतम सत्य के दर्शन होने लगते हैं और अंततः अंतिम सत्य, परम सत्य, तक जाते हैं। अपनी अनुभूति में जो उतर रहा है, वही अपनी प्रज्ञा है। यह प्रज्ञा कैसे बढ़े, कैसे भावित हो, कैसे इसका बहुलीकरण हो? जो सच्चाई जैसे प्रकट हुई, उसे वैसे ही देखेंगे, वैसे ही स्वीकारेंगे। इस पर किसी मान्यता का दर्शन का, अथवा राग का, द्वेष का, भ्रांति का रंग-रोगन नहीं चढ़ायेंगे।

सबसे पहली स्थूल सच्चाई इस शरीर की है, इससे काम शुरू करते हैं और इसकी सूक्ष्मताओं में उतरते हैं। धीरे-धीरे चित्त की सुक्ष्मताओं में उतरते हैं। उसके गुण, धर्म, स्वभाव को देखते हैं। इसके बाद जो इंद्रियातीत धर्म है, सच्चाई है। लोकातीत धर्म है. सच्चाई है, उसका साक्षात्कार अपने आप हो जाता है।

शरीर तथा संसार की अनित्यता और क्षण-भंगुरता के बारे में खूब सुना और पढ़ा, लेकिन अनुभूतियों के स्तर पर यह बात नहीं जानी। इसलिए भ्रांति होती है। उस व्यक्ति ने, जिसे सम्यक सम्बोधि प्राप्त हुई, बाहर की दुनिया को खूब देखा। बाहर की सच्चाइयों को बहुत देखा। फिर अंतर्मुखी होकर अंतर की सच्चाई को देखने लगा। इस शरीर के बारे में क्या सच्चाई है? हड़ी है, मांस है लहू है, त्वचा है, इत्यादि-इत्यादि। फिर इन्हें टुकड़े करके देखा तो पाया कि ये सब-के-सब नन्हें नन्हें परमाणु कणों से बने हैं और ये परमाण-कण भी उत्पन्न होते हैं, नष्ट होते हैं। अनुभूति से मालूम हुआ कि उत्पन्न नष्ट होने वाले ये कण परमाणु से भी छोटे हैं। उस समय की समृद्ध भाषा में भी ऐसे छोटे कण को व्यक्त करने के लिए कोई शब्द नहीं था। तो एक नया शब्द गढ़ लिया अष्टकलाप । अष्टकलाप उस इकाई को कहा, जहां आठ चीजें जुड़ गयीं। उनके और टुकड़े नहीं हो सकते। यह है भौतिक जगत की नन्ही-से-नन्हीं इकाई।

क्या आठ बातें जुड़ गयीं? चार भौतिक तत्व और उनके अपने अपने गुण, धर्म, स्वभाव। पृथ्वी तत्त्व, जल तत्व, अग्नि तत्व, वायु तत्व-अपने-अपने गुण-धमों के साथ। और फिर देखा कि यह जो इतनी नन्हीं सी इकाई है, वह भी ठोस नहीं है। तरंग-ही-तरंग है। नश्वर है, भंगुर है, उदय-व्यय ही उदय व्यय है। और देखा कि इतनी तीव्र गति से इन तरंगों का उदय-व्यय हो रहा है कि पलक झपकने भर में ये अष्टकलाप अनेक शत सहस्त्र कोटि बार उत्पन्न हो-होकर नष्ट हो जाते हैं।

अनुभूतियों के स्तर पर जब यह बात स्पष्ट होती है कि यह शरीर कितना अनित्य है, कितना भंगुर है। प्रतिक्षण उदय होता है, व्यय होता है तो आसक्तियों अपने आप टूटने लगती हैं। जितनी जितनी अनुभूति वाली यह प्रज्ञा पुष्ट होती है, सम्यक होती है, उतनी उतनी आसक्ति टूटती ही है। प्रज्ञा का यह पहला स्वरूप, अनित्य बोध का स्वरूप, जब जगने लगता है, प्रमुख होने लगता है, तो राग दूर होते हैं, द्वेष दूर होते हैं, मोह दूर होते हैं याने दुख दूर होते हैं, व्याकुलता दूर होती है, कठिनाइयां दूर होती हैं, तनाव दूर होते हैं।

ज्यों-ज्यों अनित्य-बोध पुष्ट होने लगता है, त्यों-त्यों प्रज्ञा का दूसरा अंग अनात्म-वोध स्पष्ट होने लगता है। अनात्म-बोध क्या है? इसे भी ठीक से समझें।

दार्शनिकों के अनात्मवाद और आत्मवाद के विवाद में हमें नहीं पड़ना है। अनात्मभाव अर्थात अहंभाव और ममभाव का अभाव। 'मैं' नहीं है, 'मेरा' नहीं है। इस 'मैं-मैं' ने, 'मेरा मेरा' ने कितनी आसक्ति पैदा कर दी है, यह खूब समझ में आने लगेगा। व्यवहार जगत में 'मैं-मेरा', 'तू-तेरा' कहना पड़ता है। लेकिन वास्तविक कठिनाई आसक्ति की है, जिसके कारण दुख होता है। वस्तुतः इस शरीर स्कंध के प्रति गहरा चिपकाव हो गया है, गहरी आसक्ति हो गयी है। ऐसे ही चित्त-स्कंय के प्रति गहरा चिपकाव, गहरी आसक्ति हो गयी है। अनुभूति के स्तर पर देखने लगेंगे तो पता लगेगा कि जिनके प्रति आसक्ति पैदा कर रहे हैं, ये तो तरंगें ही तरंगें हैं।

'सब्बो पज्जलितो लोको,सब्बो लोको पकम्पितो !'

सारे लोक प्रज्वलित-ही-प्रज्वलित है, सारे लोक प्रकंपित-ही-प्रकंपित हैं। यह तो उदय-व्यय का प्रकंपन है, इसमें मैं और मेरा जैसा कुछ है ही नहीं। जब यह शरीर ही मेरा नहीं है तो इससे एक कदम भी आगे, एक इंच भी आगे जो वस्तु हैं, व्यक्ति है, स्थिति है, वह मेरी कैसे होगी? अनात्म का अर्थ है जहां अहं समाप्त हो जाय, मम समाप्त हो जाय। तभी राग मिटता है, द्वेष मिटता है।

अनित्य और अनात्मबोध के साथ-साथ प्रज्ञा के तीसरे अंग दुख का वास्तविक बोध होने लगता है। सही माने में दुख क्या है? यह बात समझ में आने लगती है। जो अनित्य है, प्रतिक्षण बदलता है, प्रतिक्षण भंग होता है, जिस पर मेरा कोई अधिकार नहीं है, जो 'मैं' नहीं, 'मेरा' नहीं, उसके प्रति जितनी जितनी आसक्ति है, उत्तना-उतना दुख ही है। यह बात अनुभूतियों से समझ में आयेगी, प्रवचनों से नहीं। सही माने में दुख के दर्शन होने लगेंगे। स्थूल-स्थूल दुख के दर्शन तो होंगे ही, आगे चलकर सूक्ष्म दुख के भी दर्शन होने लगेंगे, जिसे दुनियादारी की भाषा में सुख कहते हैं। अभी तो शरीर पर होने वाली s
स्थुल - स्थुल पीड़ाओं का जितना दुख है, उसे साक्षी भाव से देखना सीखेंगे। जिसे सुखद संवेदना कहते हैं, अनित्य स्वभाव वाली होने के कारण उसके नष्ट होने पर जो दुख होता है, उसे भी जानेंगे और साक्षीभाव से देखना सीखेंगे।

अनित्य, अनात्म और दुख की ये तीनों प्रज्ञाएं भीतर से अपने आप जागने लगेंगी, तो बाह्य जगत में भी प्रज्ञा का शासन चलेगा। जो बात अशुभ है, अशुभ ही लगेगी। जो असुंदर है, असुंदर ही लगेगी।

जैसे-जैसे अंतर्मुखी होकर गहराइयों में प्रवेश करेंगे तो मालूम होगा कि संगठन की, संश्लेषण की घनीभूत की अपनी माया है। बड़ा भ्रम पैदा करती है यह माया। ज्यों-ज्यों प्रज्ञा पुष्ट होने लगेगी, सारी बात जैसी है, वैसी ही दिखने लगेगी। जैसा बाहर, वैसा भीतर। इस प्रकार के ज्ञान से कभी घृणा नहीं जगेगी। धर्म कभी किसी से घृणा करना नहीं सिखाता। मैत्री जगेगी, करुणा जगेगी, जीवन में समता आयेगी।

इस भावनामयी प्रज्ञा को जगाने के लिए कल काम शुरू करेंगे। इन तीन दिनों तक शील पालन करते हुए समाधि के क्षेत्र में जो पुरुषार्थ किया है, उसका लाभ कल मिलेगा। कितनी गहराइयों में जा सकेंगे, यह बात हर व्यक्ति की अपनी मेहनत पर, अपने काम पर, अपनी तपस्या पर निर्भर करती है। निरंतर अभ्यास में लगे रहें। सफलता मिलने ही वाली है।

कायिक कर्म सुधार ले, वाचिक कर्म सुधार। मनसा कर्म सुधार ले, यही धर्म का सार ॥

जो चाहे बंधन खुलें, मुक्ति दुखों से होय। वश में कर ले चित्त को, चित के वश मत होय ॥

चित से चित्त का दमन कर, चित से चित्त सुधार। चित्त स्वच्छ कर चित्त से, खोल मुक्ति के द्वार ॥

पर-सेवा ही पुण्य है, पर-पीड़न ही पाप। पुण्य किये सुख ही मिले, पाप किये दुख-ताप ॥

कुशल कर्म करते रहें, करें न पाप लबलेश। मन निरमल करते रहें, शुद्ध धर्म उपदेश ॥

कुदरत का कानून है, सब पर लागू होय। मैले मन दुखिया रहे, निरमल सुखिया होय ॥

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