12/04/2025
हिंदी प्रवचन - पांचवां दिन
आज साधना के पांच दिन पूरे हुए। हम अन्तर्मुखी होकर अपने ही शरीर-स्कंध को देख रहे हैं, चित्त-स्कंध को देख रहे हैं। यह जो सिर से पाव तक चक्कर लगा रहे हैं, कोई रूढ़ि नहीं पूरी कर रहे हैं। अपने आपको देखने का अभ्यास कर रहे हैं। अपने मन और शरीर के स्वभाव को देख रहे हैं। देख रहे हैं कि मन कितना राग-रंजित है, कितना द्वेष दूषित है और शरीर पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा है?
यह जो मनुष्य जीवन को दुखी बनाने वाला रोग है, उसे समझें, उसके कारण को समझें। जीवन में दुख तो है ही। किसी को इस बात का दुख है तो किसी को उस बात का। जीवन जगत की यह पहली सच्चाई है। विना कारण के कुछ होता नहीं। दुख के पीछे कोई कारण है, यह दूसरी सच्चाई है। यदि कारण दूर कर लिया तो दुख दूर हो ही गया। यों दुख दूर करने का एक तरीका है। यह तीसरी और चौथी सच्चाइयों हैं। जीवन जगत की ये चार सच्चाइयां हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण सच्चाइयां है।
चित्त की चेतना के बारे में हमने चर्चा की कि चेतना का एक खंड विज्ञान, जानने का काम करता है। दूसरा खंड संज्ञा, पहचानने का काम करता है। तीसरा खंड वेदना संवेदनशील होने का काम करता है और चौथा खंड, संस्कार, प्रतिक्रिया करने का काम करता है। अनुभूतियों के स्तर पर इस सारी प्रक्रिया को समझना है। जबतक जीवित हैं, सारे शरीरस्कंध पर कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी कारण से, कोई-न-कोई संवेदना होती ही रहती है। इंद्रियों के दरवाजों पर बाहर की कोई चीज टकराती है तो संवेदना होती है। भीतर मन और शरीर के टकराव से संवेदना होती है। जो अंतर्मन की गहराइयों में इन संवेदनाओं की वजह से राग-द्वेष की जो प्रतिक्रियाएं हो रही हैं, यदि हमने उसे जाना ही नहीं, यदि उसका दर्शन ही नहीं किया तो उसे दूर कैसे कर सकेंगे?
जीवन-जगत में दुख है, यह स्पष्ट है। इस सच्चाई को स्वीकार करना है। लेकिन मात्र स्वीकार करना काफी नहीं है। इस सच्चाई का दर्शन करना है। जब हम सच्चाई का दर्शन कर लेते हैं, तो यह सच्चाई आर्य सच्चाई बन जाती है। जबतक दुख को भोगते हैं, दुख का संवर्धन ही करते हैं, दुख को बढ़ाते ही हैं। जब दुख के दर्शन करने लगते हैं, तो दुख दूर होने लगता है। दुख सत्य, आर्य सत्य, बन जाता है। आर्य सत्य इस माने में कि देखने वाले को आर्य बना देगा, निर्मल बना देगा, संत बना देगा, मुक्त बना देगा, शुद्ध बना देगा, बुद्ध बना देगा।
इस साधना में हमें इस सच्चाई का अनुभव करना है और उसे साक्षीभाव से देखना है। घंटे भर एक ही आसन में बैठे रहने से बड़ा दुख अनुभव होता है, बड़ी पीड़ा होती है। इस पीड़ा को देखना है। साक्षीभाव से देखते-देखते यह पीडा कम होती जायेगी और ऐसी स्थिति आयेगी कि विल्कुल समाप्त हो जायेगी। परंतु यदी इस पीड़ा को भोगते रहे, पीड़ा में कराहते रहे, तो पीड़ा न कम होगी, न मिटेगी। उसका संवर्धन ही होगा।
जब से मनुष्य जन्म लेता है, अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्याकुल रहता है। आयश्यकताओं की कोई सीमा नहीं है। बीमार होता है तो दुखी होता है। बूढ़ा होता है तो दुखी होता है। मरता है तो दुखी होता है। देखता है कि जीवन में दुख-ही-दुख है। सारा जीवन क्या चलता है? जो प्रिय है उसका वियोग हुआ जा रहा है, प्रिय व्यक्ति, प्रिय वस्तु, प्रिय स्थिति। जो अप्रिय है उसका संयोग हुआ जा रहा है। अनचाही होती रहती है, मनचाही नहीं होती। जो कामना करता है, वह पूरी नहीं होती, तो दुखी होता है। यह जीवन-जगत की सच्चाई है। तीव्र इच्छा यानी तृष्णा अपने आप में व्याकुलता है। तृष्णा माने जो अपने पास है, उससे तृप्ति नहीं और जो नहीं है, उसे पाने के लिए व्याकुल हैं। साधना करते-करते स्वयं अनुभव होगा कि तृष्णा कैसे जागती है। शरीर में जो पीड़ा हो रही है, वह अपने आप में इतनी दुखदायी नहीं, लेकिन उसे दूर करने की तृष्णा कई गुना दुखदायी होती है। जीवन भर यही करते आए हैं। जो अप्रिय है उसे दूर धकेलना चाहते हैं, जो प्रिय है, उसे अपनी ओर समेटना चाहते हैं। तृष्णा का दुख इस धकेलने समेटने का ही दुख है। यह सत्य है। लेकिन वह महापुरुष इस सच्चाई पर ही नहीं रुक गया। और गहराइयों में उतरा तो देखता है, 'सद्धित्तेन पञ्युपादानखन्धा दुक्खा'। यह जो पांचों स्कंधों के प्रति उपादान यानी आसक्ति पैदा कर ली, यह दुख है। ये पांच स्कंध क्या है? एक रूपस्कंध यानी परमाणुओं का स्कंथ, भौतिक कलापों का स्कंध यह सारा शरीर, जिसे मैं' कहता है, मेरा' कहता है, उसके प्रति गहरा चिपकाव है, आसक्ति है। इसी तरह चित्त के चार स्कंध विज्ञान, संज्ञा, वेदना और संस्कार। इनके प्रति गहरा चिपकाय है। जैसे कलापों का अपना स्वभाव है, वैसे ही इन चित्त स्कंधों का अपना स्वभाव है और वे अपने स्वभाव के अनुसार निरंतर काम करते रहते हैं। लेकिन इनके साथ इतना गहरा चिपकाव पैदा कर लिया है कि मैं जान रहा हूं, मैं पहचान रहा हूं, मैं संवेदनशील हो रहा हूं, मैं प्रतिक्रिया कर रहा हूं। व्यवहार-जगत में तो ऐसा कहना ही पड़े, लेकिन हमें वास्तविकता को समझना है, सत्य को समझना है, देखना है। इसके साथ जितनी आसक्ति पैदा की है, उतना ही दुख है। आसक्ति और दुख दोनों पर्यायवाची हैं। जहां आसक्ति वहां दुख। जितनी आसक्ति उतना दुख। यह प्रकृति का अटूट नियम है।
हम चार तरह की आसक्तियों को अपने भीतर संजोए बैठे हैं। इन्हें दिन-रात बढ़ाए जा रहे हैं। एक तृष्णा की आसक्ति है। तृष्णा अपने आप में व्याकुलता बढ़ाती है, परंतु इसके साथ इतना चिपकाव पैदा कर लिया कि तृष्णा रहनी ही चाहिए। जिस किसी वस्तु, व्यक्ति, स्थिति के प्रति तृष्णा जागी तो जबतक वह नहीं प्राप्त होती, बड़ी बेचैनी होती है, व्याकुलता होती है। परंतु प्राप्त होने पर शीघ्र ही फीकी लगने लगती है। अब दूसरी के प्रति तृष्णा जाग उठती है। यह मिली तो तीसरी, चौथी... अंत ही नहीं है इस तृष्णा का। बिना पेंदी की बाल्टी है, जी कभी भरती ही नहीं। जीवन भर यही चलता है। तृष्णा कायम रहनी ही चाहिए, क्योंकि उसके साथ गहरी आसक्ति है।
एक अन्य आसक्ति है में के प्रति, मेरे के प्रति। जानते ही नहीं कि में क्या है, मेरा क्या है। फिर भी इस में के खिलाफ, मेरे के खिलाफ, कोई एक शब्द नहीं कहे। किसी ने कुछ कहा तो बड़ी व्याकुलता होती है, बड़ा दुख होता है। जिसे मेरा कहा, उसका विछोह होते ही दुख होता है। आसक्ति जो है। आसक्ति दुख ही लाति है।
एक अन्य आसक्ति होती है, अपने दर्शन के प्रति अपनी परंपरागत मान्यता के प्रति। इस आसक्ति को लेकर मनुष्य खूब बहस करता है, विवाद करता है, लड़ता है, झगड़ता है, व्याकुल रहता है।
एक और आसक्ति अपने-अपने कर्म-कांडों के प्रति होती है। यह आसक्ति भी कम व्याकुल नहीं करती।
इन चार आसक्तियों पर ध्यान देंगे तो देखेंगे कि जब-जब दुख होता है, इन चारों में से कोई न कोई आसक्ति ही उसका कारण होती है। परंतु वह महापुरुष, जी सम्यकसंबुद्ध बना, उसे तो कारण की जड़ों तक पहुँचना था। अनुसंधान चालू रहा। कार्य-कारण शृंखला की एक-एक कड़ी का निरीक्षण करते हुए जड़ों तक जा पहुंचा। जीवन में दुख तो है ही।
'जाति-पत्यया-जरा-मरणं-सोक-परिदेव-दुक्खदोमनस्तुपायासा सम्भवन्ति।'
जन्म हो गया तो बुढ़ापा, बीमारी, मृत्यु आयेगी ही। शोक, बेचैनी, परेशानी आयेगी ही। पर जन्म क्यों हुआ? बिना कारण तो इस जगत में कुछ भी नहीं होता। जन्म के लिए माता-पिता का संयोग आवश्यक है, जो प्रकृति का एक नियम है, लेकिन इसके अतिरिक्त यह समझें कि जीवन-धारा किस प्रकार चलती है-
'भव पच्चया जाति' । यह भव-भव-भव कुछ बनता ही जा रहा है। मृत्यु के साथ बात समाप्त नहीं होती। मृत शरीर में भी परिवर्तन होता जा रहा है और यह चेतना की धारा तुरंत किसी दूसरे शरीर से जुड़ जाती है। फिर क्षण क्षण बनती है, बिगड़ती है। इस प्रकार यह क्रम चलता ही रहता है। तो यह भव क्यों होता है? अनुभूतियों से देखने पर एकदम समझ में आ गया-
'उपादान पच्चया भवो'। यह आसक्ति ही भव का कारण है। जितनी गहरी आसक्ति होगी, उतना गहरा भव कर्म होगा। तो यह उपादान क्यों होता है? उसका क्या कारण है? अनुभूतियों द्वारा तुरंत मालूम हुआ-
'तण्हा पच्चया उपादानं।' तृष्णा यानी यह राग और द्वेष ही उपादान के कारण हैं। तृष्णा क्यों पैदा होती है? स्पष्ट हुआ-
'वेदना पच्चया तण्हा'। सारे शरीर स्कंध पर जहां संवेदना होती है, वहां तृष्णा जगती है। सुखद संवेदना हो तो राग और दुखद संवेदना हो तो द्वेष। वेदना होने का क्या कारण है?-
'फस्स पच्चया वेदना' । वेदना स्पर्श से होती है। इन छह इंडियों के द्वारों पर इनके विषयों से स्पर्श होते ही संवेदना होती है। तो यह स्पर्श क्यों होता है?-
'सळायतन पच्चया फस्स'। यह छह इंद्रियों के दरवाजे खुले रहते हैं, इन पर स्पर्श होता है। तो यह छह इंद्रियां कहां से आयी? बात स्पष्ट हो गई-
'नाम-रूप पच्चया सळायतनं' ! नाम रूप की वजह से ये छह इंद्रिया आयी । यह नाम-रूप क्या है? नाम यानी मन और रूप यानी शरीर। इन दोनों की मिली-जुली जीवन-धारा जैसे ही शुरू हुई, छह इंद्रियों को लेकर ही शुरू हुई। तो यह नाम-रूप क्यों हुआ?-
'विश्आण पच्चया नाम-रुपे'। विज्ञान से नाम-रूप हुआ। यह विज्ञान यानी चेतना जो एक जीवन समाप्त होते ही उसके साथ समाप्त हो जाती है, पर अगले जीवन में फिर किसी अन्य शरीर के साथ नयी उत्पन्न हो जाती है। समाप्त होते ही अगले क्षण नया विज्ञान उत्पन्न हो जाता है। उसका स्वभाव है क्षण-प्रतिक्षण उत्पन्न होकर आगे बढ़ना। यह विज्ञान क्यों होता है?-
'सहार पच्चया विड्वाणं' हर संस्कार नया विज्ञान पैदा करता है। जैसे-जैसे साधना की गहराइयों में जायेंगे, मालूम होगा कि हर संस्कार नया विज्ञान यानी अगले क्षण की नई चेतना पैदा करता है। ये संस्कार कैसे बनते हैं?
'अविजा पच्चया सद्वारा'। अविद्या से ही संस्कार बनते हैं। अविद्या का अर्थ है अज्ञान, बेहोशी, विमूढ़ता। इस प्रकार सारा रहस्य खुल गया। जड़ तक बात समझ में आ गयी।
'अविज्ञ्जा-पच्चया सद्वार ,
सद्वार-पच्चया विड्वाणं,
विड्वाणं पच्चया नाम-रुपे
नामरूप-पच्चया तळायतनं,
सळायतन-पच्चया फस्सो,
फस्स-पच्चया वेदना,
वेदना-पच्चया तण्हा,
तण्हा-पच्चया उपादानं,
उपादान-पच्चया भव,
भव-पच्चया जाति,
जाति-पच्चया-जरामरणं-सोक-परिदेव-दुक्ख-दोमनस्सुपायासा सम्भवन्ति। एबमे तस्स केवलस्स, दुक्खक्खन्धस्स समुदयो होति।'
देख लिया कि किस प्रकार यह दुख का पहाड़ खड़ा होता है। सारा खेल समझ में आ गया। यह अविद्या, यह बेहोशी ही दुख का मूल कारणा है। इस अविद्या को जड़ से काटें:
'अविजाय त्वेव असेस विराग-निरोधा सहार-निरोधो,
सहार-निरोधा किआण-निरोधो,
विड्आण-निरोधा नाम-रूप-निरोधी,
नामरूप-निरोधा सजावतन-निरोधी,
सळायतन-निरोधा फस्स-निरोधो,
फरस-निरोधा वेदना-निरोधी,
वेदना-निरोधा तण्हा-निरोधी,
तण्हा-निरोधा उपादान-निरोधी,
उपादान निरोधा भव-निरोधी,
भव-निरोधा जाति-निरोधो,
जाति-निरोधी जरामरणं-सोक-परिदेव-दुक्ख-दोमनस्सुपायासा निरुज्जान्ति । एवमेतस्स केवलस्स दुक्खक्खन्धस्स निरोधी होती 'ति ।'
कारण का निवारण समझ में आ गया। कितना भी बड़ा दुखों का पहाड़ क्यों न खड़ा कर लिया हो, सारा का सारा समाप्त ही जायेगा। अविद्या को जड़ से उखाड़ना सीखें। कैसे उखाड़ें? दुख को देख लिया। दुख के कारण को देख लिया, अविद्या की शृंखला देख ली। जीवित हैं तो नाम-रूप की धारा चलेगी ही। इंद्रियां भी अपना काम करेंगी ही। स्पर्श भी होगा ही। संवेदना भी होगी ही। और जब-जब संवेदना होगी, पुराने स्वभाव के कारण तुष्या जागेगी। सुखद होगी तो राग की, दुखद होगी ती द्वेष की। बस, वहीं रोक लगानी होगी। वेदना तो हो, लेकिन 'वेदना-पच्चया तण्हा' के स्थान पर 'वेदना-पच्चया पन्या' हो, प्रज्ञा जागे। हर वेदना के साथ प्रज्ञा जागेगी तो अविद्या के कारण जो दुख-चक्र चल रहा था, वह पलट जायेगा 'धर्म-चक्र में।
क्या है धर्म-चक्र? जब-जब वेदना जागे, हर वेदना प्रज्ञा जगाए-अनित्य है, नश्वर है। देख तो सही इसे। राग मत पैदा कर। द्वेष मत पैदा कर। हर संवेदना के साथ जितनी देर प्रज्ञा जगती है, नए संस्कार नहीं बनते। इतना ही नहीं, पुराने संस्कार भी कटने लगेगे।
'खीणं पुराणं नवं नत्थि संभर्व'। नया नहीं बनने पायेगा और पुराना क्षीण हो जायेगा। उस महापुरुप ने प्रकृति के इस कानून को, विधान को, देख लिया। नया बनाना बंद किया तो पुराना क्षीण पड़ने लगा। क्षीण होते-होते एक ऐसी अवस्था पर पहुंच गया कि सारे पुराने भव-संस्कार क्षीण हो गए। प्रज्ञा को जगाते जगाते चित्त नितातं निर्मल हो गया। नितातं विमुक्त हो गया। शुद्ध-बुद्ध हो गया। उस समय जो हर्ष के उद्गार निकले, वे बड़े महत्व के है:-
'अनेक जाति-संसारं,सन्धाविस्सं अनिब्बिसं । पुनप्पुनं । काहसि। विसहितं । गहकारकं गवेसन्तो, दुक्खा जाति महकारकविद्रोसि, पुन मेहं न सव्वा ते फासुका भग्गा, गहकूटं विसङ्कारगर्त चित्तं, तण्हानं खयमागा'।
कितनी बार जन्म लिया इस संसार में गिनती ही नहीं। जन्म लेता गया और बीना रुके [मृत्यु की ओर] दौड़ लगाता गया। इस कायारूपी घर बनाने वाले की खोज करते हुए पुनः पुनः दुखमय जीवन में पड़ता रहा। अब घर बनाने वाले को देख लिया। अब नया घर नहीं बना सकेगा। सारी कड़ियां भग्न हो गयीं। घर का शिखर टूट गया। घर बनाने की सारी सामग्री तोड़-फोड़कर फेंक दी गयी। चित्त पूर्व संस्कारों से विहीन हो गया। भविष्य के लिए कोई तृष्णा नहीं रह गई। तृष्णा का समूल नाश हो गया। विमुक्त हो गया। हर व्यक्ति ऐसा कर सकता है। हर व्यक्ति इस अवस्या तक पहुँच सकता है। पर काम करना होगा। काम स्वयं ही करना होगा।
आठ अंग का आर्य पथ, शुद्ध धर्म का पंथ। कदम-कदम चलते हुए, दुर्जन होवे संत ॥
पंचशील पालन भला, निरमल भली समाधि। प्रज्ञा तो जागी भली, दूर करे भव व्याधि ॥
मन के करम सुधार ले, मन ही प्रमुख प्रधान। कायिक वाचिक करम तो, मन ही की संतान ॥
मन ही दुर्जन मन सुजन, मन बैरी मन मीत। जीवन में मंगल जगे, जब मन होय पुनीत ॥
जैसी चित्त की चेतना, फल वैसा ही होय। दुर्मन का फल दुखद ही, सुखद सुमन का होय ॥
जबतक मन में राग है, जबतक मन में देष। तबतक दुख ही दुःख है, मिटे न मन के क्लेश ॥