नर्मदेश्वर धाम आदमपुर

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नर्मदेश्वर धाम आदमपुर नर्मदेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से ही सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। Since - 1979

: जिस गीता को गा केशव ने, जग को राह दिखाई थी !जिसका पालन कर अर्जुन ने, धर्म ध्वजा लहराई थी !!आंख बंद कर आर्यभूमि  ने, जि...
01/12/2025

: जिस गीता को गा केशव ने, जग को राह दिखाई थी !
जिसका पालन कर अर्जुन ने, धर्म ध्वजा लहराई थी !!

आंख बंद कर आर्यभूमि ने, जिसपर है विश्वास किया !
जिसका पालन कर वीरों ने, है अधर्म का नाश किया !!

वह गीता लेकर हाथों में, कैसे कोई भ्रमित हुआ ?
किंचित पढ़ा नहीं गीता को, ज्ञान तभी तो समित हुआ !!

धर्म सदा कहता है प्रतिपल, दानव कुल का नाश करो !
कब सिखलाया है गीता ने, सबका साथ विकास करो ??

सबको संग रखने की ज़िद में, अपना अक्सर खोता है !
मानवता का साथी बोलो, दानव कुल कब होता है ??

भारत माता के खंडन के, नये व्यूह जो रचते हैं !
संविधान का कवच पहन कर , प्रतिदिन वह बच लेते हैं !!

तुमने पूरा ज़ोर लगाया, साथ न उनका है पाया !
कुछ लोमड़ियों के लालच में, सिंहों का बलिदान कराया !!

शक्ति मिली है महादेव से, उसका पूर्ण प्रयोग करो !
पढ़ने से ज्यादा गीता का, शासन में उपयोग करो !!

आर्यभूमि के अरि हैं जितने, उनका पूर्ण विनाश करो !
चलकर गीता के पथ राजन, अब अधर्म का नाश करो !!

- पंडित कृष्ण दत्त जोशी

मोक्षदा एकादशी _गीता जयंती _की हार्दिक शुभकामनाएं!!

*मोक्षदा एकादशी 2025* सत्य सनातन वैदिक धर्म की जै सभी सनातनीय धर्म प्रेमियों को सादर नमस्कारम, प्रणाम, जै माता दी 🙏 अवगत...
01/12/2025

*मोक्षदा एकादशी 2025*
सत्य सनातन वैदिक धर्म की जै
सभी सनातनीय धर्म प्रेमियों को सादर नमस्कारम, प्रणाम, जै माता दी 🙏
अवगत कराना चाहूंगा दिनांक 01 दिसंबर 2025 दिन सोमवार को मोक्षदा एकादशी उपवास रखा जाएगा।

*सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वितः।*
*मनुष्या मत्प्रसादेन भविष्यन्ति न संशयः॥*

मार्गशीर्ष माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मोक्षदा एकादशी उपवास रखा जाता है। धार्मिक मान्यतानुसार श्री हरि विष्णु प्रसन्न होकर मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं तथा मृत्यु के उपरांत बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है। पौराणिक मान्यतानुसार द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन अर्जुन को कुरुक्षेत्र में गीता का ज्ञान दिया था इसलिए इस तिथि को मोक्षदा एकादशी कहा जाता है धार्मिक मान्यता है कि मोक्षदा एकादशी उपवास के प्रभाव से मनुष्य के पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है सभी कष्टों का नाश होता है।

*मुहूर्त*
मोक्षदा एकादशी तिथि प्रारंभ 30 नवंबर 2025 रात्रि 09:30 से 01 दिसंबर 2025 सायंकाल 07:02 तक।
एकादशी उपवास पारण समय रहेगा 02 दिसंबर 2025 प्रातः 06:51 से 09:04 तक।

*पूजा विधि*
नित्य कर्म से निवृत्त हो, स्नानादि कर, पूजा स्थल व पूरे घर को स्वच्छ करें। पूजा स्थल पर गंगाजल का छिड़काव करें। उपवास का संकल्प लें, श्री हरि भगवान विष्णु को गंगाजल से स्नान कराने के उपरांत आसन प्रदान करें। भगवान विष्णु के सम्मुख घी का दीपक प्रज्वलित करें। पीतांबर अर्पित करें। भगवान विष्णु को रोली, कुमकुम, धूप, पंचामृत, पीले पुष्प, पीले लड्डू ,पानसुपारी, तुलसी के 11 पत्ते, अर्पित करें गीता के ग्यारवे अध्याय का पाठ करें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। श्री हरि विष्णु को मखाने से बनी हुई खीर भोग में चुटकी भर हल्दी डालकर अर्पित कर सकते हैं। 11 घी के दीपक व कपूर जलाकर विष्णु भगवान की आरती करें। अखंड ज्योत उपवास संपन्न होने तक प्रज्वलित रखें।
*मोक्षदा एकादशी पर कुछ उपाय करने से लाभ प्राप्त होगा*
1–धार्मिक मान्यता अनुसार मोक्षदा एकादशी पर अन्नदान करना शुभ माना जाता है जिन भी जातकों पर पित्र दोष का प्रभाव हो इस दिन पीली वस्तुओं का दान करें। पितरों की आत्मा को मोक्ष प्राप्त होगा और आपकी कुंडली में पित्र दोष का प्रभाव कम होगा।
2–जिन जातकों को आर्थिक परेशानी हो या ऋण आदि से पीड़ित हो तो ऐसे जातक मोक्षदा एकादशी पर पीपल में जल अर्पित करें व सरसों के तेल से दीपक जलाएं। शास्त्रों के अनुसार पीपल में भगवान विष्णु का वास माना गया है ऐसा करने से आपको ऋण से मुक्ति प्राप्त होगी साथ ही आपकी आर्थिक स्थिति में सुधार होगा।
3–पारिवारिक माहौल सौहार्दपूर्ण बनाने हेतु मोक्षदा एकादशी पर गाय को गुड़ व चना और हरा चारा खिलाएं, सनातन धर्म के अनुसार गाय में तैतीस कोटि देवी देवताओं का वास होता है।

*पंडित कृष्ण दत्त जोशी*
#हिंदूसंस्कृती #भगवानविष्णु #मोक्षदाएकादशी #सनातनधर्म #नवंबर2025 #देवीलक्ष्मी #विष्णुलोक

रामलला विग्रह तथा श्री राम जन्मभूमि मन्दिर से जुड़ी अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारियां ⚜️🌼ऐसी अदभुत जानकारी प्राप्त करने के लि...
26/11/2025

रामलला विग्रह तथा श्री राम जन्मभूमि मन्दिर से जुड़ी अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारियां ⚜️🌼
ऐसी अदभुत जानकारी प्राप्त करने के लिए पेज अवश्य फॉलो करें 🚩🙏🔱

🔶 “पंचांगों की अवहेलना — विद्वता नहीं, विचलन है” 🔶कृपया पोस्ट को पूरा पढ़ें 🙏🙏🙏                ( विषय : दीपावली निर्णय 2...
17/10/2025

🔶 “पंचांगों की अवहेलना — विद्वता नहीं, विचलन है” 🔶
कृपया पोस्ट को पूरा पढ़ें 🙏🙏🙏


( विषय : दीपावली निर्णय 21 अक्टूबर 2025 के पक्ष में )
वर्तमान समय में जब दीपावली जैसी महान सांस्कृतिक परंपरा का प्रश्न उठता है, तो अनेक नवोदित विद्वान अपनी-अपनी मतानुसार तिथि निर्धारण कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो जो जितना अधिक परंपरा से हटकर निर्णय देगा, वही अधिक “आधुनिक” और “गंभीर” विद्वान कहलाएगा।

परंतु यह प्रवृत्ति चिंताजनक है।
क्योंकि धर्म निर्णय व्यक्तिगत नहीं, सिद्धांत आधारित होता है।
हमारे आचार्यों, सिद्धांतों और प्राचीन निर्णय ग्रंथों ने सहस्राब्दियों पूर्व ही समय गणना के गूढ़ नियम निर्धारित किए हैं। इन्हीं नियमों के आधार पर निर्णय सागर, दिवाकर पंचांग, वार्षिक पंचांग, धर्मसिन्धु, निर्णयामृत, और अन्य प्रमाणिक ग्रंथ 21 October 2025 के पक्ष में पूर्व ही स्पष्ट निर्णय दे चुके हैं।

अब यदि कोई नवोदित विचारधारा यह कहती है कि इन प्रमाणित पंचांगों का निर्णय अमान्य है — तो प्रश्न यह उठता है कि जब इन्हें आप अस्वीकार कर ही चुके हैं, तो आगे से इन पंचांगों को किसी भी निर्णय, मुहूर्त या गणना के लिए क्यों देखना चाहते हैं?
फिर तो आप अपने-अपने स्वतंत्र सिद्धांत बना लीजिए।
परंतु एक बात स्मरण रखें —
जब आधार ही नकार दिया गया, तो निर्णय की प्रमाणिकता शून्य हो जाती है।
21 अक्टूबर 2025 के पक्ष में अपना निर्णय रखने वालें पंचांगों के नाम भी नीचे पोस्ट के अन्त में दिए हैं।
विद्वता का अर्थ यह नहीं कि प्राचीन परंपरा को झुठलाया जाए।
सच्चा विद्वान वह नहीं जो भिन्नता लाए, बल्कि वह है जो सिद्धांत और प्रमाण दोनों को यथावत रखकर सम्यक निर्णय करे।
अतः आवश्यकता है कि हम विद्वता के नाम पर मतभेद न फैलाएं,
बल्कि सत्य, प्रमाण और परंपरा — इन तीनों के संगम से धर्म का संरक्षण करें।

दीपावली केवल एक तिथि नहीं — यह सनातन परंपरा की धड़कन है।
इसका निर्णय भावनाओं या व्यक्तिगत मत से नहीं, बल्कि प्रमाणिक पंचांगों और आचार्यों के निर्णय से होता है।
जो निर्णय सागर, दिवाकर आदि अन्य मान्य पंचांगों ने कह दिया — वही सनातन का स्वर है, और उसी का सम्मान धर्म की रक्षा है।

🔶 दीपावली तिथि विवाद: परंपरा पर प्रश्न या प्रमाण पर अविश्वास? 🔶

हर वर्ष पंचांग छपते हैं — जिनमें तिथि, वार, नक्षत्र, योग, पर्व और मुहूर्तों का विस्तारपूर्वक विवरण दिया जाता है।
यह पंचांग केवल तिथि-सूची नहीं, बल्कि सनातन कालगणना का जीवित प्रमाण हैं।
और जब कोई शताब्दी पंचांग सैकड़ों वर्षों का निर्णय पहले ही स्पष्ट कर चुका होता है —
जिसमें धनतेरस 19 अक्टूबर, छोटी दीपावली 20 अक्टूबर और दीपावली 21 अक्टूबर बताई गई है —
तो उस निर्णय पर शंका करना केवल पंचांग पर नहीं, बल्कि परंपरा की आत्मा पर प्रश्न उठाना है।

आज की स्थिति देखकर मन में हंसी भी आती है और दुख भी —
क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि अब पंचांगों को नहीं,
बल्कि “नवोदित विद्वानों” की राय को संशोधन का आधार मानना पड़ेगा!
अब यह चर्चा हो रही है कि पंचांगों में ही परिवर्तन किया जाए,
क्योंकि कुछ लोगों को दीपावली की तिथि बदलकर अलग दिखना अधिक विद्वतापूर्ण लग रहा है।

मैंने अनेक पंचांग कर्ताओं से इस विषय में संवाद किया —
सभी का मत यही था कि निर्णय तो परंपरा का है, प्रतियोगिता का नहीं।
यदि संशोधन करना ही है, तो उसे पंचांग निर्माण के समय,
विस्तृत गणना और निर्णय सभा के साथ करना चाहिए —
ना कि पर्व से पाँच-दस दिन पूर्व केवल चर्चा के माध्यम से।

जो पंचांग हमारे बाबा, पिताजी, आचार्यगण और परंपरा मानते चले आए हैं,
उन पर अविश्वास करके यदि हम स्वयं को अधिक विद्वान समझने लगें,
तो यह “विद्वता” नहीं — अभिमान है।
धर्म का निर्णय तर्क से नहीं, श्रद्धा और प्रमाण से होता है।

इसलिए निवेदन है —
कृपया भ्रम न फैलाएँ।
निर्णय सागर, दिवाकर और अन्य प्रमाणित पंचांगों के अनुसार
21 अक्टूबर 2025 ही दीपावली की तिथि मान्य है।
और हम उसी परंपरा को स्वीकार करते हैं,
जो प्रमाण और श्रद्धा — दोनों में अडिग है।

---

✍️ “पंचांगों पर विश्वास रखिए, भ्रम पर नहीं।

परंपरा का आदर कीजिए, प्रतिस्पर्धा का नहीं।”

— आचार्य कृष्ण दत्त जोशी जी ( नटराज ज्योतिषम् )

दि. 21-10-25 की दीपावली

1. चामुंडा पंचांग, गुजरात
2. श्री भादवामाता पंचांग, नीमच
3. श्रीधर शिवलाल पंचांग, अजमेर
4. दाते पंचांग, सोलापुर
5. निर्णय सागर पंचांग, नीमच
6. गृहस्थ दर्पण पंचांग, कलकत्ता
7. सनातन ज्योतिष पंचांग, सुमेरपुर
8. अर्बुद श्री पंचांग, जावाल
9. श्री गणेशमार्तन्ड पंचांग, उत्तराखंड
10. श्री कालचक्र पंचांग, राजोद
11. श्री मेवाड़ विजय पंचांग, उदयपुर
12. श्री जयमार्तंड पंचांग, जयपुर
13. सवाई जयपुर पंचांग, जयपुर
14. ज्योतिष सम्राट् पंचांग, जयपुर
15. राज-पचार पंचांग, पचार शेखावाटी
16. अखिल भारतवर्षीय पंचांग, जयपुर
17. ज्योतिष सम्राट् कालदर्शक
18. किशोर जंत्री, जयपुर
19. किशोर कालचक्र, जयपुर
20. गुरु-धाम पंचांग, सालासर
21. गुरु धाम कालदर्शक, सालासर
22. छ: न्याति कालदर्शक, बीकानेर
23. श्रोत्रिय पंचांग, जयपुर
24. श्री सिद्धेश्वर पंचांग उज्जैन
25. मगभास्कर पंचांग ग्वालियर
26. दैवज्ञ प्रबोध पंचांग
27. श्री साकेत पंचांग बूंदी
28. श्री साकेत जंत्री बूंदी
29. श्री नैना देवी पंचांग अमलोह पंजाब
30. श्री बद्रिकाशी पंचांग अशोक नगर
31. श्री ताराप्रसाद दिव्य पंचांग उत्तराखंड
32. श्रीधरी कालदर्शक पंचांग अजमेर
33. निर्णयसागर कालदर्शक पंचांग नीमच
34. Bbs सिद्धांति पंचांग हैदराबाद
35. Indrakanti Vari Panchang Kadappa
36. सिया भवानी पंचांग सागर MP
37. कैलाश पंचांग हरियाणा
38. कालनिर्णय पंचांग मुंबई
39. स्वामी समर्थ पंचांग मुंबई
40. महालक्ष्मी पंचांग कोल्हापुर
41. स्वामी समर्थ गादी पंचांग मुंबई
42. मुंबई समाचार गुजराती पंचांग
43. राजंदेकर पंचांग नागपूर
44. निर्णयसागर पंचांग मुंबई.
45. सोमण पंचांग ठाणे
46. शताब्दी पंचांग मुंबई
47. मार्वल कालदर्शक, जयपुर
48. रस्तोगी कालदर्शक, अजमेर
49. राम कालदर्शक, हरियाणा
50. श्री राघवेन्द्र पञ्चाङ्गम्, जम्मू
51. पंचांग दिवाकर, जालन्धर, पंजाब
52. श्रीमार्तण्ड पञ्चाङ्ग, पंजाब
53. पप्पी पंचांग, दिल्ली

जय गणेश जी महाराज की 🙏🚩
28/08/2025

जय गणेश जी महाराज की 🙏🚩

ॐ श्री गणेशाय नमः 🙏
28/08/2025

ॐ श्री गणेशाय नमः 🙏

* भूतनाथ अष्टकम‌् *शिव शिव शक्तिनाथं संहारं शं स्वरूपं     नव नव नित्यनृत्यं ताण्डवं तं तन्नादम्।घन घन घूर्णिमेघं घङ्घोर...
28/08/2025

* भूतनाथ अष्टकम‌् *
शिव शिव शक्तिनाथं संहारं शं स्वरूपं
नव नव नित्यनृत्यं ताण्डवं तं तन्नादम्।
घन घन घूर्णिमेघं घङ्घोरं घं निनादं
भज भज भस्मलेपं भजामि भूतनाथम्।।१।।

कल कल कालरूपं कल्लोलं कं करालं
डम डम डमनादं डम्बुरुं डङ्कनादम्।
सम सम शक्तग्रीवं सर्वभूतं सुरेशं
भज भज भस्मलेपं भजामि भूतनाथम्।।२।।

रम रम रामभक्तं रमेशं रां रारावं
मम मम मुक्तहस्तं महेशं मं मधुरम्।
बम बम ब्रह्मरूपं वामेशं बं विनाशं
भज भज भस्मलेपं भजामि भूतनाथम्।।३।।

हर हर हरिप्रियं त्रितापं हं संहारं
खम खम क्षमाशीलं सपापं खं क्षमणम्।
द्दग द्दग ध्यानमूर्त्तिं सगुणं धं धारणं
भज भज भस्मलेपं भजामि भूतनाथम्।।४।।

पम पम पापनाशं प्रज्वलं पं प्रकाशं
गम गम गुह्यतत्त्वं गिरीशं गं गणानाम्।
दम दम दानहस्तं धुन्दरं दं दारुणं
भज भज भस्मलेपं भजामि भूतनाथम्।।५।।

गम गम गीतनाथं दूर्गमं गं गन्तव्यं
टम टम रुण्डमालं टङ्कारं टङ्कनादम्।
भम भम भ्रं भ्रमरं भैरवं क्षेत्रपालं
भज भज भस्मलेपं भजामि भूतनाथम्।।६।।

त्रिशूलधारी संहारकारी गिरिजानाथं ईश्वरं
पार्वतीपति त्वं मायापति शुभ्रवर्णं महेश्वरम्।
कैलासनाथ सतिप्राणनाथ महाकालं कालेश्वरं
अर्धचन्द्रं शिरकिरीटं भूतनाथं शिवं भजे।।७।।

नीलकण्ठाय सत्स्वरूपाय सदाशिवाय नमो नमः
यक्षरूपाय जटाधराय नागदेवाय नमो नमः।
इन्द्रहाराय त्रिलोचनाय गङ्गाधराय नमो नमः
अर्धचन्द्रं शिरकिरीटं भूतनाथं शिवं भजे।।८।।

तव कृपा कृष्णदासः भजति भूतनाथं
तव कृपा कृष्णदासः स्मरति भूतनाथम्।
तव कृपा कृष्णदासः पश्यति भूतनाथं
तव कृपा कृष्णदासः पिबति भूतनाथम्।।९।।

यः पठति निष्कामभावेन सः शिवलोकं सगच्छति।

इति श्री कृष्णदासविरचितं भूतनाथाष्टकगीतं सम्पूर्णम् ।।

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 #ऋषी_पंचमी की आप सभी देश वासियो को हार्दिक शुभकामनाएं ।भारत देश को ऋषी मुनियो की पवित्र भूमि माना गया है, आज ऋषी पंचमी ...
28/08/2025

#ऋषी_पंचमी की आप सभी देश वासियो को हार्दिक शुभकामनाएं ।

भारत देश को ऋषी मुनियो की पवित्र भूमि माना गया है, आज ऋषी पंचमी पर हम सभी भारतवासी भारत वर्ष के इन महान तपस्वियों को नमन करते है।

#ऋषिपंचमी का त्यौहार हिन्दू पंचांग के भाद्रपद महीने में शुक्ल पक्ष पंचमी को मनाया जाता है।

यह त्यौहार गणेश चतुर्थी के अगले दिन होता है। इस त्यौहार में सप्त ऋषियों के प्रति श्रद्धा भाव व्यक्त किया जाता है।

वेदों का अध्ययन करने पर जिन सात ऋषियों या ऋषि कुल के नामों का पता चलता है वे नाम क्रमश: इस प्रकार है:- 1.वशिष्ठ, 2.विश्वामित्र, 3.कण्व, 4.भारद्वाज, 5.अत्रि, 6.वामदेव और 7.शौनक।

विष्णु पुराण अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है :-- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज।

सप्त ऋषि ।
कश्यप
अत्रि
भारद्वाज
विश्वामित्र
गौतम
जमदग्नि
वशिष्ठ

1. #वशिष्ठ : राजा दशरथ के कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ को कौन नहीं जानता। ये दशरथ के चारों पुत्रों के गुरु थे। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था। #कामधेनु_गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध भी हुआ था। वशिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो उन्हीं के कुल के मैत्रावरूण वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया।

2. #विश्वामित्र : ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए। इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर #त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं।

माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहां शांतिकुंज हैं उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ठ होकर एक अलग ही स्वर्ग लोक की रचना कर दी थी। विश्वामित्र ने इस देश को #ऋचा बनाने की विद्या दी और #गायत्री_मन्त्र की रचना की जो भारत के हृदय में और जिह्ना पर हजारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा है।

3. #कण्व : माना जाता है इस देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों ने व्यवस्थित किया। #कण्व_वैदिक_काल के ऋषि थे। इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था।

4. #भारद्वाज : वैदिक ऋषियों में भारद्वाज-ऋषि का उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। भारद्वाज ऋषि राम के पूर्व हुए थे, लेकिन एक उल्लेख अनुसार उनकी लंबी आयु का पता चलता है कि वनवास के समय श्रीराम इनके आश्रम में गए थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। माना जाता है कि भरद्वाजों में से एक भारद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का उत्तराधिकारी बन राजकाज करते हुए मन्त्र रचना जारी रखी।

ऋषि भारद्वाज के पुत्रों में 10 ऋषि #ऋग्वेद के मन्त्रदृष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम 'रात्रि' था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रदृष्टा मानी गई हैं। ॠग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा भारद्वाज ऋषि हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के 765 मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के 23 मन्त्र मिलते हैं। ' #भारद्वाज-स्मृति' एवं 'भारद्वाज-संहिता' के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे। ऋषि भारद्वाज ने 'यन्त्र-सर्वस्व' नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने 'विमान-शास्त्र' के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिए विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन मिलता है।

5. #अत्रि : ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र, सोम के पिता और कर्दम प्रजापति व देवहूति की पुत्री अनुसूया के पति थे। अत्रि जब बाहर गए थे तब त्रिदेव अनसूया के घर ब्राह्मण के भेष में भिक्षा मांगने लगे और अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे, तब अनुसूया ने अपने सतित्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी। माता अनुसूया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया था।

अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह योगदान दिया था। अत्रि लोग ही सिन्धु पार करके पारस (आज का ईरान) चले गए थे, जहां उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया। अत्रियों के कारण ही अग्निपूजकों के धर्म पारसी धर्म का सूत्रपात हुआ। अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था। मान्यता है कि अत्रि-दम्पति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में जन्मे। ऋषि अत्रि पर अश्विनीकुमारों की भी कृपा थी।

6. #वामदेव : वामदेव ने इस देश को #सामगान (अर्थात् #संगीत) दिया। वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के सूत्तद्रष्टा, गौतम ऋषि के पुत्र तथा जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं।

7. #शौनक : शौनक ने दस हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया। वैदिक आचार्य और ऋषि जो शुनक ऋषि के पुत्र थे।

फिर से बताएं तो वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भरद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक- ये हैं वे सात ऋषि जिन्होंने इस देश को इतना कुछ दे डाला कि कृतज्ञ देश ने इन्हें आकाश के तारामंडल में बिठाकर एक ऐसा अमरत्व दे दिया कि सप्तर्षि शब्द सुनते ही हमारी कल्पना आकाश के तारामंडलों पर टिक जाती है।

आप सभी पाठको को #ऋषी_पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।।

बलराम जयंती 2025 आप सभी देशवासियों को बलराम जयंती 2025 की हार्दिक बधाई एवं ढेरों शुभकामनाएं...🙏पूरे भारत में बलराम जयंती...
14/08/2025

बलराम जयंती 2025
आप सभी देशवासियों को बलराम जयंती 2025 की हार्दिक बधाई एवं ढेरों शुभकामनाएं...🙏

पूरे भारत में बलराम जयंती बहुत ही प्रसिद्ध है। इस वर्ष 14 अगस्त को उनकी जयंती मनाया जाएगा। बलराम जी भगवान कृष्ण के बड़े भाई है, और दोनों में काफी स्नेह और प्रेम है, और इससे हमें भी अपने भाई-बहनों के साथ प्रेम-स्नेह के साथ की शिक्षा मिलती है।

भगवान बलराम जी ने बहुत ही दानवी राक्षस धेनुकासुर का वध किया और लोगों का जीवन सुगम बनाया।

बलराम जी ने ही अपनी शक्तियों से प्रलम्बासुर का वध किया और पृथ्वी पर शांति फैलायी। बलराम जी और भगवान कृष्ण का आपस में प्रेम देखते ही बनता है और वह उनकी महिमा सदैव करते थे। बलराम जी को रास्ता नहीं देने पर यमुना देवी का पीछा किया गया और यह प्रसंग भी उन्हें पूजनीय बनाता है। बलराम जी ने रेवती से शादी की।

भगवान बलराम जी को नागों के अवतार के रूप में भी पूजा जाता है। ऐसा माना जाता है कि जिन नागों (शेषनाग) पर भगवान विष्णु जी विश्राम करते हैं, वो बलराम जी ही हैं। भगवान बलराम को अन्य नामों से भी जाना जाता है, जैसे बलदेव, बलभद्र और हलायुध।

इस दिन को उत्तर भारत में हल षष्ठी और ललही छठ के रूप में बहुत ही जोर-शोर से मनाया जाता है। वहीं ब्रज क्षेत्र में इस विशेष दिन को बलदेव छठ के नाम से जाना जाता है, गुजरात में इस शुभ दिन को रंधन छठ के रूप में बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

भगवान बलराम जी अपनी अद्भूत सुंदरता से किसी को भी चकित कर सकते हैं। वह बहुत ही सुंदर नीले वस्त्र और वन फूलों की माला पहनते हैं। उनके सुंदर बाल एक बहुत सुंदर चोटी में गुंथे हुये जो उनकी सुंदरता को और भी अधिक बढा देते हैं। बहुत ही शानदार और सुंदर झुमके उनके कानों की भव्यता को बढाते हैं। उनके चेहरे पर लगा हुआ कस्तूरी तिलक उनकी सुंदरता को और भी अधिक भव्य बनाता है।

भगवान बलराम श्रीकृष्ण जी के प्रिय है और इसीलिये उन तक पहुंचने के सभी मार्ग भगवान श्रीकृष्ण से होकर जाता हैं। बलराम जी ही लक्ष्मण के रुप में भाई राम के साथ आये थे। वह आध्यात्तमिक गुरु हैं और उनकी दया प्राप्त करना बहुत ही आवश्यक है।

भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त करने या भगवान कृष्ण का प्रेम और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए भगवान बलराम जी की पूजा अर्चना अतिआवश्यक है।
🙏जय भगवान श्री बलरामजी🙏
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56 (छप्पन) भोग क्यों लगाते है...???-----------------------------भगवान को लगाए जाने वाले भोगकी बड़ी महिमा है |इनके लिए 56...
14/08/2025

56 (छप्पन) भोग क्यों लगाते है...???
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भगवान को लगाए जाने वाले भोग
की बड़ी महिमा है |
इनके लिए 56 प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं, जिसे छप्पन भोग कहा जाता है |
यह भोग रसगुल्ले से शुरू होकर दही, चावल, पूरी, पापड़ आदि से होते हुए इलायची पर जाकर खत्म होता है |
अष्ट पहर भोजन करने वाले बालकृष्ण भगवान को अर्पित किए जाने वाले छप्पन भोग के पीछे कई रोचक कथाएं हैं |

ऐसा भी कहा जाता है कि यशोदाजी बालकृष्ण को एक दिन में अष्ट पहर
भोजन कराती थी | अर्थात्...बालकृष्ण आठ बार भोजन करते थे |
जब इंद्र के प्रकोप से सारे व्रज को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत
को उठाया था, तब लगातार सात दिन तक
भगवान ने अन्न जल ग्रहण नहीं किया |
आठवे दिन जब भगवान ने देखा कि अब इंद्र
की वर्षा बंद हो गई है, सभी व्रजवासियो को गोवर्धन पर्वत से बाहर निकल जाने को कहा, तब दिन में आठ प्रहर भोजन करने वाले व्रज के नंदलाल कन्हैया का लगातार सात दिन तक भूखा रहना उनके व्रज वासियों और
मया यशोदा के लिए बड़ा कष्टप्रद हुआ. भगवान के प्रति अपनी अन्न्य श्रद्धा भक्ति दिखाते हुए सभी व्रजवासियो सहित यशोदा जी ने 7 दिन और अष्ट पहर के हिसाब से 7X8= 56 व्यंजनो का भोग बाल कृष्ण को लगाया |

गोपिकाओं ने भेंट किए छप्पन भोग...
श्रीमद्भागवत के अनुसार, गोपिकाओं ने एक माह तक यमुना में भोर में ही न केवल स्नान किया, अपितु कात्यायनी मां की अर्चना भी इस मनोकामना से की, कि उन्हें नंदकुमार ही पति रूप में प्राप्त हों |

श्रीकृष्ण ने उनकी मनोकामना पूर्ति की सहमति दे दी | व्रत समाप्ति और मनोकामना पूर्ण होने के उपलक्ष्य में ही उद्यापन स्वरूप गोपिकाओं ने छप्पन भोग का आयोजन किया |

छप्पन भोग हैं छप्पन सखियां...ऐसा भी कहा जाता है कि गौलोक में भगवान श्रीकृष्ण राधिका जी के साथ एक दिव्य कमल पर
विराजते हैं |

उस कमल की तीन परतें होती हैं...प्रथम परत में "आठ", दूसरी में "सोलह" और तीसरी में "बत्तीस पंखुड़िया" होती हैं | प्रत्येक पंखुड़ी पर एक प्रमुख सखी और मध्य में
भगवान विराजते हैं | इस तरह कुल पंखुड़ियों संख्या छप्पन होती है |
56 संख्या का यही अर्थ है |

-:::: छप्पन भोग इस प्रकार है ::::-
1. भक्त (भात),
2. सूप (दाल),
3. प्रलेह (चटनी),
4. सदिका (कढ़ी),
5. दधिशाकजा (दही शाक की कढ़ी),
6. सिखरिणी (सिखरन),
7. अवलेह (शरबत),
8. बालका (बाटी),
9. इक्षु खेरिणी (मुरब्बा),
10. त्रिकोण (शर्करा युक्त),
11. बटक (बड़ा),
12. मधु शीर्षक (मठरी),
13. फेणिका (फेनी),
14. परिष्टïश्च (पूरी),
15. शतपत्र (खजला),
16. सधिद्रक (घेवर),
17. चक्राम (मालपुआ),
18. चिल्डिका (चोला),
19. सुधाकुंडलिका (जलेबी),
20. धृतपूर (मेसू),
21. वायुपूर (रसगुल्ला),
22. चन्द्रकला (पगी हुई),
23. दधि (महारायता),
24. स्थूली (थूली),
25. कर्पूरनाड़ी (लौंगपूरी),
26. खंड मंडल (खुरमा),
27. गोधूम (दलिया),
28. परिखा,
29. सुफलाढय़ा (सौंफ युक्त),
30. दधिरूप (बिलसारू),
31. मोदक (लड्डू),
32. शाक (साग),
33. सौधान (अधानौ अचार),
34. मंडका (मोठ),
35. पायस (खीर)
36. दधि (दही),
37. गोघृत,
38. हैयंगपीनम (मक्खन),
39. मंडूरी (मलाई),
40. कूपिका (रबड़ी),
41. पर्पट (पापड़),
42. शक्तिका (सीरा),
43. लसिका (लस्सी),
44. सुवत,
45. संघाय (मोहन),
46. सुफला (सुपारी),
47. सिता (इलायची),
48. फल,
49. तांबूल,
50. मोहन भोग,
51. लवण,
52. कषाय,
53. मधुर,
54. तिक्त,
55. कटु,
56. अम्ल.
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