16/03/2021
आस्था, विश्वास, सौहार्द एवं संस्कृतियों के मिलन का पर्व होता है कुंभ। ज्ञान, चेतना, और उसका परस्पर मंथन कुंभ मेले का वो आयाम है जो आदि काल से ही हिन्दू धर्मावलंबियों की जाग्रत चेतना को बिना किसी आमंत्रण के खींचकर ले आता है। कुंभ पर्व किसी इतिहास निर्माण के दृष्टिकोण से नहीं शुरु हुआ था। अपितु उसका इतिहास समय द्वारा स्वयं ही बना दिया गया। वैसे भी धार्मिक परंपराएं हमेशा आस्था एवं विश्वास के आधार पर ही टिकती हैं, ना की इतिहास पर। यह कहा जा सकता है कि कुंभ जैसा विशालतम मेला संस्कृतियों को एक सूत्र में बांधे रखने के लिए ही आयोजित होता है। कुंभ का शाब्दिक अर्थ है कलश। और यहां कलश का संबंध अमृत कलश से है।
बात उस समय की है जब देवासुर संग्राम के बाद दोनों पक्ष समुद्र मंथन को राजी हुए थे। जब समुद्र को मंथना था तो मंथनी और नेती भी उसी हिसाब की चाहिए थी। ऐसे में मंदराचल पर्वत मंथनी बना और वासुकी नाग को नेती बनाया गया। समुद्र मंथन से 14 रत्नों की प्राप्ति हुई। जिन्हें परस्पर बांट लिया गया। परंतु जब धन्वंतरि ने अमृत कलश देवताओं को दे दिया तो फिर युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई। तब भगवान विष्णु ने स्वयं मोहिनी रुप धारण कर सबको अमृत पान कराने की बात कही। और अमृत कलश का दायित्व इंद्र के पुत्र जयंत को सौंपा। अमृत कलश को प्राप्त कर जब जयंत दानवों से अमृत की रक्षा हेतु भाग रहा था, तभी इस क्रम में अमृत की बूंदें पृथ्वी पर चार स्थानों पर गिरी, हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और प्रयागराज। चूंकि विष्णु की आज्ञा से सूर्य, चंद्र शनि एवं बृहस्पति भी अमृत कलश की रक्षा कर रहे थे। और विभिन्न राशियों सिंह, कुंभ, एवं मेष में विचरण के कारण ये सभी कुंभ पर्व के द्योतक बन गए। इस प्रकार ग्रहों एवं राशियों की सहभागिता के कारण कुंभ पर्व ज्योतिष का पर्व भी बन गया।
जयंत को अमृत कलश को स्वर्ग ले जाने में 12 दिन का समय लगा। और माना जाता है कि देवताओं का एक दिन पृथ्वी के एक वर्ष के बराबर होता है। यहीं कारण है कि कालांतर में वर्णित स्थानों पर ही ग्रह, राशियों के विशेष संयोग पर 12 वर्षों में कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। ज्योतिष गणना के क्रम में कुंभ का आयोजन चार प्रकार से माना गया है। बृहस्पति के कुंभ राशि तथा सूर्य के मेष राशि में प्रविष्ट होने पर हरिद्वार में गंगातट पर कुंभ पर्व का आयोजन होता है।