श्री जोतराम भगवान

श्री जोतराम भगवान जय श्री जोतराम

12/10/2019
06/10/2019

कहतें हैं.. बंधनों के कई रूप होते हैं...
सात फेरों का बंधन, सात जन्मों का बंधन
जन्मों जन्मों का बंधन...
पर एक बंधन और भी होता है...
मन से मन का बंधन...!!!
रेशम सा... बहतें नीर सा..
हवाओं मे बहता सा.. महकते इत्र सा..
बांधे एक ही.. डोर से.. मन से मन को...
हर भीड़ मे तलाशती.. एक दूसरें को..
उस नाम को.. उसके लिखे शब्दों को..
यही तो है.. मन से मन का बन्धन!!
देखते सुनते... जाने कब.. कैसे..
खुद की आत्मा ... मन.. और मौन...
मिल से ज़ातें हैं... बंध से जाते हैं...
और फिर... प्रेम हो ज़ाता है.. बस हो ज़ाता है...
एक दूसरें को.. मन से मन को..
शायद इस बंधन मे...कोई अग्नि साक्षी नही..
हवन नही.. कोई सात वचन नही...
पर सबसे निकट.. अलग है य़े..
न बांधने की चाहत.. न छूटने का मन...
बस ऐसा है य़े.. मन से मन का बंधन..!!!
राधे राधे मित्रों

20/02/2019

एक सच्ची घटना सुनिए
एक संत की

वे एक बार वृन्दावन गए
वहाँ कुछ दिन घूमे फिरे
दर्शन किए

जब वापस लौटने का मन किया तो सोचा
भगवान को भोग लगा कर कुछ प्रसाद लेता चलूँ

संत ने रामदाने के कुछ लड्डू ख़रीदे
मंदिर गए
प्रसाद चढ़ाया
और आश्रम में आकर सो गए
सुबह ट्रेन पकड़नी थी

अगले दिन ट्रेन से चले
सुबह वृन्दावन से चली ट्रेन को मुगलसराय स्टेशन तक आने में शाम हो गयी

संत ने सोचा
अभी पटना तक जाने में तीन चार घंटे और लगेंगे
भूख लग रही है
मुगलसराय में ट्रेन आधे घंटे रूकती है
चलो हाथ पैर धोकर संध्या वंदन करके कुछ पा लिया जाय

संत ने हाथ पैर धोया
और लड्डू खाने के लिए डिब्बा खोला
उन्होंने देखा
लड्डू में चींटे लगे हुए थे
उन्होंने चींटों को हटाकर एक दो लड्डू खा लिए
बाकी बचे लड्डू प्रसाद बाँट दूंगा ये सोच कर छोड़ दिए

पर कहते हैं न
संत ह्रदय नवनीत समाना

बेचारे को लड्डुओं से अधिक उन चींटों की चिंता सताने लगी

सोचने लगे
ये चींटें वृन्दावन से इस मिठाई के डिब्बे में आए हैं
बेचारे इतनी दूर तक ट्रेन में मुगलसराय तक आ गए
कितने भाग्यशाली थे
इनका जन्म वृन्दावन में हुआ था
अब इतनी दूर से पता नहीं कितने दिन
या कितने जन्म लग जाएँगे
इनको वापस पहुंचने में
पता नहीं ब्रज की धूल इनको फिर कभी मिल भी पाएगी या नहीं
मैंने कितना बड़ा पाप कर दिया
इनका वृन्दावन छुड़वा दिया

नहीं
मुझे वापस जाना होगा

और संत ने उन चींटों को वापस उसी मिठाई के डिब्बे में सावधानी से रखा
और वृन्दावन की ट्रेन पकड़ ली

उसी मिठाई की दूकान के पास गए
डिब्बा धरती पर रखा
और हाथ जोड़ लिए

मेरे भाग्य में नहीं कि तेरे ब्रज में रह सकूँ
तो मुझे कोई अधिकार भी नहीं कि जिसके भाग्य में ब्रज की धूल लिखी है
उसे दूर कर सकूँ

दूकानदार ने देखा
तो आया
महाराज चीटें लग गए तो कोई बात नहीं
आप दूसरी मिठाई तौलवा लो

संत ने कहा
भईया मिठाई में कोई कमी नहीं थी
इन हाथों से पाप होते होते रह गया
उसी का प्रायश्चित कर रहा हूँ

दुकानदार ने जब सारी बात जानी तो उस संत के पैरों के पास बैठ गया
भावुक हो गया
इधर दुकानदार रो रहा था
उधर संत की आँखें गीली हो रही थीं

बात भाव की है
बात उस निर्मल मन की है
बात ब्रज की है
बात मेरे वृन्दावन की है
बात मेरे नटवर नागर और उनकी राधारानी की है
बात मेरे कृष्ण की राजधानी की है

बूझो तो बहुत कुछ है
नहीं तो बस पागलपन है
बस एक कहानी है

राधे राधेश्री कृष्ण ओर नारदजी संवाद🌾 एकबार देवर्षि नारदजी भगवान श्रीकृष्ण की दर्शन की अभिलाषा मन में लेकर द्वारिकापुरी आ...
15/02/2019

राधे राधे
श्री कृष्ण ओर नारदजी संवाद🌾

एकबार देवर्षि नारदजी भगवान श्रीकृष्ण की दर्शन की अभिलाषा मन में लेकर द्वारिकापुरी आये,परन्तु भगवान श्रीकृष्ण अपने महल में नही मिले,देवर्षि नारद जी ने जब ध्यान लगाकर पता लगाया तो भगवान श्रीकृष्ण द्वारिका से बहुत दूर समुन्द्र की एकान्त टापू पर ध्यान समाधि लगाये बैठे हुए दिखाई दिए,उनके नेत्रों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी और उनके श्वांश-श्वांश से श्रीराधे-श्रीराधे का स्वर गुंजायमान हो रहा था,देवर्षि नारदजी अतिशीघ्र ही उस टापू पर आ गये और भगवान श्रीकृष्ण के नेत्र खुलने की प्रतीक्षा करने लगे,कुछ समय पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने अपने नेत्रों को खोला और दोनों ने ही एकदूसरे को प्रणाम किया,भगवान श्रीकृष्ण कुछ भी कहते इससे पहले ही देवर्षि नारद जी बोल पड़े,हे प्रभु सम्पूर्ण जगत सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आपके ध्यान में बैठता है आपके नाम का कीर्तन करता है आपके लिए ही अश्रु बहाता है,परन्तु हे गोविन्द आप भी किसी के ध्यान में बैठते हैं और किसी के लिए अश्रु बहाते हैं,प्रभु मुझे आपकी ये लीला समझ में नहि आ रही है कृपा करके मेरे मन में उठ रहे इस प्रकार के समस्त संशयों का समाधान कीजिये?
तब भगवान श्रीकृष्णजी ने देवर्षि नारद जी से कहा---
हे देवर्षि यह सत्य है कि सम्पूर्ण जगत,अखिल ब्रह्माण्ड मेरा ही ध्यान और भजन करता है,लेकिन यह भी परम सत्य है कि मैं अखिल ब्रह्माण्ड का स्वामी होते हुए भी श्रीराधे का ध्यान भजन कीर्तन करता हूँ,
हे देवर्षि तत्व रूप से मैं और श्रीराधे एक ही हैं हममे किसी भी प्रकार का कोइ भी भेद नही है,फिर भी मैं किसी भी प्रकार से श्रीराधे की बराबरी नही कर सकता हूँ,वास्तव में श्री राधेजी ही मुझ अखिल ब्रह्माण्ड के स्वामी की भी एकमात्र स्वामिनी हैं,और मैं उन्हें पूर्ण समर्पित उनका एक नित्य दास ही हूँ,भगवन श्रीकृष्ण के इस प्रकार के वचनों को सुनकर देवर्षि नारद का संशय और अधिक गहरा हो गया तब देवर्षि ने पुनः प्रश्न किया कि,हे प्रभु कृपा करके बताइये कि श्रीराधे कौन हैं?

भगवान श्रीकृष्ण ने देवर्षि नारदजी से कहा---श्रीराधे प्रेम हैं,मैं केवल प्रेम के लिए ही रोता और तड़पता हूँ,हे देवर्षि नारद जी मैं अभी भी प्रेम के लिए ही तड़प रहा हूँ और रो रहा हूँ।
तब देवर्षि नारदजी ने भगवान श्रीकृष्णजी से पूछा---कहे प्रभु आप प्रेम के लिए रोते और तड़पते है,परन्तु यहाँ तो आपकी सोलह हजार एक सौ आठ पत्नियाँ हैं भला यहाँ आपको प्रेम की क्या कमी हो सकती है,वे सभी आपसे अत्यन्त प्रेम करती होंगी,फिर ब्रम्ह को तड़प कैसे हो सकती हैं?

भगवान श्रीकृष्ण ने देवर्षि नारदजी से कहाँ--हे देवर्षि नारदजी यहाँ मुझसे कोई भी प्रेम नही करता है,सभी मुझसे केवल अपना सुख ही चाहते हैं और बदले में मुझे भी सुख देना चाहते हैं,यदि कोई मुझसे सुख प्राप्त करने की इच्छा से भी मुझसे प्रेम करता है तो वह वास्तव में प्रेम नही है,वह केवल कपट पूर्ण चाहत ही है,हे देवर्षि मैं आनन्दघन परमात्मा होते हुए भी,मुझे केवल और केवल निष्काम प्रेम की ही तड़प और भूख रहती है,और वही निष्काम प्रेम ही मुझ आनन्दघन परमात्मा को भी आनन्दित करता है,हे देवर्षि श्रीराधेजी का प्रेम मेरे लिए परम निष्काम प्रेम हैं,श्रीराधे मेरे हृदय को जानती हैं मुझे समझती हैं तथा उनके द्वारा मन से वाणी से कर्म से जो भी किया जाता है वह केवल और केवल एकमात्र मेरे ही आनन्द और प्रसन्नता के लिए ही होता है,हे देवर्षि श्रीराधे परम प्रेम और परम त्याग की साक्षात प्रतिमूर्ति हैं,जब मैं वृन्दावन छोड़कर मथुरा आ रहा था तब सभी ने मुझे रोकना चाहा था,सभी ने अपने-अपने प्रेम की सौगंध भी दी थी,परन्तु धन्य हैं श्रीराधे जिन्होंने ऐसा कुछ भी नही किया, क्योंकि उन्होंने इसमें मेरी प्रसन्नता जानकर मौन रहीं,हे देवर्षि नारद जब उद्धवजी मेरा सन्देश लेकर वृन्दावन गये थे तब भी सभी लोगों ने मेरे विरह वेदना को लेकर कुछ न कुछ अपनी मनःस्थिति प्रकट किया था,परन्तु धन्य हैं श्रीराधेजी जिन्होंने उद्धवजी से केवल इतना ही पूछा था कि कृष्ण कैसे हैं आनन्द से तो हैं ना,जब उद्धवजी ने श्रीराधे से मेरे लिए कुछ सन्देश देने को कहा था तब भी श्रीराधे ने बस इतना ही कहा था,कि हे उद्धवजी कृष्ण से बस इतना कहियेगा कि वो सदैव आनन्द में रहें,मेरे प्रति किसी भी प्रकार का मन में कोइ भोझ या दुःख ना रखें और प्रसन्नता पूर्वक अपने जीवन के समस्त उद्देश्यों को पूर्ण करें,यही मेरी एकमात्र इच्छा और प्रसन्नता है।
श्रीकृष्ण देवर्षि नारदजी से कहते हैं----हे देवर्षि नारदजी,श्रीराधे एक क्षण भी बिना विश्राम किये सतत मेरे ही स्मरण में,सतत मेरे ही नाम सुमिरन में पूर्ण समर्पित रहतीं हैं,उन्होंने समस्त सुखों वैभवों का यहाँ तक की भोजन और निंद्रा तक का भी अपने जीवन से त्याग कर दिया है,सभी कहते हैं,कि कृष्ण मेरा है परन्तु श्रीराधे कहतीं हैं,कि श्रीकृष्ण परमात्मा हैं सभी के हैं किन्तु मैं केवल और केवल श्रीकृष्ण की हूँ,हे देवर्षि जहाँ जाकर प्रेम की समपूर्ण सीमाओं का अंत होता है,वहीं श्रीराधे का प्राकट्य होता है,श्रीकृष्ण सजल नेत्रों से कहते हैं,हे देवर्षि श्रीराधे प्रेम की पराकाष्ठा है,हे देवर्षि नारदजी मुझ ब्रह्म का सम्पूर्ण आस्तित्व ही केवल श्रीराधे ही है,इतना कहकर भगवान श्रीकृष्ण मौन हो जाते हैं,देवर्षि नारदजी का संशय समाप्त हो जाता है,और देवर्षि नारद जयराधेकृष्ण जय जय श्रीराधेकृष्ण श्रीराधेकृष्ण नाम का कीर्तन करते हुए अंतर्ध्यान हो जाते हैं।

जय श्री हनुमान *लक्ष्य प्राप्त करने का सर्वोत्तम स्त्रोत :* *किसी अन्य की प्रतिक्षा न की जाए क्योंकि जो चले थे अकेले उनक...
12/02/2019

जय श्री हनुमान

*लक्ष्य प्राप्त करने का सर्वोत्तम स्त्रोत :*

*किसी अन्य की प्रतिक्षा न की जाए क्योंकि जो चले थे अकेले उनके पीछे आज मेले हैं।*

*जो करते रहे प्रतिक्षा उनके जीवन में आज भी झमेले हैं " |*

*सब को इकट्ठा रखने की ताकत प्रेम में है,*
*और सब को अलग करने की ताकत वहम में !!*

एक नदी के किनारे दो पेड़ थे.....उस रास्ते एक छोटी सी चिड़िया गुजरी और.....पहले पेड़ से पूछा.. बारिश होने वाली है, क्या मैं ...
07/02/2019

एक नदी के किनारे दो पेड़ थे.....
उस रास्ते एक छोटी सी चिड़िया गुजरी और.....
पहले पेड़ से पूछा.. बारिश होने वाली है, क्या मैं और मेरे बच्चे तुम्हारी टहनी में घोसला बनाकर रह सकते हैं..
लेकिन उस पेड़ ने मना कर दिया....
चिड़िया फिर दूसरे पेड़ के पास गई और वही सवाल पूछा दूसरा पेड़ मान गया,
चिड़िया अपने बच्चों के साथ खुशी-खुशी दूसरे पेड़ में घोसला बना कर रहने लगी,
एक दिन इतनी अधिक बारिश हुई कि इसी दौरान पहला पेड़ जड़ से उखड़ कर पानी मे बह गया.
जब चिड़िया ने उस पेड़ को बहते हुए देखा तो कहा...
जब तुमसे मैं और मेरे बच्चे शरण के लिये आये तब तुमने मना कर दिया था, *अब देखो तुम्हारे उसी* *रूखी बर्ताव की सजा* *तुम्हे मिल रही है*
जिसका उत्तर पेड़ ने मुस्कुराते हुए दिया *मैं जानता था मेरी जड़ें कमजोर है* और इस बारिश में टिक नहीं पाऊंगा, मैं तुम्हारी और बच्चे की जान खतरे में नहीं डालना चाहता था, मना करने के लिए मुझे क्षमा कर दो, और ये कहते-कहते पेड़ बह गया..
*किसी के इंकार को हमेशा उनकी कठोरता न समझे*
क्या पता उसके उसी इंकार से आप का भला हो,
कौन किस परिस्थिति में है शायद हम नहीं समझ पाए,

इसलिए किसी के चरित्र और शैली को उनके वर्तमान व्यवहार से ना तौले...

06/02/2019

: Radhe Radheआज का सबसे अच्छा संदेश*

_एक विदेशी ने गोपी चंदन खरीदा और 10 रुपये का भुगतान करने के बाद, दुकानदार के लड़के से पूछा, समाप्ति की तारीख क्या है?_
_लड़के ने ठंडा जवाब दिया, इसकी कोई एक्सपायरी डेट नहीं है, बल्कि रोजाना माथे पर लगाऐं यह आपकी एक्सपायरी डेट बढ़ा देता है।_
*हरे कृष्णा हरे रामा*
🌼🌹👏👏🌼🌹

05/02/2019

: Radhe Radhe: *पाँच वस्तु ऐसी हैं, जो अपवित्र होते हुए भी पवित्र हैं....*

उच्छिष्टं शिवनिर्माल्यं
वमनं शवकर्पटम् ।
काकविष्टा ते पञ्चैते
पवित्राति मनोहरा॥

*1. उच्छिष्ट — गाय का दूध ।*
गाय का दूध पहले उसका बछड़ा पीकर उच्छिष्ट करता है । फिर भी वह पवित्र ओर शिव पर चढ़ता है

*2. शिव निर्माल्यं -*
*गंगा का जल*
गंगा जी का अवतरण स्वर्ग से सीधा शिव जी के मस्तक पर हुआ । नियमानुसार शिव जी पर चढ़ायी हुई हर चीज़ निर्माल्य है पर गंगाजल पवित्र है ।

*3. वमनम्—*
*उल्टी — शहद..*
मधुमक्खी जब फूलों का रस लेकर अपने छत्ते पर आती है , तब वो अपने मुख से उस रस की शहद के रूप में उल्टी करती है ,जो पवित्र कार्यों मे उपयोग किया जाता है।

*4. शव कर्पटम्— रेशमी वस्त्र*
धार्मिक कार्यों को सम्पादित करने के लिये पवित्रता की आवश्यकता रहती है , रेशमी वस्त्र को पवित्र माना गया है , पर रेशम को बनाने के लिये रेशमी कीडे़ को उबलते पानी में डाला जाता है और उसकी मौत हो जाती है उसके बाद रेशम मिलता है तो हुआ शव कर्पट फिर भी पवित्र है ।

*5. काक विष्टा— कौए का मल*
कौवा पीपल पेड़ों के फल खाता है ओर उन पेड़ों के बीज अपनी विष्टा में इधर उधर छोड़ देता है जिसमें से पेड़ों की उत्पत्ति होती है ,आपने देखा होगा कि कहीं भी पीपल के पेड़ उगते नहीं हैं बल्कि पीपल काक विष्टा से उगता है ,फिर भी पवित्र है।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
05/02/2019

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

फल बेचने वाली पर *श्री कृष्ण* *कृपा....🙌🏼🌸💐👏🏼*एक दिन  *बालकृष्ण* ने फल वाली पर भी कृपा  की है। भगवान ने देखा की उसके द्व...
05/02/2019

फल बेचने वाली पर *श्री कृष्ण* *कृपा....🙌🏼🌸💐👏🏼*

एक दिन *बालकृष्ण* ने फल वाली पर भी कृपा की है। भगवान ने देखा की उसके द्वार पर कोई फलवाली फल बेच रही है। और आवाज लगते हुए जा रही है कोई फल ले लो री! कोई फल ले लो री।

भगवान जी ने जैसे ही सुना तो दौड़े दौड़े गए और बोले मैया-मैया मुझे ये फल दे दे। मैया बोली की ठीक है लाला मैं दे दूंगी पर बदले में कुछ अनाज लेके आ जा।

*कन्हैया* कहते है ठीक है मैया।

भगवान अंदर गए है और अपने दोनों हाथो की मुट्ठी में अनाज भर कर लाते है। और दौड़े दौड़े नन्द भवन के अंदर से आते है। लेकिन रस्ते में सारा अनाज गिराते भी जा रहे है। जब तक मैया की पास पहुंचे केवल २ - ४ दाने ही बचे हैं।
फल बेचने वाली बोली की लाला क्या लेके आयो है ?

*श्री कृष्णा* ने कहा मैया तेरे लिए बहुत सारा अनाज लेके आया हूँ। दोनों मुट्ठी में अनाज है मेरे।
मैया बोली अच्छा लाला दिखा मेरे को।

ज्यों ही *श्री कृष्ण* ने अंजुली खोली तो केवल २-४ दाने ही बचे थे। फल वाली बोली की लाला तू तो कहवे है की बहुत सारा आनाज लायो है। ये देख थोड़ा सा है।
भगवान बोले वहां से लेके बहुत सारा चला था पर रस्ते में सब गिर गयो मैया। मेरे छोटे छोटे हाथ है तो अंजुली के बीच से गिर गयो मैया।

भगवान की मीठी मीठी बाते सुनकर फल वाली मुस्कराने लगी और भगवान से २-४ दाने ले लिए और उनको टोकरी में रख लिया। और बदले में मैया ने भगवान को सारे फल दे दिए। और मैया अब ये कहना भूल गई कोई फल ले लो री कोई फल ले लो री
मैया आवाज लगा रही है कोई *श्याम ले लो री! कोई *श्याम ले लो री।*

जब वह फल वाली घर पहुचती है तो क्या देखती है जिस टोकरी में उसने अनाज के २-४ दाने रखे थे। अनाज के दानों जगह वो टोकरी हीरे और मोतियों से भर गई थी। इस प्रकार भगवन ने फल वाली पर कृपा की है

*आध्यत्मिक पक्ष -*🙏🏼
*भगवान कहते है* तुम मुझे थोड़ा बहुत भी दोगे मैं तुम्हे बदले में हजार गुना वापिस करूँगा। वैसे मुझे किसी का कुछ लेने की जरुरत नहीं है। मैं भाव देखता हूँ। और उस भाव के बदले मैं सब कुछ अपने भक्त को दे देता हूँ।

💖 *बोलिए कृष्ण कन्हैया की जय !!* 💖
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Radhe Radheराजा दशरथ के मुकुट का एक अनोखा राज, शायद ही कोई जानता हो!!!!!!! अयोध्या के राजा दशरथ एक बार भ्रमण करते हुए वन...
03/02/2019

Radhe Radhe
राजा दशरथ के मुकुट का एक अनोखा राज, शायद ही कोई जानता हो!!!!!!!

अयोध्या के राजा दशरथ एक बार भ्रमण करते हुए वन की ओर निकले वहां उनका समाना बाली से हो गया. राजा दशरथ की किसी बात से नाराज हो बाली ने उन्हें युद्ध के लिए चुनोती दी. राजा दशरथ की तीनो रानियों में से कैकयी अश्त्र शस्त्र एवं रथ चालन में पारंगत थी।

अतः अक्सर राजा दशरथ जब कभी कही भ्रमण के लिए जाते तो कैकयी को भी अपने साथ ले जाते थे इसलिए कई बार वह युद्ध में राजा दशरथ के साथ होती थी. जब बाली एवं राजा दशरथ के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था उस समय संयोग वश रानी कैकयी भी उनके साथ थी।

युद्ध में बाली राजा दशरथ पर भारी पड़ने लगा वह इसलिए क्योकि बाली को यह वरदान प्राप्त था की उसकी दृष्टि यदि किसी पर भी पद जाए तो उसकी आधी शक्ति बाली को प्राप्त हो जाती थी. अतः यह तो निश्चित था की उन दोनों के युद्ध में हर राजा दशरथ की ही होगी।

राजा दशरथ के युद्ध हारने पर बाली ने उनके सामने एक शर्त रखी की या तो वे अपनी पत्नी कैकयी को वहां छोड़ जाए या रघुकुल की शान अपना मुकुट यहां पर छोड़ जाए। तब राजा दशरथ को अपना मुकुट वहां छोड़ रानी कैकेयी के साथ वापस अयोध्या लौटना पड़ा.

रानी कैकयी को यह बात बहुत दुखी, आखिर एक स्त्री अपने पति के अपमान को अपने सामने कैसे सह सकती थी. यह बात उन्हें हर पल काटे की तरह चुभने लगी की उनके कारण राजा दशरथ को अपना मुकुट छोड़ना पड़ा।

वह राज मुकुट की वापसी की चिंता में रहतीं थीं. जब श्री रामजी के राजतिलक का समय आया तब दशरथ जी व कैकयी को मुकुट को लेकर चर्चा हुई. यह बात तो केवल यही दोनों जानते थे। कैकेयी ने रघुकुल की आन को वापस लाने के लिए श्री राम के वनवास का कलंक अपने ऊपर ले लिया और श्री राम को वन भिजवाया. उन्होंने श्री राम से कहा भी था कि बाली से मुकुट वापस लेकर आना है।

श्री राम जी ने जब बाली को मारकर गिरा दिया. उसके बाद उनका बाली के साथ संवाद होने लगा. प्रभु ने अपना परिचय देकर बाली से अपने कुल के शान मुकुट के बारे में पूछा था। तब बाली ने बताया- रावण को मैंने बंदी बनाया था. जब वह भागा तो साथ में छल से वह मुकुट भी लेकर भाग गया. प्रभु मेरे पुत्र को सेवा में ले लें. वह अपने प्राणों की बाजी लगाकर आपका मुकुट लेकर आएगा।

जब अंगद श्री राम जी के दूत बनकर रावण की सभा में गए. वहां उन्होंने सभा में अपने पैर जमा दिए और उपस्थित वीरों को अपना पैर हिलाकर दिखाने की चुनौती दे दी.रावण के महल के सभी योद्धा ने अपनी पूरी ताकत अंगद के पैर को हिलाने में लगाई परन्तु कोई भी योद्धा सफल नहीं हो पाया।

जब रावण के सभा के सारे योद्धा अंगद के पैर को हिला न पाए तो स्वयं रावण अंगद के पास पहुचा और उसके पैर को हिलाने के लिए जैसे ही झुका उसके सर से वह मुकुट गिर गया। अंगद वह मुकुट लेकर वापस श्री राम के पास चले आये. यह महिमा थी रघुकुल के राज मुकुट की।

राजा दशरथ के पास गई तो उन्हें पीड़ा झेलनी पड़ी. बाली से जब रावण वह मुकुट लेकर गया तो तो बाली को अपने प्राणों को आहूत देनी पड़ी. इसके बाद जब अंगद रावण से वह मुकुट लेकर गया तो रावण के भी प्राण गए।

तथा कैकयी के कारण ही रघुकुल के लाज बच सकी यदि कैकयी श्री राम को वनवास नही भेजती तो रघुकुल सम्मान वापस नही लोट पाता. कैकयी ने कुल के सम्मान के लिए सभी कलंक एवं अपयश अपने ऊपर ले लिए अतः श्री राम अपनी माताओ सबसे ज्यादा प्रेम कैकयी को करते थे।

Radhe Radheएक संत थे वृन्दावन में रहा करते थे, श्रीमद्भागवत में बड़ी निष्ठा उनकी थी, उनका प्रतिदिन का नियम था कि वे रोज ...
03/02/2019

Radhe Radhe
एक संत थे वृन्दावन में रहा करते थे, श्रीमद्भागवत में बड़ी निष्ठा उनकी थी, उनका प्रतिदिन का नियम था कि वे रोज एक अध्याय का पाठ किया करते थे,
और राधा रानी जी को अर्पण करते थे.! ऐसे करते करते उन्हे 55 वर्ष बीत गए,
पर उन्होंने एक दिन भी ऐसा नही गया जब राधारानी जी को भागवत का अध्याय न सुनाया हो. एक रोज वे जब पाठ करने बैठे तो उन्हें अक्षर दिखायी ही नहीं दे रहे थे और थोड़ी देर बाद तो वे बिलकुल भी नहीं पढ़ सके
अब तो वे रोने लगे और कहने लगे- हेप्रभु ! में इतने दिनों से पाठ कर रहा हूँ फिर आपने आज ऐसा क्यों किया
अब मै कैसे राधारानी जी को पाठ सुनाऊंगा. रोते-रोते उन्हें सारा दिन बीत गया. कुछ खाया पिया भी नहीं क्योकि पाठ करने का नियम था और जब तक नियम पूरा नहीं करते, खाते पीते भी नहीं थे, आज नियम नहीं हुआ तो खाया पिया भी नहीं. तभी एक छोटा-सा बालक आया और बोला -
बाबा! आप क्यों रो रहे हो? क्या आपकी आँखे नहीं है इसलिए रो रहे हो ?
बाबा बोले- नहीं लाला! आँखों के लिए क्यों रोऊंगा मेरा नियम पूरा नहीं हुआ इसलिए रो रहा हूँ. बालक बोला -
बाबा! मैआपकी आँखे ठीक कर सकता हूँ आप ये पट्टी अपनी आँखों पर बाँध लीजिए,
बाबा ने सोचा लगता है वृंदावन के किसी वैध का लाला है कोई इलाज जानता होगा, बाबा ने आँखों पर पट्टी बांध ली और सो गए,
जब सुबह उठे और पट्टी हटाई तो सबकुछ साफ दिखायी दे रहा था. बाबा बड़े प्रसन्न हुए और सोचने लगे
देखूं तो उस बालक ने पट्टी में क्या औषधि रखी थी? और जैसे ही बाबा ने पट्टी को खोला तो पट्टी में राधा रानी जी का नाम लिखा था इतना देखते ही बाबा फूट फूट कर रोने लगे और कहने लगे -
वाह! किशोरी जी आपके नाम की कैसी अनंत महिमा ह !!
मुझ पर इतनी कृपा की या खुद श्रीमद्भागवत से इतना प्रेम करती हो की रोज़ मुझ से शलोक सुनने मे तुमको भी आनंद आता है ... मन मंदिर में ज्योति जगा तुम देना, मैल मन की मेरे तुम हटा ही देना। हर घडी हर पल, हर घडी हर पल।
तेरे ध्यान में उम्र तमाम निकले, मेरी रसना से राधा राधा नाम निकले॥ दिल में राधा ही नाम बसाऊ सदा, सेवा कर्मो की भेंट चडाऊ सदा। हर घडी हर पल, हर घडी हर पल।
नाम जपते ही अंतिम स्वास निकले, मेरी रसना से राधा राधा नाम निकले॥ जय राधे राधे, जय राधे राधे, श्री राधे राधे, श्री राधे राधे। जय राधे राधे, जय राधे राधे, श्री राधे राधे, श्री राधे राधे। जय राधे राधे राधे, जय राधे राधे राधे, श्री राधे राधे राधे, श्री राधे राधे राधे। जय राधे राधे राधे, जय राधे राधे राधे, श्री राधे राधे राधे, श्री राधे राधे राधे॥

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Bhanin
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