15/02/2019
राधे राधे
श्री कृष्ण ओर नारदजी संवाद🌾
एकबार देवर्षि नारदजी भगवान श्रीकृष्ण की दर्शन की अभिलाषा मन में लेकर द्वारिकापुरी आये,परन्तु भगवान श्रीकृष्ण अपने महल में नही मिले,देवर्षि नारद जी ने जब ध्यान लगाकर पता लगाया तो भगवान श्रीकृष्ण द्वारिका से बहुत दूर समुन्द्र की एकान्त टापू पर ध्यान समाधि लगाये बैठे हुए दिखाई दिए,उनके नेत्रों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी और उनके श्वांश-श्वांश से श्रीराधे-श्रीराधे का स्वर गुंजायमान हो रहा था,देवर्षि नारदजी अतिशीघ्र ही उस टापू पर आ गये और भगवान श्रीकृष्ण के नेत्र खुलने की प्रतीक्षा करने लगे,कुछ समय पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने अपने नेत्रों को खोला और दोनों ने ही एकदूसरे को प्रणाम किया,भगवान श्रीकृष्ण कुछ भी कहते इससे पहले ही देवर्षि नारद जी बोल पड़े,हे प्रभु सम्पूर्ण जगत सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आपके ध्यान में बैठता है आपके नाम का कीर्तन करता है आपके लिए ही अश्रु बहाता है,परन्तु हे गोविन्द आप भी किसी के ध्यान में बैठते हैं और किसी के लिए अश्रु बहाते हैं,प्रभु मुझे आपकी ये लीला समझ में नहि आ रही है कृपा करके मेरे मन में उठ रहे इस प्रकार के समस्त संशयों का समाधान कीजिये?
तब भगवान श्रीकृष्णजी ने देवर्षि नारद जी से कहा---
हे देवर्षि यह सत्य है कि सम्पूर्ण जगत,अखिल ब्रह्माण्ड मेरा ही ध्यान और भजन करता है,लेकिन यह भी परम सत्य है कि मैं अखिल ब्रह्माण्ड का स्वामी होते हुए भी श्रीराधे का ध्यान भजन कीर्तन करता हूँ,
हे देवर्षि तत्व रूप से मैं और श्रीराधे एक ही हैं हममे किसी भी प्रकार का कोइ भी भेद नही है,फिर भी मैं किसी भी प्रकार से श्रीराधे की बराबरी नही कर सकता हूँ,वास्तव में श्री राधेजी ही मुझ अखिल ब्रह्माण्ड के स्वामी की भी एकमात्र स्वामिनी हैं,और मैं उन्हें पूर्ण समर्पित उनका एक नित्य दास ही हूँ,भगवन श्रीकृष्ण के इस प्रकार के वचनों को सुनकर देवर्षि नारद का संशय और अधिक गहरा हो गया तब देवर्षि ने पुनः प्रश्न किया कि,हे प्रभु कृपा करके बताइये कि श्रीराधे कौन हैं?
भगवान श्रीकृष्ण ने देवर्षि नारदजी से कहा---श्रीराधे प्रेम हैं,मैं केवल प्रेम के लिए ही रोता और तड़पता हूँ,हे देवर्षि नारद जी मैं अभी भी प्रेम के लिए ही तड़प रहा हूँ और रो रहा हूँ।
तब देवर्षि नारदजी ने भगवान श्रीकृष्णजी से पूछा---कहे प्रभु आप प्रेम के लिए रोते और तड़पते है,परन्तु यहाँ तो आपकी सोलह हजार एक सौ आठ पत्नियाँ हैं भला यहाँ आपको प्रेम की क्या कमी हो सकती है,वे सभी आपसे अत्यन्त प्रेम करती होंगी,फिर ब्रम्ह को तड़प कैसे हो सकती हैं?
भगवान श्रीकृष्ण ने देवर्षि नारदजी से कहाँ--हे देवर्षि नारदजी यहाँ मुझसे कोई भी प्रेम नही करता है,सभी मुझसे केवल अपना सुख ही चाहते हैं और बदले में मुझे भी सुख देना चाहते हैं,यदि कोई मुझसे सुख प्राप्त करने की इच्छा से भी मुझसे प्रेम करता है तो वह वास्तव में प्रेम नही है,वह केवल कपट पूर्ण चाहत ही है,हे देवर्षि मैं आनन्दघन परमात्मा होते हुए भी,मुझे केवल और केवल निष्काम प्रेम की ही तड़प और भूख रहती है,और वही निष्काम प्रेम ही मुझ आनन्दघन परमात्मा को भी आनन्दित करता है,हे देवर्षि श्रीराधेजी का प्रेम मेरे लिए परम निष्काम प्रेम हैं,श्रीराधे मेरे हृदय को जानती हैं मुझे समझती हैं तथा उनके द्वारा मन से वाणी से कर्म से जो भी किया जाता है वह केवल और केवल एकमात्र मेरे ही आनन्द और प्रसन्नता के लिए ही होता है,हे देवर्षि श्रीराधे परम प्रेम और परम त्याग की साक्षात प्रतिमूर्ति हैं,जब मैं वृन्दावन छोड़कर मथुरा आ रहा था तब सभी ने मुझे रोकना चाहा था,सभी ने अपने-अपने प्रेम की सौगंध भी दी थी,परन्तु धन्य हैं श्रीराधे जिन्होंने ऐसा कुछ भी नही किया, क्योंकि उन्होंने इसमें मेरी प्रसन्नता जानकर मौन रहीं,हे देवर्षि नारद जब उद्धवजी मेरा सन्देश लेकर वृन्दावन गये थे तब भी सभी लोगों ने मेरे विरह वेदना को लेकर कुछ न कुछ अपनी मनःस्थिति प्रकट किया था,परन्तु धन्य हैं श्रीराधेजी जिन्होंने उद्धवजी से केवल इतना ही पूछा था कि कृष्ण कैसे हैं आनन्द से तो हैं ना,जब उद्धवजी ने श्रीराधे से मेरे लिए कुछ सन्देश देने को कहा था तब भी श्रीराधे ने बस इतना ही कहा था,कि हे उद्धवजी कृष्ण से बस इतना कहियेगा कि वो सदैव आनन्द में रहें,मेरे प्रति किसी भी प्रकार का मन में कोइ भोझ या दुःख ना रखें और प्रसन्नता पूर्वक अपने जीवन के समस्त उद्देश्यों को पूर्ण करें,यही मेरी एकमात्र इच्छा और प्रसन्नता है।
श्रीकृष्ण देवर्षि नारदजी से कहते हैं----हे देवर्षि नारदजी,श्रीराधे एक क्षण भी बिना विश्राम किये सतत मेरे ही स्मरण में,सतत मेरे ही नाम सुमिरन में पूर्ण समर्पित रहतीं हैं,उन्होंने समस्त सुखों वैभवों का यहाँ तक की भोजन और निंद्रा तक का भी अपने जीवन से त्याग कर दिया है,सभी कहते हैं,कि कृष्ण मेरा है परन्तु श्रीराधे कहतीं हैं,कि श्रीकृष्ण परमात्मा हैं सभी के हैं किन्तु मैं केवल और केवल श्रीकृष्ण की हूँ,हे देवर्षि जहाँ जाकर प्रेम की समपूर्ण सीमाओं का अंत होता है,वहीं श्रीराधे का प्राकट्य होता है,श्रीकृष्ण सजल नेत्रों से कहते हैं,हे देवर्षि श्रीराधे प्रेम की पराकाष्ठा है,हे देवर्षि नारदजी मुझ ब्रह्म का सम्पूर्ण आस्तित्व ही केवल श्रीराधे ही है,इतना कहकर भगवान श्रीकृष्ण मौन हो जाते हैं,देवर्षि नारदजी का संशय समाप्त हो जाता है,और देवर्षि नारद जयराधेकृष्ण जय जय श्रीराधेकृष्ण श्रीराधेकृष्ण नाम का कीर्तन करते हुए अंतर्ध्यान हो जाते हैं।