03/06/2020
खुला पत्र: युग निर्माण मिशन के परिजनों के नाम
आदरणीय भाई साहब / बहन जी,
मैं बड़े भारी मन से इस पत्र को लिख रहा हूँ | मैं मिशन के साथ पिछले ३६ सालों से जुड़ा हूँ और कई जगहों शक्तिपीठों-प्रज्ञा संस्थानों (पटना, पुणे, बैंगलोर, दिल्ली, देवघर और अब अमेरिका) के साथ काम किया है | बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं मैंने मिशन के इस दौरान | शक्तिपीठों/प्रज्ञापीठों में ट्रस्टी बनने के लिए ऊधम, ट्रस्टियों की आपस में कहासुनी, परिहार जी आदि के निकाले जाने के बाद हमारे घर पे पत्रों का आना जिसमें डॉ साहब के बारे में उल-जलूल बातें लिखा होना, शान्तिकुञ्ज में परिजनों के आपसी मनमुटाव की कहानियाँ, नवम्बर २०११ की दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद आपसी छींटाकशी और एक-दूसरे पर दोषारोपण | सच कहूँ तो गायत्री परिवार के सदस्य होने के बावजूद मुझे इनमें से किसी बात ने ज्यादा दुःखी परेशान नहीं किया क्योंकि मैं मानता हूँ कि किसी भी सामजिक स्वयंसेवी संस्था में ऐसी बाधाएं आती हैं, लेकिन इन सबके बावजूद समाज के लिए एक बड़ा काम कर पाना मिशन की परिपक्वता / सफलता का परिचायक होती है | गायत्री परिवार की उपलब्धियों को देखें तो व्यक्ति/परिवार/समाज निर्माण के इतने कार्यक्रम संस्था के स्तर पर चलाये जाते हैं कि ये छोटी-छोटी बातें कभी भी अधिक दिनों तक अपना पाँव नहीं जमा पाती | एक और बात का गर्व मुझे इस बात का रहा है गुरुदेव की कृपा से कभी मिशन के किसी व्यक्ति के चरित्र पर किसी प्रकार का आरोप नहीं लगा, चाहे भले ही किसी के स्वभाव, विलासिता, साधनात्मक स्तर आदि के बारे में कई बातें होती हों | और यही कारण है हाल की घटनाएँ मुझे विचलित कर रही हैं |
मैं करीब साल भर से तथाकथित 'ऋषि संसद हरिद्वार' फेसबुक पेज और उनसे जुड़े लोगों को फॉलो कर रहा हूँ, जहाँ अनेकों तरह की बातें डॉ साहब, जीजी और चिन्मय भैया के बारे में कही जा रही हैं | चूँकि कहने वाले कुछ ऐसे भी हैं जिनको मैं व्यक्तिगत तरीके से जानता हूँ और उनके साथ कन्धा से कन्धा मिलाकर काम किया है, इसलिए मैंने उत्सुकता के बावजूद किसी भी पोस्ट का उत्तर देना उचित नहीं समझा | लेकिन जब मीडिया ट्रायल के जरिये हमारे मिशन को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है और दबाव बनाया जा रहा है, तो मुझे लगता है कि अब चुप नहीं रहना चाहिए | इसलिए बिंदुवार तरीके से इस पेज द्वारा उठाये प्रश्नों का जवाब दे रहा हूँ अपने समझ के अनुसार |
मिशन का उत्तरदायित्व कौन संभाले ?
सबसे पहली तो यह समझना जरूरी है कि कई अन्य संस्थाओं की तरह गायत्री परिवार का प्रमुख होना नया गुरु होना नहीं है | इसलिए मेरे विचार से यह एक जिम्मेवारी अधिक है, और प्रिवेलेज कम | आप गायत्री परिवार के किसी भी परिजन से पूछ सकते हैं कि डॉ साहब का रूटीन कैसा रहा है | हमारे यहाँ जब बैंगलोर में कार्यक्रम होते थे, तो सुबह फ्लाइट से डॉ साहब आते, फिर एक घंटे के विश्राम में हम उन्हें कॉर्पोरेट प्रोग्राम में ले जाते | फिर उसके तुरंत बाद २ घंटे बैंगलोर की ट्रैफिक में यात्रा परिवार के परिजनों के साथ गोष्ठी के लिए और रात में दीप यज्ञ के लिए किसी अन्य जगह पर प्रस्थान | ये सब तब जब उनके घुटने में दर्द होता था | फिर हर कार्यक्रम में श्रोता अलग, सो उनके हिसाब से बात करनी है | ये ध्यान रखना है कि किसी सम्माननीय व्यक्ति का नाम छूट ना जाए | परिजनों से मिलते वक़्त सबका नाम याद रखना है नहीं तो वो बुरा मान जाएंगे | और इन सबके बाद अगर रात को १०-११ बजे विश्राम के लिए गए तो फिर सुबह ३-४ बजे से उठकर साधनात्मक दिनचर्या और एक नयी यात्रा, एक नए जगह पे कार्यक्रम | और इसके अलावे देव संस्कृति विश्वविद्यालय के दायित्व, अखंड ज्योति का लेखन/सम्पादन, सभी परिजनों के ईमेल/मैसेज का जवाब देना | मिशन के प्रमुख होने के नाते उनकी हर छोटी-मोटी गतिविधि पर सबकी नजर रहती है | मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि उनकी आलोचना करने वाले कम-से-कम सिर्फ एक दिन तो उनके जैसा जीवन जीकर देखें |
एक और बात अपने व्यक्तिगत अनुभव की | मेरा शांतिकुंज अक्सर जाना होता है | एक बार एक मित्र के साथ वहां के एक वरिष्ठ परिजन से मिलना हुआ | मैंने उनका अभिवादन किया लेकिन उन्होंने ऐसा व्यवहार किया जैसे मैं वहां हूँ ही नहीं | और उस मित्र जो उनके बहुत करीब था उससे बहुत देर बात करते रहे | मुझे थोड़ा अजीब लगा, लेकिन फिर सोचा शायद उनकी नजर में मैं नहीं आ पाया होऊंगा | लेकिन ऐसा कई बार हुआ जितनी बार भी मेरा शांतिकुंज जाना और उनसे मिलना हुआ | मेरे मन में उनके लिए बहुत सम्मान है गुरुदेव के वरिष्ठ शिष्य और एक प्रखर साधक होने के नाते, लेकिन शायद उनका यह व्यवहार मुझे समझ नहीं आया | वहीँ जब-जब मैं डॉ साहब और जीजी से मिला, उनका आत्मीय व्यवहार, मेरा नाम याद रखना, मेरा हाल-चाल पूछना मुझे गुरुदेव के उस बात की याद दिलाता के 'प्यार-प्यार ही मेरा एकमात्र मंत्र है | ' यही बात मुझे चिन्मय भैया में भी दिखी | जब मैं उनसे मिला भी नहीं था और वो मुझे जानते भी नहीं थे, तब भी वो नियमपूर्वक मेरे सारे ईमेल का जवाब देते थे | अभी भी उनसे सिर्फ एक बार उनसे मिलना हुआ है न्यूजर्सी में और मुझे पता नहीं है कि मैं उन्हें याद होऊंगा भी या नहीं (क्योंकि दुर्भाग्यवश मैं यहाँ अभी अधिक सक्रिय नहीं हूँ), लेकिन जब मैंने कोरोना वायरस वाली विपरीत परिस्थति में उन्हें अप्रैल में इमेल किया तो उनका एक घंटे में सांत्वना वाला जवाब आया | मैंने गुरुदेव को तो नहीं देखा लेकिन डॉ साहब, जीजी, चिन्मय भैया एवं हज़ारों लाखोँ परिजनों के आत्मीय व्यवहार से मिशन को समझा है |
अन्ततः बात नजरिये पे आ जाती है | जिनके अंदर नकारात्मकता है उन्हें इनके अन्दर पद-प्रतिष्ठा, मान-सम्मान, भोग-विलास दिखती है और जो सिर्फ मिशन से प्यार करते हैं वे इनके अंदर शांत-सौम्य-मृदुभाषी व्यक्तित्व वाले, दिन-रात लगन और निष्ठा के साथ मिशन को आगे बढ़ाने वाले, गुरुदेव के लिए तड़प रखने वाले, और सबके लिए प्यार लुटाने वाले सच्चे प्रतिनिधि दिखते हैं और उनसे प्रेरणा पाते हैं | अगर इन्हे भोग-विलासिता का ही जीवन जीना होता तो इंग्लैंड में अपनी डॉक्टरी की प्रैक्टिस छोड़कर हरिद्वार की गर्मी में नहीं आते | मैं ऐसे कई वरिष्ठ परिजनों के बच्चोँ को जानता हूँ, जो विदेशों में आराम से रहते हैं और उन्हें शांतिकुंज में आने के लिए पूछा जाए तो आगे-पीछे देखने लगते हैं | मैं उनके निर्णय का अभिनन्दन करता हूँ कि वो जहाँ हैं वहीँ से गुरुदेव का काम कर रहे हैं, लेकिन अगर चिन्मय भैया अपना सब कुछ छोड़कर सिर्फ गुरुदेव के काम के लिए शांतिकुंज आये हैं तो उनके इस समर्पण का स्वागत होना चाहिए ना कि टीका-टिप्पणी सिर्फ इसलिए कि वो गुरुदेव के संबंधी हैं और इसलिए ये परिवारवाद को बढ़ावा है | बाकी उनकी प्रतिभा, उनकी साधना, मिशन के प्रति उनकी समझ और तड़प के बारे में मिशन का हर व्यक्ति अच्छी तरह जानता है |
देव-संस्कृति विश्वविद्यालय (DSVV)
बहुत लोग 'ऋषि संसद हरिद्वार' पर DSVV के बारे में का तरह की बातें लिखते रहे हैं | इस बारे में एक बात बताना चाहूंगा | पहली एक मेरे दोस्त के बारे में | जिसने DSVV से डिप्लोमा किया और बाद में पीएचडी करना चाहता था | पीएचडी के इंटरव्यू से पहले उसके मुँह से हमेशा डॉ साहब और DSVV के बारे में तारीफ के शब्द निकलते रहते थे | डॉ साहब की गीता की कक्षा कितनी अच्छी होती है ? डॉ साहब सबका कितना ध्यान रखते हैं ? कैसे DSVV बाकी अन्य विश्वविद्यालयों से हटकर है ? आदि आदि | दुर्भाग्य से उसका एडमिशन पीएचडी के कार्यक्रम में नहीं हुआ | अब वही शख्स मुझे डॉ साहब और DSVV की बुराइयां गिनवा रहा था | वहाँ तो सेलेक्शन ऐसे होता है, वहाँ ये सब काण्ड होते हैं, इससे अच्छा तो ये विश्वविद्यालय है, डॉ साहब ऐसे हैं वैसे हैं ? आदि आदि | मैं अवाक था | क्योंकि वो छात्र एक मिशन के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता का बेटा था | मुझे उस फेसबुक पेज पर छपे प्रसंग कुछ ऐसे ही 'अंगूर खट्टे हैं' वाले हैं जैसे लगते हैं | ऐसी बात नहीं है कि DSVV की शिक्षा प्रणाली परफेक्ट हो, लेकिन कम-से-कम हमें इस बात की सराहना करनी ही चाहिए कि विश्व का एकमात्र विश्वविद्यालय देव संस्कृति को पुनर्जीवित करने के लिए भरसक प्रयास कर रहा है | इतना ही नहीं मुफ्त की शिक्षा देकर, सुदूर गांव-देहातों के आये लोगों को स्किल दे रहा है, उन्हें रोजगार प्रदान कर रहा है, और उन्हें मिशन की विचारधारा से जोड़ रहा है | मैंने पुणे में DSVV के करीब १५-२० छात्र-छात्राओं के साथ काम किया है, और मैंने देखा है कि वहाँ दी हुई शिक्षा के माध्यम से लोग मिशन का विस्तार भी कर रहे हैं और आत्मनिर्भर भी हो रहे हैं | गुरुदेव के इस सपने को पूरा करने का श्रेय अगर डॉ साहब को मिले तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है | बाकी शिव जी के बारात की तरह DSVV में भी सभी तरह के बच्चे आते हैं, कुछ मिशन से जुड़ जाते हैं, कुछ की मानसिकता नहीं बदल पाती | इसमें DSVV का दोष कहाँ है ?
२०११ की दुर्भाग्यपूर्ण घटना
जब बात कीचड उछालने की आती है तो लोग खोज-खोज के संस्मरण निकालते हैं | मैंने देखा है कैसे लोग उस घटना को बार-बार उद्बोधित कर मिशन की चुटकियाँ लेते हैं | मुझे आज भी दो दिन याद है | मेरी जिम्मेवारी एक सम्माननीय राज्य सभा सदस्य को सुबह से शाम तक कार्यक्रम दिखाने की, मिशन का परिचय कराने की और अंत में विचार मंच से उनका उद्बोधन कराने की थी | और उसी दिन यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई | मैं पुल के इस तरफ फंसा हुआ था, मैंने विनतीपूर्वक उनसे माफ़ी माँगी और उन्हें ससम्मान विदा किया | अगले दिन सभी समाचार पत्र इस खबर से भरे हुए थे | अखाड़ा परिषद् से लेकर जिन्हें भी मौका मिला था सब डॉ साहब के बारे ऊल-जलूल बातें कह रहे थे | मुकदमा भी हुआ था और हमारे मिशन प्रमुख ने सब कुछ सहा | मुझे यही लगा कि अगर कार्यक्रम सफल हो जाता तो सभी अपनी वाहवाही लेने आगे हो जाते लेकिन अगर कार्यक्रम में विघ्न आया तो सारे जिम्मेवारी मिशन प्रमुख की हो गयी | मैं तब से जब भी कोई अश्वमेध या बड़ा कार्यक्रम होता है तो गुरुदेव से प्रार्थना करता रहता हूँ कि देखना किसी भी ऊँच नीच का फायदा कोई आसुरी शक्ति ना उठाने लगे | डॉ साहब और जीजी इस कार्यक्रम के बाद कह सकते थे कि इतना जोखिम क्यों लेना जितना मिशन का विस्तार है ठीक है अब आराम से रहते हैं, लेकिन जिनके अन्दर तड़प होती है वो मिशन के आगे अपना भी भला-बुरा कहाँ सोचते हैं ? मुझे सबसे बड़ा आश्चर्य ये होता है कि मिशन के कुछ लोग जो इस घटना का जिक्र करके डॉ साहब को भला-बुरा कहते हैं, उनमें से कई इस घटना के बाद मिशन से जुड़े हैं, जीवनदानी और समयदानी बने हैं | उस समय उन्हें कोई तकलीफ नहीं थी, लेकिन अब अपना स्वार्थ सिद्ध नहीं हो रहा तो खोज-खोज के नुस्खे निकाल रहे हैं |
हाल की घटनाएं
जैसे कि मैंने कहा कि मैं करीब एक साल से इस फेसबुक पेज और इससे जुड़े लोगों को फॉलो कर रहा हूँ | मैंने पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण किया है | शुरुवात में यह पेज परिवारवाद की बातें करता और लोगों को बहकाता | फिर कई तरह की बरगलाने वाली बातें - शांतिकुंज के इतने वरिष्ठ परिजन हमारे साथ हैं, तो शांतिकुंज में इस पुस्तकों के साथ छेड़-छाड़ हुई है (अरे भाई साहब ये आरोप आप उनपे लगा रहे हैं जिन्हें गुरुदेव् के रहते गुरुदेव के साथ साहित्य लिखने का श्रेय है - सो या तो आप गलत या गुरुदेव), मिशन अपने पथ से भटक गया है, अमुक को ट्रस्टी बनाया गया है, DSVV में ऐसा होता है आदि-आदि | जब इससे कुछ नहीं निकला तो वो धीरे-धीरे डॉ साहब के चरित्र पर लाँछन लगाने लगे और उन्हें धमकियाँ देने लगे कि आप पद छोड़ दीजिये नहीं तो हम कुछ एक्सपोज़ करेंगे | जब भी कोई इनसे तथ्यगत तरीके से बात करना चाहता तो उनकी बात का उत्तर देने के बजाय उन्हें चापलूस, राम-रहीम के चेले सरीखे, चाटुकार कहकर उनका मजाक बनाते और डॉ साहब के बारे में अभद्र टिपण्णी करते | इन गीदड़भभकियों से जब कुछ हासिल नहीं हुआ तो फिर एक दिन समाचार आया कि एक FIR दर्ज़ हुई है २०१० के किसी मामले के बारे में | मैं सोचता हूँ कभी-कभी अगर वास्तव में इनका इरादा सही होता और पीड़िता को न्याय दिलाना होता तो एक साल पहले ही ये FIR कर सकते थे | डॉ साहब को त्यागपत्र देने की धमकियाँ नहीं देते | ये मान लिए जाए कि अगर डॉ साहब जिम्मेवारी से निवृत हो जाते, और इनके चाहने वाले पदासीन हो जाते, तो फिर क्या पीड़िता को न्याय मिल जाता ? घटनाक्रम बताते है कि कहीं ना कहीं षड़यंत्र की बू है और ये स्पष्ट है कि इनका उद्देश्य किसी पीड़िता को न्याय दिलाना नहीं बल्कि मिशन को बदनाम करना है, और शाम-दाम-दंड-भेद येन-केन-प्रकारेण अपने चाहने वाले को पदासीन करना है |
चाहे जितनी भी गुरुदेव और मिशन की पंक्तियाँ उपयोग में ला लें इनकी भाषा 'मिशन के राजकुमार', 'चापलूस', ‘दादागिरी’ , ‘तानाशाही’ , ‘गुंडागर्दी’, और इनके वकील (जिन्होंने अपराधियों को बचाने के लिए निर्भया के चरित्र पर कीचड़ उछाला था) आखिरकार इनका परिचय दे ही देते हैं | साथ की हमें यह बताते हैं कि यह जंग अब विचार-विमर्श की नहीं रही और अब जो मिशन में निष्ठा रखते हैं उन्हें आगे आना ही होगा | न्याय की निर्णय तो न्यायपालिका करेगी लेकिन अपने पेज पे उल-जलूल समाचार डालकर जो ये मीडिया ट्रायल करना चाह रहे हैं, और दबाव बनाना चाह रहे हैं, उसका जवाब अब करोड़ों गायत्री परिजन अपना विश्वास और अपनी श्रद्धा मिशन एवं उसके प्रतिनधि के प्रति जाहिर करके देंगे | इन्होंने गुरुदेव के मतस्यावतार को चुनौती दी है तो इन्हें वो स्वरुप देखना ही होगा | मुझे पता है तमाम मक्कारों की तरह जब इन्हें अपनी हार दिखेगी तो ये विक्टिम कार्ड का सहारा लेंगे (इन्होने पहले ही ये शुरू कर दिया है कि ये मिशन की बेटी है उससे बात करनी चाहिए आदि-आदि) | रही बात जो इनके वकील ने कही कि मिशन का पैसा इस मुकदमा को लड़ने के लिए लगाया जा रहा है | ये चाहते हैं कि ये मुकदमा करें, पैसे देकर बड़े वकील करें, ऊल-जलूल आरोप लगाएँ और ये भी दबाव बनाएं कि आप आत्मसमर्पण कर दें क्योंकि आप मिशन के पैसे से मुकदमा नहीं लड़ सकते | वाह ? इन्हें नहीं पता कि मेरे सहित लाखोँ लोग डॉ साहब और जीजी के एक आह्वान पर सब कुछ न्योछावर करने को तैयार हैं | लेकिन बात निकली है तो फिर हमें ये भी सोचना चाहिए कि इस मुक़दमे को लड़ने के लिए जो पैसे विरोधी पक्ष द्वारा खर्च किये जा रहे हैं उनके स्रोत क्या हैं ?
जिन्होंने इन वकील को निर्भया के अपराधियों की वकालत करते हुए फॉलो किया है, उन्हें इनके हथकण्डे पता होंगे | अब इस केस में किसी भी प्रकार के सभ्य संवाद की उम्मीद बेकार है | आज इन्होंने कुलदीप सेंगर से तुलना की, अपहरण जैसे आरोप लगाए | कल को ये और गिरेंगे और नए भद्दे बेसिरपैर आरोप लगाएँगे, अपने कुछ मीडिया मित्रों का सहयोग ले उन लोगों को बरगलाने की कोशिश करेंगे जिन्हे इस विषय में अधिक नहीं पता, 'नाबालिग' शब्द का उपयोग कर सहानुभूति बटोरने की कोशिश करेंगे, फिर कुछ राजनीति के लोग कूदेंगे, फिर मिशनरियाँ जो धर्मान्तरण में गायत्री परिवार को एक खतरे के रूप में देखते हैं, वो पीछे से सहयोग करेंगे | वकालत का ऐसा ही तकाज़ा है कि जब केस में दम ना हो तो संवाद का ही स्तर इतना गिरा दो कि एक सभ्य व्यक्ति उस कीचड़ में जाना ही ना चाहे और आत्मसमर्पण कर दे | हमें इस वक़्त एक चट्टान की तरह देव परिवार के साथ खड़े रहना है, ठीक वैसे ही कि अगर ये समस्या हमारे घर के किसी सदस्य के साथ आती तो हम क्या करते ? इनके संवाद या आरोपों का स्तर कितना भी घटिया क्यों ना हो, हमें अपनी सभ्यता बनाये रखनी है और वही हमारी मजबूती है | लेकिन उनके एक-एक कदम का विश्लेषण करना है बिना आक्रोशित या परेशान हुए, और कुछ भी दुष्प्रचार हो तो उसका जवाब सभ्यतापूर्वक लेकिन ठोस तरीके से देना है | कुछ मशहूर पंक्तियाँ याद आ रही हैं-
दर्द कहाँ तक पाला जाए,
युद्ध कहाँ तक टाला जाए,
तू भी है राणा का वंशज,
फेंक जहाँ तक भाला जाए |
मैं व्यक्तिगत से रूप से चाहता हूँ कि यह केस अपने मुकाम तक पहुँचे और एक उदाहरण बने | अगर षड़यंत्र निकले तो हर षड्यंत्रकारी, हर सोशल मीडिया का व्यक्ति जिसने सिर्फ ईर्ष्यावश गलत टिप्पणियाँ की हैं, उनके खिलाफ मानहानि का ठोस केस हो और ऐसा निर्णय लिया जा सके कि क़ानून का दुरूपयोग कर आगे से किसी शरीफ़ इंसान को परेशान ना किया जा सके |
वरिष्ठ परिजनों से करबद्ध निवेदन
आखिरी बात शान्तिकुञ्ज एवं बाहर के पूज्य वरिष्ठ परिजनों से | हम जैसे लाखोँ-करोड़ों युवा आप सबको देख-देख कर बड़े हुए हैं | आपके प्रवचनों और मार्गदर्शन ने हमारे विचारों को सींचा, पाला और बड़ा किया है | मेरा मन यह मानने को तैयार नहीं कि कोई भी गुरुदेव का वरद पुत्र ऐसे षड्यंत्र में, जो कि सीधा गुरुदेव की छाती पे वार है, सीधे या पीछे से शामिल हो सकता है | हाँ विचारों की असहमति या पसंद-नापसंद करना एक अलग बात है | जिन्होंने स्वामी चिन्मयानन्द की पुस्तक 'गॉड लीवड विथ देम' पढ़ी है, उन्हें पता होगा कि कैसे श्री रामकृष्ण परमहंस के १६ शिष्यों में कई बार पुरजोर विवाद होता था | खासकर स्वामी ब्रह्मानंद एवं स्वामी तुरियानन्द की स्वामी विवेकानन्द से तर्क-वितर्क यहाँ तक की बहस भी सभी को पता हैं | इन सबके बावजूद उन सबका सम्मान एक दूसरे के प्रति उतना ही था क्योंकि उन्हें पता था कि सब अलग-अलग सोच भले रखते हों लेकिन आखिरकार काम तो सभी अपने गुरु का ही कर रहे हैं | इसलिए यह समय है कि सभी अपना मतभेद मिटाकर गुरुदेव का एक परिवार स्वरूप मिशन के विरोधियोँ के रखें | अगर आप समझते हैं कि यह एक षड़यंत्र है लेकिन आप फिर भी चुप हैं क्योंकि आपकी मिशन प्रमुख से कोई मनमुटाव है या ईर्ष्या है तो निश्चित ही समयानुसार इसका हिसाब गुरुदेव करेंगे लेकिन हम जैसे हज़ारों लाखों परिजनों के लिए गुरुभाई का यह पतन देखना अन्यन्त ही दुखकर होगा | बाकी जैसी महाकाल की इच्छा |
आपका गुरुभाई,
राजेश रंजन 'आर्य'
दिनांक: जून ३, २०२० तदनुसार ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी २०७७