हरिद्वार में स्थित यह दक्षिण काली मंदिर एक "सिद्धपीठ" है। ऐसी मान्यता है कि यहां आने वाले हर भक्त की इच्छा यहाँ जरूर पूरी होती है। यदि आप सोच रहें हैं कि इस मंदिर का नाम मंदिर में स्थापित मां काली की प्रतिमा का मुख दक्षिण में होने के कारण इसे "दक्षिण काली मंदिर" कहतें हैं, तो आप ग़लत है, यहां पर काली देवी की प्रतिमा का मुख तो पूरब दिशा की ओर है, परन्तु गंगा की दिशा यहां पर दक्षिण की ओर है, इसी
कारण मंदिर को दक्षिण काली मंदिर के नाम से जाना जाता है।
कहते हैं कि काली मां ने बाबा कामराज जी को स्वप्न में इस मंदिर की स्थापना करने का निर्देश दिया था। इसलिए उन्होंने माँ काली देवी के आदेश पर 108 नरमुंडों के ऊपर इस मंदिर की स्थापना की थी। बाबा कामराज ने इसी जगह पर आल्हा और उनकी पत्नी मछला को यहां पर दीक्षा दी थी।
इस मंदिर को आप चमत्कार माने या न माने यह अलग बात है, लेकिन कुछ न कुछ असाधारण बात जरूर है, इस स्थान की महिमा ही ऐसी है कि देवता स्वयं यहां आने को लालायित रहते हैं। हजारों वर्षों से अनवरत चल रहे विशेष अनुष्ठानों के प्रभाव से और महंत-बाबा और हजारों वर्षों से साधनारत सूक्ष्म शरीरधारी ऋषियों का यहां पर निरंतर आवागमन बना रहता है, उनके जप और साधना के तेज़ के कारण यह स्थान स्वर्ग से भी बढ़कर फल प्रदान करता है। यहां के वातावरण में मंत्रों की मधुरध्वनि स्वयं गुंजन ही करने लगती है। व्यक्ति कितना भी परेशान क्यों न हो, यहां आकार वह असीम शांति की अनुभूति अवश्य प्राप्त करता है। सच तो यह है कि यहां चमत्कार स्वयं नमस्कार करते हैं।
हरिद्वार में नील पर्वत की तलहटी के कजरी वन में गंगा की नीलधारा के तट पर स्थित दस महाविद्याओं में प्रथम सिद्धपीठ मां दक्षिण काली के मन्दिर पर पूरे विश्व के महाकाली साधक पुत्र अपनी अभीष्ट साधना करते हैं, जिसका देवी भागवत में श्यामापीठ, योगिना हृदयम, काल कल्पतरू एवं कुलार्णव तंत्र में दक्षिण काली तथा रूद्रयामल तंत्र में कामराज पीठ के नाम से वर्णन किया गया है। काली हृदय कवच में भगवान शिव ने उमा को श्यामापीठ में साधना का निर्देश दिया था।
प्राचीन काल में यह स्थान राजा राधोमछ के राज्य मायापुर के नाम से जाना जाता था। नील पर्वत के इस क्षेत्र में घने वृक्षों के कारण दिन में भी सूर्य का प्रकाश नहीं जा पाता था, इसलिए इस क्षेत्र का नाम कजरी वन (अर्थात् कालावन) क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। तंत्र शास्त्रों में इस स्थान को कामरूप देश के कामाख्या के समान मान्यता दी गई है।
“ कामाख्या वरदे देवि नीलोशैल वासिनी। “
कहतें है कि जब देव और दानव सागर मंथन कर रहे थे. तब "कालकूट विष" निकला था. जिससे सारे संसार में त्राहिमाम मच गया था. दुनिया में सारे प्राणी मरने लगे. तब देवादिदेव महादेव ने हलाहल को अपने कंठ में धारण कर लिया, उस विष के प्रभाव से शिव के कंठ से भयंकर ज्वालाएं निकलने लगीं थी, जिन्हें शान्त करने के लिए महादेव ने यहीं पर आकर स्नान किया था जिसके प्रभाव से "कजरीवन में गंगा की धारा नीली" हो गई. गंगा की उसी धारा को ही नीलधारा कहते हैं. जिसका जल आज भी नील वर्ण का है।
सागर मंथन से निकले अमृत कलश के देव एवम दानवों के मध्य छीना झपटी में उस अमृत कलश से अमृत की कुछ बूंदे यहां स्तिथ ब्रम्हकुण्ड में गिर गई थी, इसीलिए महादेव ने उस ब्रह्मकुंड में स्नान किया.
इस मंदिर के गर्भ गृह के कोने में 2700 साल पुराना त्रिशूल आज भी लगा हुआ है. जिससे इस मंदिर की प्राचीनता का सरलता से अंदाजा लगाया जा सकता है.
नवरात्रि के अलावा प्रत्येक शनिवार को वे लोग ज्यादा पहुंचते हैं,
सभी जगह नवरात्रि नौ दिन के होते हैं, लेकिन काली की इस पीठ में नवरात्र पूरे पंद्रह दिन के होती है. अमावस्या और प्रतिपदा की संधि काल में माई का दस विधि से दिव्य स्नान होता है. जिसे पीठाधीश्वर स्वामी कैलाशानंद महाराज स्वयं करते हैं. जो श्रृंगार इस दिन किया जाता है, वो श्रृंगार सप्तमी की रात्रि तक चलता है. उस दिन स्नान करने के बाद ही कपड़ों को बदला जाता है.
अब मैं आप सब को अपनी यहाँ की गुरू शिष्य परंपरा पर अपनी ज्योति डालती हूँ, परम श्रद्धेय बाबा कामराज जी के शिष्य हुए परम् श्रधेय बाबा तोतापुरी जी महाराज जी और परम श्रद्धेय स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी। श्री दक्षिण काली मन्दिर कलकत्ता के मुख्य सेवक और परम श्रद्धेय स्वामी विवेकानन्द जी के गुरू स्वामी रामकृष्ण परमहंस के गुरू तोतापुरी महाराज ने इसी पीठ से तंत्र साधना प्रारम्भ की थी।
तारा पीठ के संस्थापक तथा पूरे विश्व में तंत्र विद्या के मूल प्रवर्तक परम श्रद्धेय बामाखेपा ने भी बाबा कामराज से ही दीक्षा लेकर श्मशान काली की स्थापना की थी। दिल्ली छतरपुर स्थित कात्यायनी पीठ के संस्थापक बाबा नागपाल जी महाराज ने भी इसी स्थान पर साधना की थी तथा दतिया स्थित पीताम्बरा पीठ मां बंगलामुखी मंदिर के संस्थापक राष्ट्रीय स्वामी दतियावाले भी इसी स्थान पर साधना करते थे। आसाम में कामाख्यापीठ में दस महाविद्या की स्थापना करने से पूर्व अघोर तंत्रशिरोमणि बबलू खेपा ने भी बाबा कामराज जी से दीक्षा ली थी। जबकि उन्होंने अन्तिम दीक्षा आल्हा को दी।
सतना की मैहर स्थित शारदापीठ जिसे सरस्वती पीठ के नाम से जाना जाता है। वहां आज भी ब्रह्ममुहूर्त में सर्वप्रथम आल्हा ही पूजन की अनुमति देता है। पुजारी अन्य भक्तों को दर्शन पूजन की अनुमति देता है। वाममार्गीय परम्परा की इस पीठ पर मां दक्षिण काली अनादि काल से विराजमान हैं, मां ने स्वयं बाबा कामराज को यहां मंदिर में अपने विग्रह के मंदिर स्वरूप की स्थापना का आदेश दिया था, जिसके बाद दसवीं सदी में तंत्र सम्राट साक्षात् शिवस्वरूप बाबा जैसा कि मैने पूर्व में ही बताया कि कामराज महाराज ने 108 नरमुण्डों पर मंदिर की स्थापना की, ये नरमुंड उन लोगों के होते थे जो पूर्व में ही मृत्यु को प्राप्त होकर नीलधारा में बहते हुए वहां आ जाते थे। बाबा कामराज उन्हें तंत्र क्रिया से जीवित करके उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराते थे और उन्हें बलि के लिए सहमत करते थे। जो मृतक जीवित होने के बाद स्वयं को मां के चरणों में अर्पित कर देते थे, उनकी सहमति के बाद उनकी बलि होती थी, उसके बाद उनके शवों का अग्नि संस्कार होता था। चण्डीघाट की 33 एकड़ भूमि में स्थित इस सिद्धपीठ में 71 वें पीठाधीश्वर श्रीमहंत कैलाशानंद ब्रह्मचारी के सानिध्य में निरन्तर अन्न क्षेत्र, गौशाला, वृद्ध सेवाश्रम, धर्मार्थ चिकित्सालय, वेद विद्यालय तथा संत सेवा के साथ ही नियमित अनुष्ठान एवं पूजा- अर्चना होती है।
गुप्त व प्रकट चारों नवरात्र में पूरे देश के भक्त विशेष कार्य सिद्धि अनुष्ठानों का आयोजन करते हैं, ज्येष्ठ शुक्ल सप्तमी के दिन बाबा कामराज जी का जन्मदिन बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है और श्रावण मास में प्रतिदिन महारूद्राभिषेक का आयोजन होता है। वाम मार्ग की इस विश्वविख्यात पीठ का मां की सिद्धकृपा से आशीर्वाद प्राप्तकर कश्मीर के राजा हरिसिंह, हरियाणा, पंजाब, बंगाल के राजघरानों के अतिरिक्त लखनऊ के नवाब तथा अकबर के परिवार ने भी मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया था। उस समय यह मन्दिर वर्तमान स्थान से सैंकड़ों फुट नीचे था। इन भक्तों ने समय-समय पर इसे मन्दिर के गर्भगृह सहित ऊपर उठाकर मन्दिर का पुनरूद्धार कर मां का आशीर्वाद लिया। इस सिद्धपीठ की विशेषता है कि आज भी रात्रि कालीन अनुष्ठानों में वे भक्त ही सम्मिलित हो पाते हैं, जिन पर मां की कृपा होती है। शारदीय तथा वासंतीय नवरात्रों में मां काली की प्रेरणानुरूप अनवरत सहस्रचंडी अनुष्ठान, यज्ञ तथा महामृत्युञजय अनुष्ठान विश्व कल्याण की कामना से किया जाता है।
यह विश्व की प्रथम सिद्धपीठ है जहां किसी यजमान से कोई दक्षिणायाचन नहीं किया जाता और भक्त को भी माँ से कुछ मांगना नहीं पड़ता। मात्र माता के दरबार में हाजिरी देने से कल्याण हो जाता है। विशेष कार्य सिद्धि के लिये ही अनुष्ठनों का आयोजन होता है।
मन्दिर सतयुग कालीन प्राचीन ब्रह्मकुण्ड के पास स्थित है, जैसा कि पुराणों में वर्णित है कि गंगा की नीलधारा में ही ब्रह्मकुंड है परन्तु अज्ञानतावश लोग हर की पैडी को ब्रह्मकुण्ड मान बैठते हैं। इस बह्मकुण्ड को मच्छला कुण्ड के नाम से जाना जाता है। आल्हा की पत्नि मछला इसी कुण्ड में नियमित स्नान करती थीं, इसीलिये इसे मछला कुण्ड भी कहते हैं और इस कुण्ड में आज भी अथाह जलराशि है, अंग्रेज भी इस कुण्ड की थाह नहीं ले पाये तो उन्होंने बैराज बनाकर गंगनहर निकाली जहां वर्तमान ब्रह्मकुण्ड हरकी पैडी के नाम से प्रसिद्ध है। बाबा कामराज महाराज ने इसी ब्रह्मकुण्ड में आल्हा को स्नान कराकर अमर होने का वरदान दिया था। समुद्र मंथन से निकले अमृत की बूंद गिरने से यहां ब्रह्मकुण्ड बना और भगवान भोलेनाथ ने समुद्र मंथन से निकले हलाहल को कण्ठ में धारण कर उसकी उष्णता समाप्त करने के लिए गंगा की जिस मुख्य धारा में स्नान किया, वह हलाहल विष के प्रभाव से नीली हो गई गंगा की उसी धारा को ही नीलधारा कहते हैं जिसका जल आज भी नील वर्ण का होता है। इसी नीलधारा के तट पर विराजमान होकर मां दक्षिण काली अपने भक्तों का कल्याण करती हैं। श्री दक्षिण काली मन्दिर के अन्वेषक बाबा कामराज महाराज, जो अमरा गुरू के नाम से विख्यात हुए, सन् 1219 में ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष सप्तमी को मन्दिर की देखरेख अपने शिष्य बाबा कालिकानन्द जी महाराज को सौंपकर तीर्थाटन के लिए मन्दिर से अदृश्य हो गए। वे आठवें दीर्घजीवी हैं और मां के साथ मन्दिर परिसर में ही विद्यमान हैं। समय-समय पर साधकों को उनके दर्शन होते रहते हैं। इस मन्दिर परिसर में स्थायी रूप से एक सफेद नाग-नागिन, एक काला नाग-नागिन तथा एक अजगर निवास करते हैं जो श्रावण मास पर्यन्त पूरे मन्दिर परिसर में भक्तों के साथ रहते हैं और स्पर्श के बाद भी काटते नहीं।
बाबा कामराज के बाद भगवती के उच्च साधक बाबा कालिकानंद जी महाराज, बाबा देवकीनंदन जी महाराज, बाबा रामचरित्रानंद जी महाराज, बाबा कपाली केशवानंद जी महाराज, अघोर सम्राट बाबा रामतीर्थानंद जी महाराज, बाबा स्वरूपानंद जी महाराज, बाबा रामरथानंद जी महाराज, बाबा प्रेमानंद जी महाराज आदि के बाद 1984 से 2006 तक बाबा प्रेमानंद जी महाराजा के शिष्य साक्षात शिवस्वरूप गुरूदेव श्री महंत बापू गोपालानंद जी ब्रह्मचारी जी महाराज के शिष्य स्वामी सुरेशानंद ब्रह्मचारी इस पीठ के पीठाधीश्वर रहे और उन्होंने ही अपने गुरूभाई बापू गोपालानंद ब्रह्मचारी जी महाराज के शिष्य पूज्य गुरुदेव, दक्षिण काली पीठाधीश्वर एवं निरंजनी पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर श्री श्री 1008 स्वामी श्री कैलाशानंद गिरि जी महाराज का चयन किया जो 2006 से लेकर अब तक 71 वें पीठधीश्वर के रूप में मां की सेवा कर रहे हैं।