25/12/2022
#कुआं...
एक बार राजा भोज के दरबार में एक सवाल उठा, "ऐसा कौन सा कुआं है, जिसमें गिरने के बाद आदमी बाहर नहीं निकल पाता...?"
इस प्रश्न का उत्तर कोई नहीं दे पाया। आखिर में राजा भोज ने राजमंत्री से कहा, "इस प्रश्न का उत्तर ७ दिनों के अंदर लेकर आओ, वरना आपको अभी तक जो इनाम धन आदि दिया गया है, वापस ले लिए जायेंगे तथा इस नगरी को छोड़ कर दूसरी जगह जाना होगा..."
६ दिन बीत चुके थे। राजमंत्री को जबाव नहीं मिला, निराश होकर वह जंगल की तरफ गया। वहां उसकी भेंट एक गड़रिए से हुई। गड़रिए ने पूछा, "आप तो राजमंत्री हैं, राजा के दुलारे हो, फिर चेहरे पर इतनी उदासी क्यों...?"
"यह गड़रिया मेरा क्या मार्गदर्शन करेगा..." सोच कर राजमंत्री ने कुछ नहीं कहा...
इस पर गडरिए ने पुनः उदासी का कारण पूछते हुए कहा, "राजमंत्री जी हम भी सत्संगी हैं, हो सकता है आपके प्रश्न का जवाब मेरे पास हो, अतः नि:संकोच कहिए..."
राजमंत्री ने प्रश्न बता दिया और कहा, "अगर कल तक प्रश्न का जवाब नहीं मिला, तो राजा नगर से निकाल देगा..."
गड़रिया बोला, "मेरे पास पारस है, उससे खूब सोना बनाओ। एक भोज क्या लाखों भोज तेरे पीछे घूमेंगे। बस ! पारस देने से पहले मेरी एक शर्त माननी होगी, कि तुझे मेरा चेला बनना पड़ेगा..."
राजमंत्री के अंदर पहले तो अहंकार जागा, "२ कौड़ी के गड़रिए का चेला बनूं...?"
लेकिन स्वार्थ पूर्ति हेतु चेला बनने के लिए तैयार हो गया। गड़रिया बोला, "पहले भेड़ का दूध पीओ फिर चेले बनो..."
राजमंत्री ने कहा, "यदि मंत्री भेड़ का दूध पिएगा, तो उसकी बुद्धि मारी जाएगी, मैं दूध नहीं पीऊंगा..."
"तो जाओ, मैं पारस नहीं दूंगा..." गड़रिया बोला...
राजमंत्री बोला, "ठीक है, दूध पीने को तैयार हूं, आगे क्या करना है...?"
गड़रिया बोला, "अब तो पहले मैं दूध को जूठा करूंगा, फिर तुम्हें पीना पड़ेगा..."
राजमंत्री ने कहा, "तू तो हद करता है, मंत्री को जूठा पिलायेगा...?"
"तो जाओ..." गड़रिया बोला...
राजमंत्री बोला, "मैं तैयार हूं जूठा दूध पीने को..."
गड़रिया बोला, "वह बात गई। अब तो सामने जो मरे हुए इंसान की खोपड़ी का कंकाल पड़ा है, उसमें मैं दूध दोहूंगा, उसको जूठा करूं, फिर पियोगे, तब मिलेगा पारस, नहीं तो अपना रास्ता लीजिए..."
राजमंत्री ने खूब विचार कर कहा, "है तो बड़ा कठिन, लेकिन मैं तैयार हूं..."
गड़रिया बोला, "मिल गया जवाब..."
"यही तो कुआं है लोभ का, तृष्णा का, जिसमें आदमी गिरता जाता है और फिर कभी नहीं निकलता। जैसे कि तुम पारस को पाने के लिए इस लोभ रूपी कुएं में गिरते चले गए..."
"तृष्णा ऐसी आग है, कि जितनी दुनियावी चीज़ें बढ़ती जाती हैं, उतना ही लोभ या लालच बढ़ता जाता है। जिस प्रकार आग में जितनी लकड़ी डालते जाओ, उतनी ही लम्बी लपटें निकलती हैं। तृष्णा वाला मनुष्य कभी भी तृप्त नहीं होता..."
शिक्षा : लोभ का मारा धन की आशा के पीछे लग कर यह दसों दिशाओं में भागता फिरता है। सुख की खातिर यह बहुत दु:ख उठाता फिरता है। हर एक आदमी की चाकरी करता फिरता है। जिस प्रकार कुत्ता घर घर भागा फिरता है, यह भी धन के लोभ की खातिर भटकता फिरता है और परमात्मा की सुध ही भुला दी है...
परमात्मा को प्राप्त करने के लिए मन का साथ बहुत ज़रूरी है, लेकिन वह मन जो हमारे इशारे पर चले, ना कि जो हमें अपने इशारों पर नचाए...!!!
ॐ श्री काल भैरव नमो नमः...🚩
हे मेरे नाथ... हे मेरे नाथ...🙏🙂