ARYA SAMAJ HAPUR

ARYA SAMAJ HAPUR दैनिक यज्ञ — प्रातः 07:00 बजे एवं सायं 04:30 बजे
साप्ताहिक सत्संग: रविवार प्रातः 08:00 बजे एवं सोमवार सायं 04:00 बजे

आर्य समाज हापुड़ में दैनिक यज्ञ सोमवार से शनिवार प्रातः 06:30 बजे व सायं 05:30 बजे तथा साप्ताहिक सत्संग प्रत्येक रविवार प्रातः 08:00 बजे से 10:00 बजे तक व महिला सत्संग - प्रत्येक सोमवार सायं 04:00 बजे से 05:30 बजे तक होता है।

आर्य वीर दल - संस्कृति रक्षा, शक्ति संचय एवं सेवा कार्य के उद्देश्य से बालक व बालिकाओ की शाखा प्रत्येक रविवार सायंकाल में लगाई जाती है।

आर्य समाज हापुड़ में निम्न सुविधाएँ

भी उपलब्ध हैं:
1. लाला भागवत प्रसाद आर्य धर्मार्थ आयुर्वेदिक औषधालय
2. आर्य धर्मार्थ होम्योपैथिक औषधालय
3. महर्षि दयानन्द सरस्वती भौतिक चिकित्सालय
4. महर्षि दयानन्द सरस्वती दन्त चिकित्सालय
5. विवाह हेतु कन्या दिखाने के लिए सुसज्जित एवं सुविधायुक्त कक्ष उपलब्ध है।
6. वैदिक साहित्य
7. स्वनिर्मित हवन सामग्री व समिधा
8. सुयोग्य पुरोहित

03/03/2026
आर्य समाज मन्दिर, हापुड़ में चतुर्वेद शतकम् यज्ञ के साथ होलिकोत्सव सम्पन्नहापुड़। फाल्गुन पूर्णिमा संवत् 2082 के पावन अव...
03/03/2026

आर्य समाज मन्दिर, हापुड़ में चतुर्वेद शतकम् यज्ञ के साथ होलिकोत्सव सम्पन्न

हापुड़। फाल्गुन पूर्णिमा संवत् 2082 के पावन अवसर पर आर्य समाज मन्दिर, हापुड़ में वासंती नवसस्येष्टि (होलिकोत्सव) के उपलक्ष्य में चतुर्वेद-शतकम् वैदिक महायज्ञ श्रद्धा एवं वैदिक मर्यादा के साथ सम्पन्न हुआ।

कार्यक्रम में चारों वेदों के सौ-सौ मंत्रों के उच्चारण सहित यज्ञ सम्पन्न कराया गया। तीन वेदियों पर आहुतियाँ दी गईं तथा कुल 12 यजमान दम्पत्तियों ने श्रद्धापूर्वक सहभागिता की। यजमानों में श्रीमती एवं श्री अनिल आर्य, श्रीमती एवं श्री डॉ. विकास अग्रवाल, श्रीमती एवं श्री संदीप आर्य तथा श्रीमती एवं श्री वरुण आर्य, श्रीमती एवं श्री रमाकांत आर्य, श्रीमती एवं श्री मदनलाल गोयल, श्रीमती एवं श्री विजय गुप्ता, श्रीमती एवं श्री श्रेय अग्रवाल, श्रीमती एवं श्री शशांक आर्य, श्रीमती एवं श्री सचिन गर्ग, श्रीमती एवं श्री राजीव खरबंदा, श्रीमती एवं श्री गोयल आदि सम्मिलित रहे।

यज्ञ का संचालन श्रद्धेय धर्माचार्य श्री धर्मेन्द्र शास्त्री जी के ब्रह्मत्व में तथा गुरुकुल तारापुर के प्राचार्य श्री प्रेमपाल शास्त्री जी के वैदिक उद्बोधन एवं ब्रह्मचारीगण के वेदमंत्रोच्चार के मध्य सम्पन्न हुआ। मंचासीन विद्वानों ने होली के वैदिक स्वरूप—वासंती नवसस्येष्टि—पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह पर्व त्याग, समर्पण, नवान्न अर्पण एवं वातावरण की शुद्धि का प्रतीक है। आयोजन पूर्णतः वैदिक रीति से सम्पन्न हुआ।

कार्यक्रम के संयोजक श्री अनिल आर्य जी ने आयोजन की समस्त व्यवस्थाओं का व्यय वहन कर विशेष सहयोग प्रदान किया। जिसमें प्राकृतिक फूलों से सुसज्जित मन्दिर प्रांगण आकर्षण का केंद्र रहा और उपस्थित सैंकड़ों आगुंतकों ने इसकी सराहना की।

अंत में आर्य समाज हापुड़ के मंत्री अमित शर्मा ने आर्य समाज हापुड़ की 135 वर्षीय वैदिक यात्रा, महर्षि दयानन्द सरस्वती जी की द्वितीय जन्मशताब्दी, आर्य समाज की 150 वर्षीय गौरवगाथा तथा स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती जी के बलिदान शताब्दी वर्ष का उल्लेख करते हुए संस्था की विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक गतिविधियों पर प्रकाश डाला तथा सभी विद्वानों, यजमानों, अतिथियों एवं नगरवासियों का आभार व्यक्त किया।

समाज के प्रधान श्री सुरेश सिंघल ने अपनी टीम—कोषाध्यक्ष पवन आर्य, महिला प्रधान प्रतिभा भूषण, रेखा गोयल सुरेंद्र कबाड़ी, सुरजीत सिंह, राजप्रभा आर्या, नरेंद्र शर्मा, राकेश गुप्ता, संजय शर्मा, परीक्षित अग्रवाल, अनिल कसेरा, अमित आर्य, सुंदर लाल आर्य, राधा रमण आर्य, ओमवीर सिंह, आकाश आर्य, विजय पाल सिंह, चमन सिंह शिशोदिया, मंगल सेन गुप्ता, श्वेतांक आर्य, अरुण शर्मा, राजेंद्र कुमार शर्मा, मुकेश शर्मा सहित अनेक कर्मठ कार्यकर्ताओं—के साथ मिलकर व्यवस्थाओं का सफल संचालन किया। कार्यक्रम सौहार्दपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ।

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Address

Hapur
245101

Opening Hours

Monday 7am - 6pm
Tuesday 7am - 6pm
Wednesday 7am - 6pm
Thursday 7am - 6pm
Friday 7am - 6pm
Saturday 7am - 6pm
Sunday 8am - 6pm

Telephone

+919897473800

Website

https://elibrary.thearyasamaj.org/

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Our Story

आर्य शब्द का अर्थ है श्रेष्ठ और प्रगतिशील. अतः आर्य समाज का अर्थ हुआ श्रेष्ठ और प्रगतिशीलों का समाज, जो वेदों के अनुकूल चलने का प्रयास करते हैं.

आर्यसमाज के दस नियम १. सब सत्यिध्या और जो पदार्थ विध्या से जाने जाते हैं, उन सबका आदिमूल परमेश्वर है । २. ईश्वर सच्चिदानंदस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, चर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करनी योग्य है । ३. वेद सब सत्यविध्याओं का पुस्तक है । वेद का पढ़ाना - पढ़ाना और सुनना - सुनाना सब आर्यो का परम धर्म है । ४. सत्य के ग्रहण करने और उसत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत् रहना चाहिएँ । ५. सब काम धर्मानुसार, अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिएँ । ६. सँसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्धेश्य है, अर्थात् शारीरिक्, आत्मिक और सामाजिक् उन्नति करना । ७. सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार यथायोग्य वर्तना चाहिए । ८. अविध्या का नाश विध्या कि दृध्दि करनि चाहिए । ९. प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से सन्तुष्ट न रहना चाहिए, किन्तु सब की उन्नती सें अपनी उन्नति समझनी चाहिए । १०. सब मनुष्यों को सामाजिक, सर्वाहितकारी, नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिए आर प्रत्येक हितकारी नियम पालने सब स्वतंत्र रहें ।