14/05/2026
पीर बुद्धू शाह और गुरु गोविंद सिंह जी
पीर बुद्धू शाह सधौरा (पाउंटा साहिब से लगभग 10-15 मील दूर) के रहने वाले एक मुस्लिम संत थे। वे अपनी पवित्रता के लिए प्रसिद्ध थे और उनके बड़ी संख्या में अनुयायी थे। उन्होंने गुरु नानक देव जी और उनके मिशन के बारे में सुना था। उन्हें यह भी ज्ञात हुआ कि गुरु नानक देव जी की गद्दी पर उस समय गुरु गोविंद सिंह जी विराजमान थे, जो पास ही पाउंटा साहिब में ठहरे हुए थे। अंततः उन्होंने गुरु जी से मिलने का निर्णय लिया।
गुरु जी ने पीर को अपने पास बिठाया, जिन्होंने प्रार्थना की, "कृपा कर हमें बताएं कि अकाल पुरख (ईश्वर) से मिलन कैसे होता है?" चर्चा के दौरान पीर ने बड़ी विनम्रता से गुरु जी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। गुरु जी की आँखों में एक ऐसी चमक थी जिससे दिव्य प्रकाश निकल रहा था। पीर अचानक खुशी से चिल्ला उठे, "अल्लाह-हू-अकबर!" (ईश्वर महान है)। कुछ समय बाद पीर ने स्वीकार किया, "गुरुदेव, मैं आध्यात्मिक रूप से अंधा था और आपने मुझे प्रकाश दिखाया है।" धन्य हैं वे आत्माएं जिन पर गुरु अपनी दिव्य कृपा बरसाते हैं।
भंगानी का युद्ध और पीर का बलिदान
बाद में, पीर बुद्धू शाह की सिफारिश पर 500 पठानों को पाँच सरदारों—काले खान, भीखन खान, निजामत खान, हयात खान और उमर खान—के नेतृत्व में गुरु जी की सेना में भर्ती किया गया। लेकिन अक्टूबर 1686 में, जब राजा भीम चंद और फतेह शाह के नेतृत्व में पहाड़ी राजाओं ने 30,000 सैनिकों की फौज इकट्ठा की और पाउंटा साहिब पर हमला करने के लिए बढ़े, तो पठान गुरु जी के सीमित संसाधनों को देखकर आशंकित हो गए। काले खान और उनके सौ सैनिकों को छोड़कर, बाकी सभी पठान ऐन वक्त पर गुरु जी का साथ छोड़ कर पहाड़ी राजाओं से जा मिले। महंत कृपाल (कृपा दास) को छोड़कर उदासी साधु भी भाग खड़े हुए।
जब गुरु जी ने पीर बुद्धू शाह को पठानों के इस विश्वासघात की सूचना दी, तो पीर ने इसे अपना व्यक्तिगत अपमान समझा। इस नुकसान की भरपाई के लिए, बुद्धू शाह ने स्वयं को, अपने भाई को, अपने चार बेटों और सात सौ अनुयायियों को गुरु जी की सेवा में समर्पित कर दिया।
गुरु जी ने अपनी सेना को भंगानी गाँव के पास एक ऊँचे स्थान पर तैनात किया। बीबी वीरो के पाँच पुत्रों—सांगो शाह, जीत मल, गोपाल चंद, गंगा राम और मोहरी चंद—ने हमले का नेतृत्व किया। उन्हें महंत कृपा दास और अन्य सिखों का पूरा सहयोग मिला। युद्ध की आज्ञा देते हुए गुरु जी ने अपनी तलवार बांधी, पीठ पर तरकश लटकाया, हाथ में धनुष लिया और अपने घोड़े पर सवार होकर पूरी शक्ति से 'सत श्री अकाल' का जयकारा लगाते हुए शत्रुओं का सामना करने बढ़े।
शत्रु सेना का नेतृत्व राजा फतेह शाह कर रहे थे, जिनके साथ हंदूर के राजा हरि चंद, गुलेर के राजा गोपाल, चंदेल के राजा, दधवाल और जसवाल के राजा और वे 400 पठान भी थे जिन्होंने गुरु जी को धोखा दिया था। एक भीषण और खूनी युद्ध हुआ। दोनों ओर के कई बहादुर सैनिक मारे गए। हालाँकि शत्रु सेना की संख्या गुरु जी के सैनिकों से कहीं अधिक थी, लेकिन उनमें बलिदान की वह भावना और अपने नेता के प्रति वह भक्ति नहीं थी जो सिखों में थी।
"खसम दुश्मनी गर हजार आव्रद, न यक मु-ए ओ बाजार आव्रद।"
"यदि शत्रु हजारों प्रकार से शत्रुता करे, तब भी वह उसका एक बाल भी बांका नहीं कर सकता जिसका रक्षक स्वयं ईश्वर है।"
— ज़फ़रनामा (विजय की चिट्ठी)
भंगानी के इस भीषण युद्ध में पीर बुद्धू शाह, उनके बेटों और अनुयायियों ने बड़ी बहादुरी से लड़ाई लड़ी। कई सौ सिखों के साथ पीर बुद्धू शाह के दो बेटे और उनके कई अनुयायी भी शहीद हो गए।
गुरु जी का आशीर्वाद और पीर की शहादत
युद्ध के बाद गुरु गोविंद सिंह जी ने पीर को कीमती उपहार भेंट किए, जिन्हें पीर ने विनम्रतापूर्वक स्वीकार करने से मना कर दिया। परंपरा के अनुसार, उस समय गुरु जी अपने बाल संवार रहे थे। बुद्धू शाह ने उनसे प्रार्थना की कि वे उन्हें अपनी कंघी और उसमें फंसे हुए केश एक पवित्र स्मृति के रूप में दे दें। गुरु जी ने उन्हें अपनी दस्तार (पगड़ी), कंघी (केशों सहित) और एक छोटी कृपाण भेंट की। सबसे बड़ा उपहार यह था कि गुरु जी ने उन्हें 'नाम' की दात से नवाजा।
भंगानी में हार के बाद भी राजपूत राजा गुरु जी के प्रति शत्रुता रखते थे और उन्हें आनंदपुर से बेदखल करना चाहते थे। शाही सरकार से मदद लेने के लिए उन्होंने सम्राट को रिपोर्ट भेजी जिसमें गुरु जी को एक "खतरनाक विद्रोही" बताया गया। पीर बुद्धू शाह के खिलाफ भी शिकायतें पहुँचीं कि उन्होंने गुरु जी की सहायता की थी। सरहिंद के फौजदार ने स्थानीय अधिकारी उस्मान खान को पीर को दंडित करने का आदेश दिया। उस्मान खान ने सधौरा पर हमला कर पीर बुद्धू शाह को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें मृत्युदंड दे दिया।
1709 में बाबा बंदा सिंह बहादुर ने सधौरा पर हमला कर और उस्मान खान को सजा देकर पीर की शहादत का बदला लिया। सधौरा में पीर बुद्धू शाह के पैतृक घर को अब एक गुरुद्वारे में बदल दिया गया है, जिसका नाम पीर बुद्धू शाह के नाम पर रखा गया है।
धन्यवाद जी
धन धन परमात्मा 🙏🏻🙏🏻🙏🏻