माता अवाहदेवी जी के मंदिर का इतिहास तकरीबन सैकड़ों वर्ष पुराना है । यह माता मंदिर अवाहदेवी में जिला हमीरपुर व जिला मंडी की सीमा पर पहाड़ी पर स्थित है। इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि एक बार हमीरपुर जिले के संगरोह गांव में एक किसान खेती कर रहा था इस दौरान उसका हल एक पत्थर से टकरा गया जिसमें से रक्त निकलने लगा । इसके बाद लोगों ने पिंडी को बाहर निकाला और माता ने किसान को स्वपन में दर्शन दिए तब म
ां ने कहा कि मैं देवी हूं और मेरी पिंडी को स्थापित किया जाए। जल्द ही यह खबर पूरे क्षेत्र में आग की तरह फैल गई हालांकि उस समय अवाहदेवी क्षेत्र कांगड़ा और मंडी की सीमा होने के कारण दोनों तरफ के लोगों के बीच विवाद होते रहते थे जब यह खबर मंडी रियासत के लोगों को पता चली तो देवी की पिंडी को अपने क्षेत्र में स्थापित करने की इच्छा से उन्होंने पिंडी को रात को उठा लिया और रास्ते में वर्तमान मंदिर स्थान में पहाड़ी पर विश्राम करने के उद्देश्य से रुके लेकिन जब वह लोग चलने लगे तो वह बहुत प्रयास करने के बाद भी पिंडी को अपने स्थान से नहीं हिला सके। अतः उनको पिंडी को वहीं छोड़कर जाना पड़ा और देवी पुनः किसान के स्वपन में आई और अपना स्थान बता कर के कहा कि मुझे यही स्थापित करो । इस पर दोनों क्षेत्रों के लोगों ने इसी पहाड़ी पर माता की पिंडी की स्थापना कर दी और पूरी श्रद्धा से अपनी कुलदेवी के रूप में पूजने लगे । आज भी भगवती दुर्गा के पैरों के निशान दोनों तरफ के रास्तों में पत्थरों पर चिन्हित हैं।
इसके बाद सन् 1970 के दशक में बाबा श्रवण नाथ नामक एक महात्मा क्षेत्र में आए भगवती दुर्गा उनके स्वपन में आईं और कहा कि तुम मेरे लिए यहां रुक कर भव्य मंदिर का निर्माण करो । इस पर बाबा श्रवण नाथ ने यहां रुकने में असमर्थता जताई जिस पर देवी ने कहा कि मेरी सेवा किए बिना तुम यहां से नहीं जा सकते हो । तब बाबा श्रवण नाथ जी ने उनकी बात मान ली और कुछ दिनों बाद बाबा जी के भक्त भोला सेठ जी लुधियाना वाले अवाहदेवी पहुंचे और बाबा जी से विचार-विमर्श करके माता जी के मंदिर व पौड़ी को बनाने का संकल्प लिया उस समय यहां सीमेंट सरिया व मिस्त्री उपलब्ध नहीं होते थे तो सरिया सीमेंट व मिस्त्री अंबाला न्योला से आए । बाबा जी व सेठ जी के प्रयासों से 1972 में भव्य मंदिर का निर्माण करवाया गया।
सन 1981 में मंदिर की व्यवस्थाओं को सुचरु रूप से चलने और श्रद्धालओं की सुविधा के लिए विकास कार्य करने हेतु कमेटी का गठन किया गया जो तब से लगातार मंदिर की व्यवस्थाओं की देख रेख कर रही है।
इसके बाद सन् 2012 में भाजपा के कार्यकाल में मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल द्वारा पर्यटन विभाग के सहयोग से इस भवन का जीर्णोद्धार करवाया गया और यह वर्तंमान सवरूप बन कर तैयार हुआ।