17/05/2026
आज कौनहारा घाट के किनारे पर खड़ी इस मूर्ति की दुर्दशा को देखिए। जिसे कल तक 'भगवान' मानकर लोग हाथ जोड़ रहे थे, आज वह मिट्टी, पुआल और फटे कपड़ों के बीच लावारिस छोड़ दी गई है। जिन हाथों में कभी कोदंड धनुष शोभा पाता था, आज वो सूखी टहनियों के सहारे बेबस खड़े हैं। जिस मुखमंडल के दर्शन के लिए कल तक होड़ मची थी, आज वह धूल-धूसरित होकर हमारी खोखली आस्था का उपहास उड़ा रहा है।
यह विसर्जन है या विडंबना?
क्या हमारी आस्था सिर्फ उत्सव मनाने, तस्वीरें खिंचाने और सोशल मीडिया पर अपनी 'धार्मिकता' का ढिंढोरा पीटने तक ही सीमित है?
तथाकथित धर्मरक्षकों से सवाल: उत्सव के बजट में लाखों रुपये पानी की तरह बहाने वाले इन संगठनों के पास क्या दो वक्त की मज़दूरी देकर इस विग्रह को ससम्मान भू-विसर्जित करने या सुरक्षित रखने का बजट नहीं था?
दिखावे की संस्कृति: जब तक जय-जयकार मिली, तब तक भगवान हमारे थे। जैसे ही उत्सव खत्म हुआ, हमने अपने ही आराध्य को एक पुराना कबाड़ समझकर घाट की गंदगी के हवाले कर दिया।
वाह री हमारी 'प्लास्टिक' वाली श्रद्धा!
धिक्कार है ऐसी दिखावे की धार्मिकता पर, जो उत्सव में तो मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम पर रैलियां निकालती है, लेकिन उत्सव बीतते ही उन्हें इस तरह बेबस और अपमानित होने के लिए छोड़ देती है। यह सिर्फ एक मूर्ति की दुर्दशा नहीं है, यह हमारी सामूहिक नैतिकता और वास्तविक धार्मिक मूल्यों का पतन है।
अगर हम अपने आराध्य को उत्सव के बाद सम्मानजनक विदाई भी नहीं दे सकते, तो हमें उनके नाम पर जुलूस निकालने और धर्म का ठेकेदार बनने का कोई अधिकार नहीं है। कौनहारा घाट की यह मिट्टी सिर्फ मूर्ति के रंग को नहीं सोख रही है, बल्कि उन तमाम दावों और खोखले वादों को भी बेनकाब कर रही है जो अक्सर धर्म के नाम पर किए जाते हैं।
समय आ गया है कि हम 'जयकारे' लगाने के साथ-साथ थोड़ी 'ज़िम्मेदारी' लेना भी सीखें। वरना, इतिहास हमारी इस तस्वीर को देखकर हमारी तथाकथित 'श्रद्धा' पर हमेशा थूकता रहेगा।