04/02/2026
हरे-भरे धान के खेतों के बीच पानी लहरों की तरह चमक रहा था। एक ओर ट्यूबवेल चल रहा था, जिसकी मधुर आवाज़ खेतों में जीवन का संगीत घोल रही थी। उसी खेत के बीचों-बीच एक विशाल चबूतरा बना था। चबूतरे पर पंचमुखी हनुमान जी लेटे हुए थे। उनका पूरा शरीर लाल सिंदूर से आच्छादित था, मानो भक्ति ने स्वयं उनका श्रृंगार किया हो। चारों ओर फूल बिखरे पड़े थे—गेंदा, गुलाब और चमेली—और सिंदूर की सुगंध हवा में घुली हुई थी।
चबूतरे के पीछे एक सूखा पेड़ खड़ा था, जिसका आकार त्रिशूल जैसा प्रतीत होता था। गाँव वाले कहते थे कि यह पेड़ वर्षों से वहीं है और साक्षी है उस रहस्य का, जिसे कोई पूरी तरह समझ नहीं पाया। जब-जब खेतों में पानी भरा रहता और फसल लहलहाती, तब-तब पेड़ की परछाईं चबूतरे तक आकर रुक जाती, जैसे वह भी पूजा में सम्मिलित हो।
भोर होते ही भक्तों की कतार लग जाती। कोई फूल चढ़ाता, कोई सिंदूर, तो कोई बस हाथ जोड़कर मौन में खड़ा हो जाता। कहते हैं, जिस दिन सच्चे मन से प्रार्थना की जाती, उस दिन ट्यूबवेल का पानी और भी निर्मल बहता, धान की बालियाँ और घनी हो जातीं। लोगों का विश्वास था कि यह सब पंचमुखी हनुमान जी की कृपा से होता है।
एक वर्ष भयंकर सूखा पड़ा। चारों ओर चिंता फैल गई। उसी रात गाँव के बुज़ुर्ग ने स्वप्न देखा—हनुमान जी ने कहा, “भय मत करो, श्रम और भक्ति साथ हों तो जीवन फिर हरा हो जाता है।” अगले ही दिन गाँव वालों ने मिलकर नहर साफ की, खेतों की मेंड़ें मजबूत कीं और पूरे मन से पूजा की। कुछ ही दिनों में बादल घिर आए और बारिश ने धरती को भिगो दिया।
तब से यह मान्यता और गहरी हो गई कि जहाँ भक्ति, परिश्रम और विश्वास एक साथ हों, वहाँ चमत्कार स्वयं रास्ता खोज लेता है। हरे-भरे खेत, चलता ट्यूबवेल, त्रिशूल-सा सूखा पेड़ और चबूतरे पर लेटे पंचमुखी हनुमान—सब मिलकर गाँव की आस्था की अमिट कहानी बन गए।
यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है।