07/09/2026
बहुत पुराने समय की बात है। कंधारी नाम का एक छोटा-सा गाँव घने जंगल के पास बसा हुआ था। गाँव के लोग सरल, मेहनती और प्रकृति-प्रेमी थे। उनके लिए जंगल केवल पेड़-पौधों का समूह नहीं, बल्कि देवता के समान पूजनीय था। वे जंगल से लकड़ी, फल और अन्य आवश्यक वस्तुएँ लेते थे, लेकिन उसकी रक्षा करना भी अपना कर्तव्य समझते थे।
एक दिन अचानक गाँव के पास स्थित वन में आग लग गई। देखते ही देखते आग ने जंगल के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया। चारों ओर धुआँ फैल गया और पेड़-पौधे जलने लगे। किसी व्यक्ति ने राजा के दरबार में जाकर सूचना दी कि कंधारी गाँव के पास के जंगल में आग लगी है।
समाचार सुनकर राजा बहुत क्रोधित हुआ। उसने तुरंत आदेश दिया कि गाँव की औरतों और बच्चों को छोड़कर सभी पुरुषों को दरबार में हाजिर किया जाए। राजा के सैनिक गाँव पहुँचे और सभी पुरुषों को अपने साथ लेकर चल पड़े।
गाँव में केवल एक वृद्ध व्यक्ति था। जब उसने यह बात सुनी तो उसने सभी पुरुषों को रोककर समझाया, “वन हमारे देवता हैं। उन्हें जलाना या किसी प्रकार की हानि पहुँचाना बहुत बड़ा अपराध है। भविष्य में ऐसी गलती कभी मत करना। आज राजा के सामने जो भी हो, सब एक बात पर अडिग रहना—तुममें से किसी को नहीं मालूम कि आग किसने लगाई।”
सभी पुरुषों ने वृद्ध की बात स्वीकार कर ली और उसके अनुभव पर भरोसा करते हुए राजा के दरबार की ओर चल पड़े।
दरबार में पहुँचते ही राजा ने गरजकर पूछा, “वन में आग किसने लगाई?”
सभी ने एक साथ उत्तर दिया, “महाराज, हमें पता नहीं।”
राजा ने फिर कठोर स्वर में कहा, “यदि सच नहीं बताया तो सबको जेल में डाल दूँगा।”
गाँव वालों ने डरते हुए फिर कहा, “महाराज, हमें सचमुच पता नहीं।”
राजा ने क्रोधित होकर आदेश दिया, “अच्छा! सबको जेल में डाल दो।”
सभी पुरुषों को जेल में डाल दिया गया। राजा के आदेश से उनके लिए एक चारपाई, खाने का राशन, कुछ लकड़ियाँ और एक जलती हुई लालटेन रखवा दी गई। राजा ने कहा, “जो व्यक्ति चारपाई पर सोएगा, वही इनका नेता माना जाएगा और वही अंततः सच बताएगा।”
वृद्ध ने यह बात सुनकर सभी को समझाया, “चारपाई पर कोई पूरा नहीं सोएगा। कोई खाना नहीं पकाएगा और न ही खाएगा। सभी लोग चारपाई की एक-एक टांग पर अपना एक पैर रख देना। राजा हमें डराना चाहता है, लेकिन हमें अपनी बात से पीछे नहीं हटना है।”
सभी ने वृद्ध की बात मान ली।
अगली सुबह राजा ने अपने वजीर को कैदियों का हाल जानने के लिए भेजा। जेल में पहुँचकर वजीर यह देखकर हैरान रह गया कि कोई भी चारपाई पर सोया नहीं था। सभी पुरुष चारपाई की अलग-अलग टांगों पर एक-एक पैर रखे खड़े थे।
वजीर ने पूछा, “तुम लोगों ने चारपाई पर कोई क्यों नहीं सोया? और यह क्या तमाशा है कि सभी ने एक-एक टांग पर पैर रखा हुआ है?”
गाँव वालों ने कहा, “हुजूर, हमारे बाबा जी नाराज हो जाते। इसलिए उनके आदर में हमने चारपाई की एक-एक टांग पर अपना पैर रख दिया।”
वजीर ने फिर पूछा, “लकड़ी और राशन दिया गया था। फिर खाना क्यों नहीं बनाया?”
सबने उत्तर दिया, “देवता जी, आग ही नहीं थी।”
वजीर ने लालटेन की ओर इशारा करके कहा, “यह लालटेन तो जल रही थी।”
गाँव वालों ने भोलेपन से कहा, “हुजूर, इस लुप-लुपी से आग कैसे जलती है, हमें तो पता ही नहीं था।”
वजीर उनकी बात सुनकर मुस्कुराता हुआ राजा के पास पहुँचा और सारी घटना सुनाई। राजा भी उनकी भोली बुद्धिमानी समझ गया। उसने कहा, “ये तो भोले कंधारी हैं। इन्हें छोड़ दो।”
राजा का आदेश मिलते ही सभी पुरुषों को जेल से मुक्त कर दिया गया।
गाँव लौटते समय सभी ने उस वृद्ध का बहुत सम्मान किया। उन्हें समझ आ गया था कि बुजुर्गों का अनुभव जीवन की अनमोल पूँजी होता है। उम्र के साथ मिला अनुभव कई कठिन परिस्थितियों में रास्ता दिखा सकता है।
सीख: हमें अपने बुजुर्गों का सदैव सम्मान करना चाहिए और उनके अनुभवों से सीख लेकर कठिन परिस्थितियों में धैर्य, एकता और बुद्धिमानी से काम लेना चाहिए।