सत्य साधना - संस्कार

सत्य साधना - संस्कार एक साथ आना एक शुरुआत है, एक साथ रहना प्रगति है और एक साथ काम करना सफलता है।

24/03/2026

बुद्धिमानी और धैर्य से बड़ी-से-बड़ी समस्या का समाधान किया जा सकता है।

24/03/2026

अवध के उत्तर दिशा में प्रसेनजित नाम का एक न्यायप्रिय और बुद्धिमान राजा राज करता था। उसके राज्य में लोग सुखी और संतुष्ट रहते थे, क्योंकि राजा सदैव न्याय और धर्म का पालन करता था।
एक दिन उस नगर में एक तपस्वी आया। वह बड़ा विचित्र साधु था। वह दाल-भात या अन्य भोजन नहीं करता था, बल्कि केवल कच्चे धान खाकर ही अपना जीवन बिताता था। उसकी इस अनोखी तपस्या को देखकर नगर के लोग उसे बहुत बड़ा त्यागी और महात्मा समझने लगे।
नगर के एक धनी सेठ ने उस तपस्वी के रहने की व्यवस्था एक सज्जन व्यक्ति के घर में कर दी। सेठ रोज़ उसके लिए धान भेजता और साथ में कुछ सिक्के भी दान देता। धीरे-धीरे नगर के अन्य व्यापारी भी उस तपस्वी को सच्चा संत समझकर उसे दान-दक्षिणा देने लगे। कोई धान देता, तो कोई सिक्के दे जाता।
परन्तु उस तपस्वी का स्वभाव बड़ा कंजूस और लोभी था। वह बाहर से त्यागी दिखता था, पर भीतर से धन जमा करने की इच्छा रखता था। वह जो भी सिक्के दान में पाता, उन्हें संभाल-संभालकर रखता जाता।
कुछ समय में उसके पास एक हजार सिक्के जमा हो गए। तब उसने सोचा कि इतने धन को घर में रखना सुरक्षित नहीं है। इसलिए उसने उन सभी सिक्कों को एक छोटे मिट्टी के कलश में भर लिया और एक दिन चुपचाप जंगल की ओर चला गया।
जंगल में उसने एक छोटे पेड़ के नीचे गड्ढा खोदकर वह कलश दबा दिया और मिट्टी बराबर कर दी। अब वह प्रतिदिन जंगल में जाता और उस स्थान को देखकर लौट आता, ताकि यह सुनिश्चित कर सके कि उसका धन सुरक्षित है।
लेकिन एक दिन जब वह रोज़ की तरह जंगल पहुँचा, तो उसने देखा कि उस स्थान की मिट्टी उखड़ी हुई है और उसका कलश वहाँ नहीं है। यह देखकर उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। उसे समझ में आ गया कि किसी ने उसका धन चुरा लिया है।
वह अत्यंत दुखी हो गया। उसने सोचा कि अब उसके जीवन का कोई अर्थ नहीं रहा। इसलिए उसने निश्चय किया कि वह गंगा नदी के तट पर जाकर अनशन व्रत करेगा और प्राण त्याग देगा।
जब यह बात नगर के सेठ और अन्य लोगों को पता चली, तो वे उसे समझाने आए। सेठ ने कहा,
“तपस्वी देवता, धन के खो जाने से प्राण त्यागना उचित नहीं है। धन तो धूप-छाँह की तरह आता-जाता रहता है। इसके लिए इतना शोक करना व्यर्थ है।”
लेकिन तपस्वी अपनी बात पर अड़ा रहा। वह अपना डंड-कमंडल उठाकर गंगा तट की ओर चल पड़ा।
जब यह समाचार राजा प्रसेनजित तक पहुँचा, तो उन्होंने तुरंत अपने कर्मचारियों को भेजकर तपस्वी को वापस बुला लिया। राजा ने उससे पूरी बात सुनी और पूछा,
“तपस्वी देवता, आपने जहाँ धन दबाया था, वहाँ कोई निशानी भी थी?”
तपस्वी ने उत्तर दिया,
“हाँ महाराज, मैंने वह धन जंगल में एक छोटे पेड़ के नीचे दबाया था।”
राजा ने कहा,
“आप धैर्य रखिए। मैं स्वयं आपके धन की खोज करवाऊँगा। आप मृत्यु का विचार छोड़ दीजिए।”
इसके बाद राजा ने एक युक्ति सोची। वह अपने शयनकक्ष में जाकर लेट गया और सिरदर्द का बहाना कर दिया। यह समाचार पूरे नगर में फैल गया। नगर के वैद्य एक-एक करके राजा का उपचार करने आने लगे।
राजा हर वैद्य से एकांत में पूछता,
“आजकल नगर में कौन-कौन सी बीमारियाँ फैल रही हैं? आपने किस रोगी को कौन-सी दवा दी है?”
एक वैद्य ने बताया,
“महाराज, मेरा एक रोगी मातृदत्त नाम का व्यापारी है। उसका दिमाग दो दिन से ठीक नहीं है। मैंने उसे नागवाला नाम की जड़ी-बूटी खाने को कहा है।”
यह सुनकर राजा ने उस व्यापारी को बुलवाया। व्यापारी ने बताया कि उसका नौकर जंगल से नागवाला बूटी लाया है।
राजा ने तुरंत उस नौकर को दरबार में बुलाया और कठोर स्वर में कहा,
“सच-सच बताओ। जंगल में नागवाला बूटी खोजते समय तुम्हें जो सिक्कों से भरा कलश मिला है, उसे तुरंत ले आओ, नहीं तो कठोर दंड मिलेगा।”
नौकर यह सुनकर भय से काँपने लगा। उसने स्वीकार किया,
“महाराज, मुझसे बड़ा अपराध हो गया। बूटी खोजते समय मुझे वह कलश मिला था। लालच में आकर मैंने उसे अपने पास छिपा लिया।”
इतना कहकर वह तुरंत घर गया और थोड़ी ही देर में सिक्कों से भरा कलश लेकर दरबार में उपस्थित हो गया।
उस समय तपस्वी भी वहीं खड़ा था। राजा ने वह कलश उसे लौटा दिया। अपना धन पाकर तपस्वी बहुत प्रसन्न हुआ।
राजा की चतुराई और न्याय देखकर सभी नगरवासी उनकी प्रशंसा करने लगे।

बुद्धिमानी और धैर्य से बड़ी-से-बड़ी समस्या का समाधान किया जा सकता है।

19/03/2026

इन दो कार्य से हमें बचना चाहिए़
मूर्ख को कभी दोस्त न बनाएं और
दोस्त को कभी मूर्ख न बनाएं।

19/03/2026

ऊंचाई पर चढ़कर कभी गुरुर मत करना,
क्योंकि ढलान वही से शुरू होती है..!

19/03/2026

समय पहले एक छोटे से गाँव में एक लुहार रहता था। वह अपने काम में बहुत कुशल था। दिन-भर उसकी भट्टी जलती रहती और उसके घर के सामने घन की आवाज़ गूंजती रहती थी। लोग उसके बनाए हुए औज़ार खरीदने दूर-दूर से आते थे। वह हल का फाल, दरांती, कुल्हाड़ी, कुदाल और कई तरह के लोहे के औज़ार बनाता था।

एक दिन लुहार जंगल की ओर गया। वहाँ उसे एक छोटा सा रीछ का बच्चा दिखाई दिया। उसने चालाकी से उसे पकड़ लिया और घर ले आया। धीरे-धीरे उसने उस रीछ को पालतू बना लिया। कुछ समय बाद उसके मन में एक अजीब विचार आया। उसने सोचा कि क्यों न इस रीछ से भी काम कराया जाए।
लुहार ने रीछ को घन मारना सिखाना शुरू किया। वह भट्टी में लोहे को खूब लाल-गर्म करता, फिर उसे निहाई पर रखता और अपनी बाईं हाथ की तर्जनी उंगली से इशारा करता। जहाँ वह उंगली से संकेत करता, रीछ वहीं घन की जोरदार चोट मारता। कई दिनों की मेहनत के बाद रीछ ने यह काम अच्छी तरह सीख लिया।
अब लुहार का काम और भी आसान हो गया। वह आराम से लोहे को पकड़ता और रीछ घन मारता जाता। इस तरह दोनों मिलकर बहुत जल्दी-जल्दी औज़ार बनाने लगे। लुहार खूब पैसा कमाने लगा और उसकी बड़ी मौज हो गई।

लेकिन लुहार की पत्नी को यह सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। वह बार-बार अपने पति को समझाती,
“सुनो जी, वन के जीव वन में ही अच्छे लगते हैं। उन्हें मनुष्यों के बीच रखना ठीक नहीं। यह रीछ कभी भी खतरनाक हो सकता है। इससे काम लेना ठीक नहीं है।”

पर लुहार अपनी अकड़ में रहता था। उसे अपनी बुद्धि पर बड़ा घमंड था। वह हँसकर कहता,
“अरे, तुम क्या जानो! मैंने इसे पूरी तरह काबू में कर लिया है। यह अब मेरा नौकर है। इससे मुझे बहुत लाभ हो रहा है।”

पत्नी चुप हो जाती, पर उसके मन में डर बना रहता।
एक दिन लुहार अपनी भट्टी पर काम कर रहा था। भट्टी में आग तेज जल रही थी और लोहे का टुकड़ा लाल-लाल तप रहा था। उसने लोहे को निकालकर निहाई पर रखा और उंगली से इशारा किया। रीछ तुरंत घन उठाकर जोर-जोर से चोट मारने लगा।

काम करते-करते अचानक लुहार के कान में खुजली होने लगी। वह थोड़ा परेशान हो गया। उस समय भी रीछ उंगली के संकेत का इंतजार कर रहा था।
लुहार ने बिना सोचे-समझे अपनी तर्जनी उंगली कान में डालकर खुजली मिटाने लगा।

रीछ ने दूर से यह देखा। उसे लगा कि मालिक ने कान की ओर इशारा किया है। उसने समझा कि अब घन की चोट वहीं मारनी है।
बस फिर क्या था! रीछ ने पूरी ताकत से घन उठाया और सीधे लुहार के कान पर दे मारा।

घन की भयानक चोट लगते ही लुहार जोर से चीखा और वहीं गिर पड़ा। कुछ ही क्षणों में उसके प्राण निकल गए।
यह भयानक दृश्य देखकर उसकी पत्नी दौड़कर आई। उसने अपने पति को मृत पड़ा देखा तो जोर-जोर से रोने लगी।

वह विलाप करते हुए कहने लगी,
“हाय! मैं तुम्हें बार-बार समझाती थी कि वन के जीव वन में ही अच्छे लगते हैं। उन्हें घर में रखना ठीक नहीं। पर तुमने मेरी बात नहीं मानी। आज तुम्हारी यही अकड़ तुम्हारी जान ले गई।”

गाँव के लोग भी वहाँ इकट्ठा हो गए। सबको इस घटना से बड़ा दुख हुआ।
इस कहानी से शिक्षा मिलती है कि अहंकार और मूर्खता मनुष्य को विनाश की ओर ले जाते हैं। साथ ही यह भी कि प्रकृति के नियमों के साथ छेड़छाड़ करना हमेशा हानिकारक होता है।

17/03/2026

बहुत पुराने समय की बात है। एक राज्य में एक राजा शासन करता था। वह राजा बड़ा उदार, न्यायप्रिय और प्रजा की भलाई करने वाला था। उसके राज्य में लोग सुखी और संतुष्ट रहते थे। कोई भी अपराधी बिना सजा पाए नहीं बचता था। राजा न्याय करने में बहुत सावधानी रखता था, इसलिए दूर-दूर तक उसकी कीर्ति फैल गई थी।

समय बीतने के साथ राजा के मन में धीरे-धीरे घमंड आ गया। वह सोचने लगा कि उससे अधिक बुद्धिमान और न्यायप्रिय शासक कोई नहीं है। उसे लगने लगा कि उसकी वजह से ही राज्य इतना अच्छा चल रहा है। एक दिन उसके मन में यह इच्छा जागी कि वह अपने दरबारियों के मुँह से अपनी प्रशंसा सुने।
राजा ने दरबार में अपने मंत्रियों और दरबारियों से पूछा, “बताओ, मेरा शासन कैसा चल रहा है? प्रजा मेरे बारे में क्या कहती है और पड़ोसी राजा मेरे विषय में क्या सोचते हैं?”

प्रधानमंत्री ने उत्तर दिया, “महाराज, आपके राज्य में चारों ओर शांति और सुख है। प्रजा आपकी जय-जयकार करती है और आपके न्याय की प्रशंसा दूर-दूर तक होती है।”

यह सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ। फिर उसने दूसरा प्रश्न किया, “मेरे पिताजी और पितामह के समय राज्य कैसा था?”

प्रधानमंत्री ने कहा, “महाराज, अब बहुत कम लोग जीवित हैं जो उस समय की बातें जानते हों। पास के जंगल में एक वृद्ध महात्मा रहते हैं। शायद वे आपको उस समय की स्थिति बता सकें।”

राजा ने तुरंत आदेश दिया कि महात्मा को दरबार में बुलाया जाए। महात्मा आए और राजा के सामने बैठ गए। राजा ने उनसे पूछा, “महात्मन्, आप बताइए कि मेरे पितामह और पिता के समय राज्य कैसा था?”

महात्मा मुसकराए और बोले, “राजन्, मैं आपको एक घटना सुनाता हूँ। इससे आपको सब समझ में आ जाएगा।”

महात्मा ने कहना शुरू किया, “आपके पितामह के समय एक किसान के पास थोड़ी-सी जमीन थी। वह अकेला था, इसलिए उसने अपनी जमीन दूसरे किसान को बिना किसी कागज-पत्र के खेती करने के लिए दे दी थी। जो किसान जमीन जोतता था, वह ईमानदारी से फसल का हिस्सा मालिक को दे देता था।
एक दिन जब वह किसान हल चला रहा था, तब हल की नोक किसी कठोर चीज से टकराई। उसने मिट्टी खोदी तो वहाँ से अशर्फियों से भरा हुआ एक कलश निकला। किसान वह कलश लेकर जमीन के मालिक के पास गया और बोला, ‘भैया, तुम्हारी जमीन से यह कलश निकला है, इसलिए यह तुम्हारा है।’
लेकिन जमीन के मालिक ने कहा, ‘नहीं भाई, जमीन मैंने तुम्हें खेती के लिए दे दी है। उसमें से जो भी निकले, वह तुम्हारा है।’

दोनों में बहुत देर तक बहस होती रही, लेकिन कोई भी उस धन को लेने को तैयार नहीं हुआ। आखिर वे दोनों राजा के पास पहुँचे और बोले, ‘महाराज, यह धन राज्य की भूमि से निकला है, इसलिए यह आपका है।’

राजा ने कहा, ‘जब जमीन तुम्हें दे दी गई है, तो उसमें से जो कुछ निकले, वह किसान का है। राज्य का उस पर कोई अधिकार नहीं।’ राजा ने वह धन लेने से मना कर दिया।

अंत में दोनों किसानों ने निर्णय लिया कि उस कलश को वहीं जमीन में वापस गाड़ दिया जाए। उन्होंने ऐसा ही किया।”
राजा यह सुनकर बोला, “महात्मन्, उस धन का उपयोग अच्छे कार्यों में किया जा सकता था।”

महात्मा मुसकराए और बोले, “राजन्, उस समय लोग अपनी मेहनत से जीते थे। दान लेना भी लोग अच्छा नहीं समझते थे।”
फिर महात्मा ने आगे कहा, “समय बीतने के साथ आपके पितामह का देहांत हो गया और आपके पिता राजा बने। उसी समय उन किसानों के पुत्र बड़े हो गए। अब उनके मन में लोभ आ गया। दोनों उस कलश को अपना बताने लगे। विवाद बढ़ता गया।

उधर आपके पिता ने भी सोचा कि जमीन के भीतर का धन तो राज्य का होना चाहिए। उन्होंने सिपाही भेजकर वह कलश मँगवाया, पर किसान ने देने से इनकार कर दिया। मामला वहीं समाप्त हो गया।

समय बीता और अब आपका शासन आया। अब हर बात के नियम-कानून बन गए। अदालतें, पुलिस और मुकदमे सब शुरू हो गए। उन किसानों के बेटों में फिर विवाद हुआ और मामला अदालत में पहुँच गया। अदालत ने दोनों को सजा दे दी और कलश को राज्य की संपत्ति घोषित कर दिया। आज वह कलश आपके खजाने में है और दोनों किसान जेल में हैं।”
महात्मा ने शांत स्वर में कहा, “राजन्, अब आप ही बताइए कि किसका शासन अच्छा था?”

यह सुनकर राजा का सिर शर्म से झुक गया। उसे समझ में आ गया कि सच्चा अच्छा शासन वह होता है जहाँ लोगों के मन में ईमानदारी और संतोष हो, केवल कठोर कानूनों से ही न्याय नहीं होता।

16/03/2026

बुद्धि, धैर्य और सच्चाई से बड़ी से बड़ी गलतफहमी दूर की जा सकती है।

16/03/2026

बहुत समय पहले की बात है। एक गांव में एक धनी सेठ रहता था। उसका एक ही बेटा था जो व्यापार के काम से परदेस गया हुआ था। घर में सेठ, उसकी पत्नी और उसकी बहू रहते थे। सेठ की बहू बहुत समझदार, चतुर और मर्यादित स्वभाव की थी।
एक दिन सेठ की बहू पानी भरने के लिए गांव के कुएँ पर गई। उसने घड़ा भरकर कुएँ की मुंडेर पर रख दिया और हाथ-मुँह धोने लगी। तभी अचानक चार राहगीर वहां आ पहुंचे। वे लंबी यात्रा से थके हुए थे और बहुत प्यासे थे।
पहला राहगीर आगे बढ़कर बोला,
“बहन, मुझे बहुत प्यास लगी है। क्या तुम मुझे पानी पिला दोगी?”
बहू थोड़ी झिझक गई, क्योंकि उस समय उसने पूरे कपड़े नहीं पहने थे और उसके पास पानी देने के लिए कोई लोटा या गिलास भी नहीं था। इसलिए उसने सोचा कि अभी पानी पिलाना उचित नहीं होगा।
उसने राहगीर से पूछा,
“आप कौन हैं?”
राहगीर बोला,
“मैं एक यात्री हूँ।”
बहू मुस्कुराकर बोली,
“यात्री तो इस संसार में केवल दो ही होते हैं। आप उनमें से कौन हैं? यदि आपने इसका सही उत्तर दे दिया तो मैं आपको पानी पिला दूंगी।”
बेचारा राहगीर इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाया और चुप हो गया।
तभी दूसरा राहगीर आगे आया और बोला,
“बहन, मुझे भी बहुत प्यास लगी है।”
बहू ने उससे पूछा,
“आप कौन हैं?”
दूसरा राहगीर बोला,
“मैं तो एक गरीब आदमी हूँ।”
बहू ने कहा,
“गरीब भी संसार में केवल दो ही होते हैं। आप उनमें से कौन हैं?”
दूसरा राहगीर भी इस प्रश्न का उत्तर न दे सका और चुप हो गया।
अब तीसरा राहगीर बोला,
“बहन, मुझे पानी पिला दो। मैं तो एक अनपढ़ गंवार हूँ।”
बहू ने तुरंत कहा,
“अनपढ़ गंवार भी इस संसार में केवल दो ही होते हैं। आप उनमें से कौन हैं?”
तीसरा राहगीर भी निरुत्तर हो गया।
अंत में चौथा राहगीर आगे आया और बोला,
“बहन, मुझे पानी पिला दो। प्यासे को पानी पिलाना पुण्य का काम होता है। मैं तो एक मूर्ख हूँ।”
बहू बोली,
“मूर्ख भी संसार में केवल दो ही होते हैं। आप उनमें से कौन हैं?”
चौथा राहगीर भी कोई उत्तर न दे पाया।
चारों राहगीर निराश होकर वहां से जाने लगे। तभी बहू बोली,
“मेरा घर यहां से थोड़ा ही दूर है। आप लोग वहां चलिए, मैं आपको पानी पिला दूंगी।”
चारों उसके घर की ओर चल पड़े। बहू पानी का घड़ा उठाकर छोटे रास्ते से पहले ही घर पहुंच गई। उसने जल्दी से अपने कपड़े ठीक किए और फिर उन राहगीरों को गुड़ और पानी पिलाया।
यह सब सेठ एक कोने में बैठकर देख रहा था। उसे गलतफहमी हो गई कि बहू पराए पुरुषों को घर बुला रही है। उसने सोचा कि यह ठीक नहीं है। इसलिए वह सीधे राजा के दरबार में जाकर शिकायत कर आया।
राजा ने तुरंत सिपाहियों को भेजकर बहू को दरबार में बुलवा लिया।
सिपाही जब बहू के घर पहुंचे तो उसने उनसे कहा,
“जाकर राजा से पूछो कि उन्होंने मुझे किस रूप में बुलाया है—बहन, बेटी या बहू?”
सिपाहियों ने राजा को यह बात बताई। राजा ने कहा,
“उसे बहू के रूप में बुलाया जाए।”
पालकी भेजी गई और बहू सम्मान से राजदरबार पहुंची।
राजा ने पूछा,
“तुमने अपने पति की गैरहाजिरी में दूसरे पुरुषों को घर क्यों बुलाया?”
बहू ने शांत स्वर में कहा,
“महाराज, मैंने केवल अपना कर्तव्य निभाया। प्यासे को पानी पिलाना पुण्य का काम है। उस समय कुएँ पर मेरे कपड़े ठीक नहीं थे, इसलिए मैंने उन्हें घर बुलाया।”
राजा उसकी बात सुनकर संतुष्ट हो गया। फिर उसने पूछा,
“वे प्रश्न कौन से थे जो तुमने राहगीरों से पूछे थे?”
बहू ने उत्तर दिया,
“महाराज, संसार में दो ही यात्री हैं—सूर्य और चंद्रमा।
दो ही गरीब हैं—बहू और गाय।
दो अनपढ़ गंवार हैं—भोजन और पानी, जो हर किसी के पीछे चलते रहते हैं।
और दो मूर्ख…”
इतना कहकर बहू चुप हो गई।
राजा ने उत्सुकता से पूछा,
“वे दो मूर्ख कौन हैं?”
बहू बोली,
“पहले मूर्ख मेरे ससुर हैं जिन्होंने बिना सच्चाई जाने मेरी शिकायत कर दी।
और दूसरे मूर्ख आप हैं महाराज, जिन्होंने बिना जांच किए मुझे भरी सभा में बुला लिया।”
यह सुनकर दरबार में सन्नाटा छा गया। परंतु राजा को बहू की बुद्धिमानी समझ में आ गई।
राजा ने उसकी चतुराई और सत्य बोलने के साहस की प्रशंसा की और उसे सम्मान व पुरस्कार देकर विदा किया।
इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि बुद्धि, धैर्य और सच्चाई से बड़ी से बड़ी गलतफहमी दूर की जा सकती है।

26/02/2026

बुद्धिमत्ता से बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान निकाला जा सकता है।

26/02/2026

मुसीबत के समय घबराने या क्रोधित होने के बजाय बुद्धि और धैर्य का प्रयोग करना चाहिए।

17/02/2026

एक समय की बात है। एक विशाल और समृद्ध राज्य का राजा अपने हाथी पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकला। हाथी राजसी शान से सड़कों पर बढ़ रहा था। लोग दोनों ओर खड़े होकर राजा का अभिवादन कर रहे थे। अचानक हाथी एक साधारण-सी चंदन की दुकान के सामने रुक गया। राजा ने उस दुकान को ध्यान से देखा और अपने मंत्री से कहा, “मुझे नहीं पता क्यों, पर मेरा मन कहता है कि इस दुकानदार को फाँसी दे दी जाए।”

मंत्री यह सुनकर स्तब्ध रह गया। उसने सोचा—बिना किसी अपराध के ऐसी कठोर भावना कैसे उत्पन्न हो सकती है? पर राजा आगे बढ़ चुका था। मंत्री ने मन में निश्चय किया कि वह इस रहस्य को अवश्य समझेगा।

अगले दिन वह साधारण वेश में उसी चंदन की दुकान पर पहुँचा। दुकानदार उदास बैठा था। मंत्री ने सामान्य ग्राहक बनकर उससे पूछा, “भाई, व्यापार कैसा चल रहा है?”

दुकानदार ने गहरी साँस ली और बोला, “क्या बताऊँ? लोग आते हैं, चंदन की सुगंध लेते हैं, उसकी प्रशंसा करते हैं, पर खरीदते नहीं। मेरा व्यापार ठप पड़ा है। अब तो बस यही आशा है कि राजा जल्दी मर जाए। उसकी अंतिम यात्रा के लिए बहुत सारा चंदन खरीदा जाएगा। तब शायद मेरे दिन बदलें।”

मंत्री यह सुनकर चौंक गया। उसे समझ में आ गया कि दुकानदार के मन में राजा के प्रति कैसी नकारात्मक भावनाएँ हैं। शायद उन्हीं विचारों की तरंगें राजा तक पहुँची हों और उनके मन में भी अकारण क्रोध उत्पन्न हुआ हो।
मंत्री ने कुछ क्षण सोचा और बिना अपनी पहचान बताए चंदन की अच्छी मात्रा खरीद ली। दुकानदार बहुत प्रसन्न हुआ। उसने सुंदर कागज में चंदन लपेटकर मंत्री को दिया।

मंत्री सीधे महल पहुँचा और दरबार में जाकर राजा से बोला, “महाराज, एक चंदन व्यापारी ने आपके लिए यह भेंट भेजी है।” राजा ने आश्चर्य से बंडल खोला। भीतर उत्तम गुणवत्ता का सुनहरा चंदन था जिसकी सुगंध मन मोह लेने वाली थी।
राजा अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने कहा, “कितना उदार व्यापारी है!” उसने तुरंत उसे सोने के सिक्के भेजने का आदेश दिया। साथ ही उसे अपने कल के विचार पर ग्लानि भी हुई कि उसने व्यर्थ ही उसके प्रति कठोर भावना रखी थी।

जब दुकानदार को सोने के सिक्के मिले, तो वह चकित रह गया। उसकी आँखें भर आईं। वह राजा की उदारता के गुण गाने लगा। उसे स्मरण आया कि वह राजा के प्रति कितने बुरे विचार रखता था। उसे अपनी स्वार्थपूर्ण और नकारात्मक सोच पर गहरा पश्चात्ताप हुआ।

उस दिन से उसने निश्चय किया कि वह कभी किसी के लिए बुरा नहीं सोचेगा। उसका व्यापार भी धीरे-धीरे बढ़ने लगा। लोग उसके व्यवहार और सकारात्मक दृष्टिकोण से प्रभावित होने लगे।

यह कथा हमें सिखाती है कि हमारे विचार केवल हमारे भीतर ही नहीं रहते, वे वातावरण में तरंगों की तरह फैलते हैं। यदि हम किसी के प्रति शुभ भावना रखते हैं, तो वह शुभता किसी न किसी रूप में लौटकर हमारे पास आती है। और यदि हम नकारात्मक सोच पालते हैं, तो उसका दुष्परिणाम भी हमें ही भोगना पड़ता है।

हमारे शब्द, हमारे कर्म, हमारी भावनाएँ—सब हमारे विचारों से जन्म लेते हैं। इसलिए सदैव शुभ सोचें, शुभ बोलें और शुभ करें।

09/02/2026

अपने अज्ञान को स्वीकार कर लेना, ज्ञान की तरफ पहला कदम है

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