17/03/2026
बहुत पुराने समय की बात है। एक राज्य में एक राजा शासन करता था। वह राजा बड़ा उदार, न्यायप्रिय और प्रजा की भलाई करने वाला था। उसके राज्य में लोग सुखी और संतुष्ट रहते थे। कोई भी अपराधी बिना सजा पाए नहीं बचता था। राजा न्याय करने में बहुत सावधानी रखता था, इसलिए दूर-दूर तक उसकी कीर्ति फैल गई थी।
समय बीतने के साथ राजा के मन में धीरे-धीरे घमंड आ गया। वह सोचने लगा कि उससे अधिक बुद्धिमान और न्यायप्रिय शासक कोई नहीं है। उसे लगने लगा कि उसकी वजह से ही राज्य इतना अच्छा चल रहा है। एक दिन उसके मन में यह इच्छा जागी कि वह अपने दरबारियों के मुँह से अपनी प्रशंसा सुने।
राजा ने दरबार में अपने मंत्रियों और दरबारियों से पूछा, “बताओ, मेरा शासन कैसा चल रहा है? प्रजा मेरे बारे में क्या कहती है और पड़ोसी राजा मेरे विषय में क्या सोचते हैं?”
प्रधानमंत्री ने उत्तर दिया, “महाराज, आपके राज्य में चारों ओर शांति और सुख है। प्रजा आपकी जय-जयकार करती है और आपके न्याय की प्रशंसा दूर-दूर तक होती है।”
यह सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ। फिर उसने दूसरा प्रश्न किया, “मेरे पिताजी और पितामह के समय राज्य कैसा था?”
प्रधानमंत्री ने कहा, “महाराज, अब बहुत कम लोग जीवित हैं जो उस समय की बातें जानते हों। पास के जंगल में एक वृद्ध महात्मा रहते हैं। शायद वे आपको उस समय की स्थिति बता सकें।”
राजा ने तुरंत आदेश दिया कि महात्मा को दरबार में बुलाया जाए। महात्मा आए और राजा के सामने बैठ गए। राजा ने उनसे पूछा, “महात्मन्, आप बताइए कि मेरे पितामह और पिता के समय राज्य कैसा था?”
महात्मा मुसकराए और बोले, “राजन्, मैं आपको एक घटना सुनाता हूँ। इससे आपको सब समझ में आ जाएगा।”
महात्मा ने कहना शुरू किया, “आपके पितामह के समय एक किसान के पास थोड़ी-सी जमीन थी। वह अकेला था, इसलिए उसने अपनी जमीन दूसरे किसान को बिना किसी कागज-पत्र के खेती करने के लिए दे दी थी। जो किसान जमीन जोतता था, वह ईमानदारी से फसल का हिस्सा मालिक को दे देता था।
एक दिन जब वह किसान हल चला रहा था, तब हल की नोक किसी कठोर चीज से टकराई। उसने मिट्टी खोदी तो वहाँ से अशर्फियों से भरा हुआ एक कलश निकला। किसान वह कलश लेकर जमीन के मालिक के पास गया और बोला, ‘भैया, तुम्हारी जमीन से यह कलश निकला है, इसलिए यह तुम्हारा है।’
लेकिन जमीन के मालिक ने कहा, ‘नहीं भाई, जमीन मैंने तुम्हें खेती के लिए दे दी है। उसमें से जो भी निकले, वह तुम्हारा है।’
दोनों में बहुत देर तक बहस होती रही, लेकिन कोई भी उस धन को लेने को तैयार नहीं हुआ। आखिर वे दोनों राजा के पास पहुँचे और बोले, ‘महाराज, यह धन राज्य की भूमि से निकला है, इसलिए यह आपका है।’
राजा ने कहा, ‘जब जमीन तुम्हें दे दी गई है, तो उसमें से जो कुछ निकले, वह किसान का है। राज्य का उस पर कोई अधिकार नहीं।’ राजा ने वह धन लेने से मना कर दिया।
अंत में दोनों किसानों ने निर्णय लिया कि उस कलश को वहीं जमीन में वापस गाड़ दिया जाए। उन्होंने ऐसा ही किया।”
राजा यह सुनकर बोला, “महात्मन्, उस धन का उपयोग अच्छे कार्यों में किया जा सकता था।”
महात्मा मुसकराए और बोले, “राजन्, उस समय लोग अपनी मेहनत से जीते थे। दान लेना भी लोग अच्छा नहीं समझते थे।”
फिर महात्मा ने आगे कहा, “समय बीतने के साथ आपके पितामह का देहांत हो गया और आपके पिता राजा बने। उसी समय उन किसानों के पुत्र बड़े हो गए। अब उनके मन में लोभ आ गया। दोनों उस कलश को अपना बताने लगे। विवाद बढ़ता गया।
उधर आपके पिता ने भी सोचा कि जमीन के भीतर का धन तो राज्य का होना चाहिए। उन्होंने सिपाही भेजकर वह कलश मँगवाया, पर किसान ने देने से इनकार कर दिया। मामला वहीं समाप्त हो गया।
समय बीता और अब आपका शासन आया। अब हर बात के नियम-कानून बन गए। अदालतें, पुलिस और मुकदमे सब शुरू हो गए। उन किसानों के बेटों में फिर विवाद हुआ और मामला अदालत में पहुँच गया। अदालत ने दोनों को सजा दे दी और कलश को राज्य की संपत्ति घोषित कर दिया। आज वह कलश आपके खजाने में है और दोनों किसान जेल में हैं।”
महात्मा ने शांत स्वर में कहा, “राजन्, अब आप ही बताइए कि किसका शासन अच्छा था?”
यह सुनकर राजा का सिर शर्म से झुक गया। उसे समझ में आ गया कि सच्चा अच्छा शासन वह होता है जहाँ लोगों के मन में ईमानदारी और संतोष हो, केवल कठोर कानूनों से ही न्याय नहीं होता।