26/07/2022
भजन कोई अलग से करने की चीज नहीं है। आप जो कर रहे हैं उसी में भजन को आरोपित कीजिए। अपनी दिनचर्या में, हर एक क्रिया में बस एक चीज जोड़ लीजिए। जैसे अगर आप भोजन बनाते हो तो भोजन बनाते हुए उसमें एक चीज जोड़ लो कि भोजन बनाते बनाते भीष्म स्तुति का गान हो जाए। भीष्म स्तुति गा दिया बस भजन हो गया।
आप अपने घर से दफ्तर के लिए निकले। मान लो आधा घंटा लगता है पहुंचने में तो उस समय एक विषय को आरोपित करिए। चाहे श्रवण हो, चाहे कीर्तन हो। आप यह देख लो कि आधा घंटा में कितनी माला हो रही है।
अगर महामंत्र भी का विचार करें तो सात से आठ माला हो जानी चाहिए क्योंकि 16 माला अगर बढ़िया से की जाए तो सवा घंटे के आसपास लगता है।अभ्यासी लोगों को पता है। जिनका अभ्यास नहीं है उनको क्या पता। पहले दिन जब तक पहुंचने के लिए समझे निश्चित करें तो बस उसको जोड़ लीजिए कि मुझे दफ्तर पहुंचने से पहले इतनी माला पूरी करनी है।
अपने ऑफिस में जाइए, आप जैसे ही अपनी कुर्सी पर बैठिए तो सबसे पहले आप के ऑफिस में एक ग्रंथ अवश्य होना चाहिए। चाहे जो हो।जैसे ग्रंथ साहिब में शबद निकाला जाता है ऐसे ही ग्रंथ से एक शब्द, चौपाई, श्लोक को देख लीजिए फिर अपना क्रम शुरू कीजिए।
ऐसे अपने दिनचर्या में हर चीज जो आप करते हैं स्नान करो तो भी उसकी एक विधा है सुबह सुबह सबसे पहले उठते ही ठाकुर जी को प्रणाम किया
एक श्लोक जो सबको याद रखना चाहिए-
औषधे चिन्तयेद विष्णुं भोजने च जनार्दनं
शयने पद्मनाभं च विवाहे च प्रजापतिम
युद्धे चक्रधरं देवं प्रवासे च त्रिविक्रमं
नारायणं तनुत्यागे श्रीधरं प्रियसंगमे
दु:स्वप्ने स्मर गोविन्दं संकटे मधुसूदनम
कानने नारसिंहं च पावके जलशायिनम
जलमध्ये वराहं च पर्वते रघुनंदनम
गमने वामनं चैव सर्वकार्येषु माधवं
षोडश-एतानि नामानि प्रात:रुत्थाय य: पठेत
सर्वपाप विनिर्मुक्तो कृष्णलोके महीयते॥
सुबह उठते ही हाथ का दर्शन करना चाहिए। इससे आंख का फोकस है वह फिक्स होता है। फिर भूमि को अवश्य प्रणाम किया जाए,माता-पिता, गुरु को प्रणाम किया जाए फिर शौचाचार् की क्रिया उसके बाद स्नान किया जाए।
स्नान में भी भजन किया जाए तो कितना बढ़िया रहेगा। सबसे पहले स्नान करते वक्त पानी खोपड़ी पर नहीं आना चाहिए, सबसे पहले पानी पैरों में जाना चाहिए। क्योंकि शरीर का सबसे ठंडा रक्त पैर के अंगूठे में होता है। वह दिल से सबसे दूर है उसकी पंपिंग सबसे स्लो होती है तो आपका शरीर पानी के तापमान सिंक करता है। जब आप चरण में पानी डालते हैं यह विज्ञान शास्त्र में लिखा है इसलिए गंगा सबसे पहले नारायण के चरणों से निकली
और जब पैरों पर जल छोड़ो तो नारायण का स्मरण करो
शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्
विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्॥
फिर हाथ पर पानी डालो तो ब्रह्मा जी का स्मरण करो और जब खोपड़ी पर पानी डालो तो भगवान शंकर का स्मरण करो। गंगा इसी पद्धति से धरती पर उतरी हैं। नारायण के चरण, ब्रह्मा जी के कमंडलु और शंकर जी की जटाओं में घूमती हुई. यह तीनों कर लिए तो
मन चंगा तो कठौती में गंगा
वहीं गंगा का प्रादुर्भाव हो सकता है।
जितनी देर नहाओ कुछ नहीं तो शिवाष्टकम् पढ़ो जैसे शिवपिंडी के ऊपर जल गिर रहा हो, ऐसा भाव रखके अष्टक पूरा हो तो बंद कर दो। उतनी देर तक नहाओ तो तुम्हारा नहाना भी अभिषेक हो गया, भजन हो गया।
एक छोटा सा क्रम और कर सकते हो, आप भोजन करो तो हर एक बाइट पर एक बार राम बोलो। ऐसा हमने अभ्यास किया। आपने फुल्का तोड़ा सब्जी लगाई, जोर से बोलने की जरूरत नहीं है मुंह में रखी राम। दूसरी बाइट ली मुंह में रखी, राम।
अगर आप दस रोटी खाने वाले प्राणी हो और एक रोटी के दस कौर बनाता हो तो एक माला हो गई। थोड़ी दिन कोशिश करनी पड़ेगी। एक डेढ़ साल में अभ्यास हो जाएगा।
।।परमाराध्य पूज्य श्रीमन् माध्व गौडेश्वर वैष्णवाचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी महाराज ।।