Baglamukhi Pitambara Sadhna peeth

Baglamukhi Pitambara Sadhna peeth माँ भगवती बगलामुखी पीताम्बरा साधना पीठ Paytm NUMBER 9826843770 for DONESHAN
(1)

धूमावती माता महाविद्या की सातवीं शक्ति हैं । प्रवृति के अनुसार दस  के तीन समूह हैं। पहला:- सौम्य कोटि (त्रिपुर सुंदरी, भ...
15/01/2026

धूमावती माता महाविद्या की सातवीं शक्ति हैं ।

प्रवृति के अनुसार दस के तीन समूह हैं। पहला:- सौम्य कोटि (त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, मातंगी, कमला), दूसरा:- उग्र कोटि (काली, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी), तीसरा:- सौम्य-उग्र कोटि (तारा और त्रिपुर भैरवी)।

धूमावती साधना : कहते हैं कि धूमावती का कोई स्वामी नहीं है। इसलिए यह विधवा माता मानी गई है। इनकी साधना से जीवन में निडरता और निश्चिंतता आती है। इनकी साधना या प्रार्थना से आत्मबल का विकास होता है। इस महाविद्या के फल से देवी धूमावती सूकरी के रूप में प्रत्यक्ष प्रकट होकर साधक के सभी रोग अरिष्ट और शत्रुओं का नाश कर देती है। प्रबल महाप्रतापी तथा सिद्ध पुरूष के रूप में उस साधक की ख्याति हो जाती हैl

उत्पत्ति कथा : कहते हैं कि एक बार माता पार्वती को बहुत तेज भूख लगी। कुछ नहीं मिलने पर उन्होंने शिवजी से भोजन की मांग की। शिवजी कुछ समय के लिए इंतजार करने के लिए कहते हैं। परन्तु मता पार्वती की भूख और तेज हो जाती है। अंत में भूख से व्याकुल माता भगवान शिव को ही निगल जाती है।

भगवान शिव को निगलने के पश्चात माता की देह से धुंआ निकलने लगता है तब माता की भूख शांत होती है। इसके बाद भगवान शिवजी अपनी माया के द्वारा पेट से बाहर आते हैं और माता से कहते हैं कि धूम से व्याप्त देह होने के कारण आपके इस स्वरूप का नाम धूमावती होगा।

Jai mata baglamukhi
29/10/2025

Jai mata baglamukhi

गुरु दीक्षा के बिना मंत्र जाप का प्रभावइस विषय पर अलग-अलग मत पाए जाते हैं। कुछ आध्यात्मिक गुरु और विद्वान मानते हैं कि ब...
01/03/2025

गुरु दीक्षा के बिना मंत्र जाप का प्रभाव

इस विषय पर अलग-अलग मत पाए जाते हैं। कुछ आध्यात्मिक गुरु और विद्वान मानते हैं कि बिना गुरु दीक्षा के मंत्र जाप करने से उतना लाभ नहीं मिलता या कभी-कभी नकारात्मक प्रभाव भी हो सकते हैं। उनका मत है कि जब कोई व्यक्ति गुरु के मार्गदर्शन में किसी मंत्र का जाप करता है, तो उसे सही उच्चारण, ध्यान और विधि की जानकारी मिलती है, जिससे मंत्र सिद्धि प्राप्त होती है।

इस मत के पीछे तर्क:

1. मंत्र की ऊर्जा को संभालने की क्षमता – ऐसा कहा जाता है कि कुछ मंत्रों में अत्यधिक शक्ति होती है, और यदि उन्हें बिना सही विधि के जपा जाए, तो वह ऊर्जा व्यक्ति के लिए असहनीय हो सकती है।

2. मंत्र की सिद्धि में गुरु की भूमिका – शास्त्रों के अनुसार, गुरु दीक्षा लेने से मंत्र जल्दी फलित होता है। गुरु अपने शिष्य को उस मंत्र का सही अर्थ, प्रभाव और विधि सिखाते हैं, जिससे साधक को अधिक लाभ मिलता है।

3. आध्यात्मिक मार्गदर्शन – गुरु एक मार्गदर्शक होते हैं, जो साधक को सही दिशा में आगे बढ़ने में मदद करते हैं। बिना मार्गदर्शन के व्यक्ति गलत विधि से जाप कर सकता है, जिससे मन पर गलत प्रभाव पड़ सकता है।

दूसरा मत: क्या बिना गुरु के भी “ॐ नमः शिवाय” जपा जा सकता है?

कुछ विद्वानों और संतों का मत है कि “ॐ नमः शिवाय” एक सार्वभौमिक मंत्र है, जिसे कोई भी जप सकता है और इसके लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य नहीं है।

1. यह मंत्र भगवान शिव का सहज और सरल मंत्र है, जिसे कोई भी व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से जप सकता है।

2. “ॐ नमः शिवाय” मंत्र नकारात्मकता को दूर करता है और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है।

3. इस मंत्र के जाप से मानसिक शांति, आत्मविश्वास और सकारात्मकता बढ़ती है।

गुरु दीक्षा आवश्यक है या नहीं, यह पूरी तरह से व्यक्ति की आस्था और विश्वास पर निर्भर करता है। यदि आप किसी विशेष साधना या सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं, तो गुरु से मार्गदर्शन लेना लाभकारी हो सकता है। लेकिन यदि आप केवल भक्ति भाव से शिवजी का स्मरण करना चाहते हैं, तो इस मंत्र का जाप बिना किसी बाधा के किया जा सकता है।

*🌹 #देव_उठनी_एकादशी 2024🌹* : 4 शुभ योग में मनाई जाएगी देव उठनी एकादशी, अक्षय पुण्य की होगी प्राप्ति*देव उठनी एकादशी व्रत...
12/11/2024

*🌹 #देव_उठनी_एकादशी 2024🌹*


: 4 शुभ योग में मनाई जाएगी देव उठनी एकादशी, अक्षय पुण्य की होगी प्राप्ति

*देव उठनी एकादशी व्रत के फायदे 2024: दिवाली के बाद छठ पूजा और उसके बाद देव उठनी एकादशी रहती है। इस दिन के बाद से शुभ और मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते हैं। इस बार यह देवउठनी एकादशी 12 नवंबर 2024 मंगलवार को रहेगी। 13 नवंबर को पारण (व्रत तोड़ने का) समय प्रात: 06:42 से 08:51 के बीच रहेगा। इस दिन 4 शुभ योग सर्वार्थ सिद्धि योग, रवि योग, हर्षण योग, शिववास योग भी रहेंगे। उत्तर भाद्रपद नक्षत्र का संयोग बन रहा है। साथ ही बव करण का भी निर्माण हो रहा है।*

*🌹देव उठनी एकादशी के दिन क्या करते हैं?*
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
1. इस दिन से विवाह आदि मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते हैं जब देव जागते हैं तभी कोई मांगलिक कार्य संपन्न प्रारंभ होता है।

2. एकादशी के व्रत से अशुभ संस्कार नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन निर्जल या केवल जलीय पदार्थों पर उपवास रखना चाहिए। यदि उपवास नहीं रख रहे हैं तो इस दिन चावल, प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा, बासी भोजन आदि बिलकुल न खाएं।

3. इस दिन शालीग्राम के साथ तुलसी का आध्यात्मिक विवाह देव उठनी एकादशी को होता है। इस दिन तुलसी की पूजा का महत्व है। तुलसी दल अकाल मृत्यु से बचाता है। शालीग्राम और तुलसी की पूजा से पितृदोष का शमन होता है।

4. इस दिन भगवान विष्णु या अपने इष्ट-देव की उपासना करना चाहिए। इस दिन *•"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः"* मंत्र का जाप करने से लाभ मिलता है।

5. कुंडली में चंद्रमा के कमजोर होने की स्थिति में जल और फल खाकर या निर्जल एकादशी का उपवास जरूर रखना चाहिए। व्यक्ति यदि सभी एकदशियों में उपवास रखता है तो उसका चंद्र सही होकर मानसिक स्थिति भी सुधर जाती है।

6. इस दिन देवउठनी एकादशी की पौराणिक कथा का श्रावण या वाचन करना चाहिए। कथा सुनने या कहने से पुण्य की प्राप्ति होती है।

7. कहते हैं कि देवोत्थान एकादशी का व्रत करने से हजार अश्वमेघ एवं सौ राजसूय यज्ञ का फल मिलता है।

8. पितृदोष से पीड़ित लोगों को इस दिन विधिवत व्रत करना चाहिए। पितरों के लिए यह उपवास करने से अधिक लाभ मिलता है जिससे उनके पितृ नरक के दुखों से छुटकारा पा सकते हैं।

9. देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी का व्रत करने से भाग्य जाग्रत होता है।

10. पुराणों अनुसार जो व्यक्ति एकादशी करता रहता है वह जीवन में कभी भी संकटों से नहीं घिरता और उनके जीवन में धन और समृद्धि बनी रहती है।

Big shout out to my newest top fans! 💎 Big shout out to my newest top fans! 💎 Sunilanand Giri MaharajDrop a comment to w...
12/11/2024

Big shout out to my newest top fans! 💎 Big shout out to my newest top fans! 💎 Sunilanand Giri Maharaj

Drop a comment to welcome them to our community,

🌹 *ॐ हर हर महादेव  ॐ* 🌹                                                #जोशीमठ_उत्तराखण्ड जोशीमठ या ज्योतिर्मठ उत्तराखण्...
12/11/2024

🌹 *ॐ हर हर महादेव ॐ* 🌹 #जोशीमठ_उत्तराखण्ड

जोशीमठ या ज्योतिर्मठ उत्तराखण्ड राज्य में स्थित एक नगर है जहाँ हिन्दुओं की प्रसिद्ध ज्योतिष पीठ स्थित है।। यहां ८वीं सदी में धर्मसुधारक आदि शंकराचार्य को ज्ञान प्राप्त हुआ और बद्रीनाथ मंदिर तथा देश के विभिन्न कोनों में तीन और मठों की स्थापना से पहले यहीं उन्होंने प्रथम मठ की स्थापना की। जाड़े के समय इस शहर में बद्रीनाथ की गद्दी विराजित होती है जहां नरसिंह के सुंदर एवं पुराने मंदिर में इसकी पूजा की जाती है। बद्रीनाथ, औली तथा नीति घाटी के सान्निध्य के कारण जोशीमठ एक महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थल बन गया है।

जोशीमठ में आध्यात्मिकता की जड़ें गहरी हैं तथा यहां की संस्कृति भगवान विष्णु की पौराणिकता के इर्द-गिर्द बनी है। प्राचीन नरसिंह मंदिर में लोगों का सालभर लगातार आना रहता है। यहां बहुत सारे पूजित स्थल हैं।

आदि शंकराचार्य अपने 109 शिष्यों के साथ जोशीमठ आये तथा अपने चार पसंदीदा एवं सर्वाधिक विद्वान शिष्यों को चार मठों की गद्दी पर आसीन कर दिया, जिसे उन्होंने देश के चार कोनों में स्थापित किया था। उनके शिष्य ट्रोटकाचार्य इस प्रकार ज्योतिर्मठ के प्रथम शंकराचार्य हुए। जोशीमठ वासियों में से कई उस समय के अपने पूर्वजों की संतान मानते हैं जब दक्षिण भारत से कई नंबूद्रि ब्राह्मण परिवार यहां आकर बस गए तथा यहां के लोगों के साथ शादी-विवाह रचा लिया। जोशीमठ के लोग परंपरागत तौर से पुजारी और साधु थे जो बहुसंख्यक प्राचीन एवं उपास्य मंदिरों में कार्यरत थे तथा वेदों एवं संस्कृत के विद्वान थे। नरसिंह और वासुदेव मंदिरों के पुजारी परंपरागत डिमरी लोग हैं। यह सदियों पहले कर्नाटक के एक गांव से जोशीमठ पहुंचे। उन्हें जोशीमठ के मंदिरों में पुजारी और बद्रीनाथ के मंदिरों में सहायक पुजारी का अधिकार सदियों पहले गढ़वाल के राजा द्वारा दिया गया। वह गढ़वाल के सरोला समूह के ब्राह्मणों में से है। शहर की बद्रीनाथ से निकटता के कारण यह सुनिश्चित है कि वर्ष में 6 महीने रावल एवं अन्य बद्री मंदिर के कर्मचारी जोशीमठ में ही रहें। आज भी यह परंपरा निरंतर चल रही है।

त्रिशूल शिखर से उतरती ढाल पर, संकरी जगह पर अलकनंदा के बांयें किनारे पर जोशीमठ स्थित है। इसके दोनों ओर एक चक्राकार ऊंचाई की छाया है और विशेष यह है कि उत्तर में एक ऊंचा पर्वत उच्च हिमालय से आती ठंडी हवा को रोकता है। यह तीन तरफ बर्फ से ढंके दक्षिण में त्रिशूल (7,250 मीटर), उत्तर पश्चिम में बद्री शिखर (7,100 मीटर), तथा उत्तर में कामत (7,750 मीटर) शिखर से घिरा है। हर जगह से हाथी की आकृति धारण किये हाथी पर्वत को देखा जा सकता है। फिर भी इसकी सबसे अलौकिक विशेषता है– एक पर्वत, जो एक लेटी हुई महिला की तरह है और इसे स्लीपिंग ब्यूटी के नाम से पुकारा जाता है।

पांडुकेश्वर में पाये गये कत्यूरी राजा ललितशूर के तांब्रपत्र के अनुसार जोशीमठ कत्यूरी राजाओं की राजधानी थी, जिसका उस समय का नाम कार्तिकेयपुर था। लगता है कि एक क्षत्रिय सेनापति कंटुरा वासुदेव ने गढ़वाल की उत्तरी सीमा पर अपना शासन स्थापित किया तथा जोशीमठ में अपनी राजधानी बसायी। वासुदेव कत्यूरी ही कत्यूरी वंश का संस्थापक था। जिसने 7वीं से 11वीं सदी के बीच कुमाऊं एवं गढ़वाल पर शासन किया।

फिर भी हिंदुओं के लिये एक धार्मिक स्थल की प्रधानता के रूप में जोशीमठ, आदि शंकराचार्य की संबद्धता के कारण मान्य हुआ। जोशीमठ शब्द ज्योतिर्मठ शब्द का अपभ्रंश रूप है जिसे कभी-कभी ज्योतिषपीठ भी कहते हैं। इसे वर्तमान 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य ने स्थापित किया था। उन्होंने यहां एक शहतूत के पेड़ के नीचे तप किया और यहीं उन्हें ज्योति या ज्ञान की प्राप्ति हुई। यहीं उन्होंने शंकर भाष्य की रचना की जो सनातन धर्म के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है।

जैसा कि अधिकांश प्राचीन एवं श्रद्धेयस्थलों के लिये होता है, उसी प्रकार जोशीमठ का भूतकाल किंवदन्तियों एवं रहस्यों से प्रभावित है जो इसकी पूर्व प्रधानता को दर्शाता है। माना जाता है कि प्रारंभ में जोशीमठ का क्षेत्र समुद्र में था तथा जब यहां पहाड़ उदित हुए तो वह नरसिंहरूपी भगवान विष्णु की तपोभूमि बनी।

मंदिरों के हर प्राचीन शहर की तरह जोशीमठ भी ज्ञान पीठ है जहां आदि शंकराचार्य ने भारत के उत्तरी कोने के चार मठों में से पहला की स्थापना की। इस शहर को ज्योतिमठ भी कहा जाता है तथा इसकी मान्यता ज्योतिष केंद्र के रूप में भी है। संपूर्ण देश से यहां पुजारियों, साधुओं एवं संतों का आगमन होता रहा तथा पुराने समय में कई आकर यहीं बस गये। बद्रीनाथ मंदिर जाते हुए तीर्थयात्री भी यहां विश्राम करते थे। वास्तव में तब यह मान्यता थी कि बद्रीनाथ की यात्रा तब तक अपूर्ण रहती है जब तक जोशीमठ जाकर नरसिंह मंदिर में पूजा न की जाए।

आदि शंकराचार्य द्वारा बद्रीनाथ मंदिर की स्थापना तथा वहां नम्बूद्रि पुजारियों को बिठाने के समय से ही जोशीमठ बद्रीनाथ के जाड़े का स्थान रहा है और आज भी वह जारी है। जाड़े के 6 महीनों के दौरान जब बद्रीनाथ मंदिर बर्फ से ढंका होता है तब भगवान विष्णु की पूजा जोशीमठ के नरसिंह मंदिर में ही होती है। बद्रीनाथ के रावल मंदिर कर्मचारियों के साथ जाड़े में जोशीमठ में ही तब तक रहते हैं, जब कि मंदिर का कपाट जाड़े के बाद नहीं खुल जाता।

जोशीमठ एक परंपरागत व्यापारिक शहर है और जब तिब्बत के साथ व्यापार चरमोत्कर्ष पर था तब भोटिया लोग अपना सामान यहां आकर बिक्री करते थे एवं आवश्यक अन्य सामग्री खरीदकर तिब्बत वापस जाते थे। वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद यह व्यापारिक कार्य बंद हो गया और कई भोटिया लोगों ने जोशीमठ तथा इसके इर्द-गिर्द के इलाकों में बस जाना पसंद किया।

जोशीमठ में प्रवेश करते ही आपके सामने सड़क के किनारे एक छोटा झरना जोगी झरना आता है। इसे जोगी झरना इसलिये कहा जाता है क्योंकि कई योगी एवं साधु झील के ठंडे जल में यहां स्नान करने के लिये रूकते हैं।

मुख्य सड़क के ऊपर पुराना शहर बसा है जहां ज्योतिर्मठ, कल्पवृक्ष तथा आदि शंकराचार्य के पूजास्थल की गुफा है और इसके नीचे बद्रीनाथ की ओर बाहर निकलने पर जोशीमठ के दो प्रमुख आकर्षण नरसिंह मंदिर तथा वासुदेव मंदिर स्थित हैं।

कहा जाता है कि 8वीं सदीं में सनातन धर्म का पुनरूद्धार करने आदि शंकराचार्य जब उत्तराखंड आये थे तो उन्होंने इसी शहतूत पेड़ के नीचे जोशीमठ में पूजा की थी। यहां उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। कहा जाता है कि उन्होंने राज-राजेश्वरी को अपना ईष्ट देवी माना था और इसी पेड़ के नीचे देवी उनके सम्मुख एक ज्योति या प्रकाश के रूप में प्रकट हुई तथा उन्हें बद्रीनाथ में भगवान विष्णु की मूर्ति को पुनर्स्थापित करने की शक्ति तथा सामर्थ्य प्रदान किया। जोशीमठ, ज्योतिर्मठ का बिगड़ा स्वरूप है, जो इस घटना से संबद्ध है।

अब यह पेड़ 300 वर्ष पुराना है तथा इसके तने 36 मीटर में फैले हैं। यह भी कहा जाता है कि यह पेड़ वर्षभर हरा-भरा रहता है एवं इससे पत्ते कभी नहीं झड़ते। पेड़ के ठीक नीचे आदि शंकराचार्य की गुफा है तथा इसमें आदि गुरू की एक मानवाकार मूर्ति स्थापित है।

शंकराचार्य के कार्यालय एवं आवास में ज्योतिर्मठ के अंदर गुफा स्थित है। यही वह गुफा है जहां आदि शंकराचार्य के चार सबसे विद्वान एवं पसंदीदा शिष्यों में से एक ट्रोटका ने आराधाना की थी। आदि गुरू ने बाद में इन्हें ज्योतिर्मठ का प्रथम शंकराचार्य बना दिया। मठ 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में निर्मित हाल का मंदिर है। मूल मठ पहाड़ी के ऊपर है तथा शंकराचार्य नाम के एक दावेदार के नियंत्रण में है। जोशीमठ से 25 किलोमीटर दूर एक संस्कृत महाविद्यालय तथा भवन के अंदर एक आश्रम, मठ द्वारा चलाया जाता है।

ज्योतेश्वर महादेव मंदिर
~~~~~~~~~~~~
यह मंदिर कल्पवृक्ष के एक ओर स्थित है। कहा जाता है कि ज्ञान प्राप्ति के बाद आदि शंकराचार्य ने यहां के एक प्राचीन स्वयंभू शिवलिंग की पूजा की थी। यहां के गर्भगृह में पीढ़ियों से एक दीया (दीप) प्रज्वलित है।

श्री विष्णु मंदिर
~~~~~~~~
यह मंदिर धौली गंगा एवं अलकनंदा के संगम पर है जो बद्रीनाथ सड़क पर 10 किलोमीटर दूर पर नगरपालिका क्षेत्र के अंतर्गत है। यह अलकनंदा नदी पर अंतिम पंच प्रयागों में है। कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना आदि शंकराचार्य ने तब की थी जब उन्हें एक स्वप्न आया कि भगवान विष्णु की एक अन्य प्रतिमा अलकनंदा नदी में तैर रही थी। इस मंदिर का प्रशासन बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के हाथों में है।

नरसिंह मंदिर
~~~~~~~~
राजतरंगिणी के अनुसार 8वीं सदी में कश्मीर के राजा ललितादित्य मुक्तापीड़ द्वारा अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान प्राचीन नरसिंह मंदिर का निर्माण उग्र नरसिंह की पूजा के लिये हुआ जो विष्णु का नरसिंहावतार है। जिनका परंतु इसकी स्थापना से संबद्ध अन्य मत भी हैं। कुछ कहते हैं कि इसकी स्थापना पांडवों ने की थी, जब वे स्वर्गरोहिणी की अंतिम यात्रा पर थे। दूसरे मत के अनुसार इसकी स्थापना आदि गुरू शंकराचार्य ने की क्योंकि वे नरसिंह को अपना ईष्ट मानते थे। मन्दिर परिसर आदि गुरु शंकराचार्य की गद्दी स्थित है। यहाँ पर आदि गुरु को दिव्य ज्ञान रुपी ज्योति की प्राप्ति हुई थी जिसके फलस्वरुप पीठ का नाम ज्योतिष्पीठ पड़ा। वर्तमान में इस पीठ पर शंकराचार्य स्वामी श्री स्वामी वाशुदेवानंद जी पीठासीन हैं।

वासुदेव एवं नवदुर्गा मंदिर
~~~~~~~~~~~~~~~
नरसिंह मंदिर के सामने एक इतना ही प्राचीन एवं पवित्र मंदिर भगवान विष्णु के एक अवतार वासुदेव या भगवान कृष्ण को समर्पित है। मंदिर के पुजारी रघुनंद प्रसाद डिमरी के अनुसार मंदिर की मौखिक परंपरा 2200 वर्षों की है। पुरातात्विक स्रोत के अनुसार मंदिर का निर्माण 7-8वीं सदी के दौरान कत्यूरी राजाओं द्वारा किया गया। संभवत: मंदिर आज की बजाय अधिक ऊंचा रहा होगा, जिसे अब वर्तमान ऊंचाई में हाल ही में पुनर्निर्मित किया गया है। परिसर के चारों कोनों में स्थित चार मंदिर इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि मंदिर का ढांचा अधिक ऊंचा रहा होगा।

प्रधान मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति उद्धव की मूर्ति कहलाती है, क्योंकि भगवान कृष्ण के मित्र उद्धव ने इसकी पूजा की थी। चतुर्भुज स्वरूप की यह सुंदर मूर्ति कला स्पष्टत: एक महान धरोहर है जो शंख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण किये हुए है, पर उस परंपरागत क्रम में नहीं, जैसा वे होते हैं। गदा एवं चक्र का स्थान एक-दूसरे से बदल गया है। कहा जाता है कि ऐसा इसलिये किया गया है कि राजा को यह सूक्ष्म संदेश मिले कि ये चार तत्व के उद्देश्यों का अनुगमन करें तो, अपनी प्रजा उसे भगवान विष्णु की तरह मानेगी।

इसके थोड़ा पीछे बगल में भगवान कृष्ण के भाई बलराम की प्रतिमा है। समान रूप से गढ़ी मूर्ति के एक कंधे पर हल है तथा आधार पर गंधर्व एवं अप्सराएं हैं। गर्भगृह में बाद की प्रतिमाओं में लक्ष्मी-नारायण तथा राधा-कृष्ण शामिल हैं।

मंदिर की सीमा दीवार के साथ परिक्रमा मार्ग पर छोटे-छोटे मंदिर हैं जो गणेश, सूर्य, काली, भगवान शिव, भैरव, नवदुर्गा एवं गौरी-शंकर को समर्पित हैं। नवदुर्गा मंदिर का खास महत्व है। यह भारत के कुछ मंदिरों में से एक है, जहां देवी दुर्गा के नौ रूपों की प्रतिमाएं हैं। ये हैं, ब्राह्मणी, कमलेदुं, माधेश्वरी, कुमारी, वैष्णवी, वाराही, चैंद्री, चामुंडा तथा रूद्राणी। प्रतिमाएं मूर्तिगढ़न के सुंदर नमूने हैं तथा इस छोटे मंदिर में पीढ़ियों से प्रज्जवलित एक अखंड ज्योति है।

*।। ॐ नमः शिवाय ।।*
*हर हर महादेव*

दीपावली (दीवाली) लक्ष्मी-शारदा पूजन मुहूर्त, तारिखः 31/10/2024 गुरुवार(अमास : 31/10/2024 को 03:52pm से अगले दिन शाम 06:1...
24/10/2024

दीपावली (दीवाली) लक्ष्मी-शारदा पूजन मुहूर्त, तारिखः 31/10/2024 गुरुवार

(अमास : 31/10/2024 को 03:52pm से अगले दिन शाम 06:16pm तक)

उत्तर भारतीय विक्रम संवत 2081 कार्तिक, दक्षिण भारतीय विक्रम संवत 2080 आश्विन मास, शाक. 1946, दक्षिण अयन, हेमन्त ऋतु, कृष्णपक्ष, अमावास, गुरुवार

* स्थिर लग्न मुहूर्त : 31/10/2024 गुरुवार (दीवाली):

AYA | 01:21 AM से 03:30 AM : मध्य-रात्रि B) स्थिर लग्न सिंह

A) स्थिर लग्न वृषभ : शाम 06:55 PM से 08:54 PM

C) अमृत काल : शाम 05:32 PM से 07:20 PM बजे

D) गोधूलि मुहूर्त : शाम 06:04 PM से 06:29 PM बजे (मुरक्षायटिसक्सक

1) जल्दी सुबह : 06:40 AM से 08:05 AM तक शुभ चौघडिया

2) दोपहर : 12:22 PM से 01:47PM बजे तक लाभ चौघडिया

3) दोपहर

:

01:47 PM से 03:13 PM तक अमृत चौघडिया

4) शाम : 04:38 PM से 06:04 PM तक शुभ चौघडिया

5) शाम : 06:04 PM से 07:38 PM तक अमृत चौघडिया

6) मध्य-रात्रि : 12:22 AM से 01:57AM बजे तक लाभ चौघडिया

7) रात्रि : 03:31 AM से 05:06 AM तक शुभ चौघडिया

8) जल्दी सुबह विष नयन : 05:06 AM से 06:40 AM बजे तक अमृत चौघडिया
Ashokanand shastri 098268 43770

पर्व- त्योहारों को लेकर पिछले कुछ वर्षों से आ रहे मतभेद पर काशी के पंचांग और ज्योतिष के विद्वान एक मंच पर आए हैं। बगलामु...
22/10/2024

पर्व- त्योहारों को लेकर पिछले कुछ वर्षों से आ रहे मतभेद पर काशी के पंचांग और ज्योतिष के विद्वान एक मंच पर आए हैं। बगलामुखी पीताम्बरा साधनापीठ सोनी कालोनी
महर्षि भृगु ज्योतिष यज्ञ अनुष्ठान रिसर्च सेंटर शिमला गार्डन गुना
विद्वान पं अशोकानंद शास्त्री जी ने यह घोषणा की कि पूरे देश में दीपावली का पर्व 31 अक्तूबर को मनाया जाएगा। बताया कि भ्रम की स्थिति धर्मशाख के ग्रंथों का पूर्वापर संबंध स्थापित कर अध्ययन न करने से बनी है। तिथि निर्णय के पीछे उन्होंने धर्मशास्त्रों के अनुसार तर्क भी दिये।
देश के किसी भी भाग में एक नवंबर को पूर्ण प्रदोष काल में अमावस्या की प्राप्ति नहीं
धर्मशास्त्रों का पूर्वापर संबंध स्थापित करते हुए अध्ययन नहीं करने से हुआ भ्रम

पं अशोकानंद शास्त्री जी ने बताया कि शाखों में दीपावली निर्णय के लिए मुख्यकाल प्रदोष में अमावस्या का होना जरूरी माना गया है। इस वर्ष प्रदोष (2 घंटे 24 मिनट) और निशीथ (अर्धरात्रि) में अमावस्या 31 अक्तूबर को पड़ रही है इसलिए 31 को ही दीपावली मनाना शाखसम्मत है। देश के किसी भी भाग में एक

नवंबर को पूर्ण प्रदोष काल में

अमावस्या की प्राप्ति नहीं है, अतः एक

नवंबर को किसी भी मत से दीपावली मनाना शाखोचित नहीं है। विद्वानों ने यह भी बताया कि 2024 में पारम्परिक गणित द्वारा निर्मित पंचांगों में कोई भेद नहीं है क्योंकि उन सभी के अनुसार

अमावस्या का आरंभ 31 अक्तूबर को सूर्यास्त के पहले होकर एक नवंबर को सूर्यास्त के पूर्व ही समाप्त भी हो जा रही है। इससे देश के सभी भागों में पारंपरिक सिद्धांतों से निर्मित पंचांगों के अनुसार 31 अक्तूबर को ही दीपावली मनाया जाना निर्विवाद रूप में एक मत से सिद्ध है। दृश्य गणित से साधित पंचांगों के अनुसार देश के कुछ भागों में तो अमावस्या 31 अक्तूबर को सूर्यास्त के पहले आरंभ होकर एक नवंबर को सूर्यास्त के बाद एक घटी से पहले ही समाप्त हो जा रही है जिससे उन क्षेत्रों में भी दीपावली को लेकर कोई भेद शास्रीय विधि से नहीं है। वहां भी दिवाली 31 अक्तूबर को ही है।
पं अशोकानंद शास्त्री जी 9826843770

यह पृथ्वी अघोरी है, अघोर माना इसमे चाहे शुभ हो या अशुभ, चाहे इसमे गंदगी डालो, मल-मूत्र करो, चाहे फूल डालो, सब सह लेती है...
03/08/2024

यह पृथ्वी अघोरी है, अघोर माना इसमे चाहे शुभ हो या अशुभ, चाहे इसमे गंदगी डालो, मल-मूत्र करो, चाहे फूल डालो, सब सह लेती है, सब अपने मे समा लेती है,

जल अघोर है,ब्राह्मण नहाएं, कसाई नहाएं, साधु नहाएं गंगाजल मे अथवा किसी जल मे कोई कुछ भी करे, जल सब स्वीकार कर लेता है,

वायु अघोर है, कैसी भी चीज हो, सबमे वायु का स्पर्श है,तेज अघोर है,अग्नि मे कुछ भी डालो – घी डालो चाहे मिर्च डालो, लक्कड़ डालो चाहे मुर्दा डालो, चाहे कुछ भी डालो, सबके लिए अग्नि का खुला द्वार,ऐसे ही आकाश भी परम अघोर है,

श्मशान भी आकाश मे है, कब्रिस्तान भी आकाश मे है और मंदिर भी आकाश मे है, दुर्जन भी आकाश मे, साधु-संत भी आकाश मे है,चोर भी आकाश मे है, साहूकार भी आकाश मे है,आकाश तत्त्व सबको धारण करता है,

मन भी बड़ा अघोर है, मन मे जहाँ काम आता है वहीं काम से होने वाले दुष्परिणाम का विवेक भी आता है,

कई बार मन मे क्रोध आता है तो कई बार शांति आती है, कई बार कंजूसी आती है तो कई बार उदारता आती है, कई बार मित्र आते है तो कई बार शत्रु भी आ जाते है मन मे ऐसे ही बुद्धि भी अघोर है,

बुद्धि मे भी द्वन्द्व होता रहता है,शुभ निर्णय भी होते है,अशुभ भी होते है,मैं लाचार हूँ, मैं गरीब हूँ, मैं स्त्री हूँ, मैं पुरुष हूँ, मेरा कोई नही है, ऐसा भी आता है,

और मैं चैतन्यस्वरूप हूँ, अपने भाग्य का आप विधाता हूँ ऐसा भी आता है,

आत्मा अघोर है,वह अच्छे बुरे मे एक है,अच्छाई-बुराई संस्कार-विकार से बनती है,वह किसी भी तत्त्व मे नहीं होती,

तब आत्मा-परमात्मा मे कहाँ से होगी..?

अघोर शिव है, आत्मा है, परमात्मा है, ब्रह्म है उस परमेश्वर मे,

उस अघोर आत्मा मे अपनी रूचि प्रीति, अपने ज्ञान को लगाएं तो दुःखी होने का सवाल ही पैदा नही होता,जब दुःख आये, चिंता आये तो विचार करे कि,पृथ्वी,नभ, अग्नि,वायु आदि सब अघोर है, उनका अधिष्ठान आत्मा भी अघोर है फिर मैं इनके आऩे-जाने से विषम कैसे हो सकता हूँ,

कितना आराम हो जाता है,

संसार दुःखालय है लेकिन दुःख छुयेगा नही,ज्ञान की वृत्ति से अघोर बन जाओगे,

मन-बुद्धि अघोर है तो अपना अहंकार अलग से काहे को टकराने को रखता है,अघोर के साथ मिलकर उस अघोर के आधारस्वरूप ईश्वर मे उपाय खोजो, न त्यागी बनो न रागी बनो, न अनुरागी बनो,अपने अधिष्ठान-स्वरूप को जानने का प्रयत्न करो,

*गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरा |||| गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ||आप सभी को गुरु पूर्णिमा ...
21/07/2024

*गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरा ||
|| गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ||

आप सभी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं!🙏
🍁 ।। मन्त्र दीक्षा ।। 🍁*

गुरु मंत्र गुप्त रखना चाहिये।
🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸
मंत्र—दीक्षा का अर्थ है कि जब तुम समर्पण करते हो तो गुरु तुममें प्रवेश कर जाता है, वह तुम्हारे शरीर, मन, आत्मा में प्रविष्ट हो जाता है। गुरु तुम्हारे अंतस में जाकर तुम्हारे अनुकूल ध्वनि की खोज करेगा। वह तुम्हारा मंत्र होगा। और जब तुम उसका उच्चारण करोगे तो तुम एक भिन्न आयाम में एक भिन्न व्यक्ति होओगे।

जब तक समर्पण नहीं होता, मंत्र नहीं दिया जा सकता है। मंत्र देने का अर्थ है कि गुरु ने तुममें प्रवेश किया है, गुरु ने तुम्हारी गहरी लयबद्धता को, तुम्हारे प्राणों के संगीत को अनुभव किया है। और फिर वह तुम्हें प्रतीक रूप में एक मंत्र देता है जो तुम्हारे अंतस के संगीत से मेल खाता हो। और जब तुम उस मंत्र का उच्चार करते हो तो तुम आंतरिक संगीत के जगत में प्रवेश कर जाते हो, तब आंतरिक लयबद्धता उपलब्ध होती है।

मंत्र तो सिर्फ चाबी है। और चाबी तब तक नहीं दी जा सकती जब तक ताले को न जान लिया जाए। मैं तुम्हें तभी चाबी दे सकता हूं जब तुम्हारे ताले को समझ लूं। चाबी तभी सार्थक है जब वह ताले को खोले। किसी भी चाबी से काम नहीं चलेगा। प्रत्येक आदमी विशेष ढंग का ताला है, उसके लिए विशेष ढंग की चाबी जरूरी है।

यही कारण है कि मंत्रों को गुप्त रखा जाता है। अगर तुम अपना मंत्र किसी और को बताते हो तो वह उसका प्रयोग कर सकता है । यही कारण है कि लोगों को अपने— अपने मंत्र गुप्त रखने चाहिए, उन्हें सार्वजनिक बनाना ठीक नहीं है। वह खतरनाक है। तुम दीक्षित हुए हो तो तुम जानते हो, तुम उसका मूल्य जानते हो, तुम उसे बांटते नहीं फिर सकते। यह दूसरों के लिए हानिकर हो सकता है। यह तुम्हारे लिए भी हानिकर हो सकता है। इसके कई कारण हैं।

पहली बात कि तुम वचन तोड़ रहे हो। और जैसे ही वचन टूटता है, गुरु के साथ तुम्हारा संपर्क टूट जाता है। फिर तुम गुरु के संपर्क में नहीं रहोगे। वचन पालन करने से ही सतत संपर्क कायम रहता है। दूसरी बात, दूसरे को बताने से, दूसरे के साथ उसके संबंध में बातचीत करने से मंत्र मन की सतह पर चला आता है और उसकी गहरी जड़ें टूट जाती हैं। तब मंत्र गपशप का हिस्सा बन जाता है। और तीसरा कारण है कि गुप्त रखने से मंत्र गहराता है। जितना गुप्त रखोगे वह उतना ही गहरे जाएगा; उसे गहरे में जाना ही होगा।

मारपा के संबंध में खबर है कि जब उसके गुरु ने उसे गुह्य मंत्र दिया तो उससे वचन ले लिया कि वह उसे बिलकुल गुप्त रखेगा। उसे कहा गया कि तुम इसे किसी को भी नहीं बताओगे। फिर मारपा का गुरु उसके स्वप्न में प्रकट हुआ और उसने पूछा कि तुम्हारा मंत्र क्या है?

और स्‍वप्‍न में भी मारपा ने वचन का पालन किया; उसने बताने से इनकार कर दिया। और कहा जाता है कि इस भय से कि कहीं स्वप्न में गुरु फिर प्रकट हों या किसी को भेजें और वह इतनी नींद में हो कि गुप्त मंत्र को प्रकट कर दे और वचन टूट जाए, मारपा ने बिलकुल सोना ही छोड़ दिया। वह सोता ही नहीं था।

ऐसे सोए बिना मारपा को सात— आठ दिन हो गए थे। फिर जब उसके गुरु ने पूछा कि तुम सोते क्यों नहीं हो? मैं देखता हूं कि तुमने सोना छोड़ दिया है। बात क्या है? मारपा ने गुरु से कहा : आप मेरे साथ चालबाजी कर रहे हैं। आपने स्वप्न में आकर मुझसे मेरा मंत्र पूछा था। मैं आपको भी नहीं बताने वाला हूं। जब वचन दे दिया तो मैं उसका स्‍वप्‍न में भी पालन करूंगा। लेकिन फिर मैं डर गया। नींद में, कौन जाने, किसी दिन मैं भूल जा सकता हूं!

अगर तुम अपने वचन के प्रति इतने सावधान हो कि स्‍वप्‍न में भी उसका स्मरण रहता है तो उसका अर्थ है कि वह गहराई में उतर रहा है। वह अंतस में उतर रहा है; वह अंतरस्थ प्रदेश में प्रवेश कर रहा है। और वह जितनी गहराई को छुएगा, वह उतना ही तुम्हारे लिए चाबी बनता जाएगा। क्योंकि ताला तो अंतर्तम में है।

किसी चीज के साथ भी प्रयोग करो। अगर तुम उसे गुप्त रख सके तो वह गहराई प्राप्त करेगा। और अगर तुम उसे गुप्त न रख सके तो वह बाहर निकल आएगा। तुम क्यों कोई बात दूसरे से कहना चाहते हो? तुम क्यों बातें करते रहते हो?

सच तो यह है कि जिस चीज को तुम कह देते हो, उससे मुक्त हो जाते हो। एक बार तुमने किसी से कह दिया, तुम्हारा उससे छुटकारा हो जाता है। वह चीज बाहर निकल गई। मनोविश्लेषण का पूरा धंधा इसी पर खड़ा है। रोगी बोलता रहता है और मनोविश्लेषक सुनता रहता है। इससे रोगी को राहत मिलती है। वह अपनी समस्याओं के बारे में, अपने दुख के बारे में जितना ही बोलता है, वह उनसे उतनी ही छुट्टी पा लेता है।

और इसके ठीक विपरीत घटित होता है जब तुम किसी चीज को छिपाकर रखते हो, गुप्त रखते हो। इसीलिए तुम्हें कहा जाता है कि मंत्र को किसी से कभी मत कहो। तब वह गहरे से गहरे तल पर उतरता जाता है और किसी दिन ताले को खोल देता है|

 #कुण्डलिनी_साधना_तंत्र                                                        कुण्डलिनी-साधना तंत्र की विशिष्ट साधना है...
18/07/2024

#कुण्डलिनी_साधना_तंत्र


कुण्डलिनी-साधना तंत्र की विशिष्ट साधना है। योग से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। फिर भी यह योग की कुछ विशेष क्रियाओं द्वारा चलित होती है। कुण्डलिनी वास्तव में चौथे शरीर मनोमय शरीर की साधना है। स्थूल शरीर, भाव शरीर और सूक्ष्म शरीर में इस साधना की तैयारी की जाती है। कुण्डलिनी-साधना के मार्ग पर चलने वाले साधक सबसे पहले हठयोग अथवा क्रियायोग के द्वारा स्थूल शरीर को, ध्यानयोग के द्वारा भाव शरीर को साधना के अनुकूल बनाते हैं। इन दोनों शरीरों के बाद है--सूक्ष्म शरीर। इस शरीर को साधना के अनुकूल बनाने के लिए ज्ञानयोग है। ज्ञानयोग के द्वारा जब सूक्ष्म शरीर परिपक्व और पूरी तरह अनुकूल हो जाता है तो वहीं से मनोमय शरीर द्वारा आश्रय लेकर कुण्डलिनी-जागरण की क्रिया आरम्भ होती है। जागरण, उत्थान और चक्रों के भेदन की जो भी साधनाएं हैं--वे सब मनोमय के विषय हैं। सिद्ध साधकों के समाज में ऐसे भी कुछ साधक हैं जिनकी अवधि संसार में समाप्त हो जाती है तो ऐसी स्थिति में वे अपने मनोमय शरीर के साथ वैश्वानर लोक चले जाते हैं और वहीं रहकर आगे की साधना करते हैं। इस अवस्था में उनके पार्थिव शरीर, भाव शरीर और सूक्ष्म शरीर छूट जाते हैं। स्थूल शरीर तो नश्वर शरीर है लेकिन भाव शरीर और सूक्ष्म शरीर के परमाणु अपने-अपने लोक ठहर जाते हैं और वहीं अपने अस्तित्व को बराबर बनाये रखते हैं। जब कभी साधक को संसार में आने की आवश्यकता होती है तो अपने छोड़े हुए शरीरों के परमाणुओं को संघटित करके आ जाते हैं।

 #सुष्षमना_नाड़ीसुषुम्ना नाड़ी के महत्त्व का पहला कारण यह है कि वह अधो लघुमस्तिष्क में स्थित 'सहस्रार' से कुण्डलिनी शक्ति...
12/07/2024

#सुष्षमना_नाड़ी

सुषुम्ना नाड़ी के महत्त्व का पहला कारण यह है कि वह अधो लघुमस्तिष्क में स्थित 'सहस्रार' से कुण्डलिनी शक्तिकेंद्र 'मूलाधार' को जोड़ती है। 2- दूसरा कारण यह है कि कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत और चैतन्य होकर इसी नाड़ी मार्ग से 'सहस्रार' में प्रवेश करती है जहाँ उसका (शक्तितत्व का) संयोग 'शिवतत्व' से होता है जिसे तंत्र की भाषा में 'सामरस्य महामिलन' अथवा 'सामरस्य भाव' कहते हैं। तंत्र का यही 'अद्वैत सिध्दिलाभ' है। 3- तीसरा कारण यह है कि इस नाड़ी द्वारा 'षट्चक्र भेदन' भी होता है जिसकी सहायता से साधक क्रमिक उन्नति करता है साधना के क्षेत्र में। 4- चौथा कारण यह है कि सुषुम्ना के भीतर एक और महत्वपूर्ण नाड़ी है जिसे 'चित्रिणी' नाड़ी कहते हैं। चित्रिणी नाड़ी 'ज्ञानशक्ति-वाहिनी' नाड़ी है। यह कुण्डलिनी से निकलकर लघु मस्तिष्क के केंद्र में उस नाड़ी से जुड़ती है, जो उस केंद्र से निकलकर आज्ञाचक्र में 'गुह्यनी' नाड़ी से मिलती है।
चित्रिणी' नाड़ी ही एक ऐसी नाड़ी है जो 'अचेतन' मन को 'चेतन' मन से जोड़ती है। इसी नाड़ी-मार्ग से अचेतन मन की अविश्वसनीय शक्तियां अचेतन मन की सीमा लांघकर चेतन मन में कभी-कदा प्रकट हो जाती हैं जिसके चमत्कार देखकर लोग हतप्रभ रह जाते हैं। इसी को 'सिद्धि' कहा जाता है। इसके आलावा इसी नाड़ी के द्वारा मानव मस्तिष्क को वह ज्ञानशक्ति प्राप्त होती है जिसका आविर्भाव कुण्डलिनी में होता है और जो मस्तिष्क की रहस्यमयी कोशिकाओं में क्रमशः--मेधा, धी, विवेक, बुद्धि एवं संकल्प आदि शक्तियों को जन्म देती है।
हम लोगों को मालूम होना चाहिए कि हमारी पृथ्वी ब्रह्माण्ड के जिस भाग में है, उसे हमारे धर्मग्रंथों में 'वैश्वानर' जगत कहते हैं। वैश्वानर जगत तीन महत्वपूर्ण भागों में विभक्त है। प्रत्येक भाग में अनेक लोक-लोकान्तर हैं। 5- हमारे चारों तरफ के वायुमण्डल में मानवी विचारों की अदृश्य तरंगों के आलावा उन लोक-लोकान्तरों में निवास करने वाले अज्ञात प्राणियों के विभिन्न प्रकार के विचारों की भी तरंगें बराबर तैरती रहती हैं। वे अदृश्य तरंगें हमारे अधो लघुमस्तिष्क से लगातार सामूहिक रूप से टकराती रहती हैं जिन्हें हमारा चेतन मन हर क्षण, हर पल ग्रहण करता रहता है। वह जिस माध्यम से ग्रहण करता है, वह है--एकमात्र सुषम्ना नाड़ी। यह सुषम्ना के महत्व का पांचवां कारण है। सबसे पहले वे अदृश्य तरंगे ब्रह्मरंध्र मार्ग से होकर अधोलघु मस्तिष्क स्थित ज्ञानतन्तु-समूह में प्रवेश करती हैं और वहां से सुषुम्ना मार्ग द्वारा अचेतन मन में प्रविष्ट होती हैं। इतना ही नहीं, वे तरंगे पुनः विचारों में परिवर्तित होकर चेतन मन के द्वारा प्रकट होना चाहती हैं। लेकिन अचेतन मन इसके लिए बाधक बन जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि अचेतन मन बाधा न डाले तो हम उन विचार तरंगों के लगातार आघात से कभी के समाप्त हो गए होते। अगर समाप्त नहीं भी होते तो पागल अवश्य ही हो जाते। वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि वायुमण्डल में तैर रही विचार तरंगों के अस्तित्व को किसी भी अवस्था में अस्वीकार नहीं किया जा सकता। वैसे उन्हें नष्ट या निष्क्रिय करने के लिए रेडियो और टेलीविजन की तरंगें लगातार प्रयत्नशील रहती हैं। योग के इस सिद्धांत को अब वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं कि अचेतन मन भले ही अवरोधक हो लेकिन कभी कदा उसकी सीमा को तोड़कर अच्छे-बुरे बाह्य विचार चेतन मन में प्रकट हो ही जाते हैं। वे जितने ही प्रखर और भावना पूर्ण होते हैं, उनकी प्रतिक्रिया भी उतनी ही प्रखर और आवेशमयी होती है। कभी-कभी देश-काल व पात्र के अनुसार बाह्य विचार ऐसे रहस्यमय ज्ञान के रूप में प्रकट होते हैं जिन्हें हम 'आन्तर्ज्ञान' कहते हैं।
सुषुम्ना नाड़ी की एक और विशेषता बिना इन्द्रिय की सहायता से जो ज्ञान प्राप्त हो, वह 'आन्तर्ज्ञान' है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि इस भौतिक संसार में हर व्यक्ति 'जीवभाव' में जी रहा है। जीवभाव का मतलब है--व्यक्ति की आत्मा, मन, प्राण और शरीर का जोड़ है। आत्मा से जब मन का सम्बन्ध प्रथम बार सृष्टि क्रम में आने पर जुड़ता है तो उसीके साथ उसमें विचार, भाव, भावना, वासना, कल्पना के तत्व भी मन के माध्यम से आत्मा से जुड़ जाते हैं। जो जन्म-जन्मान्तर तक उसी के साथ संस्कार बनकर यात्रा करते रहते हैं और अगले जन्म के कारक भी बनते हैं। मन आत्मा की चंचल अवस्था है, वह अस्थिर है और है गतिमान भी। मन ही आत्मा को भी अस्थिर और गतिमान किये हुए है। अब आत्मा जो भी कार्य करती है या करना चाहती है, उसके लिए उसे अपने मन पर निर्भर रहना पड़ता है। मन स्वयं सोच-विचार करता है, भाव और भावना का प्रवाह मन की सतह पर चलता रहता है। लेकिन जब वह कोई कर्म करता है तो वह अपनी स्थूल कर्मेन्द्रियों की सहायता लेता है। हाथों-पैरों से, मुख से, नेत्रों से, कानों से वह अपने अनुभव प्राप्त कर कर्म संपन्न करता है। कर्म करता है मन और उसका 'आरोपण' होता है आत्मा में। अर्थात् मन के द्वारा किये गए अच्छे-बुरे कर्म के लिए आत्मा स्वयम् को उत्तरदायी मान लेती है। कहने का मतलब यह है कि मनुष्य के मन को सोचने-समझने और कर्म करने के लिए अपने स्थूल उपकरण (इन्द्रियों) की सहायता लेनी पड़ती है। उसके अनुभव और ज्ञान में इन्द्रियों की भी अपनी व्याख्या जुडी हुई होती है। इसलिए इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त ज्ञान यथार्थ ज्ञान नहीं होता है। क्योंकि इन्द्रियों की पहुँच की एक सीमा होती है, उनके द्वारा प्राप्त ज्ञान भी इसीलिए सीमित होता है। उस ज्ञान को पूर्ण सत्य नहीं कहा जा सकता। लेकिन, जो ज्ञान बिना इन्द्रियों की सहायता से, बिना मन की सहायता से आत्मा को स्वयं होता है, वही ज्ञान 'आन्तर्ज्ञान' होता है। वह ज्ञान त्रिकाल सत्य होता है।
जहां तक प्रकृति का साम्राज्य है, वहां तक मानवी- प्रज्ञा कार्य करती है। प्रकृति और मानवी प्रज्ञा से जो परे है, वही सत्य है और उस सत्य की उपलब्धि आन्तर्ज्ञान से ही सम्भव है। आइंस्टीन का नाम किसने नहीं सुना ? उन्होंने एक बार कहा था कि जब हम जीवन और ब्रह्माण्ड के रहस्यों को जानने का प्रयत्न करते हैं तो मन भय और आशंकाओं से घिर जाता है। पर हमें कभी जिज्ञासाओं को कुंठित नहीं होने देना चाहिए।
मैं मानता हूँ कि सही वैज्ञानिक प्रगति केवल आन्तर्ज्ञान से ही सम्भव है। ज्ञान वैज्ञानिक के लिए आवश्यक है। फिर भी ज्ञान हमारा वहीँ तक साथ देता है या दे सकता है--जहां तक वह जानता है और सिद्ध कर सकता है। पर एक स्थिति ऐसी भी आती है जहाँ मस्तिष्क अचानक बोध के उच्चतर स्तर पर पहुँच जाता है। इस स्थिति को 'सहजोप्लब्धि' या आन्तर्ज्ञान--कुछ भी कहा जा सकता है। संसार के सभी महान् अविष्कार मानव प्रज्ञा के आगे की इस रहस्यमयी अनुभूति द्वारा ही सम्भव हुए हैं।
सत्य की खोज योगी भी करता है और वैज्ञानिक भी। मगर दोनों की खोज के मार्ग और साधन भिन्न-भिन्न हैं। जिस तरह की सत्य की खोज में वैज्ञानिक आजकल लगे हुए हैं, वह यथार्थ नहीं है जो हमें आँखों से दिखलायी देता है। यदि बोध- क्षमता के मार्गों को स्वच्छ और निर्मल रखा जाय तो हमें सब कुछ वैसा ही दिखलायी देगा जैसा कि वह वास्तव में है--अनन्त, असीम, अपार। जब तक ऐसा नहीं होता, सत्याभास्, यथार्थता, नित्य-अनित्य--सब एक जैसे प्रतीत होंगे।
हाँ, यहाँ मैं सुषुम्ना नाड़ी के महत्त्व का एक और कारण बतलाता हूँ। जो सूत्र ब्रह्माण्ड से मानव को जोड़ता है और जिस माध्यम से ब्रह्माण्ड में व्याप्त 'समष्टिरूपा विराट चेतना' या 'परम चेतना' का सम्बन्ध मानव स्थित 'व्यष्टिरूपा परा चेतना' से जुड़ता है--वह सूत्र और वह माध्यम एकमात्र 'सुषुम्ना नाड़ी' ही है। कुण्डलिनी साधना के चार क्रम हैं। 1- प्रथम क्रम में कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होता है। वह चैतन्य होती है। 2- द्वितीय क्रम में कुण्डलिनी शक्ति का उत्थान होता है। 3- तृतीय क्रम में कुण्डलिनी शक्ति द्वारा क्रमशः षट्चक्र भेदन होता है और 4- चतुर्थ क्रम में उसका ब्रह्माण्ड स्थित 'शिवशक्ति' से सामरस्य महामिलन होता है। इन चारों क्रमों में कुण्डलिनी-शक्ति का एकमात्र उपादान--सुषुम्ना नाड़ी ही है।अब तक के विवेचन से यह स्पष्ट है कि अचेतन मन की असीम अलौकिक शक्ति अर्थात् 'परामानसिक चेतना' ही योगतंत्र की एकमात्र कुण्डलिनी शक्ति है। सर्पिणी की कुंडली के आकार के तन्तु में रहने के कारण ही उसे 'कुण्डलिनी शक्ति' की संज्ञा दी गयी है। इसीलिए आगमशास्त्र ( तंत्रशास्त्र )में कहा गया है-- "कुंडले$प्यास्ति इति कुंडली"।

Address

Soni Colony
Guna
473001

Telephone

+919826843770

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Baglamukhi Pitambara Sadhna peeth posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Place Of Worship

Send a message to Baglamukhi Pitambara Sadhna peeth:

Share

Category