Prabhu Sharnam

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जिनकी अध्यात्म में रुचि है, उनके लिए इंटरनेट जगत पर एक मंदिर ही है, प्रभु शरणम्. इसे चलाने वाले न तो कोई साधु-संन्यासी हैं, न कोई आश्रम या संस्था. आपकी तरह एक सामान्य भगवद्भक्त हूं, एक जिज्ञासु हूं जो सनातन ग्रंथों में अंकित अक्षरों में ईश्वर की बात ढूंढने का प्रयास करता है. फिर अपनी समझ के अनुसार उसे प्रस्तुत कर देता है. इसमें मेरा कुछ है ही नहीं. क्या सनातन कार्य का दायित्व सिर्फ साधु-संत ही उठाएंगे? हम आप जैसे सामान्य लोगों का भी तो दायित्व बनता है सनातन ध्वजा को ऊंचा रखने के लिए अपने हाथ बढ़ाने का.

“रामजी का नाम है, रामजी का काम है” इसी मूलमंत्र को पकड़कर बढ़ना है. इस प्रयास के लिए जो भी प्रशंसा हो वह सब ईश्वर के खाते में, जो त्रुटि रही उसका अपराध मेरे माथे रहे. त्रुटियों को दूर करने का प्रयास करूंगा, इसमें आप सबके सहयोग मार्गदर्शन की हमेशा प्रतीक्षा रहेगी.

श्री  #दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ एक, तीन या सात दिनों में भी किया जा सकता है और महात्म्य वही है। कामकाजी या व्यस्त लोगो...
04/10/2026

श्री #दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ एक, तीन या सात दिनों में भी किया जा सकता है और महात्म्य वही है। कामकाजी या व्यस्त लोगों के लिए काम की जानकारी है।

नवरात्रि विशेष उत्सव है। माता के हर भक्त में साल में कम से कम एकबार नवरात्रि में तो का पाठ करने की बड़ी लालसा रहती है। अनेकों लोग करते भी हैं लेकिन करोड़ों लोग सिर्फ इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि 700 श्लोकों के पाठ में समय बहुत लगता है। कामकाजी लोगों, नौकरीपेशा या जो लंबे समय तक बैठने में असमर्थ हैं उनके लिए यह संभव नहीं।

पर क्या कोई और रास्ता नहीं है कि श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जा सके?

बिल्कुल है। एक दिन, तीन दिन और सात दिन में भी आप पाठ पूरा कर सकते हैं और यह विधान देवी पुराण में वर्णित है। बस आपको जानकारी नहीं है।

सारी बातें बहुत सरल तरीके से इस पोस्ट में बताई गई हैं और सारी जानकारी शास्त्र आधारित है। एक मिनट लगेगा बस इस पोस्ट को पढ़ने में लेकिन आपके ऐसे अनेक प्रश्नों का उत्तर मिल जाएगा जो आप खोज रहे थे। कोई हर्ज नहीं है एक मिनिट का समय देने में।

आपको पोस्ट बहुत उपयोगी लगेगी। एक प्रार्थना और। यदि पोस्ट उपयोगी लगी तो कृपया इसे शेयर कर दीजिएगा ताकि और ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच जाए। धर्म संबंधी जानकारी को फैलाना भी धर्म कार्य है। इस कार्य में तो कुछ भी नहीं लग रहा। बस नीचे शेयर बटन दबाना है। इतना तो हम आपसे आशा रख ही सकते हैं धर्मकार्य में योगदान का।

कमेंट में जय जगदंबा, जय मां दुर्गा लिखकर मां का जयकारा जरूर लगाएं। ज़ोर शोर से लगाएं। पोस्ट शेयर कर दें।


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जीवित्पुत्रिका व्रत… इसे इतना कठिन क्यों माना जाता है?मां अपने बच्चों की लंबी, स्वस्थ और सुखी उम्र की कामना के लिए 24 घं...
02/10/2026

जीवित्पुत्रिका व्रत… इसे इतना कठिन क्यों माना जाता है?

मां अपने बच्चों की लंबी, स्वस्थ और सुखी उम्र की कामना के लिए 24 घंटे बिना अन्न-जल के यह व्रत रखती हैं।

बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल और ओडिशा के कुछ हिस्सों की यह अनोखी परंपरा हमारे लोकजीवन का हिस्सा है।

आप यह व्रत करते हों या न करते हों, अपनी परंपराओं को जानना तो बनता है।

⏱️ एक मिनट लगेगा—पढ़िए, जानिए जीवित्पुत्रिका व्रत और ‘चिल्हो-सियारिन’ की पूरी कथा।

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आप सनातनी हैं, तो अपने पूर्वजों और पितरों में आस्था जरूर रखते होंगे। श्राद्ध पक्ष के विधि-विधान भी देखे होंगे और इस विषय...
25/09/2026

आप सनातनी हैं, तो अपने पूर्वजों और पितरों में आस्था जरूर रखते होंगे। श्राद्ध पक्ष के विधि-विधान भी देखे होंगे और इस विषय का उपहास बनते भी देखा-सुना होगा।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि शास्त्र पितरों और श्राद्ध के बारे में वास्तव में क्या कहते हैं?

क्यों खूब पूजा-पाठ, व्रत, अनुष्ठान और धर्मकार्य करने के बाद भी मन को शांति नहीं मिलती? क्यों कई बार काम बनते-बनते बिगड़ जाते हैं? क्या इसका संबंध पितृदोष से हो सकता है?

बस एक मिनट निकालिए। इस पोस्ट को पढ़ने के लिए

पितृदोष क्या है, इसके संकेत क्या हैं और श्राद्ध पक्ष में क्या करना चाहिए, श्राद्ध की तिथि कैसे निर्धारित होती है, अगर पुत्र नहीं है तो क्या पुत्री यदि विवाहित है तो श्राद्ध विधान करे न करे, ऐसे बहुत से प्रश्न होंगे, ऐसी बहुत सी शंकाएं होंगी, उनका समाधान वेद और कर्मकांड विभाग के एक प्रोफ़ेसर के शब्दों में ही समझ लीजिए।

और अनुरोध है कि पोस्ट शेयर कर दीजिए। जानकारियों वाली बातें जिनसे आप थोड़ी सहमति रखते हों उनका प्रसार भी करना चाहिए। दिन भर में न जाने क्या क्या शेयर करते होंगे पर धर्म से जुड़ी बातों के शेयर में संकोच क्यों होता है? इतना सरल है, बस नीचे शेयर बटन दबाना होता है।
#श्राद्ध

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 #अनंत स्वरूप भगवान श्री हरि की जय।
24/09/2026

#अनंत स्वरूप भगवान श्री हरि की जय।


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राधाष्टमी केवल  #राधारानी के प्राकट्य का उत्सव नहीं है। यह उस प्रेम के प्राकट्य का दिन है, जो अपने लिए कुछ नहीं चाहता। इ...
17/09/2026

राधाष्टमी केवल #राधारानी के प्राकट्य का उत्सव नहीं है। यह उस प्रेम के प्राकट्य का दिन है, जो अपने लिए कुछ नहीं चाहता। इसलिए #राधाअष्टमी व्रत पूजन के साथ ही श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की पूर्णता होती है।

कृष्ण को चाहने वाले बहुत हैं, लेकिन राधा रानी का प्रेम इसलिए अद्वितीय है कि उसमें ‘मैं’ बचता ही नहीं। वहाँ प्रेम का अर्थ कृष्ण को पाना नहीं, कृष्ण के सुख में अपना सुख खोज लेना है।

शायद इसीलिए कृष्ण के नाम से पहले राधा का नाम आता है।
कृष्ण तक पहुँचने के लिए ज्ञान चाहिए, तप चाहिए, साधना चाहिए—लेकिन कृष्ण के हृदय तक पहुँचने के लिए बस राधारानी जैसा प्रेम चाहिए।

आज राधारानी के प्राकट्य दिवस पर उनसे कुछ माँगने का साहस भी कैसे करें?
बस इतना हो कि हमारी भक्ति में माँग कम होती जाए और समर्पण बढ़ता जाए… और एक दिन ऐसा आए जब ‘मैं’ न रहे, केवल ‘राधे’ रह जाए।

गोपाल का हाल न पूछो सब कुछ राधे राधे है।
राधा अष्टमी की पूजा करनी है तो सरल विधि नीचे पोस्ट में है।

अगर राधारानी जी की पोस्ट शेयर करने में कोई बाधा न लगती हो और उचित लगे तो इसे शेयर भी कर सकते हैं।

#राधे_राधेchallenge

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14/09/2026

"मम्मी डांटोगी नहीं न!" "मम्मी डांटोगी नहीं न!"
बाल गणेशजी पार्वती मैय्या की मनुहार कर रहे क्योंकि उन्हें कुछ ऑर्डर करने का मन हो रहा है।
शेयर कर दें🙏

 #हरितालिका तीज की शास्त्र अनुसार सबसे सरल विधि, कथा यहां है। step by step सारी जानकारी है। शेयर कर दें ताकि उन तक भी पह...
14/09/2026

#हरितालिका तीज की शास्त्र अनुसार सबसे सरल विधि, कथा यहां है। step by step सारी जानकारी है।
शेयर कर दें ताकि उन तक भी पहुँचे जो इसे खोज रहे हों

https://prabhusharnam.com/haritalika-teej-vidhi-katha-kajari-hariyali-teej/

हरियाली तीज, कजरी तीज और हरतालिका तीज में क्या अंतर है? जानिए तीनों तीज की तिथि, महत्व, हरतालिका या हरितालिका तीज की ....

सायुध और सवाहन प्रतिमाओं की ही पूजा क्यों करते हैं?देवी-देवताओं की प्रतिमाएं सायुध यानी आयुध या अस्त्र शस्त्र से लैस और ...
13/09/2026

सायुध और सवाहन प्रतिमाओं की ही पूजा क्यों करते हैं?

देवी-देवताओं की प्रतिमाएं सायुध यानी आयुध या अस्त्र शस्त्र से लैस और सवाहन यानी किसी न किसी वाहन पर सवार दिखाया जाता है. कोई भी प्रतिमा देख लें ऐसा ही दिखेगा. क्या यह चित्रकार की कल्पना है? या देवताओं को बहुत शक्तिशाली और दंड देने में समर्थवान के तौर पर प्रस्तुत करने का प्रयास है?
ऐसे विचार लोगों के मन में अक्सर आ जाते हैं.

सनातन की यही तो सबसे बड़ी खूबी है जिसके कारण वह सनातन है यानी जिसका आदि-अंत नहीं. सनातन एकमात्र परंपरा है जिसमें प्रश्न और तीखे प्रश्न करने को प्रोत्साहित किया जाता है- दंडित नहीं. यही बात इसे ताजा बनाए रखती है. जैसे ठेले-रेहड़ी पर सब्जियां सजाकर रखने वाला दुकानदार बीच-बीच में उलट-पुलट करता रहता है तो सब्जियां ताजा और सुंदर बनी रहती हैं. इस प्रश्न को संक्षेप में यहां पर उठा रहा हूँ, विस्तृत पोस्ट भी लिखी जाएगी.

देव-प्रतिमाएं केवल पूजा का माध्यम नहीं हैं। देवी-देवताओं के हाथों में दिखाई देने वाले आयुध और साथ चलने वाले वाहन अपने भीतर गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक संदेश समेटे हुए हैं. हमारे मनीषियों ने जीवन के बहुत से सूक्ष्म सत्य प्रतीकों के रूप में व्यक्त किया है जो हमें अपने भीतर झांकने के अवसर देते हैं.

पुराणों के साथ भी ऐसा ही है. वे प्रतीकात्मक कथाएं हैं जिनमें कुछ गूढ़ अर्थ छुपा था लेकिन विडंबना है कि उसे कथावाचकों ने लंबे समय तक बस एक कथा की तरह परोस दिया. वह मत लोगों के मन में इतनी गहराई समा गया है कि अब यदि आप उस मत से कुछ भी अलग कहना चाहें तो लोग घेरने लग जाएंगे. ख़ैर, सनातन अनर्गल प्रलाप को भी रोकने को कहता है. इसलिए आज सायुध और सवाहन पर संक्षिप्त बात करेंगे.

देवी-देवताओं के सायुध होना किसी बाहरी युद्ध की तैयारी नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चल रहे संघर्ष के प्रतीक हैं. जैसे शिव जी का त्रिशूल अहंकार, आसक्ति और अज्ञान जैसे तीन बंधनों को भेदने का संकेत है, तो नारायण का चक्र निरंतर गति और धर्म की रक्षा का. दुर्गा मां की तलवार विवेक का प्रतीक है, जो सत्य और असत्य के बीच अंतर करना सिखाती है.

इसी तरह सवाहन प्रतिमा भी अपने भीतर एक संदेश रखती है। देवता का वाहन केवल उनका साधन नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति का प्रतीक है जिस पर उन्होंने विजय पाई है.

गणेश जी के वाहन मूषक या चूहे से इसे और समझने का प्रयास करते हैं. चूहा चंचलता, अस्थिरता और मानव मन की निरंतर भागती हुई वृत्ति का प्रतीक माना जा सकता है. गणेश जी का उसके ऊपर विराजमान होना बताता है कि बुद्धि और विवेक जब जाग्रत होते हैं, तब मन की चंचलता हमारे नियंत्रण में आ जाती है. यह अहंकार के दमन और भीतर के विघ्नों पर विजय का भी संकेत है. आप गणेश कथाएं पढ़ेंगे तो उनका जिन भी असुरों के साथ संघर्ष हुआ है उनके नाम पर गौर करिए- मोहासुर, मदासुर, लोभासुर, कामासुर आदि.

इस पर प्रभु शरणं की वेबसाइट और ऐप में कथाओं की शृंखला कल से प्रकाशित होगी. आपक ऐसी कथाओं में रूचि है तो चाहें तो जुड़ जाएं. एक पोस्ट का लिंक कमेंट बॉक्स में डाला है ताकि आपको पता चल जाए कि कहां पढ़ी जा सकती हैं वे कथाएं.

खैर, कथाओं के माध्यम से मिलते संकेतों प्रसंग पर वापस लौटते हैं.

देवी-देवता की किसी भी प्रतिमा के आप दर्शन करें या दर्शन के लिए लाइन में खड़े हों तो आलतू-फालतू बातों के बारे में सोचने के स्थान पर उनकी उसकी छवि की मन में कल्पना करें. फिर सोचें कि यही वाहन, यही अस्त्र-शस्त्र आखिर क्यों? इस तरह आपकी एक दृष्टि विकसित होगी.

अध्यात्म से जुड़ने का असली अर्थ यही है कि अपनी दृष्टि विकसित हो. धीरे-धीरे यह आएगी, आपकी सहायता में हमसे जो हो सकेगा हम प्रयास करेंगे. तो चलिए आज आपको एक चिंतन की दृष्टि दी. यहीं से शुरू करिए. कथाओं को पढ़िए फिर मनन करिए जो आनंद आएगा वह अपार होगा. धीरे-धीरे आप ईश्वर को ड़र या किसी कामना से पूजने के बजाय प्रेम और भाव से जुड़ने लगेंगे. पूजना अध्यात्मिक जागरण का पहला चरण या सीढ़ी का पहला पायदान है. आपको इसके आगे बढ़ना है और वह होगा चिंतन से.

मंदिर में मौजूद हर प्रतिमा एक मौन शिक्षक है. वह कहती है— देवत्व केवल बाहर मत खोजो. जिसे पूज रहे हो उसे जानने समझने का भी प्रयास शुरू तो करो. धीरे-धीरे वह देवत्व तुम्हारे भीतर जाग उठेगा. तब ही कहा जाएगा कि ईश्वर हर व्यक्ति के अंदर निवास करता है. जिस दिन से वह शक्ति जिनकी हम पूजा कर रहे हैं, उसका हमारे भीतर जागरण आरंभ हो जाए, उस दिन से हम यह कहलाने के अधिकारी होने लगते हैं कि ईश्वर हमारे अंदर भी बसता है.

देव प्रतिमाएं भारतीय प्रतीक-दर्शन की सबसे सुंदर विशेषता है जो हमारे अंदर ज्ञान का बीज रोप सकती हैं, उस बीज के लिए सही खाद-पानी का प्रबंध तो हमें स्वयं करना होगा. पूजा-पाठ आदि खाद-पानी हैं जिसकी जरूरत है लेकिन हमें उस पौधे को पेड़ बनाना है, फल-फूल लगाना है. खाद-पानी की भूमिका जरूरी तो है लेकिन सीमित है.

एकसाथ बहुत ज्ञान की खुराक अच्छी नहीं होती. धीरे-धीरे इसमें रमेंगे हम और आप दोनों साथ-साथ.

गणेश चतुर्थी की पूजा के लिए आप गणेश प्रतिमाएं खरीदने की तैयारी कर रहे होंगे तो नीचे कमेंट बॉक्स में एक लिंक है. पढ़ लीजिए कुछ जानकारी मिल जाएगी, कुछ भूल होने से बचाव हो जाएगा.

यदि शेयर करके अपने मित्रों तक पहुँचा देंगे तो और भी लोगों तक बात पहुंच जाएगी. आपकी इच्छा है, उचित लगे तो कर दीजिए नहीं तो हरिइच्छा.

ऊँ गं गणपत्यै नमः

बात तो काम की है, अगर समझ में आ जाएजैसे बिना बीज के अंकुर पैदा नहीं होता, उसी प्रकार पुण्यकर्म किए बिना कोई सुखी या समृद...
09/09/2026

बात तो काम की है, अगर समझ में आ जाए

जैसे बिना बीज के अंकुर पैदा नहीं होता, उसी प्रकार पुण्यकर्म किए बिना कोई सुखी या समृद्धशाली नहीं हो सकता। मनुष्य देहत्याग के पश्चात् पुण्यकर्मों के फल से ही सुख पाता है।

देह सबको त्यागना है। सुख या दुख का अनुभव आत्मा करती है।

कैसे?

आइए समझते हैं।

आपने अपने आसपास ऐसे बहुत से लोग देखे होंगे जिनके पास एक जैसी सुविधा और एक जैसी दुविधा है। यानी अच्छी बुरी सारी परिस्थितियां लगभग एक जैसी हैं लेकिन एक फिर भी बहुत मज़े में जीता है। खुद तो प्रसन्न है ही औरों को भी पॉजिटिव रखता है। दूसरा ज़रूरत से ज्यादा दुखी है और उससे मिलने के बाद निराशा ही बढ़ जाती है।

जानते हैं आप किसी ऐसे व्यक्ति को? सोचा है कभी ऐसा क्यों है?

अंतर है दोनों के पिछले कर्मों का। एक की आत्मा तृप्त रही होगी दूसरा अतृप्त और बेचैन। पहले के पास पूर्व के पुण्यकर्मों का बैलेंस बचा है जो उसे उबार लेते हैं, साहस देते हैं और आगे बढ़ना सिखा देते हैं। दूसरे के साथ ऐसा नहीं है। उसके पास पहले के कर्म अच्छे हैं ही नहीं। अपनी अंटी में कुछ लाया ही नहीं तो बात कैसे बने?

अब पिछले जन्म में जाकर सुधार तो कर नहीं सकते लेकिन इस जन्म में तो ऐसा न करें कि आगे का बिगाड़ हो जाए। यदि अतृप्त आत्मा के साथ ही वापस आना है तो फिर कोई बात नहीं। और हां ऐसा न समझना कि आत्मा बदल जाएगी, बस देह बदलेगा। इस जन्म तरस रहा तो आगे भी तरसेगा।

कुल मिलाकर इतनी सी बात है। अगर समझ आ गई तो ठीक, न आई तो भी ठीक।

आई तो चाहें तो अपना विचार नीचे लिखें, न आई तो भी प्रश्न करें। इस पर चर्चा हो तो यह एक अच्छा विषय है। मेरे विचार से फालतू की चीजों पर बहस से तो ये अच्छा ही होगा।

आगे हरि इच्छा। गणपति पूजन की शुभ बेला आ रही है। राधा अष्टमी और हरितालिका तीज भी आने को है। प्रभु शरणम् में हमारा उद्देश्य रहता है कि आपको भगवत भाव में रखें, ईश्वर की आराधना उपासना में मन लगाए रखें।

ऐसा नहीं है कि बहुत कर्मकांड को प्रमोट करना चाहते हैं लेकिन ऐसे बहुत से लोग हैं जिनको भजन पूजन से अलग तरह की ऊर्जा, मानसिक प्रसन्नता और शांति मिलती है। मैं भी उनमें से एक हूँ। इसलिए इन सब विषयों पर Prabhu Sharnam में पोस्ट करते रहते हैं। कोशिश करते हैं कि चीजों को इतने सरल तरीके से रखें कि लोगों को बड़ा आसान कहे और वे इन्हें कर सकें।

ऊपर जितने भी उत्सव बताए उनके बारे में पोस्ट डाल दी है। एक का लिंक नीचे कमेंट बॉक्स में दे रहा हूं। वहां से आपको सारे मिल जाएंगे। जो न मिलते हों कमेंट में लिखिए, उसे भी डाल देंगे।

जय श्री गणेश

भागवत में  #राधा जी का नाम कहीं आया ही नहीं, ऐसा क्यों? लेकिन क्या  #राधारानी जी का नाम सचमुच नहीं है? या पूरा  #श्रीमद्...
04/09/2026

भागवत में #राधा जी का नाम कहीं आया ही नहीं, ऐसा क्यों? लेकिन क्या #राधारानी जी का नाम सचमुच नहीं है? या पूरा #श्रीमद्भागवत राधामय है! इस कौतूहल के निदान का #जन्माष्टमी से सुंदर अवसर क्या होगा?

पढ़ें और पसंद आए तो शेयर कर दें।

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