13/09/2026
सायुध और सवाहन प्रतिमाओं की ही पूजा क्यों करते हैं?
देवी-देवताओं की प्रतिमाएं सायुध यानी आयुध या अस्त्र शस्त्र से लैस और सवाहन यानी किसी न किसी वाहन पर सवार दिखाया जाता है. कोई भी प्रतिमा देख लें ऐसा ही दिखेगा. क्या यह चित्रकार की कल्पना है? या देवताओं को बहुत शक्तिशाली और दंड देने में समर्थवान के तौर पर प्रस्तुत करने का प्रयास है?
ऐसे विचार लोगों के मन में अक्सर आ जाते हैं.
सनातन की यही तो सबसे बड़ी खूबी है जिसके कारण वह सनातन है यानी जिसका आदि-अंत नहीं. सनातन एकमात्र परंपरा है जिसमें प्रश्न और तीखे प्रश्न करने को प्रोत्साहित किया जाता है- दंडित नहीं. यही बात इसे ताजा बनाए रखती है. जैसे ठेले-रेहड़ी पर सब्जियां सजाकर रखने वाला दुकानदार बीच-बीच में उलट-पुलट करता रहता है तो सब्जियां ताजा और सुंदर बनी रहती हैं. इस प्रश्न को संक्षेप में यहां पर उठा रहा हूँ, विस्तृत पोस्ट भी लिखी जाएगी.
देव-प्रतिमाएं केवल पूजा का माध्यम नहीं हैं। देवी-देवताओं के हाथों में दिखाई देने वाले आयुध और साथ चलने वाले वाहन अपने भीतर गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक संदेश समेटे हुए हैं. हमारे मनीषियों ने जीवन के बहुत से सूक्ष्म सत्य प्रतीकों के रूप में व्यक्त किया है जो हमें अपने भीतर झांकने के अवसर देते हैं.
पुराणों के साथ भी ऐसा ही है. वे प्रतीकात्मक कथाएं हैं जिनमें कुछ गूढ़ अर्थ छुपा था लेकिन विडंबना है कि उसे कथावाचकों ने लंबे समय तक बस एक कथा की तरह परोस दिया. वह मत लोगों के मन में इतनी गहराई समा गया है कि अब यदि आप उस मत से कुछ भी अलग कहना चाहें तो लोग घेरने लग जाएंगे. ख़ैर, सनातन अनर्गल प्रलाप को भी रोकने को कहता है. इसलिए आज सायुध और सवाहन पर संक्षिप्त बात करेंगे.
देवी-देवताओं के सायुध होना किसी बाहरी युद्ध की तैयारी नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चल रहे संघर्ष के प्रतीक हैं. जैसे शिव जी का त्रिशूल अहंकार, आसक्ति और अज्ञान जैसे तीन बंधनों को भेदने का संकेत है, तो नारायण का चक्र निरंतर गति और धर्म की रक्षा का. दुर्गा मां की तलवार विवेक का प्रतीक है, जो सत्य और असत्य के बीच अंतर करना सिखाती है.
इसी तरह सवाहन प्रतिमा भी अपने भीतर एक संदेश रखती है। देवता का वाहन केवल उनका साधन नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति का प्रतीक है जिस पर उन्होंने विजय पाई है.
गणेश जी के वाहन मूषक या चूहे से इसे और समझने का प्रयास करते हैं. चूहा चंचलता, अस्थिरता और मानव मन की निरंतर भागती हुई वृत्ति का प्रतीक माना जा सकता है. गणेश जी का उसके ऊपर विराजमान होना बताता है कि बुद्धि और विवेक जब जाग्रत होते हैं, तब मन की चंचलता हमारे नियंत्रण में आ जाती है. यह अहंकार के दमन और भीतर के विघ्नों पर विजय का भी संकेत है. आप गणेश कथाएं पढ़ेंगे तो उनका जिन भी असुरों के साथ संघर्ष हुआ है उनके नाम पर गौर करिए- मोहासुर, मदासुर, लोभासुर, कामासुर आदि.
इस पर प्रभु शरणं की वेबसाइट और ऐप में कथाओं की शृंखला कल से प्रकाशित होगी. आपक ऐसी कथाओं में रूचि है तो चाहें तो जुड़ जाएं. एक पोस्ट का लिंक कमेंट बॉक्स में डाला है ताकि आपको पता चल जाए कि कहां पढ़ी जा सकती हैं वे कथाएं.
खैर, कथाओं के माध्यम से मिलते संकेतों प्रसंग पर वापस लौटते हैं.
देवी-देवता की किसी भी प्रतिमा के आप दर्शन करें या दर्शन के लिए लाइन में खड़े हों तो आलतू-फालतू बातों के बारे में सोचने के स्थान पर उनकी उसकी छवि की मन में कल्पना करें. फिर सोचें कि यही वाहन, यही अस्त्र-शस्त्र आखिर क्यों? इस तरह आपकी एक दृष्टि विकसित होगी.
अध्यात्म से जुड़ने का असली अर्थ यही है कि अपनी दृष्टि विकसित हो. धीरे-धीरे यह आएगी, आपकी सहायता में हमसे जो हो सकेगा हम प्रयास करेंगे. तो चलिए आज आपको एक चिंतन की दृष्टि दी. यहीं से शुरू करिए. कथाओं को पढ़िए फिर मनन करिए जो आनंद आएगा वह अपार होगा. धीरे-धीरे आप ईश्वर को ड़र या किसी कामना से पूजने के बजाय प्रेम और भाव से जुड़ने लगेंगे. पूजना अध्यात्मिक जागरण का पहला चरण या सीढ़ी का पहला पायदान है. आपको इसके आगे बढ़ना है और वह होगा चिंतन से.
मंदिर में मौजूद हर प्रतिमा एक मौन शिक्षक है. वह कहती है— देवत्व केवल बाहर मत खोजो. जिसे पूज रहे हो उसे जानने समझने का भी प्रयास शुरू तो करो. धीरे-धीरे वह देवत्व तुम्हारे भीतर जाग उठेगा. तब ही कहा जाएगा कि ईश्वर हर व्यक्ति के अंदर निवास करता है. जिस दिन से वह शक्ति जिनकी हम पूजा कर रहे हैं, उसका हमारे भीतर जागरण आरंभ हो जाए, उस दिन से हम यह कहलाने के अधिकारी होने लगते हैं कि ईश्वर हमारे अंदर भी बसता है.
देव प्रतिमाएं भारतीय प्रतीक-दर्शन की सबसे सुंदर विशेषता है जो हमारे अंदर ज्ञान का बीज रोप सकती हैं, उस बीज के लिए सही खाद-पानी का प्रबंध तो हमें स्वयं करना होगा. पूजा-पाठ आदि खाद-पानी हैं जिसकी जरूरत है लेकिन हमें उस पौधे को पेड़ बनाना है, फल-फूल लगाना है. खाद-पानी की भूमिका जरूरी तो है लेकिन सीमित है.
एकसाथ बहुत ज्ञान की खुराक अच्छी नहीं होती. धीरे-धीरे इसमें रमेंगे हम और आप दोनों साथ-साथ.
गणेश चतुर्थी की पूजा के लिए आप गणेश प्रतिमाएं खरीदने की तैयारी कर रहे होंगे तो नीचे कमेंट बॉक्स में एक लिंक है. पढ़ लीजिए कुछ जानकारी मिल जाएगी, कुछ भूल होने से बचाव हो जाएगा.
यदि शेयर करके अपने मित्रों तक पहुँचा देंगे तो और भी लोगों तक बात पहुंच जाएगी. आपकी इच्छा है, उचित लगे तो कर दीजिए नहीं तो हरिइच्छा.
ऊँ गं गणपत्यै नमः