06/10/2025
निर्मल, निष्कलंक तुम्ह, जगाहु मोह निद्रा भारी।
त्याग करहु जगत के झूठे सपन समान व्यवहारि॥
अमल अछेद अजोनि अजोया।
सतचित आनन्द स्वरूप सुहोया॥
माया-मोह निद्रा गहि भारी।
तजि उठु मनु हरिहर आधारी॥
निर्मल निरञ्जन स्वरूप तुम्ह, नाही तुम्हारा नाम।
पञ्च भूत घट तुम्ह नहिं, मोह करै अबिधान॥
जासु नाही जन्म मरन की रीति।
सोइ कहु कवन विलाप प्रकीति॥
माया बाँधि करै अभिमाना।
सोइ रोवत जग अज्ञाना॥
निर्विकार निज स्वरूप तुम्ह, कैसे करहु विलाप।
सब गुण पञ्च भूत के, तुम्ह हो निर्मल ताप॥
बनि माया सब जग के भेदा।
सुनि समझि छूटहि मोह गेदा॥
जो गुण देखा तुम्ह माहीं।
सब घट केहि नहिं तुम्ह सहाही॥
पञ्च भूत घट देह है, वृद्धि क्षय के कारण।
आत्मा सदा निर्विकल्प है, ता की नाही समारण॥
जिमि अन्न पानी बड़हि घट होई।
तन बढ़त क्षींत कहत सब कोई॥
नाहिं जन्म मरन सुख दुखाया।
शुद्ध स्वरूप सदा अभिनाया॥
पहिरी देह जिमि बसन है, दिन दिन होइ पुरान।
जीव करै अभिमान झूठा, सोइ भूलयु ग्यान॥
तन बसन सम बन्धा भई, सुख दुःख फल भोगै।
पाप पुण्य अनुभव करत, माया जाल झूलगै॥
अस घटा बसन जिमि छीना, देह नासत एक बार।
आत्मा निर्मल सदा रहै, जन्म मरन परिहार॥
कोइ कहै पिता पुत्र तुम्ह, कोइ कहै सुख माता।
कोइ कहै तुम्ह हो सहचरि, कोइ कहै पराया ताता॥
सभ कहहु घट पञ्च भूत के बन्धन।
नाहिं आत्मा कहु मिलत सम्बन्धन॥
जीव बसन जिमि देह पहिनाया।
झूठी जाती कुल के अभिमाना॥
माया मोह बाँधि भूलाइ।
निर्मल स्वरूप न कहु पहिचानै॥
मोह अंध सुख मानी जगा, विषय विलास अनेक।
ग्यानी देखा समझि सब, दुःख के ही आधार एक॥
जो सुख देखत अब विषय समाजा।
सोइ पुन दुःख करै उपाजा॥
मोह मानहि जगा सुखकारी।
ग्यानी देखा असत भ्रम भारी॥
सत्य सुख रघुनाथ के नामा।
छूटै मोह असत अभिमाना॥
जिमि रथी रथ भिन्न है, चलै पथ पर साथ।
तिमि देह अरु जीव अलग, मोह बढ़ाई अनाथ॥
देह बसन सम जीव पहिनाया।
सोइ नहिं ताका स्वामी कीन्हाया॥
मोह अंध कहत ‘मैं देहा’।
भुलत निज स्वरूप अब खेहा॥
आत्मा निर्मल सदा सुखदाता।
देह न मानि भजहु रघुनाथा॥
A big Thanku to Rohit Garg for this beautiful creation 😊🙏