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विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् ॥अनेकरूप दैत्यांतं नमामि पुरुषोत्तमम् ॥👏
03/03/2023

विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् ॥
अनेकरूप दैत्यांतं नमामि पुरुषोत्तमम् ॥👏

*" केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ?, दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी "**एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव ...
11/06/2022

*" केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ?, दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी "*
*एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला। पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता। मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता। चलते चलते उसको महीनो बीत गए।* *आखिरकार एक दिन वह केदार धाम पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। पंडित जी से प्रार्थना की - कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये । लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद। नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवन शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी।*
*पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। और सभी जन वहा से चले गये। वह वही पर रोता रहा। रोते-रोते रात होने लगी चारो तरफ अँधेरा हो गया। लेकिन उसे विस्वास था अपने शिव पर कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी। उसने किसी की आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है। वह सन्यासी बाबा उस के पास आया और पास में बैठ गया। पूछा - बेटा कहाँ से आये हो ?* *उस ने सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा आना यहाँ पर व्यर्थ हो गया बाबा जी। बाबा जी ने उसे समझाया और खाना भी दिया। और फिर बहुत देर तक बाबा उससे बाते करते रहे। बाबा जी को उस पर दया आ गयी। वह बोले, बेटा मुझे लगता है, सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा। तुम दर्शन जरुर करोगे।*
*बातों-बातों में इस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा, किन्तु वह कहीं नहीं थे । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी आ रहे है अपनी पूरी मंडली के साथ। उस ने पंडित को प्रणाम किया और बोला - कल आप ने तो कहा था मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा ? और इस बीच कोई नहीं आएगा यहाँ, लेकिन आप तो सुबह ही आ गये। पंडित जी ने उसे गौर से देखा, पहचानने की कोशिश की और पुछा - तुम वही हो जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे ? जो मुझे मिले थे। 6 महीने होते ही वापस आ गए ! उस आदमी ने आश्चर्य से कहा - नही, मैं कहीं नहीं गया। कल ही तो आप मिले थे, रात में मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया। पंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था।*
*उन्होंने कहा - लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो ? पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी। इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है। तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी। कि एक सन्यासी आया था - लम्बा था, बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए, मृग-शाला पहने हुआ था। पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले, हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके, सच्चे भक्त तो तुम हो। तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है। उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया। यह सब तुम्हारे पवित्र मन, तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है। आपकी भक्ति को प्रणाम

एक बार गणेशजी ने भगवान शिवजी से कहा, पिताजी ! आप यह चिताभस्म लगाकर, मुण्डमाला धारणकर अच्छे नहीं लगते, मेरी माता गौरी अपू...
22/06/2020

एक बार गणेशजी ने भगवान शिवजी से कहा, पिताजी ! आप यह चिताभस्म लगाकर, मुण्डमाला धारणकर अच्छे नहीं लगते, मेरी माता गौरी अपूर्व सुंदरी और आप उनके साथ इस भयंकर रूप में ! पिताजी आप एक बार कृपा करके अपने सुंदर रूप में माता के सम्मुख आएं, जिससे हम आपका असली स्वरूप देख सकें !
भगवान शिवजी ने गणेशजी की बात मान ली !
कुछ समय बाद जब शिवजी स्नान करके लौटे तो उनके शरीर पर भस्म नहीं थी , बिखरी जटाएं सँवरी हुई, मुण्डमाला उतरी हुई थी ! सभी देवता, यक्ष, गंधर्व, शिवगण उन्हें अपलक देखते रह गये, वो ऐसा रूप था कि मोहिनी अवतार रूप भी फीका पड़ जाये !

भगवान शिव ने अपना यह रूप कभी प्रकट नहीं किया था ! शिवजी का ऐसा अतुलनीय रूप कि करोड़ों कामदेव को भी मलिन कर रहा था ! गणेशजी अपने पिता की इस मनमोहक छवि को देखकर स्तब्ध रह गए और मस्तक झुकाकर बोले -मुझे क्षमा करें पिताजी, परन्तु अब आप अपने पूर्व स्वरूप को धारण कर लीजिए !

भगवान शिव ने पूछा - क्यों पुत्र अभी तो तुमने ही मुझे इस रूप में देखने की इच्छा प्रकट की थी, अब पुनः पूर्व स्वरूप में आने की बात क्यों ?

गणेशजी ने मस्तक झुकाये हुए ही कहा - क्षमा करें पिताश्री मेरी माता से सुंदर कोई और दिखे मैं ऐसा कदापि नहीं चाहता ! और शिवजी मुस्कुराते हुए अपने पुराने स्वरूप में लौट आये !

कई संत/महात्माओं ने अपने अनुभव से कहा है कि कर्पूरगौरं शंकर तो भगवान श्रीराम से भी सुंदर हैं परन्तु वह अपना निज स्वरूप कभी प्रकट नहीं करते क्योंकि इससे उनके प्रियतम आराध्य श्रीरामजी की सुंदरता के यश की प्रशंसा में कमी होगी !!

ऐसे प्रभु आशुतोष शिव को नमन करे हम व उनकी कृपा तले जीव से शिव बनने की यात्रा करते रहे।

!! ॐ नमः शिवाय !! !! जय जय श्री राम !! !! जय जय श्री गणेश !!

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श्री केदारनाथ मंदिर के कपाट खोल दिए गए हैं।वैदिक परंपरा,मंत्रोच्चार एवं जयकारों के साथ खुले कपाट।  ।। जय श्री केदार ।।ॐ ...
30/04/2020

श्री केदारनाथ मंदिर के कपाट खोल दिए गए हैं।
वैदिक परंपरा,मंत्रोच्चार एवं जयकारों के साथ खुले कपाट।

।। जय श्री केदार ।।

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।

"महाकाल" से शिव ज्योतिर्लिंगोंके बीच कैसा सम्बन्ध है......??उज्जैन से शेष ज्योतिर्लिंगों कीदूरी भी है रोचक-सोमनाथ- 777 क...
13/11/2019

"महाकाल" से शिव ज्योतिर्लिंगों
के बीच कैसा सम्बन्ध है......??

उज्जैन से शेष ज्योतिर्लिंगों की
दूरी भी है रोचक-
सोमनाथ- 777 किमी
ओंकारेश्वर- 111 किमी
भीमाशंकर- 666 किमी
काशी विश्वनाथ- 999 किमी
मल्लिकार्जुन-999 किमी
केदारनाथ- 888 किमी
त्रयंबकेश्वर555 किमी
बैजनाथ- 999 किमी
रामेश्वरम- 1999 किमी
घृष्णेश्वर - 555 किमी

सनातन धर्म में कुछ भी बिना कारण
के नही होता था।

उज्जैन पृथ्वी का केंद्र माना जाता है।

जो सनातन धर्म में हजारों सालों से
केंद्र मानते आ रहे है इसलिए उज्जैन
में सूर्य की गणना और ज्योतिष गणना
के लिए मानव निर्मित यंत्र भी बनाये
गये है करीब 2050 वर्ष पहले।

और जब करीब 100 साल पहले
पृथ्वी पर काल्पनिक रेखा (कर्क)
अंग्रेज वैज्ञानिक द्वारा बनायीं गयी
तो उनका मध्य भाग उज्जैन ही
निकला।

आज भी वैज्ञानिक उज्जैन ही आते
है सूर्य और अन्तरिक्ष की जानकारी
के लिये।

हिन्दू धर्म की मान्यताये पुर्णतः
वैज्ञानिक आधार पर निर्मित की
गयी है...

16/10/2019

पंचमुखी और पंचमूर्ति शिव की आराधना श्री विजय कृष्ण पांडेय जी की कलम से :-

भगवान शंकर को देवों का देव
महादेव कहा जाता है।

उस महाधिदेव को नमन जिनके शरीर के ऊपर की ओर गजमुक्ता के समान किंचित श्वेत – पीत वर्ण,पूर्व की ओर सुवर्ण के समान पीतवर्ण, दक्षिण की ओर सजल मेघ के समान सघन नीलवर्ण,पश्चिम की ओर स्फटिक के समान शुभ्र उज्जवल वर्ण तथा उत्तर की ओर जपापुष्प या प्रवाल के समान रक्तवर्ण के पांच मुख हैं. यही शिव का पंचमुखी स्वरुप है.

जिनके शरीर की प्रभा करोड़ों पूर्ण चन्द्रमाओं के समान है और जिनके दस हाथों में क्रमशः त्रिशूल, टंक, तलवार वज्र, अग्नि, नाह्राज, घन्टा, अंकुश, पाश तथा अभयमुद्रा हैं. ऐसे भव्य, उज्ज्वल भगवान शिव ही भक्तों के ह्रदय में विराजते हैं.

पंचमुखी शिव;-

ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात – ये भगवान शिव की पांच मूर्तियाँ हैं. यही उनके पांच मुख कहे जाते हैं. उनकी प्रथम मूर्ति क्रीडा, दूसरी तपस्या, तीसरी लोकसंहार, चौथी अहंकार की अधिष्टात्री है. पांचवी ज्ञान प्रधान होने के कारण सम्पूर्ण संसार को आच्छन्न रखती है.

#शिवजी_ब्रह्माजीसे_कहते_हैं कि
मेरे कर्तव्यों को समझना अत्यंत गहन है, तथापि मैं कृपापूर्वक तुम्हें उसके विषय में बता रहा हूँ।

सृष्टि, पालन, तिरोभाव और अनुग्रह – ये मेरे जगत-सम्बन्धी कार्य हैं, जो नित्य सिद्ध हैं. संसार की रचनाका जो आरम्भ है, उसी को सर्ग या सृष्टी कहते हैं. मुझसे पालित होकर सृष्टि का सुस्थिररूप से रहना ही उसकी स्थिति है।
उसका विनाश ही संहार है।

प्राणों के उत्क्रमण को तिरोभाव कहते हैं इन सबसे छुटकारा मिल जाना मेरा अनुग्रह है।

इस प्रकार मेरे पांच कृत्य हैं।

सृष्टि आदि जो चार कृत्य हैं,वे संसार का विस्तार करनेवाले हैं. पांचवां कृत्य अनुग्रह मोक्ष का हेतु है।

वह सदा मुझ में ही अचल भाव से स्थिर रहता है।

मेरे भक्त जन इन पंचों कृत्यों को पंचभूतों में देखते हैं.

सृष्टि भूतल में, स्थिति जल में,संहार अग्नि में, तिरोभाव वायु में और अनुग्रह आकाश में स्थित है. पृथ्वी से सबकी सृष्टि होती है. जल से सबकी वृद्धि और जीवन-रक्षा होती है. आग सबको भस्म कर देती है. वायु सबको एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जाती है और आकाश सबको अनुगृहीत करता है. विद्वान पुरूष को यह विषय इसी रूप में जानना चाहिये. इन पंचों कृत्यों वहन करने के लिये ही मेरे पांच मुख हैं. चार दिशाओं में चार मुख और इनके बीच में पांचवां मुख है.

तुमने और विष्णु ने मेरी तपस्या करके मुझसे सृष्टि और स्थिति नामक दो कृत्य प्राप्त किये हैं. इस प्रकार मेरी विभूति रूप ने मुझसे संहार और तिरोभावरूपी कृत्य प्राप्त किये हैं. परन्तु मेरा अनुग्रह नामक कृत्य मेरे सिवा दूसरा कोई नहीं प्राप्त कर सकता.

#प्रभुशिव_आगे_कहते_हैं कि रूद्र को मैंने अपनी समानता प्रदान की है. वे रूप, वेश, कृत्य, वाहन, आसन आदि में मेरे ही समान हैं. पूर्वकाल में मैंने अपने स्वरूप भूत मन्त्र का उपदेश किया था, जो ओंकार के नाम से प्रसिद्ध है. वह परम मंगलकारी मन्त्र है. सबसे पहले मेरे मुख से ओंकार प्रकट हुआ, जो मेरे स्वरूप का बोध करानेवाला है. ओंकार वाचक है और मैं वाच्य हूँ. यह मन्त्र मेरा स्वरूप ही है. प्रतिदिन ओंकार का स्मरण करने से मेरा ही स्मरण होता है.

मेरे उत्तरपूर्वी मुख से अकारका, पश्चिम के मुख से उकारका, दक्षिण के मुख से मकार का, पूर्ववर्ती मुख से विन्दु का तथा मध्यवर्ती मुख से नाद प्रकट हुआ है. इस प्रकार पांच अवयवों से युक्त ओंकार का विस्तार हुआ.

इन सभी अवयवों से युक्त होकर वह प्रणव ‘ऊँ ‘नामक एक अक्षर हो गया. यह सम्पूर्ण नाम-रूपात्मक जगत, वेद, स्त्री- पुरूष वर्ग, दोनों कुल इस प्रणव मन्त्र से व्याप्त हैं. यह मन्त्र शिव और शक्ति दोनों का बोधक है. वह अकारादि क्रम से और मकरादि क्रम से क्रमशः प्रकाश में आया. इसी से पंचाक्षर मन्त्र की उत्पत्ति हुई. जो मेरे सकल स्वरूप का बोधक है.

‘ऊँ’ नम: शिवाय’ पंचाक्षर मन्त्र है. उसी से त्रिपदा गायत्री का प्राकट्य हुआ. उस गायत्री से सम्पूर्ण वेद प्रकट हुए. उन वेदों से करोड़ों मन्त्र निकले. इस प्रणव पंचाक्षर से सम्पूर्ण मनोरथों की सिद्दी होती है. इसके द्वारा भोग और मोक्ष दोनों सिद्ध होते हैं.

इस प्रकार गुरूवर महादेव ने ब्रह्मा और विष्णु को धीरे-धीरे उच्चारण करके अपने पांच मुखों से अपने उत्तम मन्त्र का उपदेश किया. मन्त्र में बतायी हुई विधि का पालन करते हुए उन्होंने अपने दोनों शिष्यों को मन्त्र दीक्षा दी और अपने पंचों मुखों का रहस्य बताया.

ब्रह्मा और विष्णु ने भगवान महेश्वर से कृतकृत्य होकर कहा – ‘प्रभो आप प्रणव के वाच्यार्थ हैं. आपको नमस्कार है. सृष्टि, पालन, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह करनेवाले आपको नमस्कार है. पांच मुखवाले आप परमेश्वर को नमस्कार है. पन्च ब्रह्म स्वरूपवाले और पांच कृत्य वाले आपको नमस्कार हैं. आप सबकी आत्मा और ब्रह्म हैं. आप सद्गुरु और शम्भु हैं. आपको नमस्कार है.’ इस प्रकार गुरू महेश्वर की स्तुति करके ब्रह्मा और विष्णु ने भगवान पंचमुख शिव के चरणों में प्रणाम किया.

भगवान शिव के पंचमुखी रूप की आराधना करने से मनुष्य परमलोक को प्राप्त होते हैं और जन्म मरण से मुक्त हो जाते हैं.

नमः सर्वहितार्थाय जगदाधारहेतवे।
साष्टाङ्गोऽयं प्रणामस्ते
प्रयत्नेन मया कृतः।।

पापोऽहं पापकर्माहं
पापात्मा पापसम्भवः।
त्राहि मां पार्वतीनाथ
सर्वपापहरो भव।।

ॐ भूर्भुवः स्वः
श्रीनर्मदेश्वरसाम्बसदाशिवाय
नमः प्रार्थनापूर्वक नमस्कारान्
समर्पयामि।

समस्त चराचर प्राणियों एवं सकल
विश्व का कल्याण करो प्रभु महादेव

हर हर महादेव...

ॐ नमः शिवाय...शिवलिंग पर जलाभिषेक के कुछ नियम...शिवलिंग की पूजा उपासना शिव पूजा में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं शिवल...
26/09/2019

ॐ नमः शिवाय...

शिवलिंग पर जलाभिषेक के कुछ नियम...

शिवलिंग की पूजा उपासना शिव पूजा में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं शिवलिंग कहीं भी हो पर उसकी वेदी का मुख उत्तर दिशा की तरफ ही होना चाहिए- क्योंकि, पूर्व में शिव जी की ऊर्जा प्रबहित होती रहती है।

कुछ लोग जिधर मर्जी , उधर से ही भगवान् शिव का जल अभिषेक कर देते हैं जो कि गलत है

जिस स्थान पर शिवलिंग स्थापित होता है, उससे पूर्व दिशा की ओर मुख करके भूल कर भी नहीं बैठना चाहिए और उत्तर दिशा में भी नहीं बैठना चाहिए. क्योंकि इस उत्तर दिशा में भगवान शिव जी का बाया अंग होता है और शक्ति रूपा देवी उमा/पार्वती जी का स्थान होता है।

पूजा के दौरान शिवलिंग से पश्चिम दिशा में बैठना उचित नहीं है क्योंकि इस दिशा में शिवजी की पीठ होती है जिसकी वजह से पीछे से देव पूजा करने से शुभ फल की प्राप्ति नहीं हो पाती है।

शिवलिंग से दक्षिण दिशा में बैठकर पूजा की जानी चाहिए, इससे सभी इच्छाएं पूरी होती हैं, और ये शास्त्रानुमोदित है...

सादर
डॉ. शैलेश मिश्रा

OM NAMAH SHIVAY...

Some rules of jalabhishek on shivling...

Worship of shivling is the most important in worship shiva puja. The shivling is anywhere but the face of his altar should be on the north side. Because, the energy of shiva ji is in the east.

Some people do the same thing where they want, they offer the water of lord shiva from there, which is wrong.

The place where shivling is installed should not sit on the east side and do not sit in the north direction. Because there is a baya part of lord shiva in this north direction and Shakti Roopa Devi is the place of uma / parvati ji.

It is not appropriate to sit in the west direction from shivling during worship because in this direction there is Shiva's back, due to which God worshiping from behind does not get good fruit.

Worship should be sitting in the south direction from the shivling, it is fulfilled by all desires, and this is as per Hindu Shashtra...

सावन के अंतिम सोमवार पर स्वयंभू महादेव शिव की दुर्लभ 16 पत्तियों वाले बिल्व पत्र से पूजा...
14/08/2019

सावन के अंतिम सोमवार पर स्वयंभू महादेव शिव की दुर्लभ 16 पत्तियों वाले बिल्व पत्र से पूजा...

Address

Ravan Mandir (Shiva Temple) Bisrakh
Greater Noida
201301

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Tuesday 5am - 9pm
Wednesday 5am - 9pm
Thursday 5am - 9pm
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Saturday 5am - 9pm
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