29/05/2026
श्रीराम और शबरी का निश्छल प्रेम
त्रेतायुग की बात है। भगवान श्रीराम और उनके अनुज लक्ष्मण, माता सीता के अपहरण के पश्चात उनकी खोज में दंडकारण्य वन में भटक रहे थे। चलते-चलते वे मतंग ऋषि के आश्रम पहुँचे, जहाँ एक वृद्ध तपस्विनी, माता शबरी, वर्षों से अपने प्रभु राम के दर्शनों की प्रतीक्षा कर रही थीं। उनके गुरु ने उन्हें वचन दिया था कि एक दिन राम स्वयं उनकी कुटिया में आएंगे।
जैसे ही शबरी ने श्रीराम को देखा, उनका वर्षों का इंतज़ार समाप्त हुआ और आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। उन्होंने अत्यंत भावविभोर होकर दोनों भाइयों का स्वागत किया और उन्हें आदरपूर्वक बैठाया। अपने प्रभु की सेवा के लिए शबरी तुरंत वन से जंगली बेर तोड़ लाईं।
परन्तु, उनके मन में एक दुविधा थी— कहीं कोई बेर खट्टा न निकल जाए!
अपने प्रभु को केवल मीठे फल खिलाने की तीव्र लालसा में, शबरी हर बेर को पहले खुद थोड़ा सा चखतीं और जो मीठा होता, वही निकालकर श्रीराम को अर्पित करती जातीं।
यह दृश्य देखकर लक्ष्मण जी असहज हो गए और उन्होंने प्रभु को टोकते हुए कहा, "भैया! यह स्त्री आपको अपने जूठे बेर खिला रही है, और आप इन्हें बिना किसी संकोच के कैसे ग्रहण कर रहे हैं?"
श्रीराम ने अत्यंत कोमलता से मुस्कुराते हुए लक्ष्मण को शांत किया और प्रेम से उन जूठे बेरों को खाते हुए कहा, "लक्ष्मण, इन बेरों में केवल मिठास नहीं है, बल्कि शबरी का निश्छल प्रेम, प्रतीक्षा और सच्ची भक्ति बसी है। मुझे यह किसी भी राजमहल के छप्पन भोग से अधिक स्वादिष्ट और पवित्र लग रहे हैं।"
कहानी का सार: ईश्वर केवल सच्चे प्रेम और भाव के भूखे होते हैं। उन्हें किसी दिखावे, आडंबर या भौतिक वस्तुओं से नहीं, बल्कि केवल हृदय की सच्ची भक्ति से प्रसन्न किया जा सकता है।