25/02/2026
तुम बेहतरीन उम्मत बनाए गए हो —
लेकिन शर्त ये है कि तुम हक़ कहो,
भलाई का हुक्म दो
और बुराई से रोको।”
📖 रिफ़रेंस:
क़ुरआन —
“कुन्तुम ख़ैरा उम्मतिन उख़रिजत लिन-नास
तअमरूना बिल-मआरूफ़
व तन्हौना अनिल-मुन्कर
व तुअमिनूना बिल्लाह”
(सूरह आले-इमरान : 110)
सही मुस्लिम हदीस no 132🤝👇 पूरा पढ़े ताकि आपके इल्म में इजाफा हो।
हज़रत सईद बिन मुसय्यब रहिमहुल्लाह अपने वालिद से रिवायत करते हैं:
जब अबू तालिब की वफ़ात का वक़्त आया, तो मुहम्मद ﷺ उनके पास तशरीफ़ लाए।
उस वक़्त उनके पास अबू जहल और अब्दुल्लाह बिन अबी उमय्या बिन मुग़ीरा मौजूद थे।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“ऐ मेरे चचा! ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ कह दीजिए,
एक कलिमा, जिससे मैं अल्लाह के यहाँ आपके हक़ में गवाही दूँ।”
इस पर अबू जहल और अब्दुल्लाह बिन अबी उमय्या कहने लगे:
“ऐ अबू तालिब! क्या आप अब्दुल मुत्तलिब की मिल्लत से फिर जाना चाहते हैं?”
रसूलुल्लाह ﷺ बार-बार वह कलिमा पेश करते रहे और वे दोनों बार-बार वही बात दोहराते रहे।
आख़िरकार अबू तालिब ने जो आख़िरी बात कही, वह यह थी:
“मैं अब्दुल मुत्तलिब की मिल्लत पर हूँ।”
और उन्होंने “ला इलाहा इल्लल्लाह” कहने से इंकार कर दिया।
इस पर रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“अल्लाह की क़सम! मैं तुम्हारे लिए इस्तिग़फ़ार करता रहूँगा,
जब तक मुझे इससे मना न कर दिया जाए।”
फिर अल्लाह तआला ने यह आयत नाज़िल फ़रमाई:
“नबी और ईमान वालों के लिए जायज़ नहीं कि वे मुश्रिकों के लिए मग़फ़िरत की दुआ करें,
चाहे वे क़रीबी रिश्तेदार ही क्यों न हों,
जबकि उन पर यह ज़ाहिर हो चुका हो कि वे जहन्नम वाले हैं।”
(सूरह तौबा : 113)
और अल्लाह तआला ने अबू तालिब के बारे में यह भी नाज़िल फ़रमाया:
“बेशक आप जिसे चाहें हिदायत नहीं दे सकते,
बल्कि अल्लाह जिसे चाहता है हिदायत देता है,
और वही हिदायत पाने वालों को बेहतर जानता है।”
👉🧑⚖️🧑⚖️हक़ से रोक दिए गए लोग🧑⚖️ — कल भी, आज भी ✦
जब मुहम्मद ﷺ अपने चचा अबू तालिब के आख़िरी वक़्त में उनके पास पहुँचे,
तो उन्होंने सिर्फ़ एक कलिमा पेश किया:
“ला इलाहा इल्लल्लाह”
लेकिन वहाँ मौजूद लोग बोले:
“क्या तुम अब्दुल मुत्तलिब की मिल्लत छोड़ दोगे?”
यानी बाप-दादा की रिवायत को छोड़ दोगे
समाज क्या कहेगा
लोग क्या कहेंगे —
इन सब ने हक़ के रास्ते में दीवार खड़ी कर दी।
❗ यही मंज़र आज दोहराया जा रहा है
आज का मुसलमान जब क़ुरआन और सहीह सुन्नत की तरफ़ बुलाया जाता है,
तो उससे भी कहा जाता है:
हमे अपने इमाम की तकलीद करनी चाहिए!
“हमारे बुज़ुर्ग ऐसा नहीं करते थे”
“फलाँ मौलवी ने मना किया है”
“इससे फिरक़ा टूट जाएगा”
“चुप रहो, सवाल मत करो”
यानी हक़ को नहीं,
मौलवी की तक़लीद को बचाया जा रहा है।
📌 सबक़ क्या है?
अगर रसूलुल्लाह ﷺ अपने चचा को हिदायत नहीं दे सके,
तो यह साफ़ है कि:
हिदायत मौलवी के हाथ में नहीं
नजात फिरक़े में नहीं
जन्नत नामों और लिबास से नहीं
बल्कि:
हक़ को पहचानने और कुबूल करने में है
⚠️ सोचने की बात
कल अबू जहल ने रोका था,
आज ग़लत रहनुमा रोक रहे हैं।
कल कहा गया:
“बाप-दादा की राह मत छोड़ो”
आज कहा जाता है:
“हमारे मौलवी की बात से बाहर मत जाओ”
✦ आख़िरी पैग़ाम ✦
जो दीन क़ुरआन और सुन्नत से टकराए,
वो दीन नहीं — धोखा है।
और जो इंसान को सोचने से रोके,
वो रहनुमा नहीं — रुकावट है।
👉 हक़ को पहचानो,
हक़ को कुबूल करो,
चाहे कोई कितना ही बड़ा नाम क्यों न हो।