27/08/2026
स्वामी निरंजनानन्द जयन्ती
शुक्रवार, 28 अगस्त २०२६
स्वामी निरंजनानन्द
पूर्वाश्रम का नामः नित्यनिरंजन घोष पिताः अम्बिकाचरण घोष
जन्मतिथिः सन १८६२ की श्रावण पूर्णिमा के दिन समाधिः ९ मई १९०४ जन्मस्थानः राजारहाट विष्णुपुर दक्षिण २४ परगना जिला पश्चिम बंगाल
श्रीरामकृष्ण अपने जिन विशिष्ठ अन्तरंगों का 'नित्यसिद्ध' या 'ईश्वरकोटि' कहकर निर्देश किया करते थे स्वामी निरंजनानन्द उनमें से एक थे। वे कहते की निरंजन का जन्म श्रीरामचन्द्र के अंश से हुआ है। इस अति उच्च आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न इस महापुरुष का जन्म चौबीस परगना जिले के राजारहाट-विष्णुपुर नामक ग्राम में १८६२ की श्रावण पूर्णिमा के दिन हुआ था। उनके पिता का नाम अम्बिकाचरण घोष था। वे उनके मामा कालीकृष्ण मित्र के घर कलकत्ता में रहते थे। किशोरावस्था में वे तांत्रिकों के गट से जुड़े हुए थे और उन्हें यशस्वी माध्यम करके जाना जाता था। वे स्पष्टवक्ता और खुले विचारों वाले व्यक्ति थे यह लक्षण रामकृष्णदेव को बहुत पसन्द था। वैवाहिक जीवन के प्रति उनके मन में घृणा थी और इस बारे में वे कुछ उग्रता से पेश आते थे पर अन्यथा वे मृदु स्वभाव के थे। बाद में उन्होंने मुर्शिदाबाग जिले के एक बागान मालिक के यहाँ नौकरी की।
जब निरंजन १८ वर्ष के थे तब उनकी पहली मुलाकात ठाकुर से हुई। जब उन्हें उसके तन्त्रशास्त्र के अभ्यास के बारे में पता चला तब ठाकुर ने उसे डाँटते हुए कहा, 'अगर तुम भूत-प्रेतों के बारे में सोचोगे तो तुम भूत प्रेत ही बनोगे, अगर तुम भगवान के बारे में सोचोगे तो तुम्हारा जीवन दैवी हो जाएगा।' निरंजन ने ठाकुर की सलाह मान ली और श्रीरामकृष्ण के निर्देशों के अनुसार ध्यान साधना शुरू कर दी। दुसरी बार जब निरंजन ठाकुर से मिले तो उन्होंने उसे बताया कि, 'बेटा, वक्त गुजर रहा है, तुम कब भगवान का साक्षात्कार करोगे?' निरंजन बहुत ही प्रभावित हुआ और उसने ठाकुर के पास आना जारी रखा। एक बार जब निरंजन बोट से दक्षिणेश्वर जा रहा था, नाव में सवार कुछ लोग ठाकुर के बारे में बुरी बातें करने लगे। इस पर निरंजन आगबबूला हो गया और उसने पूरी बोट को डुबाने की धमकी दी। जब ठाकुर ने इस बारे में सुना तो उन्होंने उसके गुस्से के बारे में कहा, 'गुस्सा पाप है, तुम उसके शिकार कैसे हुए? मूर्ख लोग अज्ञानवश कई बातें बोल देते हैं। हमे उन बातों की तरफ ध्यान न देकर उन्हें अनदेखी करना चाहिए। निरंजन का ऑफिस में नौकरी करना भी ठाकुर को मंजूर नहीं था। लेकिन जब उन्होंने सुना कि निरंजन अपनी बूढ़ी माता के पालन पोषण के लिए नौकरी कर रहा है तब उन्होंने उसे मंजूर किया।
जब ठाकुर बीमार थे और उन्हें भक्तों ने श्यामपुकुर में रखा, तब उस घर के द्वारपाल का काम करने के लिए निरंजन ने अपनी नौकरी छोड़ दी। यहाँ अभिनेत्री बिनोदिनी ने युरोपियन पुरुष के वेष में ठाकुर से मिलकर उसे बुद्द बनाया। बाद में जब ठाकुर को काशीपुर उद्यान में रखा गया तब भी निरंजन ने अपना द्वारपाल का काम पूर्ण भक्ति के साथ जारी रखा और जब ठाकुर गंभीर रूप से बीमार थे तब कम से कम दो भक्तों को अन्दर आने से रोका, जिन में से रामचन्द्र दत्त और गिरीशचन्द्र घोष के बन्धु अतुल घोष थे। ठाकुर के महासमाधि के बाद उनके भक्तों में अस्थियों को लेकर विवाद हुआ तो नरेन्द्र के सहायता से निरंजन ने हल किया। निरंजन और शशि महाराज ने एक अलग कलश में ठाकुर की बहुतांश अस्थियाँ रखकर बलराम बोस के घर में रखवा दी, यह कलश बाद में बेलुड़ मठ लाया गया।
अन्य गुरुबन्धुओं के साथ निरंजन ने भी सन १८८७ में संन्यास ग्रहण किया और सदा के लिए रामकृष्ण मिशन के संन्यासीयों के प्रथम निवास स्थान, बराहनगर मठ में रहने आये। उन्हें स्वामी निरंजनानन्द ऐसा संन्यास नाम स्वामी विवेकानन्द ने दिया। शारीरिक बल अधिक होने के कारण उन्होंने मठ में मेहनत के काम किये। वे एक विशिष्ट दैवी गुणवत्ता प्राप्त आत्मा थे। मठ में तीन वर्ष तक रहने के बाद, वे भारत में कई जगहों पर तीर्थयात्रा के लिए निकल गये, वे श्रीलंका भी गये। सन् १८८७ के शुरू में वे पुरी को भी गये और कुछ महिनों बाद वापस लौटे। पुराने मठ में उन्होंने ठाकुर का पूजा गृह बनाया और काशीपुर में जहाँ ठाकुर को अग्नि दी थी वहाँ पर बेल का वृक्ष लगाकर वृक्ष के चारों ओर पूजा वेदी बनायी। नवम्बर १८८९ में वे देवघर की तीर्थयात्रा को गये और बन्शी दत्त के उद्यान गृह में रहकर भिक्षा माँगकर गुजारा किया। वे प्रयाग (इलाहाबाद) गये, भारत के विविध इलाकों से गुजरते हुए श्रीलंका में कोलम्बो गये। वे वहाँ कुछ समय तक धर्म प्रचार करते रहे और ठाकुर के विचारों का प्रचार किया। सन १८९५ में ठाकुर के जन्मदिन के पूर्व वे आलमबाजार मठ में वापस आये। स्वामी विवेकानन्द जब सन १८९७ में भारत वापस आये तब उनका स्वागत करने निरंजनानन्द कोलम्बो गये। स्वामी विवेकानन्द के उत्तर और दक्षिण भारत की यात्रा में निरंजनानन्द उनके साथ रहे। सन १८९८ में वे स्वामीजी के साथ अल्मोड़ा गये। बाद में वे वाराणसी गये और वहाँ भिक्षा माँग कर तपस्या करते रहे। युवकों के एक गट को उन्होंने सेवा और त्यागमय जीवन का मार्ग अनुक्रमण की प्रेरणा दी। इन्ही युवाओं ने आगे चलकर रामकृष्ण सेवाश्रम की शुरुवात की। एकबार उन्होंने संन्यासी बन्धु सारदाप्रसन्न को डूबने से बचाया था। जब जब गुरुभाई बीमार पड़े तब तब उन्होंने योगानन्द तथा अन्य कई गुरुबन्धुओं की सेवा सुश्रुषा की। रामकृष्ण मानव देहधारी असीम परमात्मा है ऐसा उनका मानना था, वे पूजादि से अधिक सेवा भाव में ज़्यादा विश्वास रखते थे। स्वामी निरंजनानन्द श्रीमाँ सारदादेवी के निस्सीम भक्त थे।
सन १८९९ में वे हरिद्वार के निकट कनखल गये, वहाँ वे बीमार पड़े और इलाज के लिए कलकत्ता वापस लौटे। स्वास्थ्यलाभ के बाद सन् १९०२ में वे स्वामीजी से मिलने वाराणसी गये। स्वामीजी के बीमारी में उन्होंने उनके उपचार की व्यवस्था और स्वामीजी के आखिरी दिनों में भक्तों के भीड़ को रोकने के लिए वे उनके द्वारपाल हुए। स्वामीजी के महासमाधि के बाद वे हरिद्वार लौट आये। अपने आखिरी दिनों में वे पेचिश से बीमार थे। हरिद्वार में ही ९ मई १९०४ को उन्होंने देह त्याग दिया। अपने असमय मृत्यु के कारण भले ही उनका कार्यकाल बहुत ही अल्प रहा, परन्तु अपनी आध्यात्मिक उन्नति तथा लोकसेवा के कार्यों से उनकी अमिट छाप रही है। ऊँचा क़द, चौड़ा सीना और मजबूत काया के कारण उनका व्यक्तित्व राजसी लगता था।
निरंजनानन्द का जन्मस्थान राजारहाट विष्णुपुर स्थित रामकृष्ण मठ