सनातन धर्म सभा, उ.प्र.

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सनातन धर्म सभा, उ.प्र. धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्था

06/06/2020
श्रीसीताजी का परित्याग और भारतीय जीवन-दृष्टिराम के द्वारा सीता के परित्याग का विमर्श बहुत पुराना है। इस प्रसंग को आधार ब...
18/05/2020

श्रीसीताजी का परित्याग और भारतीय जीवन-दृष्टि

राम के द्वारा सीता के परित्याग का विमर्श बहुत पुराना है। इस प्रसंग को आधार बनाकर हजारों पृष्ठ रंग दिए गए हैं । जिन्होंने राम को मलिन करने की दृष्टि से इस प्रसंग पर विचार किया है, वे राम के प्रति कितने कठोर हुए हैं, यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है। भर्त्सना और धिक्कार तो पूछिए मत ! और जो इसके अंध विरोध में उल्टे सीधे तर्क प्रस्तुत कर स्वयं को विद्वान सिद्ध करने में लगे हैं, वे रामायण काव्य की आत्मा और राम सीता के चरित्र को समझने में सर्वथा चूके हैं। क्योंकि उनका एकमात्र एजेंडा यह है कि राम ऐसा कदापि नहीं कर सकते थे ! राम ने किया क्या और रामायण में बार-बार वे क्या संकेत करते हैं, इस पर उनकी दृष्टि गई ही नहीं।

जो बहुत संतुलित होकर विचार सके हैं, संभवतः वे भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण और अविभाज्य भारतीय जीवन परंपरा, दृष्टि से दूर रह गए हैं । जिन्होंने हमारे जीवन-धर्म में प्रेम की अदैहिक दिव्यता को समझा है वे स्थिरचित्त होकर राम के प्रति समर्पित रहे हैं । यही वो महत्त्वपूर्ण कारक है, जिसने राघव को हमारी चेतना में प्रतीक पुरुष के रूप में स्थापित किए रखा है। उद्भट विद्वानों, कवियों तक का साहित्य उस दिव्यता को धूमिल न कर सका है।

वाल्मीकि रामायण में सीता के लिए राम का उत्कट अनुराग है। किन्तु वह अनासक्ति और निर्लिप्ति से नियंत्रित है।‌ वह अनासक्ति कोई ऊपर से ओढ़ी हुई चारित्रिक गंभीरता नहीं,अंतरंग है । आत्मा-रूप। जहां राम सीता के लिए विलाप करते हैं, जहां राम सहज रूप से सीता को अयोध्या में छोड़कर वन जाना चाहते हैं। साथ रहना या अकेला हो जाना दो अलग मनःस्थिति होकर भी अलग नहीं है। क्योंकि सीता जितनी अकेली या रामयुक्त हैं राम भी उतने ही अकेले या सीतासहित हैं। निराला लिखते हैं; सीता के राममय नयन ! या राम से कहलवाते हैं, जागी पृथ्वीतनया कुमारिका छवि अच्युत! ध्यान रहे राम नवविवाहित थे। तथापि चौदह वर्ष के लिए वन जाते हुए उन्होंने सीता को साथ ले जाने से मना कर दिया था।

दण्डकारण्य में असुरों के आतंक से त्रस्त ऋषियों को रक्षा का वचन देते हुए राम एक प्रतिज्ञा से बंध जाते हैं। वे उन्हें अभय करते हुए कहते हैं कि राम के रहते हुए कोई राक्षस अब यहां उत्पात न कर सकेगा। सभी मारे जाएंगे। सीता कुछ व्यग्र होकर उनसे पूछती हैं कि आप राक्षसों के वध के लिए इतने उद्धत क्यों हैं? वे उनसे बार-बार पुनर्विचार को कहती हैं।

राम उत्तर देते हैं:

अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम्
न तु प्रतिज्ञां संश्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः

अपना जीवन दे सकता हूं। सीता, तुम्हें और लक्ष्मण को छोड़ सकता हूं किन्तु प्रतिज्ञा से बंधकर अध्वरकर्म में रत ब्राह्मणों और तापसों को त्याग नहीं सकता। उनकी रक्षा करनी ही होगी।( ब्राह्मण भारत छोड़ो वाले भी समझें!)

इससे पहले भी वे लक्ष्मण से कहते हैं कि मैं यह सब इसलिए नहीं करता कि मुझे किसी राज्य, वैभव या भोग की कामना है। यह सब तो तुम्हारे और भरत के निमित्त है।

धर्ममर्थं च कामं च पृथिवीं चापि लक्ष्मण
इच्छामि भवतामर्थे एतत् प्रतिश्रिणोति मे

राम और सीता कोई दैहिक सत्ता या दम्पती मात्र नहीं । वे अविभाज्य युगल हैं। उन्हें माडर्न हसबैंड वाइफ़ के मोरल चश्मे से देखना विचित्र है। कृष्ण संभवतः इसे अधिक अधिकार से प्रमाणित करते हैं । राधा या गोपियों के त्याग से। निष्काम प्रेम का उदाहरण। बुद्ध में भी यही असंपृक्त प्रेम है । आदि शंकर में भी यह समान रूप से स्थित है । राम, कृष्ण और बुद्ध अपनी सहचरी, प्राणवल्लभा को छोड़ते हैं। आदि शंकर अपनी मां से छूटते हैं । वहां भी अलग कहां होते हैं!

वाल्मीकि रामायण के कई अंशों को लोग अपनी सुविधा और स्वाद से प्रक्षिप्त घोषित करते रहे हैं। जो नहीं रुचा, उसे क्षेपक मान लिया। कई कथित विद्वानों कहते हैं कि मध्यकालीन भारत में यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण में जोड़ा गया । किन्तु वे इस प्रश्न पर भी विचार नहीं कर पाते कि सातवीं सदी में ही भवभूति जैसे उद्भट विद्वान कवि और महान नाटककार ने उत्तर रामचरित लिख डाला था। क्या उन्होंने इस क्षेपक पर विचार नहीं किया होगा? या आजकल के संस्कृत और हिन्दी के आचार्य भवभूति से बड़े विद्वान हो गए !!

मूल भाव यह है कि राम के चरित्र में विद्यमान निष्काम प्रेम-भाव को समझें। हालांकि स्त्रीवादियों के लिए यह मुश्किल है और आधुनिक प्रोग्रेसिव राइटर्स या समानता के आंदोलनकारियों के लिए असंभव.....और संस्कृत के पोंगा पंडितों के लिए भी उतना ही कठिन।

🙏🙏🙏cp from जय श्री राम जय जय श्री राम

आज का प्रवचनदीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।दीनों पर कृपा करने वाले हे नाथ अपने यश अथवा विरद (जिसके लिए आ...
15/05/2020

आज का प्रवचन

दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।

दीनों पर कृपा करने वाले हे नाथ अपने यश अथवा विरद (जिसके लिए आपकी ख्‍याति है) को याद करके, मेरे भारी संकट को दूर कीजिये। अथवा दीनों पर दया करना आपका विरद है, अत: उस विरद को याद करके हे नाथ, मेरे भारी संकट को दूर कीजिये।

आज का प्रवचनराजीवनयन धरें धनु सायक।भगत बिपति भंजन सुखदायक ।।राजीव का अर्थ कमल भी होता है , नयन अर्थात् नेत्र ।कमल के समा...
14/05/2020

आज का प्रवचन

राजीवनयन धरें धनु सायक।
भगत बिपति भंजन सुखदायक ।।
राजीव का अर्थ कमल भी होता है , नयन अर्थात् नेत्र ।
कमल के समान नेत्रोँ वाले; यहाँ राजीवनयन विशेषण का प्रयोग मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के लिए किया गया है ।
कमल के समान नेत्रोँ वाले मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम अपने प्रिय भक्तोँ की आधिदैविक , आधिदैहिक , आधिभौतिक विपत्तियोँ का भंजन अर्थात् नाश करके उन्हेँ सुखप्रदान करने के लिए ही सदैव हाथ मे धनुष सायक अर्थात् बाण धारण किए रहते हैँ।
ये भाव स्वान्तःसुखाय है ।

आज का प्रवचनकाम, क्रोध, मद, लोभ, सब, नाथ नरक के पंथ।सब परिहरि रघुबीरहि, भजहुं भजहिं जेहि संत।विभीषणजी रावण को पाप के रास...
13/05/2020

आज का प्रवचन

काम, क्रोध, मद, लोभ, सब, नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि, भजहुं भजहिं जेहि संत।

विभीषणजी रावण को पाप के रास्ते पर आगे बढ़ने से रोकने के लिए समझाते हैं कि काम, क्रोध, अहंकार, लोभ आदि नरक के रास्ते पर ले जाने वाले हैं। काम के वश होकर आपने जो देवी सीता का हरण किया है और आपको जो बल का अहंकार हो रहा है, वह आपके विनाश का रास्ता है। जिस प्रकार साधु लोग सब कुछ त्यागकर भगवान का नाम जपते हैं आप भी राम के हो जाएं। मनुष्य को भी इस लोक में और परलोक में सुख, शांति और उन्नति के लिए इन पाप की ओर ले जाने वाले तत्वों से बचना चाहिए।

आज का प्रवचन-नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥30॥भावार्थ(हनुमान जी ने कह...
12/05/2020

आज का प्रवचन-

नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥30॥

भावार्थ
(हनुमान जी ने कहा-) आपका नाम रात-दिन पहरा देने वाला है, आपका ध्यान ही किंवाड़ है। नेत्रों को अपने चरणों में लगाए रहती हैं, यही ताला लगा है, फिर प्राण जाएँ तो किस मार्ग से?॥30॥

बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ।जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ।इस चौपाई में बालकांड का प्रसंग बताया गया ...
11/05/2020

बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ।
जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ।
इस चौपाई में बालकांड का प्रसंग बताया गया है। इसमें भगवान विष्णु के रामावतार का कारण और भगवान की लीला का उद्देश्य समझाते हुए यहां भगवान शिव कहते हैं- कोई भी इस भ्रम में न रहे कि वह सर्वज्ञानी है या कोई हमेशा मूर्ख ही रहेगा। भगवान की जब जैसी इच्छा होती है, तब वह प्रत्येक प्राणी को वैसा बना देते हैं। इसलिए कभी किसी चीज का अहंकार नहीं करना चाहिए, जो अहंकार करते हैं। वह समाज में कभी आगे नहीं बढ़ पाते।

10/05/2020

आज का प्रवचन-
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
कादर मन कहुं एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।

रामचरित मानस में यह चौपाई उस समय का प्रसंग बताती है जब भगवान राम सागर पार करने के लिए सागर से रास्ता मांगने के लिए ध्यान करने जा रहे थे। लक्ष्मणजी ने तब भगवान रामजी को उनकी शक्ति और क्षमता को याद दिलाते हुए कहा था कि आप स्वयं इतने शक्तिशाली हैं कि एक बाण में समुद्र को सुखा सकते हैं, फिर सागर से अनुनय-विनय क्यों? भगवान राम यह सब जानते थे लेकिन फिर भी इन्होंने शक्ति से पहले शांति से परिस्थितियों को हल करने का प्रयास किया और बताया कि शक्तिशाली को संयमी होना भी जरूरी है। आप अपने भरोसे पर काम कीजिए ईश्वर स्वयं आपकी सहायता करेंगे।

10/05/2020

नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
कादर मन कहुं एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।

रामचरित मानस में यह चौपाई उस समय का प्रसंग बताती है जब भगवान राम सागर पार करने के लिए सागर से रास्ता मांगने के लिए ध्यान करने जा रहे थे। लक्ष्मणजी ने तब भगवान रामजी को उनकी शक्ति और क्षमता को याद दिलाते हुए कहा था कि आप स्वयं इतने शक्तिशाली हैं कि एक बाण में समुद्र को सुखा सकते हैं, फिर सागर से अनुनय-विनय क्यों? भगवान राम यह सब जानते थे लेकिन फिर भी इन्होंने शक्ति से पहले शांति से परिस्थितियों को हल करने का प्रयास किया और बताया कि शक्तिशाली को संयमी होना भी जरूरी है। आप अपने भरोसे पर काम कीजिए ईश्वर स्वयं आपकी सहायता करेंगे।

आज का प्रवचन-जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना...
05/05/2020

आज का प्रवचन-
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥
निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥

रामचरित मानस में भगवान राम और सुग्रीव की मित्रता के संदर्भ में यह चौपाई मनुष्य को ज्ञान देती है कि मित्रता निभाने वाले की भगवान भी सहायता करते हैं। जो लोग मित्र या फिर दूसरों के दुख को देखकर दुखी नहीं होते, उन लोगों की मदद नहीं करते हैं। ऐसे लोगों को देखने से भी पाप लग जाता है। जो लोग अपने दुख को भूलकर दूसरों की सहायता करते हैं, ईश्वर स्वयं उसकी मदद करते हैं।

हिन्दू नववर्ष महोत्सव के लिए पूज्य श्री महाराज का अनुमति मिला। सनातन धर्म सभा(हिंदुत्व विचार मंच)-बेंदुली, इटियाथोक,गोण्...
04/03/2020

हिन्दू नववर्ष महोत्सव के लिए पूज्य श्री महाराज का अनुमति मिला। सनातन धर्म सभा(हिंदुत्व विचार मंच)-बेंदुली, इटियाथोक,गोण्डा(उ.प्र.)

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