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22/12/2018

हिन्दू धर्म के ये महत्वपूर्ण प्रमुख 10 नियम
हिन्दू धर्म में हर कोई पंडित है। बड़े-बड़े विद्वान हैं, जो तर्क से किसी भी प्रकार की बातें सिद्ध करने में माहिर हैं। लेकिन उनमें से एक भी वेदों की सच्ची राह बताने वाला कोई नहीं है, भटकाने वाले बहुत मिल जाएंगे। दुकानदार लोगों ने धर्म का कबाड़ा कर रखा है। जब तक व्यक्ति वेद, उपनिषद नहीं पढ़ता, तब तक वह हिन्दू धर्म को नहीं समझ सकता।
हिन्दू धर्म के ऐसे 10 नियम हैं‍ जिन्हें जानकर ही प्रत्येक धर्म के लोगों ने उन नियमों को अपने-अपने धर्म में भिन्न-भिन्न तरीके से शामिल किया है। अधिकतर हिन्दू इन नियमों पर चलते हैं या नहीं, यह जानना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य होना चाहिए। आओ जानते हैं कि ऐसे कौन से 10 नियम हैं जिनका पालन हिन्दुओं को करना चाहिए।ईश्वर ही सत्य है : ब्रह्म ही सत्य है, सत्य ही ब्रह्म है। वही सर्वोच्च शक्ति है। प्रार्थना, पूजा, ध्यान और आरती आदि सभी उसी के प्रति है। देवी, देवता, त्रिदेव, यक्ष, किन्नर, गंधर्व, वानर आदि सभी उसी का ध्यान करते हैं इसलिए सिर्फ उस एक को ही सर्वोच्च सत्ता मानना धर्म का प्रथम नियम है। वेद, उपनिषद और गीता में उसी 'परम तत्व' की चर्चा की गई है। उसी के प्रति समर्पित ईश्वर प्राणिधान है। यह धर्म का बेहद जरूरी नियम है। जो व्यक्ति इस नियम का पालन नहीं करता, वह भटका हुआ है।

'...जो सांसारिक इच्छाओं के गुलाम हैं उन्होंने अपने लिए ईश्वर के अतिरिक्त झूठे उपास्य बना लिए हैं...।' -श्रीकृष्ण (भगवद् गीता 7:20)

ईश्वर प्राणिधान : सिर्फ एक ही ईश्वर है जिसे ब्रह्म, परमेश्वर या परमात्मा कहा जाता है। ईश्वर निराकार और अजन्मा, अप्रकट है। इस ईश्वर के प्रति आस्था रखना ही ईश्वर प्राणिधान कहलाता है। इसके अलावा आप किसी अन्य में आस्था न रखें। चाहे सुख हो या घोर दु:ख, उसके प्रति अपनी आस्था को डिगाएं नहीं। इससे आपके भीतर पांचों इंद्रियों में एकजुटता आएगी और आपका आत्मविश्वास बढ़ता जाएगा जिससे लक्ष्य को भेदने की ताकत बढ़ेगी। वे लोग, जो अपनी आस्था बदलते रहते हैं, भीतर से कमजोर होते जाते हैं।
दूसरा नियम : संध्योपासन अर्थात संध्या वंदन। संध्या वंदन प्रतिदिन करना जरूरी है। संध्या वंदन के दो तरीके हैं- प्रार्थना और ध्यान। मनमानी पूजा, आरती और यज्ञादि करना धर्म के नियमों के विरुद्ध है। प्रत्येक हिन्दू को सुबह और शाम को संध्या वंदन करना ही चाहिए। किसी कारणवश वह ऐसा नहीं कर पाता है तो गुरुवार को निश्चित ही यह कर्म करना जरूरी है।

संध्या वंदन है सभी का कर्तव्य

संध्या वंदन के लाभ : प्रतिदिन संध्या वंदन करने से जहां हमारे भीतर की नकारात्मकता का निकास होता है वहीं हमारे जीवन में सदा शुभ और लाभ होता रहता है। इससे जीवन में किसी प्रकार का भी दुख और दर्द नहीं रहता। हालांकि संध्या वंदन इसीलिए नहीं की जाती, बल्कि संध्या वंदन ईश्वर के प्रति‍ प्रार्थना है। इसके करने के नियम हैं।व्रत माह श्रावण : हिन्दू पंचांग का आरंभ चैत्र मास से होता है। चैत्र मास से 5वां माह श्रावण मास होता है। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार इस मास की पूर्णिमा के दिन आकाश में श्रवण नक्षत्र का योग बनता है इसलिए श्रवण नक्षत्र के नाम से इस माह का नाम 'श्रावण' हुआ। इस माह से चातुर्मास (श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक) की शुरुआत होती है। यह माह चातुर्मास के 4 महीनों में बहुत शुभ माह माना जाता है। इस पूरे माह व्यक्ति को एक वक्त ही भोजन करना चाहिए।
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उपवास के प्रकार- 1. प्रात: उपवास, 2. अद्धोपवास, 3. एकाहारोपवास, 4. रसोपवास, 5. फलोपवास, 6. दुग्धोपवास, 7. तक्रोपवास, 8. पूर्णोपवास, 9. साप्ताहिक उपवास, 10. लघु उपवास, 11. कठोर उपवास 12. टूटे उपवास, 13. दीर्घ उपवास।

श्रावण का अर्थ : 'श्रावण' शब्द 'श्रवण' से बना है जिसका अर्थ है सुनना। अर्थात सुनकर धर्म को समझना। वेदों को श्रुति कहा जाता है अर्थात उस ज्ञान को ईश्वर से सुनकर ऋषियों ने लोगों को सुनाया था।

इस माह के पवित्र दिन : इस माह में वैसे तो सभी पवि‍त्र दिन होते हैं लेकिन सोमवार, गणेश चतुर्थी, मंगला गौरी व्रत, मौना पंचमी, श्रावण माह का पहला शनिवार, कामिका एकादशी, कल्कि अवतार शुक्ल 6, ऋषि पंचमी, 12वीं को हिंडोला व्रत, हरियाली अमावस्या, विनायक चतुर्थी, नागपंचमी, पुत्रदा एकादशी, त्रयोदशी, वरलक्ष्मी व्रत, गोवत्स और बाहुला व्रत, पिथोरी, पोला, नराली पूर्णिमा, श्रावणी पूर्णिमा, पवित्रारोपन, शिव चतुर्दशी और रक्षाबंधन। चौथा नियम : तीर्थ और तीर्थयात्रा का बहुत पुण्य है। कौन-सा है एकमात्र तीर्थ? तीर्थाटन का समय क्या है? ‍जो मनमाने तीर्थ और तीर्थ पर जाने के समय हैं उनकी यात्रा का सनातन धर्म से कोई संबंध नहीं। अयोध्‍या, काशी, मथुरा, चार धाम और कैलाश में कैलाश की महिमा ही अधिक है।
लाभ : तीर्थ से ही वैराग्य और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। तीर्थ से विचार और अनुभवों को विस्तार मिलता है। तीर्थयात्रा से जीवन को समझने में लाभ मिलता है। बच्चों को पवित्र स्थलों एवं मंदिरों की तीर्थयात्रा का महत्व बताना चाहिए। पांचवां नियम : दान देना। वेदों में 3 प्रकार के दाता कहे गए हैं- 1.उत्तम, 2.मध्यम और 3.निकृष्‍ट। धर्म की उन्नतिरूपी सत्य विद्या के लिए जो देता है वह उत्तम। कीर्ति या स्वार्थ के लिए जो देता है तो वह मध्यम और जो वेश्‍यागमनादि, भांड, भाटे, पंडे को देता वह निकृष्‍ट माना गया है।
पुराणों में अनेक दानों का उल्लेख मिलता है जिसमें अन्नदान, विद्यादान, अभयदान और धनदान को ही श्रेष्ठ माना गया है, यही पुण्‍य भी है।छठा नियम : संक्रांति और कुंभ पर्व मनाना। उन त्योहार, पर्व या उत्सव को मनाने का महत्व अधिक है जिनकी उत्पत्ति स्थानीय परंपरा या संस्कृति से न होकर जिनका उल्लेख धर्मग्रंथों में मिलता है। मनमाने त्योहारों को मनाने से धर्म की हानि होती है। माना जाता है कि मकर संक्रांति के समय सभी देवता धरती पर विचरण करते हैं। मकर संक्रांति के बाद कुंभ का उत्सव मनाना जरूरी है।

जानिए मकर संक्रांति के महत्वपूर्ण तथ्य
हिंदू त्योहार‍ को जानिए
सूर्य जब धनु राशि से मकर पर पहुंचता है, तो मकर संक्रांति मनाते हैं। इस दिन से सूर्य उत्तरायन गमन करने लगता है। सूर्य पूर्व दिशा से उदित होकर 6 महीने दक्षिण दिशा की ओर से तथा 6 महीने उत्तर दिशा की ओर से होकर पश्चिम दिशा में अस्त होता है। उत्तरायन का समय देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन का समय देवताओं की रात्रि होती है। वैदिक काल में उत्तरायन को देवयान तथा दक्षिणायन को पितृयान कहा गया है।

वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ, संक्रांति विष्णुपद संज्ञक है। मिथुन, कन्या, धनु, मीन संक्रांति को षडशीति संज्ञक कहा गया है। मेष, तुला को विषुव संक्रांति संज्ञक तथा कर्क, मकर संक्रांति को अयन संज्ञक कहा गया है।

सावधानी : पुण्यकाल में दांत मांजना, कठोर बोलना, फसल तथा वृक्ष काटना, गाय, भैंस का दूध निकालना व मैथुन काम विषयक कार्य कदापि नहीं करना चाहिए। सूर्य का नेत्र, कलेजा, मेरूदंड आदि पर विशेष प्रभाव पड़ता है इससे शारीरिक रोग, सिरदर्द, अपचन, क्षय, महाज्वर, अतिसार, नेत्र विकार, उदासीनता, खेद, अपमान एवं कलह आदि का विचार किया जाता है। सातवां नियम : यज्ञ कर्म। वेदानुसार यज्ञ 5 प्रकार के होते हैं- (1) ब्रह्मयज्ञ, (2) देवयज्ञ, (3) पितृयज्ञ, (4) वैश्वदेव यज्ञ और (5) अतिथि यज्ञ। उक्त 5 यज्ञों को पुराणों और अन्य ग्रंथों में विस्तार दिया गया है। वेदज्ञ सार को पकड़ते हैं, विस्तार को नहीं।

विस्तार से पढ़ें..यज्ञकर्म विज्ञान है कर्मकांड नहीं

ब्रह्मयज्ञ अर्थात ईश्‍वर, गुरु, माता और पिता के प्रति समर्पित भाव रखकर नित्य संध्या वंदन, स्वाध्याय तथा वेदपाठ करना। देवयज्ञ जो सत्संग तथा अग्निहोत्र कर्म से संपन्न होता है। पितृयज्ञ को पुराणों में श्राद्ध कर्म कहा गया है। वेदानुसार यह श्राद्ध-तर्पण हमारे पूर्वजों, माता-पिता और आचार्य के प्रति सम्मान का भाव है। सभी प्राणियों तथा वृक्षों के प्रति करुणा और कर्तव्य समझना उन्हें अन्न-जल देना ही भूत यज्ञ या वैश्वदेव यज्ञ कहलाता है। अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना ही अतिथि यज्ञ है।आठवां नियम : सेवा करना। हिन्दुओं के ज्यादातर संत सेवा लेते हैं, सेवा करते नहीं। यही धर्म की सबसे बड़ी हानि है। सेवा के कई प्रकार हैं। रक्षा का एक रूप है सेवा।
हिन्दू धर्म में सभी कर्तव्यों में श्रेष्ठ 'सेवा' का बहुत महत्व बताया गया है। स्वजनों, अशक्तों, गरीबों, महिला, बच्चों, धर्मरक्षकों, बूढ़ों और मातृभूमि की सेवा करना पुण्य है। यही अतिथि यज्ञ है। सेवा से सभी तरह के संकट दूर होते हैं। इसी से मोक्ष के मार्ग में सरलता आती है। सेवा ही सबसे बड़ी पवित्रता है।नौवां नियम : संस्कार का पालन करना जरूरी। संस्कारों के प्रमुख प्रकार 16 बताए गए हैं जिनका पालन करना हर हिन्दू का कर्तव्य है। इन संस्कारों के नाम हैं- गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, मुंडन, कर्णवेधन, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, सम्वर्तन, विवाह और अंत्येष्टि। प्रत्येक हिन्दू को उक्त संस्कार को अच्छे से नियमपूर्वक करना चाहिए। यह हमारे सभ्य और हिन्दू होने की निशानी है।

लाभ : संस्कार हमें सभ्य बनाते हैं। संस्कारों से ही हमारी पहचान है। संस्कार से जीवन में पवित्रता, सुख, शांति और समृद्धि का विकास होता है। संस्कार विरुद्ध कर्म करना जंगली मानव की निशानी है।धर्म प्रचार : हिन्दू धर्म को पढ़ना और समझना जरूरी है। हिन्दू धर्म को समझकर ही उसका प्रचार और प्रसार करना जरूरी है। धर्म का सही ज्ञान होगा, तभी उस ज्ञान को दूसरे को बताना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को धर्म प्रचारक होना जरूरी है। इसके लिए भगवा वस्त्र धारण करने या संन्यासी होने की जरूरत नहीं। स्वयं के धर्म की तारीफ करना और बुराइयों को नहीं सुनना ही धर्म की सच्ची सेवा है।
धर्म का आधार हैं चार ग्रंथ (वेद, उपनिषद, स्मृति और गीता), चार आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास), चार पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष), चार धाम (जगन्नाथ, द्वारिका, बद्रीनाथ और रामेश्वरम्), चार पीठ (ज्योतिर्पीठ, गोवर्धनपीठ, शारदापीठ और श्रृंगेरीपीठ), चार मास (सौरमास, चंद्रमास, नक्षत्रमास और सावनमास), चातुर्मास (श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक), चार संप्रदाय (वैष्णव, शैव, शाक्त और स्मृति-संत), चार पद (ब्रह्मपद, रुद्रपद, विष्णुपद और परमपद (सिद्धपद) आदि को जानना जरूरी है।

07/06/2018

सूरीनाम देश और हिन्दी -सूर्यप्रसाद बीरे
Icon-edit.gif यह लेख स्वतंत्र लेखन श्रेणी का लेख है। इस लेख में प्रयुक्त सामग्री, जैसे कि तथ्य, आँकड़े, विचार, चित्र आदि का, संपूर्ण उत्तरदायित्व इस लेख के लेखक/लेखकों का है भारतकोश का नहीं।
लेखक- श्री सूर्यप्रसाद बीरे
सूरीनाम दक्षिण अमरीका के उत्तर में स्थित एक देश है, जिसकी राजधानी पारामारिबो है। पारामारिबो का मतलब है फूलों का शहर। कहा जाता है कि यह नाम भिलनियों (रेड-इंडियन) द्वारा दिया गया है। इन लोगों की परंपरा भारतीय मानी जाती है, जिसके कारण उनकी भाषा के कुछ शब्द संस्कृत भाषा के शब्दों से मिलते-जुलते हैं। उदाहरण के रूप में ‘‘मातापिका’’। यह एक प्राकृतिक सुन्दर स्थान है जहाँ बहुत से लोग अपनी छुट्टियाँ व्यतीत करते हैं। यदि इस शब्द के वर्ण को बदल दिया जाए तो शब्द मूल भारतीय देवनागरी शब्द बन जाता है ‘‘मातापिता’’। इस तरह से पारामारिबो के संबंध में कहा जाता है कि यह ‘‘परम ब्रह्म’’ का अपभ्रंश है।
सूरीनाम शब्द के संबंध में यह कहा जाता है कि ‘‘सूरीनाम’’ नाम की भिलनियो (रेड-इंडियन) का यहाँ समूह था जिसके कारण सूरीनाम नाम पड़ा। इस शब्द की संस्कृत शब्द ‘‘सूरीनाम’’ से तुलना की जाए तो दो अक्षरों के हेर-फेर से वह ‘‘विद्वानों का देश’’ हो जाता है। इस तरह से देखा जाए तो सूरीनाम के स्थानों आदि नामों के संबंध में इतिहासकारों एवं शोधकर्ताओं आदि के लिए खोज तथा शोध को एक सुन्दर अवसर है। कुछ लोगों का कहना है कि भिलनी लोग सूरीनाम के प्राचीन देशवासी या रेड-इंडियन या भिलनी भारत के पहाड़ी क्षेत्रों के आदिवासी हैं। यह बात कहाँ तक सही है, केवल जाँच-पड़ताल से इसे अच्छी तरह से जाना जा सकता है। सूरीनाम देश की सीमा चारों ओर से प्रकृति से घिरी हुई है। उत्तर में अटलांटिक महासागर है। दक्षिण में आकाराई और तुमुहुमुक पहाड़ है जो सूरीनाम को ब्राजील देश से अलग करते हैं। पूरब में मारोबइने नदी बहती है जिससे सूरीनाम और फ्रेंच गयाना विभाजित होते हैं। पश्चिम में कोरांताइन नदी है जो हमें (ब्रिटिश) गयाना से अलग कर देती है। सूरीनाम देश का क्षेत्रफल हालैंड देश से पांच गुना बड़ा है। कुछ वर्षों तक यह देश ब्रिटिश राज का उपनिवेश था। किंतु ‘‘नई गाइनेई’’ को सूरीनाम में हालैंड ने बदल लिया। उस समय नई गाइनेई हालैंड का उपनिवेश था। हालांकि ब्रिटिश राज यहाँ बहुत दिन तक शासन न कर पाया, फिर भी उनका प्रभाव काफ़ी बना रहा। इसीलिए नीग्रो की भाषा स्रानांग तोंगो में 80 प्रतिशत शब्द अंग्रेजी भाषा के है। यहाँ की यातायात व्यवस्था इंगलैंड की तरह है।
सूरीनाम देश की जलवायु उष्णवलयिक है। मुख्य रूप से वर्षा होती है। सूरीनाम देश की दो तिहाई मिट्टी पहाड़ी मिट्टी है। एक तिहाई उपजाऊ मिट्टी है। इस देश को कृषि-प्रधान देश कहा जाता है। निकेरी इलाका में अधिकांशत: चावल (धान) की खेती होती है। इस देश का प्रमुख व्यवसाय खेती है।
सूरीनाम में हिन्दी का प्रयोग
सूरीनाम में रहने वाले भारतीय प्राय: उत्तर भारत से आए हुए हैं और विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार प्रदेश के निवासी हैं। यहाँ की प्रमुख भाषाएँ हिंदी, उर्दू, पंजाबी, बंगाली, गुजराती और मराठी हैं। ये सभी भाषाएँ यूरोपीय भाषा वर्ग की हैं। हिन्दी को पाँच प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है। पहाड़ी राजस्थानी, पश्चिमी हिन्दी, पूर्वी हिन्दी और बिहारी। इन भाषा क्षेत्रों में कई बोलियाँ हैं। सूरीनाम में हिन्दुस्तानी प्रवासी लोग मुख्य रूप से भोजपुरी और अवधी बोली बोलते थे। इन बोलियों के अतिरिक्त अधिकांश भारतीय मूल के लोग जो सूरीनाम में बस गए थे उत्तर भारत की सार्वजनिक संपर्क भाषा खड़ी बोली भी जानते थे। खड़ी बोली के अलावा उर्दू का भी प्रयोग होता था।
वास्तव में भारतीय प्रवासियों के आपसी संपर्क के कारण उनकी सभी भाषाएँ मिश्रित होकर विशिष्ट प्रचलित हिन्दी बोली जाती है। साहित्य और अध्यापन के प्रभाव से हिन्दुस्तानी या उर्दू (मुस्लिम) और सामान्य उच्च-हिन्दी (हिन्दू) ज्यादातर मानक भाषा का रूप धारण करने लगी। वर्तमान समय में इस भाषा का प्रयोग भाषण, पत्र, सूचना आदि में शुद्ध हिन्दुस्तानी या सरल उच्च हिन्दी के रूप में होता है। बोलचाल की भाषा में स्थानीय भाषाओं का भी प्रभाव आ गया है। गयाना पड़ोसी देश से पश्चिमी प्रांत निकेरी में अंग्रेजी का प्रभाव भी पड़ा है। इसी में एक बोली स्रानांग तोंगो है जिसे नीग्रो इंगलिश भी कहा जाता है। वास्तव में अधिकांश भारतवंशी होने होने के कारण उनकी बोलचाल की भाषा सूरीनाम की धरती पर विकसित हुई है जिसे ‘‘सरनामी हिन्दी’’ कहा जाता है और अब वह केवल सरनामी से जानी जाती है। हिन्दी के अलावा बहुत से भारतवंशी स्रानांग तोंगो भी बोलते हैं। विशेष रूप से पुरुष वर्ग और युवा वर्ग हिन्दी के अतिरिक्त यह भाषा अच्छी तरह से बोलते हैं। परिवार में युवा वर्ग प्राय: सरनामी का ही प्रयोग करता है।
पारामारिबो राजधानी में भारतवंशियों द्वारा हिन्दी के अतिरिक्त डच भाषा का अधिक प्रयोग किया जाता है। कुछ ऐसे परिवार हैं जहाँ हिन्दी समझी नहीं जाती। ये परिवार बहुत समय पहले से ही पारामारिबो में बसे हुए हैं। अब कई भारतवंशी हिन्दी सीखने की कोशिश कर रहे हैं।
देश और निवासी


यहाँ दुनियाँ की क़रीब सभी जातियाँ रह रही हैं – अमरेंद्यन (रेड-इंडियन या भिलनी), नीग्रो, हिन्दुस्तानी, जाबी (इंडोनेशियन), बुश-नीग्रो, चीनी, लिबानिश (यहूदी) परिवार, यूरोपियन आदि। 1980 की जनगणना के अनुसार 39 प्रतिशत हिन्दुस्तानी, 35 प्रतिशत नीग्रो, 18 प्रतिशत इंडोनेशियन, शेष 8 प्रतिशत अन्य जातियाँ हैं। इस प्रकार सूरीनाम देश केरीबियन क्षेत्र में सब से विषमरूपी समाज है। कई जातियों के साथ-साथ यहाँ कई संस्कृतियाँ और कई भाषाएँ भी हैं। इसकी कुल आबादी लगभग चार लाख है। इस चार लाख में जो भाषाएँ बोली जाती हैं वे हैं – डच, स्रानांग, तोंगों, हिन्दी (सरनामी हिन्दी), उर्दू, जावी, चीनी, अंग्रेजी, बुशनीग्रों की कई भाषाएँ, रेड-इंडियन की कई भाषाएँ आदि। संसार में शायद कोई ऐसा देश हो जहाँ इतनी आबादी में इतनी सारी भाषाएँ बोली जाती हों।
भारतवंशी समाज
आज से यदि 110 वर्षों के भारतवंशियों के इतिहास पर प्रकाश डाला जाए तो यही पता चलता है कि हमारे पूर्वजों ने यहाँ की जमीन को आबाद किया, भूमि पर खेती की और सूरीनाम में शांति तथा प्रगति के साथ अपना जीवन आरंभ किया। इसी तरह से अफ्रीका तथा एशिया के अन्य आप्रवासियों ने भी इस देश की उन्नति और विकास में योगदान दिया।
सन् 1873 ई० में भारतवंशी पूर्वजों ने सूरीनाम देश में अपना प्रथम पग रखा। प्रथम जहाज जो आया था वह था ‘‘लालारुख’’ जिसमें 410 लोग थे। समुद्र के रास्ते से आने के कारण 11 लोगों की मृत्यु हो गई थी। कुल योग जो प्रथम बार थे 399 इस जहाज ‘‘लालारुख’’ ने 4 जून 1873 को सूरीनाम नदी में प्रवेश किया था और 5 जून को हमारे पूर्वजों ने अपना पैर इस देश की धरती पर रखा। अनेक कठिनाइयों और संकटों के बीच अपने पूर्वजों ने आज भी धर्म, संस्कृति, भाषा आदि को सुरक्षित रखा है। इतिहास बताता है कि सन् 1873 ई० तक प्राय: 56 वर्षों तक किसी न किसी रूप में हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था सरकारी विद्यालयों तथा स्वैच्छिक संस्थाओं में निरन्तर चलती रही, किन्तु सन् 1929 से अब तक प्राय: 55 वर्षों में हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन का कार्य सरकारी विद्यालयों में बंद हो गया और केवल स्वैच्छिक संस्थाओं के द्वारा ही कुछ काम होता है।
प्राचीन हिन्दी साहित्य


यद्यपि कई पूर्वज पढ़ना-लिखना जानते थे किन्तु उनकी लिखी पुस्तकों का प्रकाशन नहीं हो सका। उस समय सूरीनाम देश में हिन्दी मुद्रण की कोई व्यवस्था नहीं थी। हमें कई पांडुलिपियाँ देखने को मिलीं जिनमें न तो आदि के पृष्ठ मिले और न ही अंत के। इस तरह से कई पांडुलिपियाँ नष्ट हो गईं। एक ही पूर्वज की दो पुस्तकें छपी हैं मुंशी रहमान खान: ज्ञान प्रकाश। सन् 1954 इस पुस्तक में मुंशी रहमान खान स्वयं अपने बारे में लिखतें हैं:–
दोहा –
कमिश्नरी इलाहाबाद में ज़िला हमीरपुर नाम।
बिवांर थाना है मेरा मुकाम भरखरी ग्राम।। 1
सिद्धि निद्धि वसु भूमि की वर्ष ईस्वी पाय।
मास शत्रु तिथि तेरहवीं – डच गैयाना[1] आय।। 2
गिरमिट काटी पाँच वर्ष की कोठी रुस्तम लोस्त।
सर्दार रहेऊं वहं बीस वर्ष लो लीचे मनयर होर्स्त।। 3
अग्नि व्योम इक खंड भुईं ईस्वी आय।
मास वर्ग तिथि तेरहवीं गिरमिट बीती भाय।। 4
खेत का नम्बर चार है देइक फेल्त मम ग्राम।
सुरिनाम देश में वास है रहमानखान निजनाम।। 5
लेतरकेन्दख[2] स्वर्ण पद दीन्ह क्वीन युलियान।
अजरू अमर दम्पति हरहैं प्रेन्स देंय भगवान।। 6
स्वर्ण पदक दूजो दियो मिल सन्नुतुल जमात।
यह बरकत है दान की की विद्या खैरात।। 7
इति वर्ग ग्रह सूर्य की है ईस्वी वर्ष।
मास भूमि तिथि रूद्र को पूरण कीन्ह सहर्ष।। 8 [3]
इसी में रहमान खान का एक नोट दिया हुआ है और उसमें लिखते हैं इन दोनों उपाधियों का वृतांत मेरी बनाई दोहा शिक्षावली नामक पुस्तक में पढ़िये। जो सन् 1953 ई० में छप चुकी है।
मुंशी रहमान खान अपनी दूसरी पुस्तक दोहा शिक्षावली पृष्ठ 4 में लिखते हैं –
दोनों उपाधियों के जलसों का बयान
हार्दिक कोटिश: धन्यवाद है उस सर्वशक्तिमान सर्वव्यापी सर्वप्रिय जगदाधार परम-प्रिय पिता परमात्मा को, कि जिसने अपनी प्रभुता से सारी सृष्टि को उत्पन्न करके अपनी प्रभुताई दिखलाई, दिखला रहा है और दिखलावेगा। कि जिस दीनानाथ की परम कृपालुता से आज मुझे मेरे परम प्यारे आँख के सितारे राज्य के दुलारे, श्रीयुत् महामान्य, महोदय गवर्नर क्लाशश जी साहब बहादुर के कमलस्वरूपी चरणों के दर्शन प्राप्त हुए, कि जिसको पाकर मैं अपने को अहोभाग्य समझता हूँ और मेरी सर्व मनोकामनाएँ पूर्ण हुईं और नेत्र तृप्त हुए।
आमीन। आमीन।। रव्वुल आलमीन।।।

दोहा –
बिस्मिमल्लह कहिकर प्रथम सुमिर पाक रब नाम।
लधु कविता सेवक कहैं छोड़ मोह मद काम।। 1
निज प्यारे श्री लार्ड को करूँ प्रणाम कर जोर।
ईश क्वीन का यश कहूँ सुनहिं आप सिरमौर।। 2
क्षमियों लेख भूल हो आप ग़रीब निवाज।
कृपा दृष्टि नित राखियों तुम रक्षक महाराज।। 3
प्रथम जहाज के संबंध में मुंशी रहमान खान अपनी दोहा शिक्षावली में पद्य के रूप में इस प्रकार वर्ण करते हैं। (पृष्ठ 16 में)
(सुरीनाम – डच गैयाना में भारतवासियों की अवाई)
दोहा –
गुण यासर सिधि अवनि की वर्ष ईस्वी जान।
मास शास्त्र तिथि तत्व को यहाँ आयो जलयान।। 1
चौपाई


यही वर्ष तारीख महीना। पहंच्चे आय शहर परमारी।। 2
प्रथम जहाज यही यहं आयो। भारतवासी लाय बसायो।। 3
दुइ जाति भारत से आये। हिन्दू मुसलमान कहलाये।। 4
रही प्रीति दोनहुं में भारी। जस दुइ बन्धु एक महतारी।। 5
सब बिधि भूपति कीन्ह भलाई।
दुख अरू विपति में भयो सहाई।। 6
हिलमिल कर निशिवासर रहते।
नहिं अनभल कोई किसी का करते।। 7
बाढ़ी अस दोनहुं में प्रीति। मिल गये दाल भात की रीति।। 8
खान पियन सब सायहंवै। नहीं बिध्न कोई कारज होवै।। 9
सब विधि करें सत्य व्यवहारा। जस पद होय करें सत्कारा।। 10
इस तरह से केवल मुंशी रहमान खान की रचनाएँ हमें प्राचीन साहित्य के रूप में प्राप्त होती हैं। और जो साहित्य पूर्वजों के संबंध में उपलब्ध हैं वह ईसाई मिशनरी श्री डॉ. सी. जे. एम. देक्लरक द्वारा डच भाषा में विवेचन किया है।
1. द इमिखासी दर हिन्दोस्तानन एन सूरीनाम
(अर्थ: सूरीनाम में हिन्दुस्तानी का आप्रवास)
इसी ईसाई मिशनरी ने एक दूसरी पुस्तक भारतीयवंशियों के धर्म और उनकी रीति-रिवाज अपने शोध प्रबंध के रूप में लिखी है।
(1951) डच का नाम इस प्रकार है:
‘‘कल्सस एन रितुवैल फान हत ओर्तोदॉसक्स हिन्देस्म’’
अंग्रेजी भाषा में जहाँ तक मेरी जानकारी है केवल दो प्रमुख ग्रंथ हैं जिनमें पूर्वजों के धरोहर के बारे में वर्णन मिलता है। प्रथम है डॉ. जे. डी. स्पेकमान्न जिन्होंने सूरीनाम में भारतीयों के विवाह और रिश्ते-नाते के संबंध में अंग्रेजी में लिखा है: marriage and kinship among the indians in suriname.
दूसरे हैं डॉ. उर्षबुध आर्य जिन्होंने भारतीयों के लोकगीत पर अंग्रेजी में अपना शोध प्रबंध लिखा है : ritual songs and folks songs of the indians in suriname (1968).
भारतीय मूल के शिरोमणी डॉ. ज्ञान हंसदेव अधीन ने 1953 में हिन्दी-डच शब्दकोश का संग्रह किया जिसके प्रकाशक है ‘‘विद्या पुस्तक सदन, पारामारीबो।’’ स्वर्गीय श्री एम.ए. गुलजार ने भी 1966 में डच के माध्यम से हिन्दुस्तानियों की भाषा को सीखने की एक पाठ्यपुस्तक का निर्माण किया। आप डच भाषा अध्यापक, भारतवंशियों की भाषाओं के प्रसिद्ध अनुवादक रहे हैं। सूरीनाम की धरती पर विकसित भारतवंशियों की बोलचाल की भाषा ‘सरनामी’ (हिन्दी) पर डॉ. ज्ञान हंसदेव अधीन जी की रोमन लिपि में सरनामी हिन्दुस्तानी की वर्तनी का प्रस्ताव किया था जिसका प्रकाशन 1964 में पारामारीबो में हुआ था। इस प्रकार सूरीनाम में हिन्दी अपना स्थान बनाए हुए हैं।

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