07/08/2026
🔱🌹भगवान् शिवकी रघुपतिव्रतनिष्ठा🌹🔱
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#कामाख्या
#बगलामुखी
#छिन्नमस्ता
"शिव-सम को रघुपति-व्रत-धारी।
बिनु अघ तजी सती-असि अस नारी।।"
🔱🌹🌺 #श्रीरामचरितमानसकी इस चौपाईमें ग्रन्थकार श्रीगोस्वामीने महर्षि याज्ञवल्क्यके प्रवचन द्वारा भगवान् शिव और माता सतीदेवीकी असीम महिमा बड़े ही सुन्दर ढंगसे प्रतिपादित की है। प्रथम चरणमें 'शिव-सम को' और द्वितीय चरणमें 'सति-असि नारी' पदके द्वारा दम्पतिकी महिमाकी गम्भीरता पराकाष्ठाको पहुॅंचा दी गई है। भगवान् शिवके लिये 'रघुपति-व्रत-धारी' विशेषण ही उनके व्रतकी महत्ताको प्रकट कर रहा है, क्योंकि संसारमें सब धर्मोंका सार, सब तत्त्वोंका निचोड़ भगवत्प्रेम ही निश्चित किया गया है। भगवान् परब्रह्ममें दृढ़ निष्ठाका हो जाना ही परम् विशिष्ट धर्म है और भगवान् शिवने तो अपने अनुभवसे इसीको सार समझकर सम्पूर्ण जगतको नि:सार निश्चित कर लिया था। जैसे-----------
"उमा कहौं मैं अनुभव अपना।
सत हरिभजन जगत सब सपना।।"
🔱🌹🌺 #अब चौपाईके दूसरे चरण पर दृष्टिपात करें---
'बिनु अघ तजी सती असि नारी।'
इस पदमें 'अघ' शब्द आया है। अघ और अपराधमें महान् अन्तर है। अघ उस दुष्कर्मको कहते हैं जो वेदादिद्वारा निषिद्ध होनेपर भी जान-बूझकर अपनी वासनानुसार किये जाते हैं। अतः वह क्षम्य कभी नहीं हो सकते, उनका फल अवश्यमेव भोगना पड़ता है। परन्तु 'अपराध' चूकको कहते हैं, जो सदैव क्षम्य होती है, क्योंकि वह किसी पापबुद्धि या कुवासनाके कारण न होकर भूलसे की जाती है।
#माता सतीने जो सीताका वेष धारण किया था उसमें कदापि कोई कुवासना न थी। उसका उद्देश्य तो केवल यही जाॅंच करनेका था कि श्रीरघुनाथजी सचमुच ही सच्चिदानन्द ब्रह्मके अवतार हैं अथवा राजपुत्र हैं। केवल भगवत्स्वरूपके बोधार्थ सीताका वेष धारण करना 'अघ' नहीं कहा जा सकता। और नारीका त्याग केवल अघके ही कारण हो सकता है। परन्तु केवल अपराध हो जानेपर, जो क्षम्य भी हो सकता है, भगवान् शिवने उसे क्षमा न कर उपासनामें विरोध पड़नेके भयसे त्याग दिया। भगवान् शिवकी इस रघुपतिव्रतनिष्ठाको कोटि-कोटि दण्डवत् प्रणाम् है।
आचार्य पवन कुमार ओझा
श्रीश्रीपरमहंस कानन आश्रम
गोह, औरंगाबाद, बिहार, भारतवर्ष।
०७/०८/२०२६