साधन-समर Acharya P K Ojha

साधन-समर Acharya P K Ojha Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from साधन-समर Acharya P K Ojha, श्रीश्रीपरमहंस कानन आश्रम, अलहन परासी, पो./सिंघाडी, थाना-गोह, जिला-औरंगाबाद, बिहार-, भारत ।, Goh.

[शाक्त, शैव और वैष्णवकी त्रिपथगा]
🌹भक्ति, योग और तन्त्र🌹
[This page is devoted to Divine and insightful interpretation of Ancient Vedic Science, with emphasis on the key principles and philosophies of Sanatani Sanskriti, as in our Eternal Scriptures.]

🌹नाम-जप ही भक्ति नहीं है🌹---------------------------------------------🔥🌺 #जिससे प्रेम होता है उसके नामका जप करना नहीं पड...
21/05/2026

🌹नाम-जप ही भक्ति नहीं है🌹
---------------------------------------------
🔥🌺 #जिससे प्रेम होता है उसके नामका जप करना नहीं पड़ता। विचार करके देखें---जिन स्त्री, पुत्र और मित्र आदिमें प्यार होता है, क्या कोई उनका जप करता है ? जिसको धन प्रिय होता है, क्या वह उसका जप करता है ? जिससे प्यार होता है उसका स्मरण और चिन्तन तो अपने-आप होता है, करना नहीं पड़ता, क्योंकि प्रेम प्रयत्नसाध्य नहीं है, वह तो वह भगवान् पर विश्वास करके उनको अपना समझकर अपने-आपको उनके चरणोंमें समर्पण कर देनेसे होता है।
इससे यह नहीं समझना चाहिये कि नाम-जप नहीं करना चाहिये। जिसका नामपर विश्वास हो उसके लिये नाम-जप बहुत ही लाभदायक है। मेरे कहनेका अभिप्राय तो इतना ही है कि नाम-जप ही भक्ति है, ऐसी बात नहीं है।
---------एक विशुद्ध और सिद्ध महात्मा।

प्रेषक-
आचार्य पवन कुमार ओझा
पटना, बिहार, भारतवर्ष।
२१/०५/२०२६

🔱मेरी भी सुनो🔱------------------------🌹मृत्यु की धारणा मृत्यु के प्रति भय को जन्म देती है और इसी से आभास होता है कि जीवन...
19/05/2026

🔱मेरी भी सुनो🔱
------------------------
🌹मृत्यु की धारणा मृत्यु के प्रति भय को जन्म देती है और इसी से आभास होता है कि जीवन नाशवान है। यही भावना दृढ़ होकर वैराग्य का रूप धारण कर लेती है। इसी वैराग्य ने मुझे जहाॅं एक ओर अन्तर्मुखी बना दिया, वहीं दूसरी ओर मुझमें सत्य की खोज की प्रवृत्ति भी जागृत कर दी।🌹

"The very notion of death gives rise to the fear of death, and from this emerges the awareness that life is perishable. This feeling, when deeply rooted, gradually assumes the form of detachment. It is this detachment that, on one hand, turned me inward, and on the other, awakened within me the longing to seek the Truth."

आचार्य पवन कुमार ओझा
श्रीश्रीपरमहंस कानन आश्रम
गोह, औरंगाबाद, बिहार, भारतवर्ष।
१९/०५/२०२६

🌹यौवन 🌹 ----------------------------🌺 #विवेकरहित यौवन चंचल मनकी विभिन्न क्रिडामयी प्रवृत्तियों का आखेट बन जाता है तथा वह...
11/05/2026

🌹यौवन 🌹
-------------------
---------🌺 #विवेकरहित यौवन चंचल मनकी विभिन्न क्रिडामयी प्रवृत्तियों का आखेट बन जाता है तथा वह एक दुःख से दूसरे दुःख में गिरता जाता है। हृदयके गह्वरमें रहनेवाला काम का दैत्य आत्म-संयम से हीन युवक और युवतियों को अपने वश में कर लेता है।
---------🌺 #हे साधु! केवल उन्हीं लोगोंका आदर किया जाना चाहिये और केवल वे ही मनुष्य कहे जानेके अधिकारी हैं, जिन्होंने यौवनकी संक्रान्ति का सन्तरण अनुद्विग्न रूपसे कर लिया है।
---------🌺 #हे साधु! जो यौवन विनयसे विभूषित तथा कृपालुता जैसे गुणोंसे प्रोज्जवल है, वही यौवन सुन्दर है। वस्तुत: इस संसारमें इस प्रकारका यौवन प्राप्त करना अत्यन्त विरल है।

आचार्य पवन कुमार ओझा
श्रीश्रीपरमहंस कानन आश्रम
गोह, औरंगाबाद, बिहार, भारतवर्ष।
११/०५/२०२६

🌺ईश्वरके अस्तित्व का प्रमाण🌺---------🌹 #ईश्वरके अस्तित्व का प्रमाण जैसाकि महापुरुषों द्वारा उद्घोषित किया गया है पुस्तको...
08/05/2026

🌺ईश्वरके अस्तित्व का प्रमाण🌺
---------🌹 #ईश्वरके अस्तित्व का प्रमाण जैसाकि महापुरुषों द्वारा उद्घोषित किया गया है पुस्तकों में नहीं है, न ही दूसरोंके शब्दोंमें है। यह आपके भीतर है। जब आप शान्तिपूर्वक बैठते हैं और प्रार्थना करते हैं, और कुछ नहीं होता है, तो आपका ईश्वरसे सम्पर्क नहीं हुआ है। अन्धी प्रार्थना तथा अनुचित प्रयोजनके साथ प्रार्थना करना प्रभावी नहीं होता। यदि आप आजसे प्रतिदिन पाॅंच घण्टे प्रार्थना करें कि आप हेनरी फोर्ड हो जायें तो वह प्रार्थना स्वीकार नहीं की जायेगी। परन्तु यदि आप ईश्वरसे प्रार्थना करें, "मैं आपका बच्चा हूॅं। मैं आपके प्रतिबिम्बमें बना हूॅं। मुझे अपने साथ एक बनायें।" यह प्रार्थना पूरी की जायेगी।
----------🌹 #लहर नहीं कह सकती, "मैं सागर हूॅं," क्योंकि सागर बिना लहरके अस्तित्व में रह सकता है। परन्तु सागर कह सकता है, "मैं लहर हूॅं।" क्योंकि लहर सागरके बिना अस्तित्वमें नहीं रह सकती। यह कहना सही है कि सागर लहर हो गया है। उसी प्रकार, यह कहना सबसे बड़ा भ्रम है, "मैं ईश्वर हूॅं।" आपको सचमुच भीतर, अपने अनुभव द्वारा जानना चाहिये कि आप उनके साथ एक हैं तथा उनके चमत्कारोंको क्रियान्वित कर सकते हैं। जब आप अपनी चेतनाको प्रत्येक परमाणुमें, समस्त अंतरिक्षमें तथा सृष्टिसे परे अनुभव कर सकते हैं तब आप न्यायोचित ढंगसे कह सकते हैं कि, "ईश्वर और मैं एक हूॅं" -----परन्तु तबतक नहीं।

प्रेषक-
आचार्य पवन कुमार ओझा
०८/०५/२०२६

07/05/2026

Kamakhya
Baglamukhi
Chhinmasta

🌹परमात्मामें लीन हो जाओ🌹
--------------------------------------------
🌺 #आध्यात्मिक चेतनाके उच्चतर स्तरों पर साधक दृश्यजगतको पूरी तरह भूल जाता है। जैसे एक शिकारी जब अपने कार्यमें लीन रहता है तो उसके पास से जाती हुई कोलाहलपूर्ण बारात का भी भान उसको नहीं होता।
🌺 #आध्यात्मिक जीवनका यह मूलभूत सिद्धांत है कि जिसे भी हम सत्य समझते हैं, वह हमारी समग्र शक्ति, बुद्धि, मन और कार्यक्षमताको अपनी ओर खींच लेता है। यदि हम इस जगतको सत्य मानें, तो हम उसीमें तल्लीन हो जाते हैं। वैज्ञानिक ब्राह्माण्डके सूक्ष्म चिन्तनमें अत्यधिक लीन रहता है। यदि तुम आध्यात्मिक जीवन-यापन करना चाहते हो तो यह जगत तुम्हें आत्मा से अधिक सत्य प्रतीत नहीं होना चाहिये। भगवानको समग्र जगतसे अधिक सत्य समझे बिना द्वैतवादी भी नहीं हुआ जा सकता। एक द्वैतवादी भी जगतको ईश्वरकी तुलनामें निम्नतर स्तरकी सत्ता मानता है। परमात्मा ही एकमात्र नित्य और अमर है। कोई भी धर्म, जगतको उतना सत्य नहीं समझता, जितना परमात्मा को।
प्रेषक-
आचार्य पवन कुमार ओझा
श्रीश्रीपरमहंस कानन आश्रम
गोह, औरंगाबाद, बिहार, भारतवर्ष।
०७/०५/२०२६

 #ये दो बातें अवश्य ध्यानमें रखनी चाहिये-------------------------------------------------------------( १ ) हमको कोई दुःख...
06/05/2026

#ये दो बातें अवश्य ध्यानमें रखनी चाहिये----
---------------------------------------------------------
( १ ) हमको कोई दुःख नहीं दे सकता बिना हमारे प्रारब्धके। इसलिये हमारे दुःखमें यदि कोई निमित्त बनता है तो वह अपना बुरा स्वयं करता है। स्वयं अपने लिये खाई खोदता है। वह भूला हुआ है। इसलिये दयाका पात्र है, क्षमाका पात्र है।
( २ ) हम किसीको दुःख नहीं पहुॅंचा सकते बिना उसके प्रारब्धके, परंतु दुःख पहुॅंचानेकी इच्छा करते ही हम नया पाप कर बैठते हैं। हमें उसका फल अवश्य मिलेगा।
🌹🌺 #अतएव जब दूसरा कोई हमें दुःख पहुॅंचाये तब उसे अपने प्रारब्धका भोग मानें और उसपर रोष न करें। हम किसीको दुःख पहुॅंचा नहीं सकते बिना उसके प्रारब्धके। इसलिये वैर होनेपर भी किसीको दुःख पहुॅंचानेकी चेष्टा करके नया पाप न करे। ये दो सिद्धांत मान लेने चाहिये।

प्रातः स्मरणीय, परम् श्रद्धेय 'भाईजी' श्रीहनुमान प्रसादजी पोद्दार
प्रेषक-
आचार्य पवन कुमार ओझा
श्रीश्रीपरमहंस कानन आश्रम
गोह, औरंगाबाद, बिहार, भारतवर्ष।
०६/०५/२०२६

🔥जीवनमुक्ति🔥=============== ---------🌹🌺 #वह मिथ्या संसार-वासना जो पूर्वके हजारों वर्षोंसे चलता आ रहा है, वह निरन्तर-अभ्य...
04/05/2026

🔥जीवनमुक्ति🔥
===============
---------🌹🌺 #वह मिथ्या संसार-वासना जो पूर्वके हजारों वर्षोंसे चलता आ रहा है, वह निरन्तर-अभ्यास योगके माध्यमसे वैराग्य साधनके बिना अन्य किसी प्रकारसे भी क्षयको प्राप्त नहीं होता।
--------🌹🌺 #अतएव इस भीषण संसार-यातनाके निवारणके लिये शास्त्रोंका विचार करें, इन्द्रियोंका निग्रह करें, और तपस्याके द्वारा ज्ञानको बढ़ा कर शुभबुद्धि के लिये उपाय करें, तब जाकर वैराग्यका उदय होगा। साधु संगके द्वारा वैराग्यबीज संचित होकर यथासमय स्वयं अंकुरित होता है, क्योंकि साधुगण कभी भी अनित्य अथवा वृथा विषयकी चिंतामें मनोनिवेश नहीं करते तथा उन विषयोंकी कल्पना भी नहीं करते।अतएव उनके साथ रहने वालों में भी उसी प्रकारकी शिक्षा मिलनेके कारण शनै: शनै: उसी प्रकार मनोवृत्तिको प्राप्त कर वैराग्यबीज अंकुरित होता है।
---------🌹🌺 false worldly desires that have been continuing for thousands of years from the past cannot be brought to an end by any means other than through sustained practice (abhyāsa yoga) combined with the discipline of detachment (vairāgya).
---------🌹🌺 , in order to remove the terrible sufferings of worldly existence, one should reflect upon the scriptures, restrain the senses, and, through austerity (tapas), cultivate knowledge and adopt means for attaining pure and noble understanding. Only then does detachment (vairāgya) arise.

---------🌹🌺 the company of the virtuous (sādhu-saṅga), the seed of detachment is accumulated and, in due course, it naturally sprouts. This is because the wise never engage their minds in thoughts of transient or futile sense objects, nor do they even (imagine) such things. Consequently, those who live in their company gradually receive the same teachings, and little by little, their mental tendencies become similar, allowing the seed of detachment to sprout within them.

-----परमहंस परिव्राजकाचार्य
अनन्तश्री स्वामी निगमानन्द सरस्वतीदेव।
प्रेषक-
आचार्य पवन कुमार ओझा
श्रीश्रीपरमहंस कानन आश्रम
गोह, औरंगाबाद, बिहार, भारतवर्ष।
०४/०५/२०२६

🌹एक पत्र और महायोगी🌹---------------------------------------- #गतांकसे आगे....................... ---------🌹🌺 #फिर तुम और...
04/05/2026

🌹एक पत्र और महायोगी🌹
----------------------------------------
#गतांकसे आगे.......................
---------🌹🌺 #फिर तुम औरोंकी सेवा करनेके योग्य बननेके लिये उच्चतर जीवन बिताने की बात करते हो। लेकिन "उच्चतर जीवन बिताना" एक बड़ी अस्पष्ट सी बात है तथा "औरोंकी सेवा करना" योग का उद्देश्य नहीं है। योगका उद्देश्य है एक नितान्त नयी चेतनामें प्रवेश, जिसमें तुम अपने मन और अहं में नहीं रहते बल्कि दिव्य चेतनामें चले जाते हो और अपनी सत्ताके अन्तर्तम सत्यमें विकसित होते हो। वह सत्य मन, प्राण और शरीरसे ऊपर है। बहुत सी योग प्रणालियोंका उद्देश्य है वर्तमान जीवनसे एकदम अलग होकर इस महान सत्ताके साथ एक हो जाना। लेकिन इस योगमें हमारा लक्ष्य है मन, प्राण और शरीरको दिव्य सत्ताकी अभिव्यक्तिमें रूपांतरित करना और बाहरी और भीतरी जीवनको उसी सत्यका मूर्त रूप बनाना---और यह कहीं अधिक कठिन प्रयास है। और सब धर्मोंको छोड़कर इसी महत्तर चेतना द्वारा कार्य करना, जीवनका एकमात्र नियम बन जाता है।इस जीवनका आधारभूत नियम यह है कि तुम न तो अपने अहं की और न औरोंकी सेवा करो, केवल दिव्य शक्तिके सेवक और उसके कार्यके यन्त्र बनो।
----------------महर्षि अरविन्द।
प्रेषक-
आचार्य पवन कुमार ओझा
श्रीश्री परमहंस कानन आश्रम
गोह, औरंगाबाद, बिहार।
०४/०५/२०२६

🌹एक पत्र और महायोगी 🌹--------------------------------------------🌹🌺 #विवाहित जीवनके बारेमें.............. इन बातोंमें उच...
30/04/2026

🌹एक पत्र और महायोगी 🌹
---------------------------------------
-----🌹🌺 #विवाहित जीवनके बारेमें..............
इन बातोंमें उचित नियम यह है कि जबतक तुम्हारे अन्दर कर्तव्यका भान हो, जबतक कि तुम्हें उससे छुटकारा न मिल जाये, तुम्हें उसका अनुसरण करना चाहिये। तुम्हें आध्यात्मिक जीवनमें प्रवेश करते समय कोई पापकी शंका, पछतावा, किसी प्रकारका खिंचाव या आकर्षण अपने साथ न ले जाना चाहिये। इसी तरह अगर तुम्हारे अन्दर सामान्य व्यावहारिक मानवके लिये, कमाने, उज्जवल भविष्य, सामान्य उद्देश्योंके लिये अपनी क्षमताओंका उपयोग करने या सामान्य मानव चेतनामें चमकनेका आकर्षण हो तो तुम्हें सबकुछ छोड़कर योगकी ओर अग्रसर न होना चाहिये, क्योंकि हो सकता है कि तुम्हारे अन्दर सिर्फ आध्यात्मिक जीवन या योगके लिए एक मानसिक आकर्षण मात्र हो।
#आध्यात्मिक चेतना और आध्यात्मिक जीवनको पाना बहुत कठिन है। उसके लिये बहुत गंभीर और सशक्त पुकारकी आवश्यकता होती है और किसी प्रकारकी सिद्धि पानेके लिये यह आवश्यक है कि तुम्हारी समस्त ऊर्जा एक लक्ष्यकी ओर मुड़ी हो, जिन लोगोंने अपने सभी सम्बन्ध काट दिये हों उनके लिये भी दोहरी चेतनासे बचना कठिन होता है। उनकी एक चेतना अन्दरकी ओर मुड़ी होती है और आध्यात्मिक परिवर्तनकी मांग करती है, दूसरी, जो सामान्य जीवनकी गतिविधियोंसे बंधी होती रहती है और उन्हें आध्यात्मिक अनुभूतियोंसे नीचे, निम्न प्रकृतिके अपरिवर्तनशील मार्गकी ओर बड़े हठके साथ खींचती रहती है। अगर तुम्हें पूरी तरहसे, अविभक्त पुकार नहीं हुई है तो ज्यादा अच्छा है कि तबतक डुबकी न लगाओ जबतक तुम अत्यन्त कटु संघर्ष, बहुत अधिक कठिनाइयों, बार-बार आनेवाली फिसलनों और कटी-छंटी, सन्देहास्पद प्रगतिके लिये तैयार न हो जाओ। ऐसी अवस्थामें ज्यादा अच्छा तो यह है कि सामान्य मानव जीवनमें, पारिवारिक जीवन बिताते हुए अपने-आपको ध्यान और एकाग्रताके द्वारा तबतक तैयार करो जबतक की आध्यात्मिक आकर्षण इतना प्रबल न हो जाये कि वह और सब पर छा जाये और उन्हें नष्ट न कर दे.............................।
---------महर्षि अरविन्द।
प्रेषक-
आचार्य पवन कुमार ओझा
श्रीश्रीपरमहंस कानन आश्रम
गोह, औरंगाबाद, बिहार, भारतवर्ष।
३०/०४/२०२६

Address

श्रीश्रीपरमहंस कानन आश्रम, अलहन परासी, पो./सिंघाडी, थाना-गोह, जिला-औरंगाबाद, बिहार-, भारत ।
Goh
८२४२०३

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when साधन-समर Acharya P K Ojha posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share