07/10/2026
🌺मैं, महिषी और मेरी माँ तारा:
सूक्ष्म जगत का आँखों देखा सत्य और भविष्य की चेतावनी🌺
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🌺🌹१९९७-९८ का वह वर्ष जब मुझे प्रातः स्मरणीय, परम् श्रद्धेय, परम् पूज्य गुरुदेव, भगवान् 'ठाकुर' श्रीश्रीरामकृष्ण परमहंस ने अद्भुत और अलौकिक कृपासे इस अबोध और अनभिज्ञ ब्राह्मण बालक को तन्त्रमें दीक्षित कर अनुग्रहित किया था। वो समस्त प्रक्रियाएं सूक्ष्म रूप में स्वत: घटित हुई थी, ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूॅं कि इससे संबंधित चिंतन न तो मैंने कभी किया था और न ही कभी चाहा था। उस समय मैं इस विद्या को जानता था, कि स्थूल, सूक्ष्म, कारण और महाकारण भी है अथवा तो होता है। परन्तु मैं भी उसके लायक हूॅं, ये मुझे पता नहीं था।
🌺🌹 #इस सृष्टिमें अकारण तो कुछ घटित होता नहीं है, अतः मैं एक अद्भुत और अलौकिक और रहस्यमय घटना की चर्चा कर ही देता हूॅं, क्योंकि उसके बिना उपरोक्त और अन्य सभी आध्यात्मिक घटनाओंका आधार ही नहीं होगा। चूंकि मेरे आदरणीय पिताश्री बिहार सरकार में एक अधिकारीके पद पर रह चुके हैं। १९९१-९३ में उनके साथ कुछ दिन रहनेका अवसर प्राप्त हुआ और उसी समय रहस्मय ढंग से मुझे 'अष्टभुजी' माता दुर्गाकी एक अद्भुत छवि प्राप्त हुई जो कमल पुष्पोंसे वृताकार होकर माता को आवेष्टित की हुई थी। फिर अचानक मुझे आन्तरिक प्रेरणा हुई और मैंनें उनपर सर्वस्व न्योछावर कर माॅं एवं गुरु, दोनों रूपोंमें उन्हें स्वीकार कर लिया। आगे चलकर इनकी अलौकिक कृपासे देवी कवच आदि और सिद्ध-कुंजिका मेरे नियंत्रण में हो गया, इसका रहस्योद्घाटन २००२ में तब हुआ जब मेरा सामना पटना में एक अघोरी तांत्रिक से हुआ। इससे संबंधित विस्तृत चर्चा मैं बाद में फिर कभी करूंगा।
२००२ में मैं पहली बार पश्चिम बंगालके वीरभूम जिले में स्थित 'तारापीठ' गया था। उसके बाद से ही मेरे विशुद्ध अन्तःकरणमें एक विचार प्रवाहमान था कि मुझे सहरसा, बिहार में स्थित 'महिषी' शक्तिपीठ भी अवश्य जाना चाहिये, और वो चिर प्रतिक्षित इच्छा पूरी हुई ०१/१०/२०२६ को जब मेरे जानेके लिये सारे मार्ग प्रशस्त कर दिये गये स्वयं माॅं ताराके द्वारा।
३०/०९/२०२६ को रात्रिमें पटना से ही मेरी गाड़ी खुली और प्रातःकाल वहाॅं पहुॅंचा। फिर स्नानादि से निवृत होकर मैं माॅं ताराके मंदिर परिसर में कदम रखा। जैसा कि मैं सदैव करता हूॅं, पहले चारों तरफ से मंदिर का अवलोकन किया, फिर गर्भगृह में प्रवेश किया, माॅं के विग्रह आदि पर दृष्टिपात किया और फिर बाहर आकर बलि स्थान को देखा। तत्पश्चात् गर्भगृहमें स्थित माॅं तारा, एकजटा, नील सरस्वती और भूतभावन भगवान् शिवका ही एक रूप 'अक्षोभ्य' (भैरव) विग्रहके ठीक सामने लगभग ५० फीट की दूरी पर अपना आसन ग्रहण लिया।
🌺🌹 #मैं न्यास आदि करके माॅं ताराकी अद्भुत और अलौकिक ऊर्जाके साथ स्वयंको स्थापित करनेवाला ही था कि, अचानक मेरा शरीर शीतल हो गया और मेरा भौतिक शरीर असहाय, अक्षम और निष्प्राण हो गया। अब मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि, ये सब हुआ कैसे ? और इसका कारण क्या है ? फिर मैंने 'ठाकुर' श्रीश्रीरामकृष्ण परमहंस देव का स्मरण किया, और कहा कि ये सब क्या हो रहा है ? तब माॅं तारा नें आकाशवाणी की, कि "अपनी शक्तियों का प्रयोग यहाॅं मत करो।" मैंने कहा कि माॅं तुम अच्छी तरह से जानती हो कि ये सभी शक्तियाॅं जिनमें कुछ नकारात्मक ऊर्जा वाली भी हैं मेरी सुरक्षा व्यवस्था में रहती हैं और तुमने हीं अपने अन्य रूपों में आकर इन्हें मुझको प्रदान भी किया है। फिर माॅं ने कहा कि "मैं तुम्हारी परीक्षा लेकर ये देखना चाहती थी, कि तुमको मृत्यु भयभीत करती है या नहीं, क्योंकि आनेवाले समय में तुम्हें ऐसी अन्य परिस्थितियोंका सामना करना पड़ सकता है।"
🌺🌹 #फिर माॅं के समक्ष मैंने उससे कहा, कि क्या तुम्हारे रहते ब्रह्माण्डकी कोई भी शक्ति मुझे भयभीत कर सकती है भला! फिर माॅं ने कहा कि आनेवाला समय बहुत ही भयावह है पुत्र, अतः तुमको मैं पहले से और सबल एवं शक्तिशाली बनाना चाहती हूॅं। आचार, विचार, संस्कार और हर प्रकार से नैतिक मूल्योंका पतन हो जायेगा। लोग काम और अर्थ अर्थात् भोग-विलास में आकण्ठ डूब जायेंगे, अच्छे-अच्छे ज्ञानी, भक्त, साधु-संत, महात्मा, विद्वान आदि अपने मूल सिद्धांतों से भटककर कलियुगी प्रवाहमें बह जायेंगे। अतः ब्रह्मचर्य व्रतका कठोरताके साथ पालन करो। मैं सदैव तुम्हारे साथ थी और रहुॅंगी। मैं किसी भी परिस्थितिमें तुम्हें नहीं छोड़ सकती।"
🌺🌹 #कुछ और गोपनीय संवाद हुआ, जिसका संबंध भारतवर्ष और सम्पूर्ण विश्वसे है, जिसे मैं व्यक्त नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसा करनेसे सृष्टि और प्रकृतिके योजनाओं में हस्तक्षेप होगा जो मैं नहीं कर सकता।
अब मुझे और लिखने की अनुमति नहीं हो रही है, अतः मैं इस संवाद को यहाॅं विराम देता हूॅं।
आप सभीका परम् मंगल हो!
जय माॅं तारा।
जय माॅं कामाख्या।
तुम्हारा अबोध बालक-
आचार्य पवन कुमार ओझा
श्रीश्रीपरमहंस कानन आश्रम
गोह, औरंगाबाद, बिहार, भारतवर्ष।
०७/१०/२०२६