30/04/2025
#बैकुण्ठ में #भगवान_श्रीहरि_नारायण के पार्षद िजय को सनत्कुमार के शाप से असुर योनि प्राप्त हुई थी। कृपालु महर्षि ने तीन जन्म में पुनः बैकुण्ठ लौट आने का इनका विधान कर दिया था।
#पहले जन्म में दोनों दिति के पुत्र हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु हुए। हिरण्याक्ष को भगवान ने वराह रूप से और हिरण्यकशिपु को नृसिंह रूप धारण करके मारा।
#दोनों का दूसरा जन्म रावण-कुम्भकर्ण के रूप में हुआ। त्रेता में श्रीराघवेन्द्र के बाणों ने दोनों को रणशैय्या दी। #अब द्वापर में दोनों शिशुपाल-दन्तवक्र होकर उत्पन्न हुए थे। शिशुपाल को श्रीकृष्ण ने सायुज्य दे दिया। अब दन्तवक्र की नियति उसे उत्तेजित कर रही थी। और श्राप या श्राप से मुक्ति के कारण श्री कृष्ण पर आक्रमण कर बैठा और अंत मे मृत्यु को प्राप्त हुआ।
#संक्षेप में कहें तो #तीन_आसुरी_योनियों_से_होते_हुए_मोक्ष_को_प्राप्त कर अपने चिर पुरातन पद #श्रीहरि_नारायण_के_सानिध्य_बैकुण्ठ_को_प्राप्त_हुए।
#आत्मसमीक्षा_अतिआवश्यक_है, अगर कोई मोक्ष प्राप्त करना चाहता हो तो अपनी आत्मसमीक्षा कर क्योंकि, श्री हरि नारायण के पार्षद को मोक्ष में तीन जन्म आसुरी कुल में ले कर श्रीहरि के हाथों मोक्ष पाना सम्भव हुआ।
मानव = मा + नव = नहीं है + नया
हे मानव! तू नया नहीं है, अपने को अपने वस्त्र (शरीर) से मत जान, तू तो वास्तव में आत्मा है। शरीर तो तेरा एक वस्त्र मात्र है, जिसे कई बार बदल कर तू अंत में श्रीहरिधाम को प्राप्त होगा।
अपने आस पास आसुरी और दैविक आत्माओं की पहचान करने को परम् पिता ने तुम्हें विवेक प्रदान किया है। इसके प्रयोग से अपने आसुरी प्रवृत्ति का त्याग कर देवत्व को जगा कर अपने मोक्ष के मार्ग को सरल कर अन्यथा इस जन्म में तो अपने को महामानव समझ कर छद्म अहं में अपने मोक्ष को क्षय करेगा ही साथ ही साथ जन्म जन्मान्तर के चक्र को प्राप्त होगा।
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✍️ जय वैद्यनाथ