23/05/2026
वाणी तो अनमोल है
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संतवाणी में वाणी को केवल बोलने का साधन नहीं, अपितु आत्मा का दर्पण माना गया है। मनुष्य का अंतःकरण जैसा होता है, उसकी वाणी भी वैसी ही निकलती है। इसी को परम संत कबीर कहते हैं—
बोली तो अमोल है, जो कोइ बोले जान।
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आन।।
अर्थात् "वाणी अमूल्य है। उसका मूल्य वही जानता है, जो बोलने की मर्यादा और प्रभाव को समझता है। वाणी को मुख से निकालने के पूर्व उसकी उपयोगिता -अनुपयोगिता को हृदयरूपी तराजू पर तौलकर, तब मुख से प्रकट करना चाहिए।"
मनुष्य-जीवन में जितने भी कलह, वैर, तनाव और दुःख उत्पन्न होते हैं, उनमें अधिकांश का कारण असंयमित वाणी होती है। एक कठोर शब्द वर्षों का प्रेम नष्ट कर सकता है और एक मधुर वचन पत्थर जैसे हृदय को भी पिघला सकता है। इसलिए भारतीय ऋषियों ने वाणी-सुधार को तप, साधना और योग का अंग माना है।
महाभारत का प्रसंग : द्रौपदी द्वारा दुर्योधन के प्रति कहा गया व्यंग्य — “अंधे का पुत्र अंधा”— आगे चलकर महाविनाश का कारण बना। एक असावधान वाणी ने पूरे कुरुवंश को युद्ध की ज्वाला में झोंक दिया। यह घटना शिक्षा देती है कि वाणी का तीर निकल जाने पर वापस नहीं आता।
रामायण का प्रसंग : रामचरितमानस में मंथरा की कुटिल वाणी ने कैकेयी के मन को विषाक्त कर दिया। परिणामस्वरूप श्री राम को वनवास हुआ, दशरथ की मृत्यु हुई और समूचे अयोध्या में शोक फैल गया। यह प्रसंग बताता है कि दुष्ट संगति और विषैली वाणी मनुष्य के विवेक को ढक देती है। इसलिए गीता (२:६२) कहते हैं—
संगात् संजायते कामः।
अर्थात "जैसी संगति और जैसी बातें, वैसा ही मन बन जाता है।"
याद रखें, अध्यात्म केवल ध्यान या जप का नाम नहीं है, अपितु अध्यात्म वाणी की पवित्रता का भी साधन है। जिसकी वाणी कटु, छलपूर्ण और अपमानजनक है, उसका ध्यान भी स्थिर नहीं हो सकता।
मन, वाणी और कर्म — इन तीनों की शुद्धि से ही अध्यात्म की साधना पूर्ण होती है। मन में द्वेष हो और मुख पर मधुरता, इसे कपट कहते हैं, साधना नहीं। कबीर साहब कहते हैं —
मनसा वाचा कर्मणा, कबीर सुमिरन सार।
अर्थात् "मन, वाणी और कर्म को निर्मल रखना ही सुमिरन का सार है।"
वाणी में वरदान देने की और विनाश करने की, दोनों ही शक्तियां निहित है।
एक गुरु की वाणी शिष्य का जीवन बदल देती है।
एक माता का आशीर्वाद संतान को ऊँचाइयों तक पहुँचा देता है। वहीं एक अपमानजनक शब्द किसी को जीवनभर पीड़ा दे सकता है। चाणक्य नीति में कहा गया—
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥
अर्थात "प्रिय वचन बोलने से संसार के सभी प्राणी संतुष्ट और प्रसन्न होते हैं। इसलिए हमेशा मीठे और हितकर १वचन ही बोलने चाहिए। ऐसे वचन बोलने में कंजूसी या दरिद्रता कैसी?"
सार निष्कर्ष :
वाणी केवल ध्वनि नहीं, वह संस्कारों की अभिव्यक्ति है। जिसने वाणी को साध लिया, उसने आधा संसार जीत लिया। वाणी में संयम, करुणा, सत्य और हित की भावना हो — यही साधक की पहचान है।
अतः बोलने से पूर्व स्वयं से तीन प्रश्न अवश्य करें—
(१) क्या यह सत्य है?
(२) क्या यह आवश्यक है? और
(३) क्या यह हितकारी है?
यदि उत्तर “हाँ” हो, तभी वाणी को मुख से बाहर आने दें। यही इस कबीर-वाणी का सार है और यही अध्यात्म का वास्तविक अनुशासन भी है।
शुभं भवतु मंगलं भवतु
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श्री कबीर ज्ञान मंदिर
गिरिडीह झारखंड
दिनांक 23 मई 2026