Sri Kabir Gyan Mandir

Sri Kabir Gyan Mandir has written many books which have inspired many to walk in the path for reaching ultimate happiness in life, which as per Gita is moksha.

A motivational institution in headed by Sadguru Maa in a mission to spreads the message of Sadguru Kabir and Sanatan Dharma for the benefit of humankind and guiding people to understand their soul & make their life better. श्री कबीर ज्ञान मंदिर

"श्री कबीर ज्ञान मंदिर भारत के झारखंड प्रदेश के पावन, विविध खदानों से समृृृद्ध उजले अबरख और काले हीरे की रानी गिरिडीह नगरी में अवस्थित एक जाग्रत और महान

तपःस्थली, तीर्थभूमि तथा दुर्लभ आत्मबोध का प्रकाश फैलानेवाला आध्यात्मिक केंद्र है। यह ब्रह्मनिष्ठ, आत्मस्थित महान ज्ञानी व त्यागी, परम तपस्वी दिव्य चेता महर्षि, परम विदूषी, लोकोपकारी संत-सद्गुरु ‘मां ज्ञान’ की दिव्य तपोभूमि और कर्मभूमि है। दूसरे शब्दों में, ‘श्री कबीर ज्ञान मंदिर’ सद्गुरु मां ज्ञान की बहुमुखी प्रतिभा, तप-त्याग, साधुता, नैतिकता, अथक पुरुषार्थ और ज्ञान-प्रेम का भव्य साकार रूप है।
इसके यशोज्ज्वल धर्मोदीप्त पावन प्रांगण में ‘गुरु गोविंद धाम’ भव्य मंदिर अवस्थित है, जहां सद्गुरु कबीर और भगवान नारायण का भव्य युगल विग्रह विराजित है। इसके भूमिगत तल में सद्गुरु मां ज्ञान के पूज्य गुरुदेव ‘सद्गुरु विवेक साहब’ की सिद्ध समाधि है, जो सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करनेवाली है। इसके बगल में स्थित ‘श्री कबीर ज्ञान दर्शन’ भी भव्य दर्शनीय है। यहां सद्गुरु कबीर साहब के प्रेरक जीवनदर्शन व कल्याणकारी संदेशों के मनमोहक म्यूरल तथा मध्ययुगीन भारतीय संतों के दुर्लभ पेंटिग्स बने हैं। इसके मार्बल स्तंभों में कबीर साखी व सद्गुरु मां ज्ञान के भजनों के सुलेख अंकित हैं।
यह संपूर्ण भारतवर्ष का लोकप्रिय व सतत् सक्रिय प्रकाशन केंद्र है, जहां से सद्गुरु ‘मां ज्ञान’ की पचासों से अधिक पुस्तकें व श्री कबीर ज्ञानामृत पत्रिका का प्रकाशन हो रहा है। यह एक जाग्रत केंद्र है, जहां से आत्मिक शांति, समाज सेवा, समाज सुधार, प्रेम-सौहार्द्रता के विस्तारण, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, योग शिविर, सेवा प्रकल्प इत्यादि आयोजन सदाबहार होते रहते हैं। "

Spiritual Guru साध्वी ज्ञानानद जी (Sadhvi Gyananand Jee). Kabir Gyan Mandir is a famous spiritual organization of Giridih, a small town in JHARKHAND INDIA. Its also known for Guru Govind Dham, lord Vishnu temple & Sadguru Kabir. Folks interested to know more, kindly contact

Publication House-
Shree Kabir Gyan Prakashan Kendra (Giridih,Jharkhand,India)
Address SHREE KABIR GYAN MANDIR
SANT KABIR GYAN MARG,
SIHODIH,GIRIDIH,JHARKHAND
Contact info-
Phone
06532223393
Mob - +91-9155950505

वाणी तो अनमोल है*******संतवाणी में वाणी को केवल बोलने का साधन नहीं, अपितु आत्मा का दर्पण माना गया है। मनुष्य का अंतःकरण ...
23/05/2026

वाणी तो अनमोल है
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संतवाणी में वाणी को केवल बोलने का साधन नहीं, अपितु आत्मा का दर्पण माना गया है। मनुष्य का अंतःकरण जैसा होता है, उसकी वाणी भी वैसी ही निकलती है। इसी को परम संत कबीर कहते हैं—
बोली तो अमोल है, जो कोइ बोले जान।
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आन।।
अर्थात् "वाणी अमूल्य है। उसका मूल्य वही जानता है, जो बोलने की मर्यादा और प्रभाव को समझता है। वाणी को मुख से निकालने के पूर्व उसकी उपयोगिता -अनुपयोगिता को हृदयरूपी तराजू पर तौलकर, तब मुख से प्रकट करना चाहिए।"
मनुष्य-जीवन में जितने भी कलह, वैर, तनाव और दुःख उत्पन्न होते हैं, उनमें अधिकांश का कारण असंयमित वाणी होती है। एक कठोर शब्द वर्षों का प्रेम नष्ट कर सकता है और एक मधुर वचन पत्थर जैसे हृदय को भी पिघला सकता है। इसलिए भारतीय ऋषियों ने वाणी-सुधार को तप, साधना और योग का अंग माना है।
महाभारत का प्रसंग : द्रौपदी द्वारा दुर्योधन के प्रति कहा गया व्यंग्य — “अंधे का पुत्र अंधा”— आगे चलकर महाविनाश का कारण बना। एक असावधान वाणी ने पूरे कुरुवंश को युद्ध की ज्वाला में झोंक दिया। यह घटना शिक्षा देती है कि वाणी का तीर निकल जाने पर वापस नहीं आता।
रामायण का प्रसंग : रामचरितमानस में मंथरा की कुटिल वाणी ने कैकेयी के मन को विषाक्त कर दिया। परिणामस्वरूप श्री राम को वनवास हुआ, दशरथ की मृत्यु हुई और समूचे अयोध्या में शोक फैल गया। यह प्रसंग बताता है कि दुष्ट संगति और विषैली वाणी मनुष्य के विवेक को ढक देती है। इसलिए गीता (२:६२) कहते हैं—
संगात् संजायते कामः।
अर्थात "जैसी संगति और जैसी बातें, वैसा ही मन बन जाता है।"
याद रखें, अध्यात्म केवल ध्यान या जप का नाम नहीं है, अपितु अध्यात्म वाणी की पवित्रता का भी साधन है। जिसकी वाणी कटु, छलपूर्ण और अपमानजनक है, उसका ध्यान भी स्थिर नहीं हो सकता।
मन, वाणी और कर्म — इन तीनों की शुद्धि से ही अध्यात्म की साधना पूर्ण होती है। मन में द्वेष हो और मुख पर मधुरता, इसे कपट कहते हैं, साधना नहीं। कबीर साहब कहते हैं —
मनसा वाचा कर्मणा, कबीर सुमिरन सार।
अर्थात् "मन, वाणी और कर्म को निर्मल रखना ही सुमिरन का सार है।"
वाणी में वरदान देने की और विनाश करने की, दोनों ही शक्तियां निहित है।
एक गुरु की वाणी शिष्य का जीवन बदल देती है।
एक माता का आशीर्वाद संतान को ऊँचाइयों तक पहुँचा देता है। वहीं एक अपमानजनक शब्द किसी को जीवनभर पीड़ा दे सकता है। चाणक्य नीति में कहा गया—
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥
अर्थात "प्रिय वचन बोलने से संसार के सभी प्राणी संतुष्ट और प्रसन्न होते हैं। इसलिए हमेशा मीठे और हितकर १वचन ही बोलने चाहिए। ऐसे वचन बोलने में कंजूसी या दरिद्रता कैसी?"
सार निष्कर्ष :
वाणी केवल ध्वनि नहीं, वह संस्कारों की अभिव्यक्ति है। जिसने वाणी को साध लिया, उसने आधा संसार जीत लिया। वाणी में संयम, करुणा, सत्य और हित की भावना हो — यही साधक की पहचान है।
अतः बोलने से पूर्व स्वयं से तीन प्रश्न अवश्य करें—
(१) क्या यह सत्य है?
(२) क्या यह आवश्यक है? और
(३) क्या यह हितकारी है?
यदि उत्तर “हाँ” हो, तभी वाणी को मुख से बाहर आने दें। यही इस कबीर-वाणी का सार है और यही अध्यात्म का वास्तविक अनुशासन भी है।
शुभं भवतु मंगलं भवतु
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श्री कबीर ज्ञान मंदिर
गिरिडीह झारखंड
दिनांक 23 मई 2026

प्रगटे संत कबीर  (प्राकट्य महोत्सव २८-२९ जून २०२६)  ​******        गुजरात के एक अत्यंत सम्मानित और प्रभावशाली संत 'जीवन ...
21/05/2026

प्रगटे संत कबीर
(प्राकट्य महोत्सव २८-२९ जून २०२६) ​
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गुजरात के एक अत्यंत सम्मानित और प्रभावशाली संत 'जीवन साहब' कबीर साहब को केवल एक ऐतिहासिक संत नहीं, अपितु साक्षात् पूर्ण ब्रह्म और युगावतार मानते थे। वे अपने अनेक पदों में सद्गुरु कबीर साहब का महिमा गान किया है। प्रस्तुत पद में वे कह रहे हैं —
​ ​द्वापर कान्हा प्रगटे, त्रेता में रघुवीर।
कलि काल में जीवना, प्रगटे संत कबीर।।
अर्थात "जिस प्रकार परमात्मा ने त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और द्वापरयुग में लीलाधारी श्री कृष्ण के रूप में अवतार लिया; ठीक उसी प्रकार इस अत्यंत कठिन और अंधकारमय कलियुग में जीवों का उद्धार करने के लिए, परमात्मा सद्गुरु कबीर साहब के रूप में प्रकट हुए।"
​ यहाँ जीवन साहब यह स्पष्ट कर रहे हैं कि राम और कृष्ण ने अपने-अपने युगों में दुष्टों का संहार कर धर्म की स्थापना की थी। लेकिन कलियुग की बीमारी अलग है—यहाँ शत्रु बाहर नहीं, मनुष्य के भीतर अज्ञान, पाखंड, अहंकार, और छुआछूत के रूप में विद्यमान है। इसलिए इस युग में किसी शस्त्रधारी अवतार की नहीं, एक ऐसे 'शब्द-अवतार' की आवश्यकता थी, जो ज्ञान की लाठी से मनुष्य के भीतर के अंधकार को मिटा सके। वह समर्थ स्वरूप कबीर साहब हैं।
​सद्गुरु कबीर साहब का व्यक्तित्व और उनका दर्शन संपूर्ण विश्व के इतिहास में अद्वितीय है। उनकी विलक्षणता के कुछ मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं—
​कबीर साहब इतिहास के सबसे निर्भीक संत हैं। उन्होंने बिना किसी भय के समाज में व्याप्त पाखंड, कुरीतियों और अंधविश्वास पर प्रहार किया। उन्होंने हिंदू और मुसलमान, दोनों को उनकी कमियों के लिए समान रूप से फटकारा।
कबीर ने ईश्वर को किसी मंदिर, मस्जिद या कैलाश में नहीं, अपितु हर जीव के भीतर घट-घट में व्याप्त बताया। उन्होंने कठिन हठयोग या कर्मकांड के स्थान पर 'सहज समाधि' का मार्ग दिखाया, जहाँ गृहस्थ जीवन जीते हुए भी ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है।
​कबीर साहब की सबसे बड़ी विलक्षणता यह थी कि वे धर्म, जाति, और संप्रदाय की दीवारों को ढहाने वाले अद्वितीय अवतार थे। उनके लिए न कोई अछूत था, न कोई श्रेष्ठ। उन्होंने 'मानव मात्र की एकता' का संदेश दिया।
​कबीर साहब की 'उलटबांसियों' और साखियों में जो गहरा अध्यात्म और विज्ञान छिपा है, उसने बड़े-बड़े विद्वानों को चकित कर दिया। उनकी भाष आम जनता के दिल की भाषा बन गई।
संत जीवन साहब भाव विभोर होकर कहते हैं, जहाँ राम और कृष्ण ने त्रेता और द्वापर को धन्य किया, वहीं कबीर साहब ने अपनी 'शब्द-क्रांति' से कलियुग के त्रस्त जीवों को मुक्ति का मार्ग दिखाया है। वे सचमुच इस कलियुग के सबसे जाज्वल्यमान ज्ञान-सूर्य हैं।
शुभं भवतु मंगलं भवतु
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श्री कबीर ज्ञान मंदिर
गिरिडीह झारखंड
दिनांक 21 मई 2026

तेरे घट में है राम *******परम संत कबीर साहब की अग्र लिखित वाणी अत्यंत गंभीर, रहस्यात्मक और 'यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे' पर...
19/05/2026

तेरे घट में है राम
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परम संत कबीर साहब की अग्र लिखित वाणी अत्यंत गंभीर, रहस्यात्मक और 'यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे' पर आधारित है। कबीर साहेब यहाँ बाह्य कर्मकांडों, तीर्थों और मूर्तियों तक सीमित बुद्धि का खंडन करते हुए यह समझा रहे हैं कि परम तत्व कहीं बाहर नहीं, स्वयं के भीतर ही स्थित है। ​यथा—
​काया मध्ये कोटि तीरथ, काया मध्ये काशी।
​ काया मध्ये कंवलापति, काया मध्ये बैकुंठ वासी।।
अर्थात "इस मानव शरीर (काया) के भीतर ही करोड़ों तीर्थ विद्यमान हैं और इसी के भीतर साक्षात 'काशी' स्थित है। बाहर के तीर्थों की यात्रा केवल शारीरिक श्रम है, वास्तविक तीर्थयात्रा अंतर्मुखी होना है। जिसे ढूंढने मनुष्य मंदिरों-मस्जिदों और वनों में जाता है, वह कंवलापति (लक्ष्मीपति नारायण/परमात्मा) इसी शरीर के भीतर निवास करते हैं, और वास्तविक 'वैकुंठ' (जहाँ कोई कुंठा या दुख न हो) भी इसी काया के भीतर स्थित है।" शास्त्रों में कहा गया है,
​देहौ देवालयः प्रोक्तो जीवो देवः सनातनः।
त्यजेदज्ञाननिर्माल्यं सोऽहंभावेन पूजयेत्॥
अर्थात "यह देह ही साक्षात देवालय है और इसमें रहने वाला आत्मा ही सनातन देव है। अज्ञान रूपी कालिख को पोंछकर 'मैं आत्मा ही परमात्मा हूँ' इस भाव से अपनी अंतरात्मा की पूजा करनी चाहिए।"

​छान्दोग्य उपनिषद (८.१.१) में हृदय को ही ब्रह्मपुर और वैकुंठ के रूप में परिभाषित किया गया है।
यथा —
​अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म
दहोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं...
अर्थात "इस ब्रह्मपुर यानी शरीर के भीतर एक छोटा सा कमल-समान घर (हृदय) है। उसके भीतर एक सूक्ष्म आकाश है, उस आकाश के भीतर जो स्थित है, उसे ढूंढना चाहिए। वही वास्तविक वैकुंठ और परमात्मा का निवास है।"

​श्री कृष्ण (गीता १८.६१) भी कहते हैं—
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।
अर्थात "हे अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय-देश (काया के मध्य) में स्थित है।"
​इसी प्रकार १५वें अध्याय के १५वें श्लोक में भी श्री कृष्ण कहते हैं— "सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो" मैं सब के हृदय में स्थित हूँ।

​'शिव संहिता' (द्वितीय पटल, श्लोक १-५) में शरीर के भीतर ही सारे तीर्थों, पर्वतों और नदियों की उपस्थिति का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक विवरण दिया गया है—
"​शरीर में जो रीढ़ की हड्डी (मेरुदंड) है, उसे 'मेरु पर्वत' कहा गया है। ​मेरुदंड के बाईं ओर बहने वाली ईड़ा नाड़ी को 'यमुना', दाईं ओर बहने वाली पिंगला नाड़ी को 'गंगा' और मध्य में स्थित सुषुम्ना नाड़ी को 'सरस्वती' कहा गया है। ​जहाँ ये तीनों नाड़ियाँ (भ्रूमध्य या आज्ञा चक्र में) मिलती हैं, उसे ही 'त्रिवेणी प्रयागराज' कहा गया है। जो साधक अंतर्मुखी होकर यहाँ ध्यान लगाता है, उसे करोड़ों तीर्थों का फल शरीर के भीतर ही मिल जाता है।"

​शिव-पार्वती संवाद (कुलार्णव तंत्र) भी कहता है —
​तीर्थं हि हृदयं प्रोक्तं सर्वतीर्थाश्रमप्रदम्।
अर्थात "स्वयं का हृदय ही सबसे बड़ा तीर्थ है, जो संसार के सभी तीर्थों और आश्रमों को आश्रय देने वाला है।"

सार ​निष्कर्ष —
संत मत और शास्त्र का समन्वय
सद्गुरु ​कबीर साहेब की उपरोक्त साखी वेदांत के 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ही ब्रह्म हूँ) और 'तत्त्वमसि' (वह परमात्मा तुम ही हो) के महावाक्यों का सहज हिंदी अनुवाद है।
​शास्त्रीय दृष्टि से जब तक मनुष्य बहिर्मुखी रहता है, वह काशी, मथुरा और वैकुंठ आदि को बाहर ढूंढता है। परंतु जब सद्गुरु की कृपा से अंतर्दृष्टि जाग्रत होती है, तब उसे अनुभव होता है कि जिस 'कंवलापति' को वह पूरी सृष्टि में ढूंढ रहा था, वह तो उसकी अपनी काया के मध्य ही 'चैतन्य' रूप में विराजमान है। इसलिए काया ही काशी है, काया ही वैकुंठ है और काया में ही परम ब्रह्म का निवास है —
जिन ढूंढा तिन पाइया गहरे पानी पैठ।।
शुभं भवतु मंगलं भवतु
*******
श्री कबीर ज्ञान मंदिर
गिरिडीह झारखंड
दिनांक - 19 मई 2026

सद्गुरु कबीर आविर्भाव महोत्सव, 28-29 जून 2026श्री कबीर ज्ञान मंदिर, गिरिडीह झारखंड
18/05/2026

सद्गुरु कबीर आविर्भाव महोत्सव, 28-29 जून 2026
श्री कबीर ज्ञान मंदिर, गिरिडीह झारखंड

जब तुम भीतर मुस्काते हो​हंसते-मुस्कुराते गुजर जाएगी जिंदगी, तुम जो मेरे साथ हो,टूटेंगी सब बंधन की कड़ियां, जब सिर पर तुम्...
17/05/2026

जब तुम भीतर मुस्काते हो

​हंसते-मुस्कुराते गुजर जाएगी जिंदगी, तुम जो मेरे साथ हो,
टूटेंगी सब बंधन की कड़ियां, जब सिर पर तुम्हारा हाथ हो। ।।१।।

​काँटे भी बन जाते हैं कलियाँ, जब तुम राहों में आते हो,
पतझड़ में भी वसंत खिले, जब तुम करुणा बरसाते हो। ।।२।।

​हर साँस सुमिरे नाम तुम्हारा, धड़कन में याद तुम्हारी हो,
ज्ञान का दीप जले अंतस में, मिटती मोह की रात हो। ।। ३।।

​मन-मंदिर का कोना-कोना, अब नाम से तेरे गूंज रहा,
तुम ही मेरी बंदगी प्रभुवर, तुम ही मेरी बिसात हो। ।।४।।

​जीवन की हर बाज़ी जीतूँ, जब तुम राह दिखाते रहो,
मेरा तो हर पल उत्सव है, जब तुम रक्षक बन जाते हो। ।।५।।

​भ्रम और संशयों के बादल, पल भर में छँट जाते हैं,
मिट जाता है अहम् का साया, जब तुम भीतर मुस्काते हो। ।।६।।

शुभं भवतु मंगलं भवतु
*******
श्री कबीर ज्ञान मंदिर
गिरिडीह झारखंड
दिनांक - 17 मई 2026

भक्ति की अविरल धारा ​*******​संत शिरोमणि कबीर साहेब अपनी एक कालजयी साखी में आध्यात्मिक जीवन के गूढ़ रहस्य को उद्घाटित करत...
15/05/2026

भक्ति की अविरल धारा
​*******
​संत शिरोमणि कबीर साहेब अपनी एक कालजयी साखी में आध्यात्मिक जीवन के गूढ़ रहस्य को उद्घाटित करते हुए कहते हैं:
​ गंगा तीर जो घर करै, पीवहि निर्मल नीर।
बिनु भक्ति मुक्ति नहीं, यूँ कथि रमै कबीर।।
​अर्थात : "यदि कोई साधक गंगा के पावन तट पर अपना स्थायी निवास बना ले, नित्य गंगा के शीतल और निर्मल जल का पान करे और बाह्य शुद्धि के समस्त उपकरणों में जीवन व्यतीत करे, तब भी केवल इन भौतिक क्रियाओं से उसे 'मुक्ति' प्राप्त नहीं हो सकती। जब तक अन्तःकरण में परमात्मा के प्रति अनन्य भक्ति, पूर्ण शरणागति और चित्त की निर्मलता का उदय नहीं होता, तब तक परम पद की प्राप्ति सर्वथा असम्भव है।"
​भक्ति की इसी अपरिहार्यता को श्रीमद्भगवद्गीता
(११.५४) में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है:
​ भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥
​अर्थात्, "हे परन्तप! अनन्य भक्ति के माध्यम से ही मैं वास्तविक रूप में जाना जा सकता हूँ, देखा जा सकता हूँ और मुझमें प्रवेश (एकाकार) पाया जा सकता है।"
पुनः गीता के अठारहवें अध्याय में वे उद्घोष करते हैं— “भक्त्या मामभिजानाति", अर्थात मनुष्य केवल भक्ति के दिव्य चक्षुओं से ही परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानने में समर्थ होता है।
​ इसी सत्य की पुष्टि श्रीमद्भागवत भी करता है: ​“स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।”
"वही धर्म सर्वश्रेष्ठ और वास्तविक है, जो परमात्मा के प्रति निष्काम और अविरल भक्ति को जन्म दे।"
​सद्गुरु कबीर यहाँ बाहरी कर्मकांड और आंतरिक साधना के सूक्ष्म अंतर को रेखांकित कर रहे हैं। वे यह चेतावनी देते हैं कि यदि भीतर भक्ति और आत्मबोध का प्रकाश नहीं जागा, तो समस्त बाह्य पवित्रता एक निष्प्राण प्रदर्शन बनकर रह जाएगा।
​इसे दो दृष्टांतों से समझा जा सकता है: जिस प्रकार मछली निरंतर जल में निवास करती है, किंतु यदि वह प्राणहीन हो जाए तो जल उसे पुनः जीवित नहीं कर सकता; वैसे ही यदि मनुष्य की चेतना आध्यात्मिक रूप से सुप्त है, तो तीर्थों का जल उसे भवसागर से पार नहीं उतार सकता।
​ यदि गंगाजल को किसी अशुद्ध पात्र में रख दिया जाए, तो वह जल भी दूषित हो जाता है। इसी प्रकार, यदि हमारा मन काम, क्रोध, लोभादि विकारों से मलिन हो, तो गंगा-स्नानादि पुण्य कर्म भी अन्तःकरण को प्रकाशित नहीं कर पाते।
​इसके विपरीत, यदि कोई साधारण गृहस्थ भी आंतरिक निर्मलता, निष्कपट प्रेम और निरंतर आत्म-स्मरण में स्थित है, तो उसकी स्थिति ही बदल जाती है। उसके लिए उसका निवास स्थान ही 'तीर्थ' बन जाता है, उसका भोजन ही 'प्रसाद' हो जाता है और उसके द्वारा ग्रहण किया गया जल 'पंचामृत' के समान पवित्र हो जाता है।
​सार निष्कर्ष
​कबीर साहेब की यह अमर वाणी संदेश देती है कि गंगा-वास, यज्ञ, दान और कठिन तपस्या केवल साधन हैं, वे साध्य (मुक्ति) का विकल्प नहीं हो सकते। मुक्ति के परम लक्ष्य तक पहुँचने का एकमात्र सुनिश्चित सेतु 'भक्ति' है।
आत्म-कल्याण के लिए बाह्य प्रदर्शन की अपेक्षा मन, वचन और कर्म की शुद्धि तथा सत्संग व भजन की सार्थकता अधिक है।
​"यूँ कथि रमै कबीर" — यह वाक्यांश इस बात का प्रमाण है कि कबीर ने इस सत्य को केवल सुनाया नहीं, अपितु स्वयं के अनुभव की कसौटी पर कसकर इसे संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए 'ब्रह्म-वाक्य' के रूप में प्रतिपादित किया। याद रखें:
​भक्ति वह चेतन ऊर्जा है, जो मरे हुए भावों में जीवन फूँकती है।
भक्ति वह पावक अग्नि है, जो संचित मलों को जलाकर आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप में प्रकाशित करती है।
भक्ति अमृत का प्रवाह है, सुख-शांति का आधार है।
चलो, ईश्वर से भक्ति मांग लें।
शुभं भवतु मंगलं भवतु
*******
श्री कबीर ज्ञान मंदिर
गिरिडीह झारखंड
दिनांक 15 मई 2026

दर्पणवत्‌ निर्मल और आकाशवत् असंग*******सद्गुरु कबीर साहब का निम्नलिखित साखी आत्मज्ञानी पुरुष की उस आन्तरिक अवस्था का चित...
13/05/2026

दर्पणवत्‌ निर्मल और आकाशवत् असंग
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सद्गुरु कबीर साहब का निम्नलिखित साखी आत्मज्ञानी पुरुष की उस आन्तरिक अवस्था का चित्रण करती है, जहाँ संसार के समस्त सुख-दुःख, मान-अपमान, लाभ-हानि उसके भीतर प्रतिबिम्बित तो होते हैं, किन्तु उसे प्रभावित नहीं कर पाते।
सद्गुरु कबीर साहब कहते हैं —
ज्यों गिरि सायर मुकुर में, भींज भार किछु नाहीं ।
ऐसे दुख सुख रहित है, ज्ञानी के घट माहीं ।।
अर्थात "जैसे दर्पण में विशाल पर्वत का प्रतिबिम्ब पड़ने पर भी दर्पण पर उसका भार नहीं पड़ता, और समुद्र का प्रतिबिम्ब पड़ने पर भी दर्पण भीगता नहीं; उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष संसार के समस्त व्यवहारों को करता हुआ भी उनसे असंग रहता है। सुख-दुःख उसके चित्त को स्पर्श नहीं कर पाते।"
ज्ञानीजनों के जीवन में भी जन सामान्य की तरह सुख-दुख आते रहते हैं, पर वे न तो सुख में विभ्रमित होते हैं न दुख में व्यथित। इसी को
गीता (2.56) में श्रीकृष्ण कहते हैं—
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।
अर्थात "जो दुःखों में उद्विग्न नहीं होता, सुखों में जिसकी स्पृहा नहीं रहती तथा जो राग, भय और क्रोध से मुक्त है, वही स्थितप्रज्ञ मुनि है।"
यहाँ स्थितप्रज्ञ उसे ही कहा जा रहा है, जिसका अन्तःकरण दर्पण के समान निर्मल और असंग हो गया हो। संसार की घटनाएँ उसमें प्रतिबिम्बित तो होती हैं, किन्तु वे उसके भीतर विकार उत्पन्न नहीं करतीं। भगवद्गीता (13.33) में आत्मा की असंगता का अद्भुत वर्णन है—
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते।।
अर्थात "जिस प्रकार सूक्ष्म होने के कारण आकाश सबमें व्याप्त होकर भी किसी वस्तु से लिप्त नहीं होता, वैसे ही ज्ञानीजन शरीर में स्थित होकर भी कर्मों और विकारों से लिप्त नहीं होते।"
सद्गुरु कबीर साहब अपने बीजक ग्रंथ रमैनी 74.2 में असंगता का उदाहरण कमलपत्र से देते हुए कहते हैं—
कंबल पत्र तरंग एक मांही।
संगै रहै लिपित पै नाहीं ।
अर्थात "जैसे-कमलपत्र जल में रहते हुए भी जल से भींगते नहीं, वैसे ही ज्ञानीजन शरीर-संसार में रहते हुए भी उसमें लिप्त नहीं होते।"
इस पद में सद्गुरु कबीर साहब ज्ञानीजनों की विलक्षण स्थिति बतला रहे है। ज्ञानीजन शरीर-संसार में रहते हुए भी इससे असंग-निर्लिप्त रहते हैं। शरीर- संसार की आसक्ति-स्पृहा उन्हें छू भी नहीं पाती।
अपने को ज्ञानी समझनेवाले लोगों को इस पद की कसौटी पर स्वयं को कसना चाहिए। यदि उन्हें शोक-माया व्यापते हैं तो समझना चाहिए कि अभी ज्ञान परिपक्व नहीं हुआ है। अतः और अधिक दृढ़ता और सजगतापूर्वक आत्मस्थित होने का प्रयत्न करना चाहिए।
जैसे दर्पण स्वयं किसी रूप को ग्रहण नहीं करता। उसमें राजा भी दिखे तो वह राजा नहीं बनता, और भिखारी दिखे तो भिखारी नहीं बनता। अग्नि दिखाई दे तो जलता नहीं, जल दिखाई दे तो भींगता नहीं। वैसे ही ज्ञानीजनों का चित संसार के अनुकूल -प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच रहते हुए भी इन सब से असंग-अप्रभावित रहता है।
जैसे समुद्र में सभी नदियाँ आकर मिलती हैं, किन्तु समुद्र अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता, वैसे ही अनुकूलता - प्रतिकूलता ज्ञानीजनों के जीवन में भी आते हैं,पर वे उसे विचलित नहीं कर पातीं।
उपरोक्त साखी मनुष्य को संसार त्यागने का नहीं, आसक्ति त्यागने का संदेश देती है। दुःख और सुख जीवन के दर्पण में पड़ने वाले प्रतिबिम्ब हैं; वे आत्मा को स्पर्श नहीं कर सकते।
जब साधक अपने भीतर के साक्षी को पहचान लेता है, तब वह परिस्थितियों का दास नहीं रहता। तब न सुख उसे उन्मत्त करता है, न दुख उसे तोड़ पाता है।
यही ज्ञान और अध्यात्म का परिचायक है। जहाँ मन दर्पणवत् निर्मल हो जाता है और आत्मा आकाशवत् असंग।
शुभं भवतु मंगलं भवतु
******
श्री कबीर ज्ञान मंदिर
गिरिडीह, झारखंड
दिनांक - 13 मई 2026

धन का गौरव*******सद्गुरु कबीर साहब अपनी एक साखी में कहते हैं—         जो जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम।        दोनो...
11/05/2026

धन का गौरव
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सद्गुरु कबीर साहब अपनी एक साखी में कहते हैं—
जो जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम।
दोनों हाथ उलीचिए, यही सयानो काम।।
अर्थात "जिस प्रकार नाव में जल भर जाने पर उसे तुरन्त बाहर निकालना आवश्यक हो जाता है, अन्यथा नाव डूब सकती है; उसी प्रकार घर में आवश्यकता से अधिक धन का संचय भी अन्ततः संकट, भय, अहंकार और पतन का कारण बनता है। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति धन को केवल जमा नहीं करता, अपितु उसका सदुपयोग करते हुए— दान, सेवा, लोककल्याण और धर्मकार्य में लगाता है।"
जैसे बहता जल निर्मल रहता है, किन्तु रुक जाने पर सड़ने लगता है। उसी प्रकार धन भी यदि समाजहित में प्रवाहित न हो, तो लोभ, भय और अहंकार को जन्म देता है। श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता में कहते हैं—
त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः
अर्थात् "त्याग के द्वारा ही अमृतत्व की प्राप्ति होती है। केवल संग्रह करने वाला व्यक्ति कभी शान्ति प्राप्त नहीं कर सकता।" ईशावास्य उपनिषद् कहा गया है—
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा
अर्थात् "त्याग भावना के साथ भोग करो।"
यह उपदेश स्पष्ट करता है कि उपभोग का अधिकार तभी पवित्र है, जब उसमें आसक्ति और स्वार्थ न हो। जो व्यक्ति अपनी आय का एक भाग सेवा-सद्कर्म और समाजहित में लगाता है, उसका धन पवित्र हो जाता है। वहीं जो केवल संचय करता है, वह अन्ततः उसी संचय का दास बन जाता है।
याद रखें— धन साधन है, साध्य नहीं। उसका प्रवाह जीवन को पवित्र बनाता है, जबकि उसका अन्धसंचय आत्मा को बोझिल कर देता है। सभी संत और शास्त्र कहते हैं —
१. दान लोभ का क्षय करता है
मनुष्य जितना अधिक संग्रह करता है, उतना ही भय और असुरक्षा से भरता जाता है। दान इस भय को तोड़ता है। जब व्यक्ति स्वेच्छा से अपने अर्जित धन का अंश दूसरों के कल्याण में लगाता है, तब उसके भीतर यह विश्वास जागृत होता है कि सुख धन के ढेर में नहीं, अपितु सद्कर्मों में है।
२. दान अन्तःकरण को शुद्ध करता है
दान केवल हाथ से नहीं, हृदय से होना चाहिए। करुणा और सेवा की भावना से दिया गया दान चित्त को निर्मल करता है। इससे अहंकार घटता है और मन में प्रेम, विनम्रता तथा मानवता का विकास होता है।
३. दान सामाजिक समरसता का आधार है
समाज में अनेक लोग अभाव, रोग और अशिक्षा से पीड़ित हैं। दान उनके जीवन में आशा का दीप प्रज्वलित करता है। अन्नदान भूखे को जीवन देता है, विद्यादान अज्ञान का अन्धकार मिटाता है और औषधदान पीड़ित को राहत देता है। इस प्रकार दान समाज को जोड़ने वाला सेतु बन जाता है।
४. दान धन को अर्थपूर्ण बनाता है
केवल संचय किया गया धन अन्ततः यहीं रह जाता है, किन्तु लोकहित में लगाया गया धन पुण्य और प्रेरणा के रूप में सदैव जीवित रहता है।
५. दान आध्यात्मिक उन्नति का द्वार है
ईशावास्य उपनिषद् का संदेश है कि त्याग की भावना से भोग करो। दान इसी त्याग का व्यावहारिक रूप है। जब मनुष्य देने की कला सीख लेता है, तब उसका मन धीरे-धीरे मोह के बन्धनों से मुक्त होने लगता है। यही मुक्ति अध्यात्म की दिशा में पहला कदम है।
एक वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाता, नदी अपना जल स्वयं नहीं पीती, सूर्य अपना प्रकाश अपने लिए नहीं रखता। प्रकृति का प्रत्येक तत्व देने में ही अपनी सार्थकता पाता है। इसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी तभी महान बनता है, जब वह केवल अपने लिए न जीकर दूसरों के कल्याण का माध्यम बने।
स्मरण रहे— दान धन को घटाता नहीं, उसे पवित्र बनाता है। यह मनुष्य के भीतर छिपे देवत्व को जागृत करता है। संग्रह से तिजोरी भरती है, किन्तु दान से हृदय भरता है।
जो बाँटे वह धन धन्य है, जो रोके वह भार।
दान सुधा है जीवन का, लोभ घोर अन्धकार।।
शुभं भवतु मंगलं भवतु
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श्री कबीर ज्ञान मंदिर
गिरिडीह, झारखंड
दिनांक 11 मई 2026

सुमिरन और सुख*******       परम सुहृद उपदेष्टा सद्गुरु कबीर साहब का यह साखी उनके आध्यात्मिक अनुभव का निचोड़ है। इसमें उन्...
08/05/2026

सुमिरन और सुख
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परम सुहृद उपदेष्टा सद्गुरु कबीर साहब का यह साखी उनके आध्यात्मिक अनुभव का निचोड़ है। इसमें उन्होंने 'सुमिरन' (परमात्म ध्यान) को जीवन का एकमात्र सत्य और शेष संसार को प्रपंच बताया है।
वे कहते हैं—
कबीर सुमिरन सार है, और सकल जंजाल।
आदि अंत मधि सोधिया, दूजा देखा काल।।
अर्थात् "इस सम्पूर्ण जीवन और संसार में यदि कुछ सारभूत, कल्याणकारी और शाश्वत है, तो वह
है- ईश्वर का सुमिरन, आत्मचिन्तन और परम सत्य का स्मरण। इसके अतिरिक्त संसार के समस्त विषय, मोह, वासनाएँ, अहंकार, लोभ और बाहरी उलझनें केवल जंजाल हैं, जो मनुष्य को जन्म-मरण और दुःख के चक्र में बाँधे रखती हैं।
मैंने सृष्टि के आदि (प्रारंभ), अंत और मध्य (वर्तमान) की अच्छी तरह खोज कर ली है और इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि सुमिरन के अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह केवल 'काल' (विनाश) का ग्रास है।"
यह वाणी उपनिषदों और गीता के सिद्धान्तों से पूर्णतः मेल खाती है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।
अर्थात् "यह संसार अनित्य और दुःखरूप है, इसलिए मुझ परमात्मा का भजन करना ही सार है।"
इसी प्रकार कठोपनिषद् में नचिकेता को यमराज समझाते हैं कि संसार के भोग क्षणभंगुर हैं; केवल आत्मतत्त्व ही अमर है—
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः
अर्थात "मनुष्य धन और भोगों से कभी तृप्त नहीं हो सकता।"
कबीर साहब का “सुमिरन” केवल जिह्वा से नाम जपना नहीं है, अपितु चेतना को परम सत्य में स्थिर करना है। जब मन बार-बार ईश्वर, आत्मा या सत्य की ओर लौटता है, तब धीरे-धीरे वासनाएँ और मानसिक अशान्तियाँ क्षीण होने लगती हैं।
आधुनिक न्यूरोसाइंस के अनुसार नियमित ध्यान, मंत्र-स्मरण और एकाग्र जप से मस्तिष्क की संरचना एवं कार्यप्रणाली में सकारात्मक परिवर्तन होते हैं। ध्यान और नाम-स्मरण से—
तनाव हार्मोन कॉर्टिसोल घटता है,
मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स अधिक सक्रिय होता है, जिससे विवेक और स्थिरता बढ़ती है,
एमिग्डाला की अति-उत्तेजना कम होती है, जिससे भय और क्रोध नियंत्रित होते हैं,
मन की चंचलता घटती है और आन्तरिक शान्ति का अनुभव बढ़ता जाता है।
​ न्यूरोसाइंस कहता है , 'ध्यान', 'सुमिरन' या मंत्र जप के दौरान मस्तिष्क में गामा वेव और थीटा वेव सक्रिय होता है। यह व्यक्ति को व्यर्थ की चिंताओं में उलझने से बचाती है। इससे व्यक्ति तनाव के विष से मुक्त हो कर शांति का अनुभव करता है।
ईश्वर-स्मरण और ध्यान से उत्पन्न शान्ति भीतर से आती है; वह बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होती। इसी कारण संत कबीर सुमिरन को “सार” कहते हैं।
परम संत ​कबीर की यह साखी एक धार्मिक उपदेश के साथ-साथ एक मेटाफिजिकल सत्य है। जहाँ विज्ञान पदार्थ के क्षय को 'काल' मानता है, वहीं कबीर उस क्षय से बचने का मार्ग 'सुमिरन' को बताते हैं, जो हमारी चेतना को नश्वर संसार से हटाकर शाश्वत सत्य से जोड़ता है। सार निष्कर्ष यह है कि -
सुमिरन से सुख ऊपजै, सुमिरन से दुख जाय।
कहहिं कबीर सुमिरन किए, सांई मांहि समाय।।
शुभं भवतु मंगलं भवतु
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श्री कबीर ज्ञान मंदिर
गिरिडीह झारखंड
दिनांक - 09 मई 2026

माँ ज्ञान कौशलम् में प्रमाण पत्र वितरण समारोह*******नारी स्वावलंबन की दिशा में श्री कबीर ज्ञान मंदिर ट्रस्ट का प्रेरणादा...
07/05/2026

माँ ज्ञान कौशलम् में प्रमाण पत्र वितरण समारोह
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नारी स्वावलंबन की दिशा में श्री कबीर ज्ञान मंदिर ट्रस्ट का प्रेरणादायी प्रयास

परम वंदनीय सद्गुरु माँ के पावन नेतृत्व एवं प्रेरणा से श्री कबीर ज्ञान मंदिर ट्रस्ट द्वारा संचालित माँ ज्ञान कौशलम् में बच्चियों को प्रमाण पत्र वितरण का सुंदर और प्रेरणादायी आयोजन संपन्न हुआ। यह माँ ज्ञान कौशलम् का 10वाँ बैच था, जिसमें प्रशिक्षण पूर्ण कर चुकी बच्चियों को प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।

माँ ज्ञान कौशलम् केवल एक प्रशिक्षण केंद्र नहीं, बल्कि नारी स्वावलंबन, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भर जीवन की एक सशक्त पाठशाला है। यहाँ बहनों और बच्चियों को ब्यूटीशियन, कंप्यूटर, सिलाई तथा इन सभी क्षेत्रों के एडवांस कोर्स निःशुल्क करवाए जाते हैं, ताकि वे अपने जीवन में सम्मानपूर्वक आगे बढ़ सकें और अपने परिवार व समाज के लिए उपयोगी बन सकें।

अब तक हजारों की संख्या में बहनें माँ ज्ञान कौशलम् से प्रशिक्षण प्राप्त कर चुकी हैं। यहाँ प्रमाण पत्र पाना मात्र औपचारिकता नहीं है, बल्कि इसके लिए कठिन परीक्षा में सफल होना पड़ता है। इससे स्पष्ट होता है कि संस्था केवल प्रशिक्षण ही नहीं देती, बल्कि गुणवत्ता, अनुशासन और योग्यतापूर्ण शिक्षा पर भी विशेष ध्यान देती है।

परम वंदनीय सद्गुरु माँ की करुणा, दूरदर्शिता और समाजहित की भावना से प्रेरित यह कार्य वास्तव में नारी शक्ति को जागृत करने वाला है। आज के समय में जब महिलाओं का आत्मनिर्भर होना अत्यंत आवश्यक है, तब माँ ज्ञान कौशलम् जैसे सेवा-प्रकल्प समाज के लिए वरदान के समान हैं।

श्री कबीर ज्ञान मंदिर ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा यह कार्य अत्यंत प्रशंसनीय है। यह संस्था केवल आध्यात्मिक जागरण ही नहीं, बल्कि सामाजिक उत्थान, कौशल विकास और नारी स्वावलंबन के क्षेत्र में भी निरंतर सेवा कर रही है।

जो बहनें अपने जीवन में कुछ नया सीखना चाहती हैं, आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं और सम्मानपूर्वक आगे बढ़ना चाहती हैं, उन्हें माँ ज्ञान कौशलम् से प्रशिक्षण अवश्य प्राप्त करना चाहिए। यहाँ निःशुल्क प्रशिक्षण के साथ-साथ संस्कार, अनुशासन, आत्मविश्वास और जीवन निर्माण की प्रेरणा भी मिलती है।

परम वंदनीय सद्गुरु माँ के पावन आशीर्वाद से माँ ज्ञान कौशलम् नारी स्वावलंबन की दिशा में एक उज्ज्वल दीपक बनकर समाज को प्रकाश दे रहा है। श्री कबीर ज्ञान मंदिर ट्रस्ट का यह सेवा-कार्य सचमुच समाज के लिए अनुकरणीय और प्रेरणादायी है।
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दिनांक ७ मई २०२६
श्री कबीर ज्ञान मंदिर ट्रस्ट
गिरिडीह झारखंड

कस्तुरी कुंडल बसे *******​       ​जिस प्रकार एक प्यासा हिरण मरुस्थल की तपती रेत पर चमकती किरणों को जल समझकर मृगतृष्णा का...
06/05/2026

कस्तुरी कुंडल बसे
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​जिस प्रकार एक प्यासा हिरण मरुस्थल की तपती रेत पर चमकती किरणों को जल समझकर मृगतृष्णा का शिकार होता है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य इस संसार के नश्वर और विषैले सुखों को 'शाश्वत अमृत' मानकर उनमें उलझा रहता है। वह यह भूल जाता है कि भौतिकता की चाहत कभी तृप्ति नहीं, केवल अंतहीन दाह देती है।
​कस्तूरी मृग का उदाहरण इस विडंबना को और भी स्पष्ट करता है। सुगंधित कस्तूरी मृग की ही नाभि में बसती है, किंतु वह उसे वन-उपवन और पत्थरों में ढूंढता फिरता है। यही स्थिति आज के मानव की है-
​वह 'परम तत्व या सुख-शांति' जो स्वयं उसके भीतर ही अनुस्यूत है, उसे वह बाहर के कर्मकांडों, ग्रहों-नक्षत्रों, मूर्तियों-तीर्थों आदि में तलाश रहा है। जब तक दृष्टि 'बाहर' से मुड़कर 'भीतर' नहीं आती, तब तक वह शाश्वत सत्य और परम आनंद मात्र एक छलावा ही बना रहता है।
​इन दोनों उदाहरणों का सार यही है कि "खोज" गलत नहीं है, बस "खोज की दिशा" गलत है। जब तक मनुष्य चमत्कारों और बाह्य वस्तुओं में पूर्णता ढूंढेगा, तब तक वह अतृप्त रहेगा। परम सुख व शांति की प्राप्ति केवल आत्म-साक्षात्कार से ही संभव है।
​"बाहर ढूँढे जो मिले, वह तो केवल माया है।
जिसने झांका अपने भीतर, उसने ही सत्य पाया है।"
शुभं भवतु मंगलं भवतु
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श्री कबीर ज्ञान मंदिर
गिरिडीह झारखंड
दिनांक 6 मई 2026

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