Sri Kabir Gyan Mandir

Sri Kabir Gyan Mandir has written many books which have inspired many to walk in the path for reaching ultimate happiness in life, which as per Gita is moksha.

A motivational institution in headed by Sadguru Maa in a mission to spreads the message of Sadguru Kabir and Sanatan Dharma for the benefit of humankind and guiding people to understand their soul & make their life better. श्री कबीर ज्ञान मंदिर

"श्री कबीर ज्ञान मंदिर भारत के झारखंड प्रदेश के पावन, विविध खदानों से समृृृद्ध उजले अबरख और काले हीरे की रानी गिरिडीह नगरी में अवस्थित एक जाग्रत और महान

तपःस्थली, तीर्थभूमि तथा दुर्लभ आत्मबोध का प्रकाश फैलानेवाला आध्यात्मिक केंद्र है। यह ब्रह्मनिष्ठ, आत्मस्थित महान ज्ञानी व त्यागी, परम तपस्वी दिव्य चेता महर्षि, परम विदूषी, लोकोपकारी संत-सद्गुरु ‘मां ज्ञान’ की दिव्य तपोभूमि और कर्मभूमि है। दूसरे शब्दों में, ‘श्री कबीर ज्ञान मंदिर’ सद्गुरु मां ज्ञान की बहुमुखी प्रतिभा, तप-त्याग, साधुता, नैतिकता, अथक पुरुषार्थ और ज्ञान-प्रेम का भव्य साकार रूप है।
इसके यशोज्ज्वल धर्मोदीप्त पावन प्रांगण में ‘गुरु गोविंद धाम’ भव्य मंदिर अवस्थित है, जहां सद्गुरु कबीर और भगवान नारायण का भव्य युगल विग्रह विराजित है। इसके भूमिगत तल में सद्गुरु मां ज्ञान के पूज्य गुरुदेव ‘सद्गुरु विवेक साहब’ की सिद्ध समाधि है, जो सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करनेवाली है। इसके बगल में स्थित ‘श्री कबीर ज्ञान दर्शन’ भी भव्य दर्शनीय है। यहां सद्गुरु कबीर साहब के प्रेरक जीवनदर्शन व कल्याणकारी संदेशों के मनमोहक म्यूरल तथा मध्ययुगीन भारतीय संतों के दुर्लभ पेंटिग्स बने हैं। इसके मार्बल स्तंभों में कबीर साखी व सद्गुरु मां ज्ञान के भजनों के सुलेख अंकित हैं।
यह संपूर्ण भारतवर्ष का लोकप्रिय व सतत् सक्रिय प्रकाशन केंद्र है, जहां से सद्गुरु ‘मां ज्ञान’ की पचासों से अधिक पुस्तकें व श्री कबीर ज्ञानामृत पत्रिका का प्रकाशन हो रहा है। यह एक जाग्रत केंद्र है, जहां से आत्मिक शांति, समाज सेवा, समाज सुधार, प्रेम-सौहार्द्रता के विस्तारण, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, योग शिविर, सेवा प्रकल्प इत्यादि आयोजन सदाबहार होते रहते हैं। "

Spiritual Guru साध्वी ज्ञानानद जी (Sadhvi Gyananand Jee). Kabir Gyan Mandir is a famous spiritual organization of Giridih, a small town in JHARKHAND INDIA. Its also known for Guru Govind Dham, lord Vishnu temple & Sadguru Kabir. Folks interested to know more, kindly contact

Publication House-
Shree Kabir Gyan Prakashan Kendra (Giridih,Jharkhand,India)
Address SHREE KABIR GYAN MANDIR
SANT KABIR GYAN MARG,
SIHODIH,GIRIDIH,JHARKHAND
Contact info-
Phone
06532223393
Mob - +91-9155950505

कर्म ही अनुभव का दर्पण *******सद्गुरु माँ का जन्मोत्सवदिनांक १४ सितम्बर २०२६ श्री कबीर ज्ञान मंदिरसंपर्क सूत्र: 91559505...
23/08/2026

कर्म ही अनुभव का दर्पण
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सद्गुरु माँ का जन्मोत्सव
दिनांक १४ सितम्बर २०२६
श्री कबीर ज्ञान मंदिर
संपर्क सूत्र: 9155950505
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कर्म केवल बाहरी घटना नहीं है। प्रत्येक कर्म मन पर अमिट छाप छोड़ता है।
बार-बार किया गया विचार व्यवहार बनता है, व्यवहार आदत बनता है और आदत धीरे-धीरे व्यक्ति के चरित्र तथा अनुभव की दिशा निर्धारित करती है।
आधुनिक न्यूरोसाइंस और नैतिक मनोविज्ञान में भी यह समझ विकसित हुई है कि मानव के नैतिक निर्णय, सामाजिक व्यवहार और इच्छाओं के पीछे जटिल तंत्रिका-प्रक्रियाएँ काम करती हैं। शोध यह भी बताता है कि reward processing और desire के बीच गहरा संबंध है।
यह विज्ञान आत्मा के आध्यात्मिक सिद्धांत को तो सिद्ध नहीं कर पाता, लेकिन एक महत्त्वपूर्ण बात को समझने में सहायता करता है कि—
मनुष्य जिस प्रकार के विचार और व्यवहार को बार- बार पोषित करता है, उसी दिशा में उसकी मानसिक प्रवृत्तियाँ मजबूत होती जाती हैं।
इसलिए सोच-समझकर कर्म और विचार का अनुवर्तण करें। आपका कर्म और विचार ही आपके सुख-दुख का निर्णायक है। सुख चाहते हैं तो श्रेष्ठ कर्म और विचार को ही जीवन में पनपने दें और यदि दुख चाहते हैं तो मनमाना आचरण करें। निर्भर है आप पर कि आप श्रेष्ठता का आधार बनेंगे या अश्रेष्ठता का।अवह्वान है सद्गुरु का, श्रेष्ठ करें और सुख पाएं।
मनुष्य के आंतरिक रूपांतरण का परम धर्म और सुख का आधार।
शुभं भवतु मंगलं भवतु
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श्री कबीर ज्ञान मंदिर
गिरिडीह झारखंड
दिनांक 23 अगस्त 2026

मन की निर्मलता : परम धर्म*******सद्गुरु माँ का जन्मोत्सवदिनांक १४ सितम्बर २०२६ श्री कबीर ज्ञान मंदिरसंपर्क सूत्र: 915595...
21/08/2026

मन की निर्मलता : परम धर्म
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सद्गुरु माँ का जन्मोत्सव
दिनांक १४ सितम्बर २०२६
श्री कबीर ज्ञान मंदिर
संपर्क सूत्र: 9155950505
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​धर्म बाह्य आवरण में नहीं, प्रत्युत आंतरिक रूपांतरण में है। यदि साधना मनुष्य को विनम्र, करुणामय, सत्यनिष्ठ और उदार बनाती है, तभी धर्म जीवित और सार्थक है। इसके विपरीत, यदि उपासना से यह अहंकार पुष्ट होता हो कि "केवल मैं ही श्रेष्ठ हूँ, मेरी मान्यता ही सत्य है और शेष सभी भ्रमित एवं झूठे हैं," तो समझना चाहिए कि व्यक्ति ने धर्म के मूल मर्म को नहीं, केवल उसकी बाह्य पहचान और संप्रदाय को ओढ़ा है। उसके भीतर अभी सच्चे धर्म का अंकुरण हुआ ही नहीं है।
​धर्म वह नहीं जो मनुष्य को दूसरों से बड़ा होने का भ्रम दे; धर्म वह है जो उसे अपने भीतर के विकारों से लड़ना सिखाए।
जिसके जीवन में कटुता बढ़ती जाए और विनम्रता घटती जाए, उसके धार्मिक आडंबर का कोई मूल्य नहीं रह जाता।
सच्चा धर्म कभी दूसरों के मार्ग का तिरस्कार नहीं करता; वह सर्वदा मर्यादा, सत्य और प्रेम से अनुप्राणित रहता है।
​अंतःकरण की शुद्धि ही धर्म की वास्तविक धुरी है।
​धर्म वेशभूषा में नहीं, श्रेष्ठ विचारों में है।
​धर्म बाह्य चिह्नों में नहीं, पावन चरित्र में है।
​धर्म रूढ़िवादी कर्मकांडों में नहीं, संवेदनशीलता और करुणा में है।
​धर्म मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों की दीवारों में नहीं, निर्मल हृदय में बसता है।
​मुख में प्रभु-नाम हो और व्यवहार में छल हो, तो वह नाम-स्मरण नहीं, मात्र वंचना है।
वस्त्र बदलने से वृत्ति नहीं बदलती और केवल माला धारण करने से मन निष्पाप नहीं होता।
वास्तविक साधना तो उस क्षण प्रारंभ होती है, जब मनुष्य अपने अंतर्मन के दोषों को देखने और उन्हें मिटाने का साहस जुटाता है।
तीर्थ-स्नान से देह शुद्ध हो सकती है, किंतु मन का मैल केवल सत्य, सेवा, सत्संग, सुमिरन और संयम से ही धुलता है।
​धर्म की वास्तविक परीक्षा पूजा-अर्चना के क्षणों में नहीं, अपितु उस समय होती है जब कोई हमारा अपमान करे, कटु वचन कहे या हमारे अहित का प्रयास करे।
जो क्षमा करने का सामर्थ्य नहीं रखता, उसे अपने धर्म-बोध को और अधिक जाग्रत करने की आवश्यकता है; क्योंकि धर्म हृदय को संकीर्ण नहीं, विशाल बनाता है।
​जब कोई देखने वाला न हो, उस एकांत में भी स्वयं को अधर्म से रोक लेना ही अंतःकरण का वास्तविक जागरण है।
​माथे पर त्रिपुंड या चंदन हो किंतु भीतर क्रोध की ज्वाला धधक रही हो, जिह्वा पर मंत्र हों पर हृदय में द्वेष पल रहा हो, हाथ प्रार्थना में जुड़े हों और आचरण में शोषण हो—तो वह भक्ति नहीं, घोर आत्मवंचना है।
​श्रीमद्भगवद्गीता (१६.१) में भगवान श्रीकृष्ण ने दैवी संपदा का मूल आधार अंतःकरण की शुद्धि को ही बताते हुए कहा है—
​अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥
​अर्थात् "भय का पूर्ण अभाव, अंतःकरण की पूर्ण निर्मलता, और ज्ञानयोग में सुदृढ़ स्थिति ही दैवी गुण हैं।" इसी शाश्वत सत्य को सद्गुरु कबीर साहब अत्यंत सहजता से स्पष्ट करते हैं—
​कबीरा मन निरमल भया, जैसे गंगा नीर।
पाछै पाछै हरि फिरै, कहत कबीर कबीर॥
​अर्थात् "जब मन समस्त विकारों और छल-कपट से मुक्त होकर गंगाजल के समान पावन हो जाता है, तब ईश्वर स्वयं उस निष्काम साधक के पीछे-पीछे चलने लगते हैं।"
​यही धर्म का सच्चा पथ है, यही शांति का मार्ग है, यही जीवन का परम लक्ष्य है और यही मोक्ष का खुला द्वार है।
आओ सच्चा धर्म अपनावें,
मन का दर्पण निर्मल बनावें।
छोड़ के सारे झूठे आडंबर,
भीतर ज्योति प्रेम की जगावें।।
शुभं भवतु मंगलं भवतु।
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श्री कबीर ज्ञान मंदिर
गिरिडीह झारखंड
दिनांक 21 अगस्त 2026

20/08/2026
शांति की परिभाषा और मार्ग*******सद्गुरु माँ का जन्मोत्सवदिनांक : 14 सितंबर 2026संपर्क सूत्र : 9155950505*******        श...
19/08/2026

शांति की परिभाषा और मार्ग
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सद्गुरु माँ का जन्मोत्सव
दिनांक : 14 सितंबर 2026
संपर्क सूत्र : 9155950505
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शांति की इच्छा सभी करते हैं। वस्तुतः प्रत्येक मनुष्य जीवनभर शांति की प्राप्ति के लिए ही भाग-दौड़ करता रहता है। कोई धन में शांति ढूंढता है, कोई प्रतिष्ठा में, कोई सुख-सुविधाओं में, कोई परिवार में और कोई अपनी इच्छाओं की पूर्ति में। परंतु प्रश्न यह है—शांति है क्या? शांति किसे कहते हैं? और शांति प्राप्त करने का वास्तविक मार्ग क्या है? आइए, इन प्रश्नों पर विचार करें।
शांति केवल कुछ समय के लिए मन के शांत हो जाने का नाम नहीं है। न ही इच्छित वस्तु की प्राप्ति, परिस्थितियों का अनुकूल हो जाना अथवा कुछ समय के लिए चिंता का समाप्त हो जाना ही वास्तविक शांति है। ये सब सुख, सुविधा अथवा मानसिक विश्राम की अवस्थाएँ हो सकती हैं; शांति इससे कहीं अधिक गहरी और स्थायी अवस्था है।
शांति की सार्थक परिभाषा— “जब मनुष्य की अंतःचेतना इच्छा, अपेक्षा, भय, द्वेष, अहंकार और आसक्ति के द्वंद्व से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाती है, तब उस निर्विकार, संतुलित और सहज अवस्था को शांति कहते हैं।”
अर्थात् जहाँ पाने की व्याकुलता नहीं, खोने का भय नहीं; प्रशंसा की भूख नहीं, अपमान की जलन नहीं; भविष्य की चिंता नहीं, अतीत का पश्चात्ताप नहीं; जहाँ इच्छाएँ मन को खींचती नहीं और परिस्थितियाँ मन को तोड़ती नहीं—वही शांति है।
शांति और सुख में अंतर— सुख प्रायः परिस्थितियों पर निर्भर होता है, जबकि शांति चेतना की अवस्था है। मनचाही वस्तु मिली—सुख हुआ; वस्तु चली गई—सुख भी चला गया। परंतु शांति में परिस्थितियाँ बदल जाने पर भी भीतर का संतुलन बना रहता है।
इसलिए कहा जा सकता है— सुख वह है, जब संसार हमारी इच्छा के अनुसार चलता है; शांति वह है, जब संसार हमारी इच्छा के अनुसार न चले, तब भी हमारा मन संतुलित रहे।
भगवद्गीता (२.७०) में श्रीकृष्ण इसी शांति को स्थितप्रज्ञ की अवस्था के रूप में समझाते हुए कहते हैं—
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥
अर्थात् ' जिस प्रकार निरंतर नदियों का जल समुद्र में प्रवेश करता रहता है, फिर भी समुद्र अपनी मर्यादा और गंभीरता को नहीं छोड़ता, उसी प्रकार जिसके भीतर विषय और इच्छाएँ प्रवेश करती हुई भी उसे विचलित नहीं कर पातीं, वही शांति को प्राप्त करता है; इच्छाओं के पीछे भागने वाला कभी शांति प्राप्त नहीं कर सकता।'
शांति को एक अत्यंत संक्षिप्त सूत्र में इस प्रकार पिरोया जा सकता है— “इच्छाओं का पूर्ण अभाव नहीं, इच्छाओं पर प्रभुत्व ही शांति है।”
राम में स्थित होना ही शांति का आधार है
सद्गुरु कबीर साहब की वाणी में इसी सत्य को और गहराई से इस प्रकार कहा गया है—
इच्छा करि भौ सागर, वोहित रामु अधार।
अर्थात् "इच्छाओं का अनियंत्रित विस्तार ही भवसागर यानी अशांति है और राम का आधार ही उस भवसागर से पार करने वाली नौका यानी शांति है।"
जब मन संसार की वस्तुओं में सुख ढूंढता है, तब एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। इच्छा पूरी हुई तो थोड़ी देर के लिए सुख मिला; इच्छा में बाधा आई तो दुःख उत्पन्न हुआ। इस प्रकार मनुष्य इच्छा, अपेक्षा, भय और निराशा के चक्र में फँसा रहता है।
परंतु जब वही मन सत्यस्वरूप राम में स्थित होने लगता है, तब वह संसार से सुख की भीख माँगना धीरे- धीरे छोड़ देता है। यही शांति की दिशा में अग्रसरता है।
शांति वह अवस्था है, जिसमें मन संसार से सुख माँगना छोड़कर अपने आत्मस्वरूप और परमात्मा के आश्रय में स्थित हो जाता है।
शांति बाहर से नहीं, भीतर से प्रकट होती है। शांति किसी दुकान से खरीदी जाने वाली वस्तु नहीं है। इसे किसी बाहरी साधन से प्राप्त नहीं किया जा सकता। शांति तो अंतःचेतना में प्रकट होने वाली एक दिव्य अवस्था है।
यदि धन से शांति खरीदी जा सकती, तो संसार का प्रत्येक धनी मनुष्य शांत-सुखी होता। यदि महलों में शांति मिलती, तो राजमहलों में कोई दुखी न होता।
यदि प्रतिष्ठा से शांति मिलती, तो प्रसिद्ध व्यक्ति कभी व्याकुल न होते। लेकिन ऐसा नहीं है।
क्योंकि बाहरी संपन्नता और आंतरिक शांति दो अलग-अलग बातें हैं। मनुष्य के पास संसार की सारी सुविधाएँ हो सकती हैं, लेकिन यदि मन इच्छाओं, भय, अहंकार और अपेक्षाओं से भरा हुआ हो, तो वह भीतर से निर्धन और अशांत ही रहेगा। शांति धन-धान्य के बढ़ने से नहीं, मन की माँग घटने से आती है।
शांति का वास्तविक मार्ग— शांति प्राप्त करने के लिए जीवन की दिशा बदलनी होगी— इच्छा से आवश्यकता की ओर लौटें। आसक्ति से कर्तव्य की ओर अग्रसर हों। अहंकार से समर्पण की ओर आएँ।
संसार से राम की ओर उन्मुख हों।
जब मनुष्य अपनी अनावश्यक इच्छाओं, अहंकार और आसक्तियों का भार उतारने लगता है, तब उसके भीतर शांति और तृप्ति का उदय होने लगता है। शांति का मार्ग संसार से भागने का मार्ग नहीं है; संसार में रहते हुए संसार की दासता से मुक्त होने का मार्ग है। अतः—
कर्तव्य करो, पर कर्तापन मत पालो।
प्रेम करो, पर अधिकार मत जताओ।
धन कमाओ, पर धन को अपना स्वामी मत बनने दो।
सेवा करो, पर यश की अपेक्षा मत रखो।
इच्छाएँ रखो, पर उन्हें अपना स्वामी मत बनने दो।
और सबसे बढ़कर— अपने जीवन का अंतिम आधार संसार को नहीं, राम को बनाओ।
जब मन इस भाव में स्थित हो जाए—
“हे राम! जो मिला, वह तुम्हारा प्रसाद है; जो नहीं मिला, वह भी तुम्हारा ही प्रसाद है। जो आया, वह तुम्हारी व्यवस्था से आया; जो चला गया, वह भी तुम्हारी व्यवस्था का ही भाग है। मेरा कर्तव्य तुम्हारी सेवा है और मेरा जीवन तुम्हारे चरणों में समर्पित है।”
तब मनुष्य के भीतर स्वीकार जन्म लेता है, स्वीकार से संतोष, संतोष से स्थिरता और स्थिरता से शांति प्रकट होती है।
फिर देखना—तुम्हारे जीवन से भी शांति छलकने लगेगी और तुम्हारे अंतःकरण में भी आनंद का चमन खिल उठेगा।
यही शांति का मार्ग है।
शुभं भवतु मंगलं भवतु।
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श्री कबीर ज्ञान मंदिर
गिरिडीह झारखंड
दिनांक 19 अगस्त 2026

सद्गुरु माँ ज्ञान जन्मोत्सव14 सितम्बर 2026श्री कबीर ज्ञान मंदिरगिरिडीह, झारखंडसंपर्क सूत्र - 091559 50505 परम वंदनीय सद्...
18/08/2026

सद्गुरु माँ ज्ञान जन्मोत्सव
14 सितम्बर 2026
श्री कबीर ज्ञान मंदिर
गिरिडीह, झारखंड
संपर्क सूत्र - 091559 50505

परम वंदनीय सद्गुरु माँ के दिव्य आविर्भाव महोत्सव पर सद्गुरु पूजन-वंदन, सत्संग-भजन, सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं परम कृपालु सद्गुरु माँ के दिव्य उपदेश श्रवण का सौभाग्य

सब कुछ तेरा*******सद्गुरु माँ ज्ञान जन्मोत्सव14 सितम्बर 2026********        दाँत का स्वभाव है—भोजन को चबाना और आगे भेज द...
17/08/2026

सब कुछ तेरा
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सद्गुरु माँ ज्ञान जन्मोत्सव
14 सितम्बर 2026
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दाँत का स्वभाव है—भोजन को चबाना और आगे भेज देना। यदि दाँत भोजन को चबाने के बाद भी अपने भीतर दबाकर रखे रहे तो वही भोजन सड़न का कारण बन जाता है।
जीवन की घटनाएँ भी ऐसी ही हैं। जो घटित हुआ, उन सबसे सीखो; लेकिन उसे ढोते मत रहो। अपमान हुआ, गलती हुई, हानि हुई या विश्वासघात हुआ—इन सबसे सीखो। परंतु इन्हें मन में ठहरने मत दो।
जो व्यक्ति अतीत की राख को बार-बार कुरेदता रहता है, वह वर्तमान की अग्नि को बुझा देता है।
शरीर में काँटा चुभ जाए तो उसे निकाल दिया जाता है। क्या कोई बुद्धिमान व्यक्ति काँटे को इसलिए शरीर में चुभोए रखेगा कि “इसी काँटे ने मुझे चोट पहुँचाई थी, इसलिए मैं इसे हमेशा संभालकर रखूँगा?"
नहीं।
लेकिन मनुष्य मानसिक काँटों को वर्षों तक सँभालकर रखता है—अपमान, द्वेष, ईर्ष्या, पुरानी शिकायत, प्रतिशोध और कटु स्मृतियाँ।
यही मन की मूर्खता है।
मन का स्वभाव शांति है, अशांति आरोपित है
एक शांत तालाब में बाहर से पत्थर फेंका जाए तो लहरें तरंगायित होती हैं। फिर धीरे-धीरे तरंगे शांत होती जाती है।
मन भी ऐसा ही है।
शांति मन की मूल संभावना है; विकारों की निरंतर हलचल उसे अशांत करती है। कामना, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, भय और द्वेष मन में लहरें उत्पन्न करते हैं। समस्या यह नहीं कि लहर उठी; समस्या यह है कि मनुष्य हर लहर को अपना सत्य मान लेता है।
गीता (6.5) कहती है—
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
अर्थात "मनुष्य स्वयं अपना उद्धार करे, स्वयं को अधोगति में न डाले; क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।"
जिसने मन को साध लिया, वही अपना मित्र है। जिसने मन को खुला छोड़ दिया, वही अपना शत्रु है।
अब प्रश्न है—मन को इन व्यर्थ तरंगों से बचाया कैसे जाए? मन को साधा कैसे जाए?
केवल यह कह देने से कि “चिंता मत करो”, चिंता समाप्त नहीं होती। केवल यह कह देने से कि “क्रोध मत करो”, क्रोध शांत नहीं होता। इसी तरह अन्य दोषों को भी समझा जा सकता है। मन को खाली छोड़ देने पर वह पुनः किसी विषय को पकड़ लेता है। इसलिए मन को ठहराने हेतु कोई श्रेष्ठ आधार देना आवश्यक है। और वह सर्वश्रेष्ठ आधार है—रामनाम का सुमिरन।
हजारों विषयों में भटकते मन को राम-सुमिरण एक केंद्र देता है। जैसे सूर्य की बिखरी किरणें साधारण रूप से केवल प्रकाश देती हैं, लेकिन लेंस से एकाग्र होने पर अग्नि उत्पन्न कर सकती हैं, वैसे ही मन की बिखरी हुई ऊर्जा जब नाम-सुमिरण में एकाग्र होती है तो भीतर परिवर्तन की शक्ति उत्पन्न होती है।
राम सुमिरन केवल उच्चारण नहीं; मन की दिशा बदलने की एक शक्तिशाली साधना है।
मन संसार की ओर दौड़े तो उसे वापस लाकर रामनाम में लगाएं। मन अतीत में जाए—पुन: उसे वर्तमान में लाकर रामनाम में लगाएं। मन क्रोध में जाए—नाम उसे शांत करे। मन भय में जाए—नाम उसे आश्रय दे। मन तृष्णा में जाए—नाम उसे संतोष की ओर मोड़े।
इसीलिए संतों ने नाम को केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं माना, अपितु चित्त-शोधन का साधन माना है।
श्रीकृष्ण भगवद्गीता (18.65) में कहते हैं—
मन्मना भव मद्भक्तो...
अर्थात् "अपने मन को मुझ परमात्मा में लगाओ।"
ध्यान दीजिए, श्रीकृष्ण ने शरीर को नहीं, मन को समर्पित करने को प्रेरित किया। क्योंकि मन जहाँ टिकता है, जीवन उसी दिशा में ढलता है। सद्गुरु कबीर साहब कहते हैं —
मन दिया तिन सब दिया मन के लार शरीर।
अब देवे को कुछ नहीं, यों कह दास कबीर।।
अर्थात "जिसने अपना मन समर्पित कर दिया, उसने वास्तव में सब कुछ समर्पित कर दिया। क्योंकि मन के पीछे ही शरीर, इंद्रियाँ और सारे कर्म चलते हैं—मन ही राजा है, शरीर तो बस उसका सेवक है।"
बार-बार अंतस् में दुहराइए— "मैं परमात्मा का हूं। मेरा जीवन, मेरा मन, मेरी इंद्रियां मेरा सर्वस्व परमात्मा का है। परमात्मा की आज्ञाओं का पालन करना ही मेरे जीवन का व्रत है। जीवन में परमात्मा को प्रकाशित करना ही मेरी जीवन साधना है।" परमात्म-प्राप्ति ही मेरे जीवन का लक्ष्य है।
प्रभु नाम सुमिरन और उपरोक्त वाणियों की बार-बार आवृत्ति मात्र से शनै-शनै मन संशोधित- समर्पित होता जाएगा और आप शांति, आनंद की दिव्य अनुभूति से परिपूर्ण होते जाएंगे।
शुभं भवतु मंगलं भवतु
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श्री कबीर ज्ञान मंदिर
गिरिडीह झारखंड
दिनांक 17 अगस्त 2026

तेरा वैभव अमर रहे मां ******​स्वतंत्रता दिवस: १५ अगस्त २०२६​सम्माननीय गुरुजन, मातृशक्ति, देश के वीर जवानो, युवा साथियो, ...
15/08/2026

तेरा वैभव अमर रहे मां
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​स्वतंत्रता दिवस: १५ अगस्त २०२६
​सम्माननीय गुरुजन, मातृशक्ति, देश के वीर जवानो, युवा साथियो, प्यारे बच्चो और प्रिय देशवासियो—
आप सभी को ८०वें स्वतंत्रता दिवस की बहुत बहुत मंगलकामनाएँ!
​आज का दिन केवल तिरंगा फहराने, राष्ट्रगीत व राष्ट्रगान गाने और मिठाई बाँटने का ही नहीं है; अपितु उत्साह के साथ-साथ पुनः यह संकल्प लेने का दिन है कि हम अपने देश के खोए हुए गौरव, वैभव, समृद्धि और ज्ञान-विज्ञान को पुनः प्रतिष्ठित करके ही दम लेंगे।
​आइए, हम संकल्प लें कि हम न इस जाति के हैं न उस जाति के, न इस भाषा-भाषी के हैं न उस भाषा-भाषी के, न इस प्रांत के हैं न उस प्रांत के, और न ही हम किसी पंथ या संप्रदाय के हैं। हमारी एकमात्र पहचान भारत है, हमारी भाषा भारत है, हमारा पंथ व धर्म भी भारत है। हमारा ईश्वर और अल्लाह भी भारत है। हमारा स्वर्ग और जन्नत भी भारत है। हमारा परमगति और मोक्ष भी भारत है।भारत केवल हमारी मातृभूमि ही नहीं, यह हमारा प्राण है, हमारी आत्मा है और हमारा आराध्य है। यही हमारी पूजा और इबादत है।
​१५ अगस्त १९४७ को भारत ने विदेशी शासन की बेड़ियाँ तोड़ दी थीं। हमारे वीर स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर हमें राजनीतिक स्वतंत्रता दिलाई। किसी ने हँसते-हँसते फाँसी का फंदा चूमा, किसी ने जेल की कालकोठरी की यातनाएँ सहीं, किसी ने सीने पर गोलियाँ खाईं, तो किसी ने अपना घर-परिवार छोड़कर राष्ट्र को ही अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।
​उनके अमर बलिदानों के कारण ही आज हम स्वतंत्र भारत की खुली हवा में साँस ले रहे हैं। उन सभी हुतात्माओं को कोटि-कोटि नमन!
​आज भारत विश्व-पटल पर तीव्रता से आगे बढ़ रहा है। विज्ञान, तकनीक, अंतरिक्ष, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और नवाचार सहित अनेक क्षेत्रों में देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है। हमारे वैज्ञानिक अंतरिक्ष की असीम गहराइयों को खोज रहे हैं और हमारे युवा पूरे विश्व में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं।
​किंतु राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल सुदृढ़ अर्थव्यवस्था या सशक्त सैन्य बल तक सीमित नहीं होती; राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसके चरित्रवान नागरिक होते हैं।
​यदि नागरिक ईमानदार हैं, तो राष्ट्र सुदृढ़ है।
​यदि युवा चरित्रवान हैं, तो राष्ट्र सुरक्षित है।
​यदि शिक्षक आदर्शवान हैं, तो राष्ट्र सुशिक्षित है।
​यदि नेतृत्व निष्कलंक है, तो लोकतंत्र सशक्त है।
​यदि समाज में करुणा है, तो संस्कृति जीवंत है।
​अतः आज हमें केवल यह नहीं सोचना है कि— “देश मेरे लिए क्या करेगा?”
अपितु यह सोचना है कि— “मैं देश के लिए क्या-क्या कर सकता हूँ?”
​एक सैनिक सीमा पर डटकर देश की रक्षा करता है। ​एक किसान खेत में पसीना बहाकर अन्न उपजाता है। ​एक शिक्षक चरित्र-निर्माण कर राष्ट्र का भविष्य गढ़ता है। ​एक वैज्ञानिक अपने ज्ञान से देश को नई दिशा देता है। ​एक चिकित्सक जीवन की रक्षा करता है। ​एक श्रमिक अपने अथक परिश्रम से राष्ट्र की नींव मजबूत करता है।
​एक सामान्य नागरिक भी अपने दैनिक जीवन में राष्ट्रसेवा कर सकता है। सबसे बड़ी राष्ट्रसेवा यह है कि,
हम ऐसे श्रेष्ठ नागरिक बनें, जिस पर देश को गर्व हो।
​ऐसा आचरण करें, जिससे समाज में शांति, सद्भाव और सुव्यवस्था बनी रहे। ​ऐसी जीवनशैली अपनाएँ, जिससे भारत शक्तिशाली, संवेदनशील और संस्कारवान बने—जो आधुनिक भी हो और अपनी जड़ों से भी जुड़ा रहे।
​ ​इस पावन स्वतंत्रता दिवस पर हम यह व्रत लें कि हम केवल 'हमारा भारत महान' का नारा ही नहीं लगाएंगे, अपितु अपने कर्मों से इसे और अधिक महान, विवेकवान, समर्थवान और आत्मनिर्भर बनाने में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देंगे।
​हमारी मातृभूमि केवल भूमि का एक टुकड़ा नहीं है; यह करोड़ों हृदयों की आशा है, हमारे पूर्वजों के तप और बलिदान की धरोहर है, हमारी संत-परंपरा की जाग्रत चेतना है और हमारे भविष्य की पवित्र ज़िम्मेदारी है। हम इस ज़िम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभाएँगे। हे मातृभूमि! तेरे लिए —

गगन से तोड़ लाएँगे सितारे भी ॥
​सजाएँगे तेरे भाल पे माँ, नया इतिहास रच देंगे,
समर्पण की सलोनी आग में यह शीश धर देंगे।
हथेली पर लिए संकल्प, यह युग-गीत गाएँगे,
सँवारने तिमिर तेरा, गगन से तोड़ लाएँगे सितारे भी!

​न रुकना है, न झुकना है, समंदर चीर जाना है,
धरा से चाँद तक भारत की आभा बिछाना है।
हृदय में धड़कती निष्ठा, भुजा में प्राणों का बल है,
हमारे श्वेत कर्मों से सजेगा राष्ट्र का कल है।
असंभव को सुगम करके, नया पथ हम बनाएँगे,
सँवारने तिमिर तेरा, गगन से तोड़ लाएँगे सितारे भी!

​चरित्रों की सुचिता से तेरी यह शान चमकेगी,
तिरंगे के सुनहरे रूप में पहचान दमकेगी।
रहे युग-युग तेरा वैभव, यह वंदन प्राण-वीणा का,
सफ़ल कर देंगे हर सपना, शहीदों की साधना का।
चरण में मातृभू के हम मुकुट ऐसा सजाएँगे,
सँवारने तिमिर तेरा, गगन से तोड़ लाएँगे सितारे भी!
​पुनश्च नमन, जय भारत!
वंदे मातरम्!
जय हिन्द!
​"हम रहें या न रहें, तेरा वैभव अमर रहे माँ!"
शुभं भवतु मंगलं भवतु
*******
श्री कबीर ज्ञान मंदिर
गिरिडीह झारखंड
दिनांक 15 अगस्त 2026

निंदा से नहीं घबराना ******         यह पद वर्ष १९७६-७७ में रचा गया था, जब संन्यास ग्रहण करने की घोषणा सुनकर जाति-समाज तथ...
13/08/2026

निंदा से नहीं घबराना
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यह पद वर्ष १९७६-७७ में रचा गया था, जब संन्यास ग्रहण करने की घोषणा सुनकर जाति-समाज तथा साधु-समाज आपे से बाहर (आक्रोशित) हो गया था। आलोचनाओं और निंदा की अग्नि धधक उठी थी। संपूर्ण संसार शत्रुवत व्यवहार कर रहा था। जीवन की राह कठिन थी। मार्ग अत्यंत जटिल था। जिसे जो समझ आ रहा था, वह वही बोल रहा था।
​ऐसी विकट परिस्थितियों में निम्नलिखित ज्ञान ही जीवन का आधार और संबल बना। संभवतः यह ज्ञान समस्त मानव जाति के लिए उपयोगी सिद्ध हो।
निंदा और आलोचनाओं के क्षणों में आत्म- विश्लेषण अवश्य करना चाहिए; यदि स्वयं में कोई त्रुटि हो तो उसमें सुधार करें, और यदि कोई गलती न हो तो अपने मन को शांत एवं स्थिर बनाए रखें। यथा-

१. अरे ओ मेरे नादान दिल तुम, निन्दा से नहीं घबराना।
मन की प्रसन्नता अरु समता, हरगिज नहीं मिटाना ॥
​अर्थात् "हे मेरे दिल! दुनिया के लोगों की निंदा या बुराई सुनकर कभी दुखी या भयभीत मत होना। दूसरों के तानों के कारण अपने मन की आंतरिक प्रसन्नता, शांति और समत्व को कभी गायब मत होने देना।"

​​२. ​किसी के अच्छा-बुरा कहने से, बने न कोई बुरा या महान।
निज कर्म से बने सब कुछ, निश्चय कर ले मन नादान।
अपने में हो महान फिर, बुनन दे जग को ताना बाना॥
​अर्थात् "किसी व्यक्ति के अच्छा या बुरा कह देने मात्र से कोई वास्तव में बुरा या महान नहीं बन जाता। व्यक्ति महान या नीच केवल अपने कर्मों से बनता है—यह बात अपने मन में पक्की तरह धारण कर लो। जब तुम अपनी आत्मा की दृष्टि में सच्चे और महान हो, तो दुनिया को जो षड्यंत्र या ताने बुनने हैं, बुनने दो; उससे तुम व्यथित न हो।"

३. चाहे कोई महर्षि हुए हों, चाहे हुए हों कोई भगवान ।
किसकी न हुई यहां निन्दा, किसे न जग कहा हैवान ।
अंत विजय हुई सत्य की, समझ लिया जग अफसाना।
​अर्थात् "इतिहास साक्षी है कि इस संसार में चाहे महान ऋषि-महर्षि रहे हों या स्वयं भगवान के अवतार—इस निंदक दुनिया ने किसी को नहीं छोड़ा। लोगों ने तो महापुरुषों और ईश्वर तक की निंदा की और उन्हें हैवान (दुष्ट) तक कह दिया। परंतु अंततः विजय हमेशा सत्य और धर्म की ही हुई है। इसलिए इस संसार के स्वभाव (अफसाने/किस्से) को समझो और लोगों की बातों को गंभीरता से मत लो।"

४.जग तुझे चाहे देखे कैसहूं, प्रभु नजर में रह तू अच्छा।
जग से नहीं प्रभु से मतलब, प्रभु प्रेमी बन तू सच्चा।
जब तक रहे उर स्पन्दन, रह बना प्रभु का दिवाना ॥
​अर्थात् "दुनिया तुम्हें किस नज़र से देखती है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; बस तुम ईश्वर की दृष्टि में सच्चे और अच्छे बने रहो। तुम्हारा वास्ता इस नश्वर संसार से नहीं, बल्कि परमेश्वर से है। इसलिए प्रभु के सच्चे प्रेमी बनो। जब तक तुम्हारे हृदय में धड़कन (स्पंदन) सांसें ले रही है, तब तक ईश्वर की भक्ति में दीवाने होकर मगन रहो ।"

५.'ज्ञान' प्रभु में रह मगन, संसार को न देकर कान।
अपने पथ पर बढ़ आगे, भूकन दे जग के श्वान ।
निज हिय प्रभु ध्यान संजो के, गा प्रभु प्रेम का गाना॥
​अर्थात् "संसार की व्यर्थ बातों पर ध्यान मत दो और केवल प्रभु के ध्यान में मस्त रहो। जैसे राह चलते पथिक को देखकर कुत्ते भौंकते हैं, वैसे ही अज्ञानी दुनिया की परवाह किए बिना अपने लक्ष्य-पथ पर आगे बढ़ते चलो। अपने हृदय में प्रभु का ध्यान बसाकर निरंतर उनके प्रेम और भक्ति के गीत गाते रहो।"

सार संग्रह: यह कविता आत्म-विश्वास, निंदा से बेपरवाही, कर्म-प्रधानता और ईश्वर-भक्ति का संदेश देती है। दुनिया की परवाह किए बिना सत्य के मार्ग पर चलते रहना ही जीवन का वास्तविक आनंद है। आओ, हम सब शांत और प्रसन्न रहने का व्रत लें।
शुभं भवतु मंगलं भवतु
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श्री कबीर ज्ञान मंदिर
गिरिडीह झारखंड
दिनांक 13 अगस्त 2026

कर्म का बीज*******         ​एक विद्यार्थी ने अपने शिक्षक से पूछा, “सर, यदि कोई व्यक्ति कोई कर्म ही न करे, तो क्या उसे भी...
11/08/2026

कर्म का बीज
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​एक विद्यार्थी ने अपने शिक्षक से पूछा, “सर, यदि कोई व्यक्ति कोई कर्म ही न करे, तो क्या उसे भी उसके लिए दंड मिलना चाहिए?”
​शिक्षक ने उत्तर दिया, “नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है? ऐसा कोई नियम नहीं है।”
​विद्यार्थी बोला, “सर, मैं होमवर्क करके नहीं आया हूँ। अतः मुझे दंड देना अनुचितहै।”
​शिक्षक ने कहा, “गृहकार्य न करना भी तो तुम्हारा एक अनुचित कर्म ही है! जैसे ​विद्यार्थी ने वर्ष भर पढ़ाई नहीं की, समय पर अभ्यास नहीं किया और परीक्षा की तैयारी नहीं की; अतः परिणाम स्वरूप परीक्षा में असफल होना स्वाभाविक है। परीक्षा में असफल होना केवल अकस्मात घटने वाली घटना नहीं है; अपितु इसके पीछे वर्ष भर बोए गए कर्मों के बीज होते हैं।
​अर्थात् कर्म केवल वही नहीं है, जो हम करते हैं, कर्म वह भी है, जिसे हमें करना चाहिए था, किंतु हमने नहीं किया।
​मनुष्य का जीवन कर्मों से निर्मित होता है। हम जो करते हैं, जैसा सोचते हैं, जिस भावना से कार्य करते हैं और जिन कार्यों की उपेक्षा करते हैं—ये सभी हमारे भीतर किसी-न-किसी संस्कार का बीज बोते हैं।
​प्रत्येक कर्म का फल तत्काल प्राप्त नहीं होता।
​उदाहरण के लिए, एक विद्यार्थी को ही देखिए। सर्वप्रथम वह विद्यालय या महाविद्यालय में प्रवेश लेता है। तत्पश्चात पुस्तकें और अभ्यास-पुस्तिकाएँ खरीदता है, उन पर कवर लगाता है, प्रतिदिन पढ़ाई करता है, प्रश्नों के उत्तर तैयार करता है, टिप्पणी (नोट्स) बनाता है, उनका पुनराभ्यास करता है, परीक्षा-प्रपत्र भरता है, प्रवेश-पत्र प्राप्त करता है और अंततः परीक्षा देता है।
​परीक्षा-परिणाम के रूप में जो सफलता या असफलता दिखाई देती है, उसके पीछे महीनों और वर्षों का परिश्रम अथवा असावधानी छिपी होती है। परिणाम परीक्षा के कुछ दिनों पश्चात दिखाई देता है, जबकि उस परिणाम का बीज बहुत पहले ही बोया जा चुका होता है।
​जीवन के कर्म भी ऐसे ही हैं। कुछ कर्मों का फल तत्काल मिलता है, कुछ का कुछ समय पश्चात और कुछ का फल अत्यंत विलंब से सामने आता है। इसलिए कभी-कभी मनुष्य अपने वर्तमान दुख का कारण नहीं समझ पाता। उसे लगता है कि “मैंने तो ऐसा कुछ किया ही नहीं था।”
याद रखें, बीज बिना अंकुर की कल्पना करना भी अज्ञानजन्य है।
​कर्म का नियम अत्यंत सूक्ष्म है। जिस प्रकार बीज मिट्टी में छिपा रहता है और उपयुक्त समय आने पर उसका अंकुर एवं पौधा दिखाई देता है, उसी प्रकार कर्म का बीज भी व्यक्ति के अंतःकरण की गहराइयों में छिपा रहता है और समय आने पर फल के रूप में प्रकट होता है। ​श्रीमद्भगवद्गीता (६.४०) में कहा गया है:
​न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति।
​अर्थात् "कल्याणकारी कर्म करने वाले व्यक्ति की कभी दुर्गति नहीं होती।"
​यह आश्वासन केवल श्रेष्ठ कर्म करने की प्रेरणा ही नहीं देता, अपितु कर्मफल की अनिवार्यता की ओर भी संकेत करता है। अतः सदैव शुभ एवं श्रेष्ठ कर्म करें, क्योंकि इसी में सुख, शांति और संतोष समाहित है।
​शुभं भवतु, मंगलं भवतु।
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श्री कबीर ज्ञान मंदिर
गिरिडीह झारखंड
दिनांक 11 अगस्त 2026

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