Vedic Sangrah

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15/02/2025

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यदि ब्राह्मण त्रिकाल की संध्या करे तो अवश्य मुक्ति निश्चित है!

सामान्य दृष्टि से सन्ध्या माने दो समयों का मिलन और तात्त्वि दृष्टि से सन्ध्या का अर्थ है जीवात्मा और परमात्मा का मिलन। ‘सन्ध्या’ जीव को स्मरण कराती है उस आनंदघन परमात्मा का, जिससे एकाग्र होकर ही वह इस मायावी प्रपंच से छुटकारा पा सकता है।

त्रिकाल संध्या में सूर्योदय,दोपहर के 12 बजे एवं सूर्यास्त इन तीनों वेलाओं से पूर्व एवं पश्चात् 15-15 मिनट का समय सन्ध्या का मुख्य समय माना जाता है। इन समयों में सुषुम्ना नाड़ी का द्वार खुला रहता है, जो कि कुंडलिनी-जागरण तथा साधना में उन्नति हेतु बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।

सन्ध्या के समय ध्यान, जप, प्राणायाम, न्यास इत्यादि करने से बहुत लाभ होता हैं|

जानिए क्या मिलता है त्रिकाल संध्या करने से ?

1. नित्य नियमपूर्वक सन्ध्या करने से चित्त की चंचलता समाप्त होती है। धीरे-धीरे मन एकाग्रता में वृध्दि होती है।

2. भगवान के प्रति आस्था, प्रेम, श्रद्धा ओर भक्ति अपनेआप उत्पन्न हो जाती है ।

3. अंतर्प्रेरणा जाग्रत होती है, जो जीव को प्रति पल सत्य पथ पर चलने की प्रेरणा देती है।

4. अंतःकरण के जन्मों-जन्मों के कुसंस्कार जलने लगते हैं व समस्त विकार समाप्त होने लगते हैं।

5. मुख पर अनुपम तेज, आभा और गम्भीरता आ जाती है।

6. वाणी में माधुर्य, कोमलता और सत्यता का वास हो जाता है।

7. मन में पवित्र भावनाएँ, उच्च विचार एवं सबके प्रति सद्भाव आदि सात्त्वि गुणों की वृद्धि होती है।

8. संकल्प-शक्ति सुदृढ़ होकर मन की आंतरिक शक्ति बढ़ जाती है।

9. हृदय में शांति, संतोष, क्षमा, दया व प्रेम आदि सद्गुणों का उदय हो जाता है और उनका विकास होने लगता है।

10. प्रायः मनुष्य या तो दीनता का शिकार हो जाता है या अभिमान का। ये दोनों ही आत्मोन्नति में बाधक हैं। सन्ध्या से प्राप्त आध्यात्मिक बल के कारण संसार के प्रति दीनता नहीं रहती और प्रभुकृपा से बल प्राप्त होने से उसका अभिमान भी नहीं होता।

11. प्रातःकालीन सन्ध्या से जाने-अनजाने में रात्रि में हुए पाप नष्ट हो जाते हैं। दोपहर की सन्ध्या से प्रातः से दोपहर तक के तथा सायंकालीन संध्या से दोपहर से शाम तक के पापों का नाश हो जाता है। इस प्रकार त्रिकाल सन्ध्या करनेवाला व्यक्ति निष्पाप हो जाता है।

12. सन्ध्या करते समय जो आनंद प्राप्त होता है, वह वर्णनातीत होता है। हृदय में जो रस की धारा प्रवाहित होती है, उसे हृदय तो पान करता ही है, प्रायः सभी इन्द्रियाँ तन्मय होकर शांति-लाभ भी प्राप्त करती हैं।

13. सन्ध्या से शारीरिक स्वास्थ्य में भी चार चाँद लग जाते हैं। सन्ध्या के समय किये गये प्राणायाम सर्वरोगनाशक महा औषधि हैं।

14. त्रिकाल सन्ध्या करनेवाले को कभी रोजी-रोटी के लिए चिंता नहीं करनी पड़ती।

और्व मुनि राजा सगर से कहते हैं : ”हे राजन् ! बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि सायंकाल के समय सूर्य के रहते हुए और प्रातःकाल तारागण के चमकते हुए ही भलीप्रकार आचमनादि करके विधिपूर्वक संध्योपासना करे ।

सूतक (संतान के जन्म लेने पर होनेवाली अशुचिता), अशौच (मृत्यु से होनेवाली अशुचिता), उन्माद, रोग और भय आदि कोई बाधा न हो तो प्रतिदिन ही संध्योपासना करनी चाहिए ।

जो पुरुष रुग्णावस्था को छोड़कर और कभी सूर्योदय या सूर्यास्त के समय सोता है वह प्रायश्चित्त का भागी होता है अतः हे महीपते ! गृहस्थ पुरुष सूर्योदय से पूर्व ही उठकर प्रातःकालीन संध्या करे और सायंकाल में भी तत्कालीन संध्या-वंदन करे, सोये नहीं ।”

इससे ओज, बल, आयु, आरोग्य, धन-धान्य आदि की वृद्धि होती है । आजकल की व्यस्त दिनचर्या में भी हमे समय निकाल कर सुबह शाम की दो संध्या तो अवश्य ही करनी चाहिए और यदि तीनो समय की संध्या सम्भव हो सके तो अति उत्तम होगा।

#उसके उपरान्त "नमः शिवाय " यथा शक्ति...

नमो ब्राह्मण्यदेवाय!!|| हरि ॐ ||

वेदों मेँ त्रिकाल गायत्री उपासना ब्राह्मणों के लिए अनिवार्य कही
गई है | वही ब्राह्मण पूजनीय है , वन्दनीय है; जो त्रिकाल उपासना
करता है |
किन्तु बड़े अफसोस की बात है कि एक भी ब्राह्मण अथवा हिन्दु
आपको त्रिकाल साधक हर जगह नहीं मिलेगें ; जबकि हर जगह
पाँच बक्त नमाज पढने वाले मुस्लिम साधक जरुर मिलेगें |

|| जय श्रीराम ||
🙏🙏🌹
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29/09/2024

29 सितम्बर 2024
जीवन ऐसा हो, जो संबंधों की कदर करे। और संबंध ऐसे हो, जो याद करने को मजबूर कर दे।जीवन में सदा हम एक-दूसरे को समझने का प्रयत्न करें, परखने का नहीं। *प्रशंसा करने वालों को धन्यवाद कीजिये और हमारी बुराई करने वाले को गौर से सुनें क्योंकि यह लोग अक्सर वह बातें भी जानते/बताते हैं, जो हमें भी मालूम ही नहीं होती। वास्तव में ज़िंदगी में ऐशों आराम कितना भी क्यों न हो, यदि शान्ति नहीं है तो समझें कि कुछ भी नहीं है। ज़िंदगी में संतुष्टि और शांति होना बहुत आवश्यक है, जबकि सब जानते हैं कि इस धरा का, इस धरा पर, सब धरा ही रह जायेगा। ध्यान रहे कि कोई हमारा बुरा करें यह उसका कर्म हैं, लेकिन हम किसी का बुरा ना करें यह हमारा धर्म हैं।* सुप्रभात -आज का दिन शुभ व मंगलमय हो।

22/09/2024

समझो तो जानें, नहीं तो अपने आपको दिखावे के लिए खोखला बना लिया है।

गर्व करो कि हम हिन्दू हैं।

जयतु सनातन धर्मः

19/09/2024

🌿🌼 श्राद्ध-तत्त्व-प्रश्नोत्तरी 🌼🌿 अवश्य पढ़ें।।

🌿 प्रश्न - श्राद्ध किसे कहते हैं ?

उत्तर - श्रद्धासे किया जानेवाला वह कार्य, जो पितरों के निमित्त किया जाता है, श्राद्ध कहलाता है।

🌿 प्रश्न- कई लोग कहते हैं कि श्राद्धकर्म असत्य है और इसे ब्राह्मणों ने ही अपने लेने खाने के लिये बनाया है। इस विषय पर आपका क्या विचार है ?

उत्तर - श्राद्धकर्म पूर्णरूपेण आवश्यक कर्म है और शास्त्रसम्मत है। हाँ, वर्तमानकाल में लोगों में ऐसी रीति ही चल पड़ी है कि जिस बात को वे समझ जायँ-वह तो उनके लिये सत्य है; परंतु जो विषय उनकी समझ के बाहर हो, उसे वे गलत कहने लगते हैं।

कलिकाल के लोग प्रायः स्वार्थी हैं। उन्हें दूसरे का सुखी होना सुहाता नहीं। स्वयं तो मित्रों के बड़े-बड़े भोज-निमन्त्रण स्वीकार करते हैं, मित्रों को अपने घर भोजन के लिये निमन्त्रित करते हैं, रात-दिन निरर्थक व्यय में आनन्द मनाते हैं; परंतु श्राद्धकर्म में एक ब्राह्मण को भोजन कराने में भार अनुभव करते हैं। जिन माता-पिता की जीवनभर सेवा करके भी ऋण नहीं चुकाया जा सकता, उनके पीछे भी उनके लिये श्राद्धकर्म करते रहना आवश्यक है।

🌿 प्रश्न - श्राद्ध करने से क्या लाभ होता है ?

उत्तर - मनुष्यमात्र के लिये शास्त्रों में देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण - ये तीन ऋण बताये गये हैं। इनमें श्राद्ध के द्वारा पितृ ऋण उतारा जाता है।

विष्णुपुराण में कहा गया है कि 'श्राद्धसे तृप्त होकर पितृगण समस्त कामनाओंको पूर्ण कर देते हैं।' (३। १५।५१)

इसके अतिरिक्त श्राद्धकर्ता से विश्वेदेवगण, पितृगण, मातामह तथा कुटुम्बीजन - सभी सन्तुष्ट रहते हैं। (३। १५।५४) पितृपक्ष (आश्विन का कृष्णपक्ष) में तो पितृगण स्वयं श्राद्ध ग्रहण करने आते हैं तथा श्राद्ध मिलने पर प्रसन्न होते हैं और न मिलने पर निराश हो शाप देकर लौट जाते हैं।

विष्णुपुराण में पितृगण कहते हैं- हमारे कुल में क्या कोई ऐसा बुद्धिमान् धन्य पुरुष उत्पन्न होगा, जो धनके लोभ को त्यागकर हमारे लिये पिण्डदान करेगा। (३।१४। २२)

विष्णुपुराण में श्राद्धकर्म के सरल-से-सरल उपाय बतलाये गये हैं। अतः इतनी सरलता से होनेवाले कार्य को त्यागना नहीं चाहिये।

🌿 प्रश्न - पितरों को श्राद्ध कैसे प्राप्त होता है ?

उत्तर - यदि हम चिट्ठी पर नाम-पता लिखकर लैटर- बक्स में डाल दें तो वह अभीष्ट पुरुष को, वह जहाँ भी है, अवश्य मिल जायगी। इसी प्रकार जिनका नामोच्चारण किया गया है, उन पितरों को, वे जिस योनि में भी हों, श्राद्ध प्राप्त हो जाता है। जिस प्रकार सभी पत्र पहले बड़े डाकघर में एकत्रित होते हैं और फिर उनका अलग-अलग विभाग होकर उन्हें अभीष्ट स्थानों में पहुँचाया जाता है, उसी प्रकार अर्पित पदार्थ का सूक्ष्म अंश सूर्य-रश्मियों के द्वारा सूर्यलोक में पहुँचता है और वहाँ से बँटवारा होता है तथा अभीष्ट पितरों को प्राप्त होता है।

पितृपक्ष में विद्वान् ब्राह्मणों के द्वारा आवाहन किये जानेपर पितृगण स्वयं उनके शरीर में सूक्ष्मरूप से स्थित हो जाते हैं। अन्न का स्थूल अंश ब्राह्मण खाता है और सूक्ष्म अंश को पितर ग्रहण करते हैं।

🌿 प्रश्न- यदि पितर पशु-योनि में हों, तो उन्हें उस योनि के योग्य आहार हमारे द्वारा कैसे प्राप्त होता है ?

उत्तर- विदेश में हम जितने रुपये भेजें, उतने ही रुपयों का डालर आदि (देशके अनुसार विभिन्न सिक्के) होकर अभीष्ट व्यक्ति को प्राप्त हो जाते हैं। उसी प्रकार श्रद्धापूर्वक अर्पित अन्न पितृगण को, वे जैसे आहार के योग्य होते हैं, वैसा ही होकर उन्हें मिलता है।

🌿 प्रश्न - यदि पितर परमधाम में हों, जहाँ आनन्द-ही- आनन्द है, वहाँ तो उन्हें किसी वस्तु की भी आवश्यकता नहीं है। फिर उनके लिये किया गया श्राद्ध क्या व्यर्थ चला जायगा ?

उत्तर- नहीं। जैसे, हम दूसरे शहरमें अभीष्ट व्यक्ति को कुछ रुपये भेजते हैं, परंतु रुपये वहाँ पहुँचने पर पता चले कि अभीष्ट व्यक्ति तो मर चुका है, तब वह रुपये हमारे ही नाम होकर हमें ही मिल जायँगे।

ऐसे ही परमधामवासी पितरों के निमित्त किया गया श्राद्ध पुण्यरूप से हमें ही मिल जायगा। अतः हमारा लाभ तो सब प्रकार से ही होगा।

।। शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।
❗ राधे राधे ❗
⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️

19/09/2024

~💐~ पुरुषार्थ हो, लेकिन निस्वार्थ हो ~💐~
एक सन्त जी बड़े निस्पृह, सदाचारी एवं लोक सेवी थे। जीवन भर नि:स्वार्थ भाव से समाज की भलाई में लगे रहे। एक बार विचरण करते हुए देवताओं की टोली उनकी कुटिया के समीप से निकली। सन्त जी साधनारत थे, साधना से उठे। देखा, देवगण खड़े हैं। आदर सम्मान किया, आसन दिया।
देवतागण बोले, "आपके लोकहितार्थ किए गए कार्यों को देखकर हमें प्रसन्नता हुई। आप जो चाहें वरदान माँग लें।"
सन्त जी विस्मय से बोले, "सब तो है, मेरे पास, कोई इच्छा भी नहीं है, जिसे माँगा जाये।"
देवगण एक स्वर में बोले, "आप को माँगना ही पड़ेगा, अन्यथा हमारा बड़ा अपमान होगा।"
सन्त जी बड़े असमंजस में पड़े कि कोई तो इच्छा शेष नहीं है। माँगें भी तो क्या माँगें? फिर बड़े विनीत भाव से बोले, "आप सर्वज्ञ हैं, स्वयं समर्थ हैं। आप ही अपनी इच्छा से दे दें, मुझे स्वीकार होगा।"
देवता बोले, "तुम दूसरों का कल्याण करो।"
सन्त जी बोले, "क्षमा करें देव !! यह दुष्कर कार्य मुझसे ना बन पड़ेगा।"
देवता बोले, "इसमें दुष्कर क्या है?"
सन्त जी बोले, "माफ करना, मैंने तो आज तक किसी को दूसरा समझा ही नहीं। सभी तो मेरे अपने हैं, फिर दूसरों का कल्याण कैसे बन पड़ेगा?"
देवतागण एक-दूसरे को देखने लगे कि सन्तों के बारे में बहुत सुना था, आज वास्तविक सन्त जी के दर्शन भी हो गये। देवताओं ने सन्त जी की कठिनाई समझकर अपने वरदान में संशोधन किया और बोले, "अच्छा !! आप जहाँ से भी निकलेंगे और जिस पर भी आपकी परछाईं पड़ेगी, उसका कल्याण होता चला जाएगा।"
सन्त जी ने बड़े विनम्र भाव से प्रार्थना की, 🌷"हे देवगण !! यदि एक कृपा और कर दें तो बड़ा उपकार होगा। वो यह कि मेरी छाया से किसका कल्याण हुआ, कितनों का उद्धार हुआ, इसका भान मुझे ना होने पाए, अन्यथा मेरा अहंकार मुझे ले डूबेगा।"🌷
देवतागण सन्त जी का विनम्र भाव सुनकर नतमस्तक हो गए। कल्याण सदा ऐसे ही सन्तों के द्वारा सम्भव है। अहंकारी इन्सान को चापलूस बहुत अधिक पसंद आते हैं। जो उसकी चापलूसी करके उसको दीमक की तरह खोखला करते रहते हैं।
🌿आलोचकों की सत्य बोलने वाली कड़वी वाणी उनके अहंकार को चोट पहुँचाती है। इसलिए आलोचक उन्हें शत्रु के समान दिखाई देते हैं। अहंकारी इन्सान से सच्चे मित्र एवं शुभचिंतक मानसिक तौर से दूर हो जाते हैं क्योंकि अहंकारी को अपने वार्तालाप में किसी की मर्यादा भंग करने तथा उसे द्रवित करने वाले वचनों का ध्यान नहीं रहता।🌿
🌸अहंकार को सदा मुँह की खानी पड़ती है। वह चाहे रावण का अहंकार हो या दुर्योधन का। अहंकार के उत्पन्न होने से विवेक नष्ट होता है एवं विवेकहीन व्यक्ति सम्मान पाने लायक नहीं होते। सम्मान पाने के लिए विवेकपूर्ण कार्यों की आवश्यकता होती है और जरुरी नहीं कि धन से सम्मान मिले, अधिकतर तो धन से धोखा ही मिलता है। परंतु सच यह भी है कि जीते जी धन की आवश्यकता है, इसके बिना जीवन अधूरा हो जाता है। हमें नेक कमाई से कमाए हुए धन का उपयोग से अपने परिवार (कुटुंब) की जरूरतें पूरी करने के बाद, बचे हुए धन का समाज कल्याण हित में जितना हो सके उतना उपयोग अवश्य करना चाहिए।🌸
🙏🙏 जय श्री राधेश्याम जी 🙏🙏

15/09/2024

दुःख किसे कहते हैं? दुःख की परिभाषा क्या है?

भगवान कहते है ~

'दुःखं कामसुखापेक्षा पण्डितो बन्धमोक्षवित्।।'

विषयों से सुख की अपेक्षा करते रहना ही दुःख है। भोग से, खाने पीने से हम सुखी हो जाएँगे, ऐसा सोचना ही दुःख है।

फिर कहा - दरिद्र कौन है? गरीब कौन है? हम सोचते हैं, जिसके पास धन नहीं वह दरिद्र है। लेकिन यहाँ दरिद्र की सुन्दर परिभाषा दी गई है।

'दरिद्रो यस्त्वसन्तुष्टः।'

दरिद्र व्यक्ति वह है जो हमेशा असंतुष्ट रहता है। असंतुष्ट व्यक्ति गरीब है या नहीं? बहुत कुछ मिल जाने पर भी, यह नहीं है, वह नहीं है - ऐसा लगना ही दारिद्रय है। बचपन में जब हम बोलते थे कि यह नहीं है, वह नहीं है, तो पिताजी हमें डाँट देते थे। कहते थे - नहीं है, नहीं है क्यों कहते रहते हो, यही दरिद्रता का, असंतुष्टि का लक्षण है।

कृपण अथवा दया का पात्र कौन है?

'कृपणो योऽजितेन्द्रियः।'

दया का पात्र वह है जिसका अपनी इन्द्रियों पर संयम नहीं। अजितेन्द्रिय तो वस्त्रविहीन से भी बढ़कर दया का पात्र है। वास्तव में वही कृपण है।

ईश्वर कौन है? ईश्वर की परिभाषा क्या है?

'गुणेष्वसक्तधीरीशो।'

जो प्रकृति के गुणों से नितान्त अनासक्त रहता है, वही समर्थ होता है, शक्तिशाली पुरुष होता है, ईश्वर हो जाता है। दूसरे अर्थ में वैराग्यवान पुरुष ही ईश्वर कहलाता है और जो गुणों में आसक्त हो जाता है उसे जीव कहते हैं।

अब भगवान एक सुन्दर तथा ऊँचे स्तर की बात कहते हैं। कहते हैं - गुण-दोष की बात मैं कहाँ तक बताता रहूँ? किसी में गुण-दोष देखना ही दोष है और गुण-दोष दोनों नहीं देखना ही सबसे बड़ा गुण है। क्या अच्छा है, क्या बुरा है यह कब तक देखते रहोगे? जरा इन भावों से ऊँचे उठ जाओ।

01/09/2024

आप एक छोटा सा प्रयोग करो मात्र एक घंटा कभी भी समय निकाल कर, आप का जीवन एकदम प्रवर्तित हो जाएगा, आप वो होने के मार्ग पर चल पड़ोगे जो आप वास्तव में हो...
प्रयोग👇

एक घंटे के लिए, आप भूतकाल और भविष्य की घटनाओं को बिल्कुल भुला दे, और वर्तमान में आ जाए, भूल जाओ पहले क्या हुआ, भूल जाप आगे क्या होगा, केवल वर्तमान में आ जाओ।
उसके पश्चात आप के आसपास जो कुछ भी हो रहा उसको देखे, जैसे कोई फिल्म देख रहे हो, स्वयं को भी देखो और बाकी जो कुछ भी हो रहा उसको भी देखो...
धीरे धीरे आप बाहर से ध्यान हटा के नेत्र बंद कर ले और अब अपने भीतर जो विचार चल रहे उनको देखने का प्रयास करे।
याद रहे विचारो के साथ बहाना नही, देखना है, जैसे ही बहने लगो, पुनः विचार देखो, विचारो में कुछ भी आ रहा हो, मात्र देखने का अभ्यास करो।
एक घंटे पश्चात अपने अनुभव मुझे ऑडियो में भेज सकते हो।

31/08/2024

नाम जप का महत्व

*कलयुग केवल नाम अधारा,*
*सुमिर सुमिर नर उतरहिं पारा ll*

*तुलसीदास रचित रामायण की इस चौपाई के अनुसार आज के युग में ऐसे क्या साधन उपलब्ध हैं, जिनके द्वारा आसानी से आत्मज्ञान अर्थात मोक्ष पाया जा सकता है..!*

*इस कलयुग में भगवान का नाम ही आधार है। केवल नाम सुनने व जपने से ही मानव भव सागर से पार उतर जाता है।*

*नाम जप में किसी विधिविधान, देश, काल, अवस्था की कोई बाधा नहीं है। किसी प्रकार से, कैसी भी अवस्था में, किसी भी परिस्थिति में, कहीं भी, कैसे भी नाम जप किया जा सकता है।*

*इस नाम जप से हर युग में भक्तों का भला हुआ।*

*शास्त्र कहते हैं कि कलियुग ने आने के लिए राजा परीक्षित से बहुत अनुनय-विनय की; कहा कि "घबराइए नहीं महाराज, हम किसी को तंग नहीं करेंगे, बस 'स्वर्ण' में घर बसाएंगे।"*

*"हमारे साथ दो-चार संगी, साथी होंगे- राग, द्वेष, ईर्ष्या, काम-वासना आदि।"*

*अपने गुण बताते हुए कलियुग ने कहा- "सुनो हमारी महिमा! हमारे राज में जो प्रभु का 'केवल' नाम ले लेगा, उसकी मुक्ति निश्चित है। और तो और, मन से सोचे गए पाप की हम सजा नहीं देंगे, पर मन से सोचे गए पुण्य का फल जरूर देंगे।"*

*राजा परीक्षित ने कलियुग को आने दिया तो सबसे पहले वह राजा के सोने के मुकुट में ही विराजमान हुआ और सबसे पहले उन्हें ही मृत्यु की ओर धकेल दिया।*

*कलियुग को सभी कोसते हैं, सभी क्रोध, राग, द्वेष और वासना से ग्रस्त हैं। कोई कहता है काश, हम सतयुग में पैदा हुए होते। कोई त्रेता और द्वापर युग के गुण गाता है।*

*तुलसीदास ने जन-मानस की हालत देखकर समझाया कि "कलियुग में बेशक बहुत सी गड़बडि़याँ हैं, मगर उन सबसे बचने का उपाय जितनी सरलता से कलियुग में मिल सकता है, उतनी सरलता से किसी और काल में नहीं मिला।"*

*पहले के युगों में प्रभु को पाने के लिए ध्यान, घोर तपस्या, बड़े-बड़े यज्ञ, अनुष्ठान करना पड़ता था। ये सभी मार्ग नितांत कठिन और घोर तपस्या के बाद ही फलीभूत होते हैं।*

*पर कलियुग में ईश्वर को प्राप्त करना पहले के मुकाबले बड़ा ही सरल हो गया है। केवल भगवान नाम जप प्रभु को पाया जा सकता है।*

*हर मत और संप्रदाय ने गुण गाया है 'नाम' का। यह वह मार्ग है जहाँ विविध संप्रदाय एकमत हो जाते हैं। तभी तो गोस्वामी तुलसीदास ने कहा: "कलियुग केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा।।"*

*नाम जप में किसी विधिविधान, देश, काल, अवस्था की कोई बाधा नहीं है। किसी प्रकार से, कैसी भी अवस्था में, किसी भी परिस्थिति में, कहीं भी, कैसे भी नाम जप किया जा सकता है।*

*इस नाम जप से हर युग में भक्तों का भला हुआ।*

*श्रीभद् भागवत में कथा आती है अजामिल ब्राह्माण की जिसने सतयुग में घोर पाप किया। पत्नी के होते हुए वेश्या के पास रहा। वेश्या के पुत्र का नाम नारायण रख दिया।*

*मरते समय पुत्र को पुकारा- 'नारायण!' तो स्वयं नारायण आ गए।*

*ऐसी ही एक और कथा है गज ग्राह युद्ध की। गज ने अपनी सूंड तक अपने को डूबते पाया तो पुकारा 'रा!' इतनी भी शक्ति नहीं थी कि पूरा 'राम' कह दे। पर प्रभु ने भाव समझ लिया और गज के प्राण बचा लिए।*

*त्रेता में वाल्मीकि ने नाम जप किया तो उल्टा। 'राम' कह न सके, डाकू थे, मांसाहारी थे, सो 'मरा' कहना सरल लगा, तोते की तरह रटते रहे तो स्वयं श्री राम पधारे कुटिया में। 'उलटा नाम जपत जग जाना। वाल्मीकि भए ब्रह्मा समाना।"*

*द्वापर युग में द्रोपदी ने भरी सभा में रोते हुए हाथ खड़े कर दिए। सभी का सहारा छोड़ दिया तो कृष्ण की याद आई। श्रीकृष्ण चीर रूप में प्रकट हुए।*

*कलियुग में तो नाम जप के भक्तों की भरमार है। कबीर, मीरा, रैदास, तुलसीदास, रहीम, रसखान, नानक, रामकृष्ण परमहंस, रमण महर्षि आदि।*

*राजा परीक्षित के वैद्य धन्वन्तरि तो कहते थे कि 'नाम जप' औषधि है, जिससे सभी रोग नष्ट हो जाते हैं। इस औषधि का लाभ अनेक संतों ने उठाया है। हर अवस्था में, चिंता में, रोग में उन्होंने 'राम नाम' का आश्रय लिया।*

*लेकिन नाम जप का यह अर्थ नहीं कि पाप करने की छूट मिल गई।*

*नाम से पापों का विनाश होता तो है, पर तभी जब व्यक्ति के हृदय में पिछले पापों के प्रति प्रायश्चित और उन्हें दोबारा न करने का संकल्प हो।*

*नाम जप की औषधि के साथ परहेज भी आवश्यक है। नाम जपते रहो, क्रोध स्वत: दूर हो जाएगा। जप में बुरी प्रवृत्तियां पीछे हटती जाती हैं। उन्हें जबरन हटाने का प्रयास न करो, बस नाम जपो, प्रेम से।*

*नाम जप माया रूपी संसार से उबरने का अमोघ मंत्र है। किन्तु इसके लिए हृदय का योग भी होना चाहिए।*

*ईश्वर को पुकारने के लिए जब दिल से आवाज उठती है, तभी उस तक पहुंचती है। अतः आइए हम सब पूर्ण भाव से ईश्वर के पवित्र नामों का जप करें।*

31/08/2024

बछ बारस आज
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भाद्रपद मास (भादों) की कृष्णपक्ष की द्वादशी तिथि के दिन बछ बारस का पर्व मनाया जाता हैं। इस दिन पुत्रवती स्त्रियाँ अपने पुत्र के स्वास्थ्य और लम्बी उम्र के लिये गौमाता से प्रार्थना करती हैं और बछड़े वाली गाय का पूजन करती हैं। इस दिन चाकू से काटी गई वस्तुयें, गेहूँ, जौ, और गाय के दूध से बनी चीजों का सेवन निषेध हैं। एक दिन पहले ही रात्रि को बछबारस के लिये मूंग, मोठ, चने एवं बाजरा भिगो कर रख दिया जाता है, उसे भिजोना कहते हैं।

बछ बारस कब है?
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इस वर्ष बछ बारस की पूजा एवं व्रत 30 अगस्त, 2024 शुक्रवार के दिन किया जायेगा।

बछ बारस क्यों मनाते हैं?
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हमारे आराध्य श्री कृष्ण को गायों से बहुत प्रेम था। उन्होने गौ-सेवा के महत्व को लोगों को बताया और गाय को माता कहकर उसकी पूजा को प्रतिपादित किया। भगवान श्री कृष्ण स्वयं गायों की सेवा किया करते थें। उनके गायों के प्रति इस प्रेम को देखकर स्वयं कामधेनु ने बहुला गाय का रूप लेकर नंदबाबा की गौशाला में स्थान लिया था।

भगवान श्री कृष्ण का एक नाम गोपाल भी है। इस दिन पहली बार भगवान श्री कृष्ण गायों और बछड़ों को चराने के लिये गये थे। माता यशोदा ने श्री कृष्ण को खूब सजा-धजा कर और पूजा पाठ कराकर इस दिन गाय चराने के लिये भेजा था। उनके साथ उनके बड़े भाई बलराम भी थे। श्री कृष्ण उनके साथ गायों और उनके बछड़ों को लेकर चराने के लिये गये थे। इसलिये इस दिन सब लोग गौ-पूजा करके भगवान श्री कृष्ण द्वारा दिये गये गौ-सेवा के संदेश को सम्मान देकर इसे एक पर्व के रूप में मनाते हैं।

बछ बारस की पूजा विधि
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बछ बारस के दिन पुत्रवती स्त्रियाँ व्रत रखती है और गाय – बछड़ें की पूजा करती हैं। बछ बारस से एक दिन पहले रात्रि को बछबारस के लिये मूंग, मोठ, चने एवं बाजरा भिगो कर रख दिया जाता है। फिर प्रात: काल स्नानादि के बाद पूजा से पहले उसे कढ़ाई में छोंक कर पका लिया जाता है।

1. व्रत करने वाली स्त्री को बछ बारस के दिन प्रात: काल स्नानादि नित्य क्रिया से निवृत्त होकर स्वच्छ कपड़े पहनने चाहिये।
2. यदि आपके घर पर बछड़े वाली दूध देने वाली गाय हो तो उसे बछडे़ के साथ स्नान करायें।
3. फिर गाय और उसके बछड़े को नया कपड़ा ओढा़कर, हल्दी-चंदन से तिलक करें और फूलों की माला पहनायें। अगर सम्भव तो उनेक सींगों को भी सजायें।
4. तत्पश्चात तांबे का बर्तन लेकर उसमें पानी भरें। उसमें तिल, अक्षत, इत्र और फूल ड़ालकर गाय पर छिड़के और उसके पैरों (खुर) पर जल ड़ाले। यह करते समय निम्नलिखित मंत्र का पाठ करें –

क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते।
सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्य नमो नम:॥

5. गाय माता के खुर पर लगी मिट्टी से अपने मस्तक पर टीका लगायें।
6. दीपक जलाकर गौमाता की आरती उतारें। भीगे चने, मूंग, मोठ एवं बाजरा गाय को अर्पित करें।
7. गौ पूजन के पश्चात बछ बारस की कहानी कहे या सुनें।
8. व्रत करने वाली स्त्री भिजोना (भीगा हुआ मूंग,मोठ, बाजरा और चने) पर पैसे रखकर अपनी सास या जेठानी को पैर छू करे दें।
9. बछ बारस के पूरे दिन व्रत रखकर रात को अपने इष्ट देवता का ध्यान और पूजन करके भोजन करें।
10. इस दिन भोजन में गेहूँ और जौ नही खाना चाहिये और ना ही गाय के दूध से बनी किसी वस्तु का सेवन करना चाहियें। साथ ही चाकू से कुछ भी नहीं काटना चाहिये और न ही चाकू से कटी किसी वस्तु का सेवन करना चाहिये। इस दिन सब्जी भी काटना वर्जित है।
11. अगर आपके घर पर बछड़े वाली गाय न हो तो, आपके घर के आस-पास जहाँ भी बछड़े वाली गाय हो वहाँ इसी विधि से पूजा करें। पूजा के बाद उसके लिये दक्षिणा भी रखें।
12. यदि आपको बछड़े वाली गाय न मिले तो भी आप यह पूजा कर सकती है। उस परिस्थिति में आप गीली मिट्टी से गाय एवं बछडे़ की प्रतिमा बनाकर उपरोक्त विधि से उनकी पूजा करें।

बछ बारस की दो बहुत ही प्रचलित कथायें हैं-
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बछ बारस की कहानी - (1)
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प्राचीन समय की बात है, एक गाँव में एक सास और बहू रहा करती थी। सास बहुत ही धार्मिक थी। नित्य प्रतिदिन मंदिर जाना, पूजा पाठ करना, गौ सेवा करना, यह उसकी दिनचर्या का महत्वपूर्ण काम था। उसकी बहू भी बहुत आज्ञाकारी थी। जो भी उसकी सास कहती वो बिना प्रश्न किये उस कार्य को सम्पादित कर देती थी। उनके पास एक गाय और बछड़ा था। उस गाय का नाम था गेहूँला और उसके बछड़े का नाम था जौला। दोनों सास बहू उस गाय और बछड़े से बहुत प्यार करती थी और खूब मन लगाकर उनकी सेवा भी करती थी। वो गाय भी बहुत ही समझदार थी, प्रतिदिन चरने के लिये छोड़ने पर शाम को स्वयं ही घर पर आ जाती थी।

एक बार सास ने घर पर जौ की बालियाँ लाकर रखी। परंतु वो बहू को उनके विषय में बताना भूल गई। सास हर दिन की भांति प्रात:काल उठकर अपने नित्य कर्मों से निवृत्त होकर मंदिर जाने के लिये तैयार हुई और गाय को चरने के लिये छोड़ दिया। मंदिर जाते जाते उसने अपनी बहू को आवाज लगाकर कहा- बहू मैं मंदिर जा रही हूँ। जब तक मैं वापस लौट कर आँऊ तब तक तू जौ लाकर, काटकर उबालने के लिये रख देना। बहू को घर पर रखें जौ के विषय में कुछ भी पता नही था। उसको अपनी सास की बात सुनकर ऐसा लगा कि उसकी सास ने उसे जौला यानी गाय के बछड़े को काटकर उबालने के लिये कहा हैं।

यह सुनकर वो सोच में पड़ गई, कि आज सासू माँ ने कैसी बात कह दी? अगर मैं उनकी बात मानती हूँ, तो मुझे इस निरिह बछड़े की हत्या करनी पड़ेगी। जिससे मुझे गौहत्या का पाप लगेगा। लेकिन अगर उनकी बात नही मानती हूँ और उनके कहे अनुसार नही करती हूँ तो उनकी अवज्ञा होगी। वो भी मेरे लिये पाप के समान ही हैं।

वो इसी धर्म संकट में उलझ गई थी। बैठी – बैठी यही सोचे जा रही थी क्या करें? और क्या न करें? अंत में उसने अपनी सास की आज्ञा का पालन करना ही अपना धर्म जाना और गाय के बछड़े जौला को काटकर बर्तन में उबालने के लिये रख दिया। परंतु उस बछड़े की हत्या करके उसके मन को बिल्कुल भी चैन नही मिल रहा था और वो उसका दुख मान कर बस रोये जा रही थी।
जब उसकी सास वापस आयी तो उसकी आँखें घर का दृश्य देखकर आश्चर्य से फटी रह गई। घर में खून ही खून फैल रहा था। जहाँ-तहाँ खून के धब्बे देखकर उसने अपनी बहू को आवाज लगाई। उसकी बहू रोती हुई उसके सामने आगई। तब सास ने उससे पूछा कि यह घर में खून कहाँ से आया? तब बहू ने सास को उसकी आज्ञा याद करायी और कहा कि यह रक्त जौला का है। मैंने आपके कहे अनुसार उसको काटकर उबालने के लिये रख दिया हैं।

बहू की बात सुनकर सास ने उसे कहा मैंने तुम्हे घर में रखें जौ काटकर उबालने के लिये कहा थी ना कि गाय के बछड़े जौला को काटकर उबालने के लिये कहा था। यह सुनकर बहू अपनी सुधबुध खो बैठी। उसकी सास का भी दुख के मारे बुरा हाल हो गया। तब सास ने हिम्मत करके अपनी बहू को सम्भाला और उसे अपने साथ अपने ईष्ट देव के मंदिर लेकर गई। वहाँ पहुँच कर दोनो सास-बहू हाथ जोड़कर उनके आगे खड़ी हो गई।

उनके सामने बारम्बार माथा टेक कर, नाक रगड़कर बहू की उस गलती के लिये क्षमा माँगने लगी। सास ने कहा- हे प्रभु! मैंने सदा ही आपका ध्यान और पूजन सच्ची श्रद्धा एवं भक्ति के साथ किया हैं। हमेशा धर्म का पालन किया। मेरी आपसे विनती है कि यदि मेरी बहू ने यह सब जानबूझकर किया है, तो इसे सजा दो और अगर इससे यह भूल वश हुआ है, तो इसे क्षमा करों और उस बछड़े को पुन: जीवित कर दो। दोनो सास बहू मंदिर में भूखी-प्यासी ईश्वर का ध्यान करती रही।

जब शाम होने लगी तब उन्हे लगा कि अब गाय चरकर वापस आने वाली होगी और अपने बछड़े को जीवित ना पाकर उसका क्या हाल होगा? यही सोचकर वो मंदिर से घर के लिये रवाना हो गई। घर पहुँच कर उन्होने देखा की गाय भी आ चुकी है। सास-बहू आगे के बारे में सोचकर भयभीत हो रही थी, तभी जैसे ही गाय रम्भाते हुये घर की तरह बढ़ी उसका बछड़ा घर के अंदर से दौड़ता हुआ अपनी माँ के पास आ गया।

यह देखकर सास बहू दोनो विस्मित हो गई और बार-बार ईश्वर का धन्यवाद देने लगी। तब उन्होने घर आकर उस गाय और बछड़े की खूबा सेवा करी। तबसे स्त्रियाँ अपनी संतान की रक्षा और लम्बी आयु के लिये बछ बारस का व्रत एवं पूजा-अर्चना करती हैं।

बछ बारस की कहानी - (2)
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पौराणिक कथानुसार बहुत समय पहले सुवर्णपुर नामक नगर पर देवदानी नाम का एक राजा राज किया करता था। उसकी दो रानियाँ थी। एक का नाम था सीता’ और दूसरी का गीता। देवदानी एक न्यायप्रिय और धर्मपरायण राजा था।

राजा के पास एक बहुत बड़ी गौशाला थी उसमें बहुत सी गायें और भैंसे थी। रानी सीता को एक भैंस अति प्रिय थी और वो उसका बहुत खयाल रखती थी। वही दूसरी ओर रानी गीता को एक गाय और उसका बछड़ा बहुत ही ज्यादा प्रिय था। वो उस गाय को अपनी सखी मानती थी और उसके बछड़े को अपनी संतान के समान स्नेह करती थी।

रानी गीता और उस गाय में एक दूसरे के प्रति इतना प्यार देखकर रानी सीता और उसकी भैंस उनसे ईर्ष्या करती थी। रानी सीता स्वयं को रानी गीता से श्रेष्ठ मानती थी और उसकी भैंस भी स्वयं को गायों से श्रेष्ठ मानती थी। परंतु गायों को पूजा जाता देखकर उसको बहुत ईर्ष्या होती थी। ईर्ष्यावश एक दिन उस भैंस ने रानी सीता को रानी गीता और उसकी गाय के विषय में भड़काना शुरू कर दिया। भैंस ने कहा इस गाय और बछड़े को सब बहुत प्यार करते हैं। राजा देवदानी भी इस गाय और बछड़े में अधिक रुचि लेते हैं। इस तरह से तो एक दिन तुम और मैं अकेले ही रह जायेंगे। सभी उस गाय-बछड़े और रानी गीता को ही सम्मान देंगे। उसकी बाते सुनकर रानी सीता को क्रोध आ गया और असुरक्षा की भावना से ग्रस्त होकर उसने मौका पाते ही उस गाय के बछड़े को काटकर गेहूँ के ढ़ेर के नीचे दबा दिया।

अपने बछड़े को ना पाकर वो गाय दुखी होकर आंसू बहाने लगी। उसको दुखी देखकर रानी गीता भी व्यथित हो उठी। रानी ने सेवकों को उस गाय के बछड़े को खोजने के लिये कहा परंतु उसका कोई पता नही चल सका। ऐसे ही कुछ ही दिन बीत गयें।
एक दिन राजा जब भोजन करने बैठा तो राजा को भोजन में से बहुत बुरी दुर्गंध आने लगी। उसे सभी तरफ रक्त और मांस ही मांस दिखाई देने लगा। यह देखकर वो भोजन से उठ गया। जैसे ही वो भोजन से उठकर बाहर की तरफ गया तभी बाहर रक्त और मांस के टुकड़ों की बारिश होने लगी। यह सब देखकर राजा बहुत परेशान हो उठा। उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यूँ हो रहा हैं? तब वो अपने गुरू के पास गया।

उसके गुरू बहुत ही ज्ञानी और सिद्ध पुरूष थे। उन्होने अपने तपोबल से यह जान लिया की रानी सीता ने भैंस के भड़काने और असुरक्षा भाव के कारण गाय के बछड़े को मारकर गेहूँ के ढ़ेर के नीचे दबा दिया है!। उन्होने राजा देवदानी को कहा, हे राजन! तुम्हारी रानी ने एक भैंस की बातों में आकर गाय के बछ्ड़े की निर्मम हत्या करके गेहूँ के ढ़ेर के नीचे दबा दिया है। यह सब उसी का परिणाम हैं। जल्द ही बछ बारस आने वाली है उस दिन तुम अपनी रानियों के साथ गाय-बछड़े की पूजा करना। और उस भैंस को नगर से निकाल देना।

राजा ने आकर सारी बात अपनी रानियों से कही, राजा की बात सुनकर रानी सीता को अपनी भूल का एहसास हुआ और उसने प्रायश्चित करने का निश्चय किया। राजा ने उस भैंस को नगर से बाहर छुड़वा दिया। बछ बारस के दिन पूरे विधि विधान से राजा और रानियों ने गाय और बछड़े का पूजन किया। उस दिन उन्होने कोई भी कटी हुई वस्तु का उपयोग नहीं किया और ना ही गाय के दूध से बनी किसी वस्तु का उपभोग किया। रानी सीता ने पूजन करके अपनी गलती की क्षमा याचनी की।

बछबारस की पूजा के प्रभाव से वो गाय का बछड़ा फिर से जीवित हो गया। और उस रानी का पाप भी नष्ट हो गया। बछबारस के दिन गाय और बछड़े के पूजन का विशेष महत्व हैं। ऐसा करने से संतानवती स्त्रियों की संतान दीर्घायु होती हैं। उनके प्राणों पर कोई संकट नही आता
जय गोविंद

29/08/2024

एकादशी का व्रत करने वाले लोग सब पापों से मुक्त हो ठाकुर जी के धाम को जाते हैं:--
भाद्रपद कृष्ण पक्ष की जया एकादशी की बहुत-बहुत बधाई।
दिनांक 29 अगस्त दिन गुरुवार को स्मार्तो एवं 30 अगस्त दिन शुक्रवार को वैष्णवों की भाद्रपद कृष्ण पक्ष की जया एकादशी है को जया एकादशी है।
धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्री कृष्ण ने कहा हे राजन एक चित्त होकर सुनो। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम जया है। वह सब पापों का नाश करने वाली बताई गई है ।जो भगवान हृषीकेश का पूजन करके इसका व्रत करता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।
पूर्व काल में हरिश्चंद्र नाम के विख्यात चक्रवर्ती राजा हुए हैं जो समस्त भूमंडल के स्वामी और सत्य प्रतिज्ञ थे। एक समय किसी कर्म का फलभुक्त प्राप्त होने पर राज्य से भ्रष्ट होना पड़ा। राजा ने अपनी पत्नी और पुत्र को बेंचा फिर अपने को बेंच दिया। पुण्यात्मा होते हुए भी उन्हें चांडाल की दासता करनी पड़ी।वह मुर्दों का कफन लिया करते थे।
इतने पर भी नृपश्रेष्ठ हरिश्चंद्र सत्य से विचलित नहीं हुए ।इस प्रकार चांडाल की दासता करते उनके अनेक वर्ष व्यतीत हो गए ।उससे राजा को बड़ी चिंता हुई, अत्यंत दुखी होकर सोचने लगे क्या करूं कहां जाऊं राजा को आतुर देख कोई मुनि उनके पास आए, वे महर्षि गौतम थे।
श्रेष्ठ ब्राह्मण को आया देख राजा ने उनके चरणों में प्रणाम किए। दोनों हाथ जोड़कर गौतम मुनि के सामने खड़े होकर अपना सारा दुख :मय समाचार सुनाया ।
राजा की बात सुनकर गौतम मुनि ने कहा राजन भादों के कृष्ण पक्ष में अत्यंत कल्याणमई जया नाम की एकादशी आ रही है, जो पुण्य प्रदान करने वाली है।इसका व्रत करो इससे पाप का अंत होगा। तुम्हारे भाग्य से आज के सातवें दिन एकादशी है।
उस दिन उपवास करके रात में जागरण करना।ऐसा कहकर महर्षि गौतम अंतर्ध्यान हो गए। उनकी बात सुनकर राजा हरिश्चंद्र ने उसका अनुष्ठान किया ।उसके प्रभाव से राजा के सारे दुख: दूर हो गए।उन्हें पत्नी का संनिधान और पुत्र का जीवन मिल गया। आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी। एकादशी के प्रभाव से राजा ने राज्य किया, और अंत में वह पुरजन तथा परिजनों के साथ स्वर्ग लोक को प्राप्त हुए।
हे राजा युधिष्ठिर जो मनुष्य एकादशी को व्रत करते हैं वह सब पापों से मुक्त हो मेरे धाम में जाते हैं ।इसको पढ़ने और सुनने से अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है ।

नोट:- एकादशी का पारणा स्मार्त 30 तारीख को प्रातः 8 :11 तक करेंगे! कुछ लोग बराबर प्रश्न करते हैं कि स्मार्त कौन है? और वैष्णव कौन है? जिन्होंने श्री वैष्णव संप्रदाय से सद्गुरु से सभी पंच संस्कार दीक्षा ग्रहण कर श्रीमन्नारायण की अनन्यता स्वीकार की है वह ही श्री वैष्णव है ।।अर्थात भगवान श्रीमन्नारायण श्री राम, श्री कृष्ण के जो भक्त हैं। उन्हें ही श्री वैष्णावनाम_ व्रत करने का अधिकार है। शेष पंचदेव उपासक शैव शाक्त गृहस्थ आदि को स्मार्तानाम_ व्रत करने का विधान है।

रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं।।
19/08/2024

रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं।।

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