28/12/2024
----: श्रीमद् भागवत पुराण का परिचय एवं सार:---+
तृतीय भाग:---
भागवत के दशम स्कंध में शुकदेव जी भगवान श्री कृष्ण के जन्म का उद्देश्य और उनकी लीलाओं का वर्णन करते हैं। यह स्कंद श्री कृष्ण का प्रेम स्वरूप है। यह निरोध लीला है। भगवान श्री कृष्ण के जन्म से पूर्व लाखों दैत्यों ने घमंडी राजाओं का रूप धारण करके पृथ्वी को आक्रांत कर दिया था। जब पृथ्वी भगवान की शरण में गई तो उन्होंने सभी देवताओं को आदेश दिया कि वह सभी अपने अपने अंशों सहित यदुकुल में जन्म लें। वे स्वयं वासुदेव जी के घर में पुत्र रूप में प्रकट हुए। स्वयं भगवान शेष भी जो उनका कार्य करने के लिए बड़े भाई बलराम रूप में प्रकट हुए। योग माया भी अंश रूप में उनकी लीला को संपन्न करेंगी। भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं से तो सभी भलीभांति परिचित होंगे । पूतना उद्बार,शकट भंजन, तृणावर्त उद्धार, उखल लीला, बकासुर उद्धार, अघासुर उद्धार,धेनुकासुर उद्धार, कालिया नाग लीला, गोवर्धन धारण, चीरहरण, रास लीला, महारास इत्यादि से सभी परिचित हैं।ये लीलाएं वृंदावन में हुई। उसके बाद मथुरा में उन्होंने कंस का उद्धार किया और द्वारिका का निर्माण किया। इसके बाद भगवान के विभिन्न विवाहों का विवरण और उनकी सन्तति का विस्तार, शिशुपाल का उद्धार, दन्तवक्त्र का उद्धार,तथा सुदामा जी को ऐश्वर्य प्राप्त करा कर मित्रता का स्वरूप दिखाया। एकादश स्कंध "मुक्ति लीला "का है। इसमें भगवान का ज्ञान स्वरूप बताया गया है। भगवान कृष्ण रूप में अवतरित होकर जिस कार्य के लिए आए थे वह सारे कार्य संपन्न हो चुके थे। इसलिए अब उन्होंने देखा कि सारे यदुवंशी मेरे आश्रित हैं और विशाल वैभव के कारण सब अहंकार में आकर गड़बड़ करने लगे हैं। उनकी किसी के द्वारा पराजय भी नहीं हो सकती इसलिए उन्होंने मन में अपने कुल का संघार करके जाना ही उचित समझा। उन्होंने जामवंती नंदन "साम्भ" के माध्यम से लीला रची। सभी ऋषि मुनि भगवान के समीप ही निवास कर रहे थे। सबको ज्ञात था कि भगवान अब अपने धाम जाने की तैयारी कर रहे हैं।इसी समय नारद जी द्वारका में पहुंचे। वहां वासुदेव जी ने प्रश्न किया कि ,"मुझे ऐसा उपदेश दीजिए जिससे जीव का कल्याण हो सके"। तब नारद जी ने उनसे कहा कि यही प्रश्न राजा निमी ने ऋषभ के नौ पुत्र जो योगेश्वर थे उनसे पूछा ।राजा ने पूछा ,"परम कल्याण का क्या स्वरूप है? और इसका क्या साधन है? "उन्होंने बताया परम कल्याण का स्वरूप है "भागवत धर्म का अवलंबन करना" भागवत धर्म है शरीर मन, वाणी, इंद्रियां, बुद्धि, अहंकार से अपने जन्म के स्वभाव वश जो भी कर्म हैं वह भगवान को समर्पित करना ।इसका एक सरल एकमात्र साधन है प्रतिक्षण एकाग्र चित्त के द्वारा भगवान के चरण कमल का भजन करना। जैसे भोजन के प्रत्येक ग्रास के साथ तुष्टि, पुष्टि तथा क्षुधा निवृत्ति तीनों एक साथ हो जाते हैं ,वैसे ही भजन के द्वारा भगवान के प्रति प्रेम में भक्ति, संसार के प्रति वैराग्य तथा भगवान के स्वरूप की स्मृति तीनों हो जाते हैं ।जिससे मनुष्य का परम कल्याण हो जाता है। फिर निमी ने प्रश्न किया कि" मैं उसे माया का स्वरूप जानना चाहता हूं जो बड़े-बड़े ऋषि मुनियों को मोहित कर देती है तथा इस माया से कैसे पार उतर सकते हैं"? योगेश्वरों ने उत्तर दिया" पंच महाभूत, 5 कर्मेंद्रियां, पांच ज्ञानेंद्रियां, 5ज्ञानेंद्रियों के विषय, मन, बुद्धि , चित्त, अहंकार यह 24 तत्व है यह जड़ है यही माया है। इस माया से पार तभी उतरा जा सकता है जब हमें यह विश्वास होने लगे की एक और केवल एक भगवान ही है जो सब क्रिया-कलाप, आचार्य -व्यवहार कर्म इत्यादि सब करा रहे हैं ।स्वयं को कर्ता नहीं मानना है। इस प्रकार राजा निमी प्रश्न करते गए और योगेश्वर उत्तर देते रहे नारायण कौन है? उनका क्या स्वरूप है ?कर्म- विकर्म -अकर्म की क्या व्याख्या है? सब उत्तर जाने के बाद उन्होंने सतयुग ,कलयुग ,त्रेता युग ,द्वापर युग में भगवान की उपासना के तरीके इत्यादि बताए ,भक्तिहीन पुरुषों की गति को भी बताया गया। जब नारद जी चले गए तब सभी देवताओं ने भगवान को स्वधाम लौटने की प्रार्थना की तब श्री भगवान ने सब यदुवंशियों को इकट्ठा करके कहा कि मूसल की घटना से जो ऋषियों ने बालकों को श्राप दिया है उसे द्वारिका में बहुत अपशकुन तथा उत्पात मैं देख रहा हूं। इसलिए हमें शीघ्र ही यहां से निकलना होगा और वह सब के सब प्रभास क्षेत्र जो सौराष्ट्र गुजरात में सो मनाथ मंदिर के साथ लगता है कि ओर निकल पड़े। जब उद्धव जी ने सुना तो उन्होंने आभास हो गया कि यदि कृष्ण चाहते तो श्राप को मिटा सकते थे परंतु अब वह यदुवंश का संहार करके स्वधाम जाना चाहते हैं। वह बहुत ही विचलित हो उठे। भगवान ने उन्हें समझाया कि जिस उद्देश्य से मैं पृथ्वी पर आया था वह पूरा हो चुका है ।अब तुम भी सब सगे संबंधियों का मोह छोड़कर सम दृष्टि रखते हुए पृथ्वी पर विचरण करो। गुण तथा दोष बुद्धि से अतीत होकर बालक के समान विहित कर्मों का अनुष्ठान करते रहो। उद्धव जी कहते हैं," प्रभु मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह मैं हूं यह मेरा है इस भाव से आपकी माया के खेल देह और देह के संबंधी ,स्त्री, पुरुष, धन आदि में मैं डूब रहा हूं आप जो मुझे संन्यास का उपदेश दे रहे हैं वह मेरी समझ में नहीं आ रहा आप मुझे इस प्रकार समझाइए कि मैं इसे समझ सकूं"। तब उन्होंने शुद्ध बुद्धि राजा यदु तथा दत्तात्रेय का संवाद सुनाया। दत्तात्रेय सभी स्त्री धन आदि संसार के स्पर्श से रहित थे। हमेशा अपने ही स्वरुप में स्थित रहते थे ।राजा यदु ने दत्तात्रेय से "आत्मा सदा आनंदित रहने का उपाय पूछा" तब दत्तात्रेय ने उनको बताया कि मैं अपनी बुद्धि से बहुत से गुरुओं का आश्रय लिया ।उनसे ही शिक्षा ग्रहण करके मैं सबसे मुक्त हुआ उनके 24 गुरु थे पृथ्वी, वायु, आकाश, अग्नि, जल ,सूर्य ,चंद्रमा, कबूतर ,अजगर ,समुद्र ,पतंगा, भंवरा, मधुमक्खी ,हाथी, हिरण , मछली, पिंगला वैश्या, कुरर पक्षी ,बालक, कुंवारी कन्या, बाण बनाने वाला ,सर्प, मकड़ी, भृगी कीड़ा। उनका कहना था कि जहां से भी कुछ अच्छा सीखने को मिले वही गुरु है। तब उन्होंने उद्धव जी को लौकिक तथा पारलौकिक सुखों के गुण दोष से अवगत कराया बद्ध और मुक्त भक्तों के लक्षणों से अवगत कराया,सत्संग की महिमा को समझाया। उद्धव जी ने फिर प्रश्न किया कि" सब जानते हैं की विषय विपत्तियों का घर है फिर भी वह कुत्ते ,गधे ,बकरे के समान दुख सहन करके भी भोगने की कामना रखते हैं क्यों" इस पर भगवान ने कहा कि बार-बार विषयों का सेवन करने से चित्त विषयों में आसक्त हो जाता है और वह चित्त में प्रविष्ट हो जाते हैं ।जैसे मदिरा पीकर उन्माद पुरुष यह नहीं देख पता कि मेरे द्वारा पहना हुआ वस्त्र शरीर पर है या गिर गया है ।इसलिए परमात्मा का साक्षात्कार नहीं कर पाता। इसके बाद भक्ति योग तथा ध्यान विधि का वर्णन किया। वर्णाश्रम धर्म को समझाया। यम, नियम पर प्रकाश डाला ।ज्ञान योग ,कर्म योग तथा भक्ति योग की व्याख्या की ।गुण तथा दोष की व्यवस्था पर प्रकाश डाला। प्रकृति- पुरुष ,शरीर -आत्मा का भेद समझाया। भगवान कृष्ण कहते हैं संसार में ऐसे संत पुरुष नहीं मिलते जो दुर्जनों की कटु वाणी से बिधें हुए हृदय को संभाल सके ।मनुष्य का हृदय मर्म भेदी बाण से इतना नहीं बिंधता जितना उसे दुष्ट जनों के मर्मान्तक कठोर वाणी से पीड़ा होती है। लेकिन यदि "मैं और मेरे पन "की गांठ खोल दी जाए तो मन शांत रहेगा और शांत मन पीड़ा का अनुभव कम करेगा। तत्पश्चात् भगवान ने उन्हें सांख्य योग का ज्ञान करवाया।
अंत में उद्धव जी कहते हैं कि" सब कुछ जानने के पश्चात भी जीव अपना मन वश में नहीं कर पाते क्योंकि योग साधना तो बहुत कठिन होती है ।आप कोइ ऐसा सरल रास्ता बताइए जिस पर चलकर अनायास ही परम पद प्राप्त हो सके"। तब भगवान ने उत्तर दिया कि," मेरी प्राप्ति के जितने भी साधन है उनमें सबसे श्रेष्ठ साधन है कि समस्त प्राणियों और पदार्थों में मन ,वाणी और शरीर की सभी वृत्तियों में मेरी ही भावना करें। यही मेरा भागवत धर्म है। सारे कर्म मेरे लिए ही करें और करते समय मेरे स्मरण का अभ्यास बनाएं"। तब वह सर्वत्र आत्म बुद्धि, ब्रह्म बुद्धि का अभ्यास करने लगता है। उसे सब कुछ ब्रह्म स्वरूप दिखने लगता है। हरओर मेरा साक्षात्कार करते-करते संसार दृष्टि से उपराम होने लगता है। तत्पश्चात उन्होंने उद्धव जी को बद्रिकाश्रम जाने की आज्ञा दी। वहां उन्होंने तपोमय जीवन व्यतीत कर परमगति प्राप्त की।उनके जाने के पश्चात उन्होंने यदुकुल के संहार के लिए लीला रची। वहां पर यदुवंशियों मेने ऐसी मदीरा पी , जिससे उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई ।आपस में एक दूसरे को मारने लगे ।मारते मारते सबके अस्त्र शस्त्र धनुष आदि समाप्त हो गए। तब मूसल के चूरे से जो समुद्र के किनारे एरक नामक घास थी उसे एक दूसरे पर उसी से वार करने लगे वह घास वज्र के समान कठोर थी। बलराम तथा कृष्ण को ही शत्रु समझने लगे। उनके साथ भी मार काट करने लगे और अंत में सभी यदुवंशी मारे गए। बलराम जी भी उनके नाश के बाद समुद्र तट पर बैठकर एकाग्रचित्त से परमात्म चिंतन करते-करते मनुष्य शरीर छोड़ दिया। जब उन्होंने शरीर छोड़ दिया तब वहां पीपल के पेड़ के नीचे भगवान बैठ गए ।वहां पर एक जरा नाम का शिकारी था उसने भी मूसल के टुकड़े से तीर बनाया हुआ था भगवान के पैर के तलवे को उसने हिरण समझा तीर चलाया। उससे भगवान जी को चोट लगी। इतने में उनका सारथी दारूक वहां पहुंचा। क्या देखते हैं कि भगवान के चारों ओर सभी देव उनकी सेवा में संलग्न है। उनके देखते देखते भगवान का गरुड़ ध्वज रथ घोड़े सहित आकाश में उड़ चला है ।भगवान ने उसको कहा कि तुम द्वारका चले जाओ और बलराम जी की परम गति और मेरे स्वधाम गमन की बात कहो। सब जो वहां स्त्री, बच्चे तथा बुजुर्ग हैं अपनी संपत्ति लेकर अर्जुन के संरक्षण में चले जाएं। भगवान जी के जाने के बाद समुद्र ने श्री कृष्ण का निवास स्थान छोड़कर एक क्षण में सारी द्वारिका डुबो दी। बारहवां स्कंद भगवान की "आश्रय लीला "का है। परीक्षित ने शुकदेव जी से कहा कि, "अब मुझे कलयुग का वर्णन भी बताइए "।तब शुकदेव जी ने कहा कि जिस समय कृष्ण भगवान अपनी लीला संवरण करके परमधाम पधार गए उसी समय कलयुग ने संसार में प्रवेश कर दिया और मनुष्य की मति पाप की ओर चल पड़ी।अधर्म के चारों चरण असत्य, हिंसा, असंतोष तथा कलह उजागर होने लगे और धर्म के चारों चरण सत्य, दया , तप दान क्षीण होने लगे ।सब कामवासना की पूर्ति और पेट भरने की धुन में लगने लगे। धन के लिए सद्भाव, मित्रता ,सगे संबंधियों की हत्या से भी परहेज नहीं करते ।तब परीक्षित जी पूछते हैं," ऐसे वातावरण में जीव भगवान का आश्रय कैसे प्राप्त कर सकेगा "।तब शुकदेव जी कहते हैं ,"कलयुग में दोष तो अनेक है ,किंतु इस कलयुग में एक सबसे बड़ा सद्गुण है जो भगवान का आश्रय प्राप्त करने का उत्तम साधन है। सतयुग में ध्यान धारणा से जो सिद्धि मिलती है, त्रेता युग में यज्ञ करने से और द्वापर में वैदिक विद्या से पूजा करने वालों को जो सिद्धि मिलती है वही सिद्धि कलयुग में बहुत प्रेम से परमात्मा के नाम का संकीर्तन करने पर प्राप्त होती है। प्रभु के नाम के साथ जो अतिशय प्रेम करता है उसकी भक्ति में कली बाधा उत्पन्न नहीं कर सकता। तब उन्होंने परीक्षित जी को अंतिम उपदेश देते हुए कहा ,"मन ही आत्मा के लिए शरीर, विषय और कर्मों की कल्पना कर लेता है और माया मन की सृष्टि उत्पन्न करके जीव को संसार चक्र में पड़ने का कारण बनती है"। इस कारण राजन तुम अपनी विशुद्ध एवं विवेकमयी बुद्धि को परमात्मा के चिंतन से भरपूर कर लो और स्वयं ही अपने अंतर में स्थित परमात्मा का साक्षात्कार करो। तुम चिंतन करो कि मैं ही सर्वाधिष्टान परबृह्म हूं, उसी समय तुम अपने आप को वास्तविक, एक रस अखंड स्वरूप में स्थित कर लोगे और तुम्हें उनका आश्रय प्राप्त हो जाएगा। अब परीक्षित जी सुखदेव जी के चरणों में बारंबार वंदन करते हैं और कहते हैं आपने मुझ पर बड़ी कृपा कि मुझे अब कोई शंका नहीं है। अब मुझे तक्षक नाग से डर भी नहीं लग रहा ।मेरे अंदर जो नारायण है वही नाग में भी है।मैं चारों ओर नारायण के दर्शन कर रहा हूं। द्वादश स्कन्द तक कथा सुनते-सुनते मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे भगवान मुझे बुला रहे हैं ,"आजा तू मेरे पास आजा" मुझे उनका आश्रय प्राप्त होने जा रहा है। उसके बाद उन्होंने शुकदेव जी की पूजा की और साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। गंगा तट पर आए और महायोग की स्थिति में होकर ब्रह्म स्वरूप हो गए। जब तक्षक नाग डसने आया तो श्राप तो पूरा होना था उनका शरीर सबके सामने जलकर भस्म हो गया, परंतु वह तो डसने से पहले ही ब्रह्म में स्थित हो गए थे। इस प्रकार मनुष्यों का सारा शोक चाहे वह समुद्र के समान गहरा तथा विस्तार वाला हो, भगवान के परम पवित्र नाम, धाम, लीला ,यश वाले वचनों के प्रभाव से सदा के लिए समाप्त हो जाता है ।साथ ही उस समय कोई वृद्धावस्था नहीं, कोई युद्ध नहीं, कोई मृत्यु नहीं, कोई शोक नहीं, काम, क्रोध ,लोभ ,मोह ,मद, मत्सर, इर्ष्या, द्वेष की घेरे से बाहर निकलकर केवल एक स्थाई आनंद की अनुभूति होती है, जो सदैव नित्य नवीन रहती है ,जिससे परम शांति का अनुभव होने लगता है। "कुछ और ,कुछ और "पाने,की सोच सदा के लिए समाप्त हो जाती है ।श्री कृष्ण के चरण कमलों की अविचल स्मृति प्रदान हो जाती है, जिससे परम शांति का अनुभव होने लगता है।
मंगल कामनाओं सहित ,
कमला वाधवा