The Geeta Explained

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03/07/2026

Continued (2)
सृष्टि उत्पत्ति का प्रसंग :------

सृष्टि के आरंभ में मनु और शतरूपा हुए। मनु को संपूर्ण मन्वन्तरों का प्रवर्तक माना जाता है। सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में जानने के लिए मनु ब्रह्मा जी के पास गए। तब उन्होंने कहा, "बेटा, तुम्हें भगवती जगदंबा की उत्तम उपासना करनी चाहिए। उन्हीं के प्रसन्न होने पर तुम्हारी यह प्रजा-सृष्टि उत्तम रूप से चल सकती है।"

मनु जी ने बड़ी सावधानी के साथ स्तुति की। स्वयंभूव मनु की उपासना से प्रसन्न हो देवी ने उन्हें वर मांगने को कहा। मनु बोले, "देवी, यदि आप मेरी भक्ति से प्रसन्न हैं तो ऐसी कृपा करें कि यह प्रजा-सृष्टि का कार्य निर्विघ्नतापूर्वक संपन्न हो सके।"

देवी ने कहा, "मेरी कृपा-प्रसाद से तुम्हारी प्रजा-सृष्टि बिना बाधा के अवश्य संपन्न होगी और क्रमशः बढ़ती रहेगी।"

ऐसा कहकर देवी अंतर्धान हो गई। इस प्रकार देवी के प्रताप से सर्वप्रथम श्री हरि ने वाराह रूप में आकर पृथ्वी को स्थापित किया। फिर मनु-शतरूपा की संताने हुईं। तीन कन्याएं आकूति, देवहुति तथा प्रसूति हुईं तथा दो पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद। आकूति का विवाह मुनि रुचि के साथ, देवहुति का कर्दम ऋषि के साथ तथा प्रसूति का विवाह प्रजापति दक्ष के साथ हुआ। आकूति से भगवान यज्ञपुरुष उत्पन्न हुए, देवहुति से भगवान कपिल का जन्म हुआ। दक्ष तथा प्रसूति से 64 कन्याएं उत्पन्न हुईं। उन्हीं कन्याओं से देवता, मानव, पशु, नाग, सर्प इत्यादि की सृष्टि उत्पन्न हुई।

स्वयंभूव मनु के बड़े पुत्र का नाम प्रियव्रत था। उनकी दो पत्नियां थीं। एक से दस पुत्र और एक पुत्री उत्पन्न हुईं। दसों पुत्र बड़े ही गुणवान थे। दूसरी पत्नी से तीन पुत्र उत्पन्न हुए। इन तीनों पुत्रों ने एक-एक मन्वन्तर तक राज्य-भार संभाला।

प्रियव्रत बहुत ही तेजस्वी थे। सूर्य के समान इन्होंने तेजस्वी रथ पर बैठकर पृथ्वी की सात प्रदक्षिणाएं की तथा सूर्य के समान प्रकाश फैलाया। रथ के पहियों से जो गड्ढे बने थे, वे सात समुद्र बने, और जो बीच की पृथ्वी थी, वह सात द्वीप बने। उनकी पहली पत्नी बहिर्ष्मती, जो विश्वकर्मा की पुत्री थीं, उनसे उत्पन्न दस पुत्रों में से तीन तो त्यागी पुत्र बने, जो महान परमहंस थे तथा शेष सात पुत्रों को पृथ्वी के सात द्वीपों का राजा बनाया। उनकी पुत्री का विवाह शुक्राचार्य से हुआ।

दूसरे पुत्र उत्तानपाद थे। उनके दो पुत्र थे ध्रुव तथा उत्तम। उत्तम उनकी पत्नी सुरुचि से तथा ध्रुव उनकी दूसरी पत्नी सुनीति से उत्पन्न हुए। ध्रुव 5 वर्ष की अवस्था में ही तपस्या पर निकल पड़े। नारद जी ने उन्हें "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करने के लिए कहा। उनकी तपस्या इतनी प्रबल थी कि भगवान विष्णु को प्रकट होना पड़ा। भगवान विष्णु ने उन्हें वर मांगने के लिए कहा। वर में भगवान से ध्रुव ने उनकी भक्ति का वर मांगा। भगवान बहुत प्रसन्न हुए। वर के साथ भगवान ने उनको आकाश में अटल स्थान प्रदान किया, जो ध्रुवलोक कहलाया।

इस प्रकार मां जगदंबा की कृपा से मनु और शतरूपा की संतानों ने सृष्टि-कार्य में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रियव्रत के रथ द्वारा जो सात द्वीप बने थे, वहां पर जाकर सृष्टि की उत्पत्ति के बाद प्रजा को रहने के लिए स्थान प्राप्त हुए।

जम्बू द्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मली द्वीप, कुश द्वीप, क्रोंच द्वीप, शाक द्वीप और पुष्कर द्वीप सात द्वीपों के नाम हैं। इन सभी द्वीपों के चारों ओर विभिन्न प्रकार के समुद्र बताए गए हैं, जैसे दूध, घृत, मधु, गन्ने का रस, सुरा आदि। इसमें जम्बू द्वीप के मध्य मेरु पर्वत स्थित है। यह इस ब्रह्मांड का केंद्र माना जाता है। मेरु पर्वत स्वर्णमय है। यहां पर देवताओं का निवास है। जम्बू द्वीप नौ खण्डों में विभाजित बताया गया है। इन खण्डों को वर्ष भी कहा जाता है। पहला वर्ष भारतवर्ष है, जहां पर हम रहते हैं। भारतवर्ष को ही कर्मभूमि कहा गया है। यहां मनुष्य कर्म करके मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

भारत के अलावा और जो आठ वर्ष हैं, वहां पृथ्वी पर रहते हुए भी केवल स्वर्ग के फल को ही प्राप्त कर सकते हैं। भगवान नारायण स्वयं कहते हैं, "भारत में मैं आदिपुरुष विराजमान रहता हूं। शेष आठ वर्षों में ब्रह्मा, रुद्र, हयग्रीव, नरसिंह, कामदेव, मत्स्यरूप में श्री हरि, कच्छप रूप में श्री हरि, वाराह रूप में श्री हरि, राम रूप में श्री हरि विराजते हैं। वहां उनकी पूजा होती है।"नारायण स्वयं नारद जी को कहते हैं, "भारतवर्ष में जन्म लेने वाले पुरुष को अपने-अपने सात्त्विक, राजस और तामस कर्मों के प्रभाव से दिव्य मानव एवं नारकीय योनियां मिलती हैं। संपूर्ण निवासियों को भांति-भांति के भोग भोगने को मिलते हैं। अपने-अपने वर्णानुसार कर्म करने पर भारतवासियों को मोक्ष तक भी मिल जाता है। अवश्य ही उन प्राणियों ने उत्तम कर्म किए हैं, जिनको श्री हरि की कृपा प्राप्त हुई है और भारतवर्ष में मनुष्य योनि प्राप्त हुई है। अन्य वर्षों में पैदा होकर दीर्घायु प्राप्त करने के स्थान पर भारतवर्ष में थोड़ी आयु लेकर जन्म होना भी श्रेष्ठ है, क्योंकि मानव शरीर से किए गए कर्म भगवान को अर्पण करके उनके निर्भय पद के अधिकारी बन सकते हैं। वास्तव में भारतवासी बड़े भाग्यशाली हैं क्योंकि उनके द्वारा जो यज्ञ, हवन आदि होते हैं, उनसे अर्पण की हुई सामग्री से देवता भी प्रसन्न हो जाते हैं।"

इस प्रकार स्वयंभूव मनु द्वारा सृष्टि-उत्पत्ति हुई। भगवती की निरंतर आराधना करते हुए पहले मन्वन्तर में स्वयंभूव मनु ने निष्कंटक राज्य भोगा। उनके प्रियव्रत और उत्तानपाद दोनों पुत्रों की भूमंडल पर बड़ी ख्याति हुई। द्वितीय मनु प्रियव्रत के पहले पुत्र थे, जिनका नाम स्वरोचिष था। उन्होंने भी भगवती की मूर्ति बनाकर बारह वर्षों तक तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रभावित होकर देवी उनके सामने प्रकट हुईं। उन्होंने उन्हें दूसरे मन्वन्तर का राजा बना दिया। प्रियव्रत के दूसरे पुत्र उत्तम भी निरंतर देवी भगवती के मंत्र का जाप करते थे। प्रसादस्वरूप उन्हें तीसरे मन्वन्तर का राज्य दे दिया। प्रियव्रत के तीसरे पुत्र तामस ने भगवती माहेश्वरी के कामबीज (क्लीं) को धारण कर नर्मदा के दक्षिणी तट पर उपासना की। वे चौथे मनु हुए। उनके एक और पुत्र रैवत ने भी यमुना के तट पर कामबीज संज्ञक मंत्र "ॐ क्लीं कामदेवाय नमः" पर सिद्धि प्राप्त करके पांचवें मनु के रूप में आए।

राजा अंग उत्तानपाद के वंशज थे। उनकी पत्नी का नाम सुनीथा था। वह मृत्यु देव की पुत्री थीं। उनका एक पुत्र था "वेन"। वह बहुत अत्याचारी था। ऋषियों ने उन्हें मार डाला। उनके शरीर को मथने पर "पृथु" प्रकट हुए, जिनके नाम से पृथ्वी का नाम पृथ्वी पड़ा। इनका एक पुत्र था "चाक्षुष", जो छठे मन्वन्तर के शासक हुए। यह पुलह ऋषि की शरण में गए। उन्होंने इन्हें सरस्वती बीज का अव्यक्त रूप से जाप करने को कहा। "ॐ ऐं क्लीं सरस्वत्यै नमः", जो मानसिक स्पष्टता के लिए होता है। इसे इन्हें सिद्धि प्राप्त हुई।

वैवस्वत मनु सातवें मन्वन्तर के मनु हैं, जो वर्तमान मन्वन्तर है। वैवस्वत का तात्पर्य है विवस्वान के पुत्र, अर्थात् सूर्य तथा संज्ञा के पुत्र हैं। इनका एक नाम "श्राद्धदेव" मनु भी है। श्राद्धदेव इसलिए नाम पड़ा क्योंकि वह श्रद्धा, धर्म तथा यज्ञ के महान प्रवर्तक माने जाते हैं।आठवें मनु सावर्णि हैं। सावर्णि का अर्थ है समान वर्ण वाले। पुराणों के अनुसार सावर्णि सूर्यदेव और उनकी पत्नी छाया के पुत्र हैं। वह वैवस्वत मनु के सौतेले भाई माने जाते हैं। आठवें मन्वन्तर में दैत्यराज बलि इंद्र के पद पर होंगे। वामन अवतार में श्री हरि ने इन्हें पाताल भेजा था। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्होंने इन्हें भविष्य में इंद्र पद पाने का वरदान दिया था। सावर्णि मनु ने भी पूर्व जन्म में देवी की उपासना करके वरदान लिया था कि वे मन्वन्तर के अधिपति होंगे। वैवस्वत मनु के 6 पुत्र थे। इन पुत्रों ने यमुना तट पर देवी भगवती की घोर तपस्या की, जिसके प्रभावित होकर देवी ने वर दिया कि तुम सब मन्वन्तरों के स्वामी बनोगे।

प्रथम पुत्र दक्ष सावर्णि ये नौवें मनु कहलाए। द्वितीय पुत्र मेरु सावर्णि दसवें मनु कहलाए। तीसरे पुत्र सूर्य सावर्णि ये ग्यारहवें मनु कहलाए। चौथे पुत्र इन्द्र सावर्णि बारहवें मनु, पांचवें पुत्र रुद्र सावर्णि तेरहवें मनु तथा छठे विष्णु सावर्णि ये चौदहवें मनु कहलाए। यह सभी मनु भगवती "भ्रामरी" की नित्य उपासना करते थे। भगवती भ्रामरी देवी उस शक्ति का स्वरूप है, जिसमें उन्होंने "अरुणाचल", जो एक महान पराक्रमी दैत्य था, जिसने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या करके वर प्राप्त किया हुआ था कि, "मैं न युद्ध में मरूं, न किसी अस्त्र-शस्त्र से मरूं, न किसी स्त्री-पुरुष से, न दो पैरों तथा चार पैरों वाले प्राणी से मरूं।"ऐसा वर पाकर वह देवों पर शासन करने लगा। तब देवता दुखी होकर मां जगदंबा की शरण में गए। उनकी आर्तवाणी सुनकर मां जगदंबा भगवती ने भ्रमरों को प्रेरित किया, जिन्होंने एकत्रित होकर दैत्यों की छाती छेद डाली और इस प्रकार देवों की रक्षा की।

इस प्रकार श्रीमद् देवी भागवत द्वारा हमें ज्ञान हो गया कि भगवती जगदंबा की अनंत शक्तियां हैं। वही परमब्रह्म हैं। देवी और ब्रह्म एक ही हैं। उनमें किंचित मात्र भी भेद नहीं है। केवल संसार-रचना के समय वह द्वैत रूप को प्राप्त होती हैं। देवताओं में विभिन्न नाम से विख्यात हैं। उनकी अनंत शक्तियों का वर्णन करना असंभव है। श्रीमद् देवी भागवत में उनके मुख्य अंश, कलाओं तथा कलांशों के बारे में हमें जानकारी प्राप्त हुई। वह अपनी विभिन्न शक्तियों को धारण करके पराक्रम दिखलाती हैं। गौरी, ब्राह्मी, रौद्री, वाराही, वैष्णवी, शिवा, वारुणी, नरसिंही सभी उनके ही रूप हैं। विभिन्न कार्यों के उपस्थित होने पर उन देवियों के भीतर अपनी शक्ति स्थापित करके ही वह सारी व्यवस्था करती हैं। बुद्धि, श्री, धृति, कीर्ति, स्मृति, श्रद्धा, कांति, शांति, विद्या, स्पृहा, वसा, मज्जा, त्वचा, दृष्टि इत्यादि सब भगवती जगदंबा के ही रूप हैं। सृष्टि में जब-जब देवताओं पर दुःख या कष्ट आए, मां जगदंबा ने ही विभिन्न शक्तियों को धारण करके उनका निवारण किया। कभी दुर्गा रूप में, कभी काली रूप में, कभी चंडी रूप में, कभी भ्रामरी रूप में, कभी गौरी रूप में प्रकट होकर दैत्यों के संहार के लिए प्रकट हुईं। देवी भगवती से ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश संसार की सृष्टि, पालन और संहार का कार्य संपूर्ण कर रहे हैं। पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, अग्नि पांचों तत्व भी उनकी ही कला हैं। ज्ञानेंद्रियां, कर्मेंद्रियां, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार ये सब देवी की शक्ति से अपना-अपना कार्य कर रहे हैं।

भगवती की माया से ही सारा संसार सजा पड़ा है। जगदंबा की शक्ति से ही सूर्य जगत को प्रकाशित करता है। चंद्रमा की शीतलता, अग्नि की दाहिका शक्ति, वायु में गति, जल में रस, सभी जगदंबा की शक्ति का प्रताप है। बलवानों का बल, तपस्वियों का तप, तेजस्वियों का तेज, धनवानों का धन, बुद्धिमानों की बुद्धि सब भगवती की शक्ति से ही संभव है। भगवती त्रिगुणा, निर्गुणा और प्रकृति से भी परे हैं। जब भगवती ने ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को सृष्टि-उत्पत्ति, पालन तथा संहार का आदेश दिया, तो उन्होंने पहले उन्हें नवार्ण मंत्र का उपदेश दिया। उन्हें वाग्बीज (ऐं), कामबीज (क्लीं) तथा मायाबीज (ह्रीं) देकर कहा कि इनका निरंतर जाप करते हुए आनंदपूर्वक अपने-अपने कार्य करो। ये मंत्र भक्ति और मुक्ति देने वाले हैं। सभी देवों ने भी इन्हीं मंत्रों से आवाहन करके देवी से सहायता लेकर अपने-अपने कार्य किए हैं। सभी मनुओं ने इन मंत्रों का आश्रय लेकर ही अपने-अपने मन्वन्तरों में सफलतापूर्वक राजकाज संभाला है। देवी ने सब देवों को सुचारू रूप से कार्यभार संभालने के लिए नवार्ण मंत्र तथा बीज मंत्रों का आश्रय देकर कहा कि जब प्रलयकाल में संपूर्ण चराचर जगत को मैं अपने में लीन करूंगी, तब तुम भी सब मेरे शरीर में मेरे अंदर प्रवेश कर जाना।

देवी भगवती जगदम्बा की कृपा सब पर बनी रहे।
मंगल कामना सहित
कमला वाधवा

03/07/2026

Continued (1)
महिषासुर प्रसंग :------

महिषासुर द्वारा भेजे गए प्रधान मंत्री ताम्र ने जब देवी से कहा कि तुम्हें शीघ्र ही महिषासुर की पटरानी बन जाना चाहिए, अन्यथा उनसे युद्ध करने के लिए तैयार हो जाओ। भगवती ने कहा, "मेरी शक्तिशाली पति विराजमान हैं। वह सब के कर्ता, साक्षी और निस्पृह हैं। निर्गुण, निर्मम, अनंत, निरालम्ब, निराश्रय, सर्वज्ञ, सर्वगामी, पूर्ण, साक्षी, कल्याण स्वरूप उनका श्री विग्रह है।"

ऐसा कहकर भगवती ने भयानक गर्जना की। उनकी गर्जना से सभी दैत्यों में आतंक छा गया। महिषासुर ने वाष्कल, दुर्मुख, चिक्षु, ताम्राक्ष, असीलोमा, विडालक्ष आदि बड़े-बड़े शूरवीर दैत्यों को उनका सामना करने के लिए भेजा। सभी देवी द्वारा काल के ग्रास बन गए। अंत में भगवती चंडिका द्वारा महिषासुर का भी वध हो गया। तब सभी देवता देवी भगवती की स्तुति करने लगे। देवताओं द्वारा स्तुति करने पर देवी ने मधुर स्वर में कहा, "देवताओं, तुम्हारे सामने कोई भी दुस्साध्य कार्य हो, तो मुझे स्मरण करना। मैं शीघ्र ही तुम्हारे संकट हर लूंगी।"

यह है देवी की महानता। इसी प्रकार जब-जब दैत्यों ने देवों को संकट में डाला, देवी ने उनकी रक्षा की। शुंभ-निशुंभ, चंड-मुंड, रक्तबीज जैसे दैत्यों का संहार करके देवताओं की रक्षा की।

वृत्रासुर प्रसंग :---

वृत्रासुर नाम का एक प्रतापी असुर था। वृत्रासुर की उत्पत्ति ऋषि तवष्टा के यज्ञ की अग्नि से हुई। ऋषि तवष्टा ने उन्हें अपना पुत्र ही कहा है। तब ऋषि तवष्टा प्रजापति के पद पर थे। उन्हें देवताओं में प्रधान माना जाता था। तवष्टा प्रजापति का एक पुत्र था, उसकी विश्व रूप नाम से प्रसिद्ध थी। उनके तीन मुख थे। एक मुख से हमेशा वेद पाठ करते थे, दूसरे से मधु पान तथा तीसरे से दसों दिशाओं का निरीक्षण करते थे। क्योंकि उनके तीन मुख थे, इसलिए उन्हें "त्रिशिरा" नाम से भी जाना जाता था।

एक बार विश्वरूप घोर तपस्या में संलग्न थे। उनकी तपस्या से इंद्र को भय होने लगा। उन्होंने बारी-बारी से उर्वशी, मेनका, रंभा, घृताची, तिलोत्तमा इत्यादि अप्सराओं को उनकी तपस्या भंग करने के लिए भेजा। लेकिन वे सभी उनकी तपस्या भंग करने में असफल रहीं। ईर्ष्या तथा लोभ वश इंद्र ने उस तपस्वी पर अपना वज्रास्त्र चला दिया, जिससे उनके प्राण प्रयाण कर गए। उनके मृत शरीर को देखकर भी उन्हें लगने लगा कि यह पुनः जी उठेंगे। तभी उन्होंने अपने सामने खड़े व्यक्ति, जिसका नाम तक्षा था, उसके हाथ में कुल्हाड़ी थी, कहने लगे, "कुलाहड़ी से इसका सिर धड़ से अलग कर दो।"

वह नहीं माना। तब इंद्र ने उन्हें लालच दिया कि समस्त यज्ञों में मैं तुम्हें भी भाग दूंगा। तब तक्ष लालच में आ गया। उसने विश्वरूप का सिर धड़ से अलग कर दिया। ज्यों ही उनका सिर धड़ से अलग हुआ, तो जिस मुख से वह वेद पाठ करते थे, उनसे कबूतर प्रकट होने लगे। जिस मुख से मधुपान करते थे, उनसे गौरैया की उत्पत्ति हुई। जिस मुख से दिशाओं पर दृष्टिपात करते थे, उनसे तीतर प्रकट हुए। इस प्रकार कबूतर, गौरैया तथा तीतरों की उत्पत्ति हुई।

जब उनके पिता तवष्टा ने सुना कि इंद्र द्वारा मेरा पुत्र मर गया है, तो उन्होंने इंद्र से बदला लेने की योजना बनाई। तवष्टा ने बदला लेने के लिए अथर्व वेद के मंत्रों का उच्चारण करते हुए अग्नि में हवन करना प्रारंभ किया। आठ रात्रियों तक हवन होता रहा। अग्नि प्रचंड लपटों से धधकती रही। हवन की अग्नि से एक पुरूष, जो बड़ा तेजस्वी और बलवान था, प्रकट हुआ। तब तवष्टा ने उसकी ओर देखा और कहा कि तुम मेरी तपस्या से शक्तिशाली हो जाओ। उसी समय वो पर्वत के समान बढ़ गये, मानो काल ही प्रकट हो गया हो। कहने लगे, "पिता जी, मुझे आज्ञा दो। मैं कुछ भी असम्भव को सम्भव बना सकता हूं। मैं वृत (obstacle) को दूर कर सकता हूं।"

तब तवष्टा ने उनका नाम वृत्रासुर रख दिया। वृत्रासुर पूर्व जन्म में विष्णु जी के परम भक्त थे। पार्वती जी के श्राप से उन्हें असुर योनि में जन्म लेना पड़ा। तब तवष्टा ने उन्हें अपने पुत्र विश्वरूप की मृत्यु का, जो त्रिशिरा नाम से भी विख्यात थे, सारा वृत्तांत सुनाया और कहा कि वह तुम्हारा भाई था। उनकी मृत्यु का बदला इंद्र से लेना है।

वृत्रासुर के पैदा होते ही स्वर्ग में कई तरह की अपशकुन होने लगे। जब उन्होंने उनके के प्रकट होने का हाल जाना, तो इन्द्र सभी देवों सहित भयभीत हो गए। उन्होंने सब देवों को इकट्ठा करके वृत्रासुर के साथ युद्ध का प्रोग्राम बनाया। इधर वृत्रासुर भी दानवों की सैना इकट्ठा करके युद्ध के लिए तैयार हो गया। 100 वर्षों तक युद्ध चलता रहा। अंत में इंद्र सहित सभी देवता युद्ध स्थल से डर कर भाग खड़े हुए। उनको युद्ध में हराकर वह पिता के पास लौट आए। पिता ने उनका सम्मान किया और कहां, "पुत्र, तुम बहुत बलशाली हो। तुम ब्रह्मा जी से उनकी तपस्या करके अमृत्व का वर प्राप्त कर लो।"

तब वृत्रासुर ब्रह्मा जी की तपस्या में अमृत्व का वर पाने हेतु लीन हो गए। उनकी तपस्या से प्रभावित होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और कहा, "वत्स, उठो। जो भी तुम्हारी अभिलाषा है, वह पूर्ण होगी। सूखे-गीले अस्त्र-शस्त्र से या किसी भी कठोर पदार्थ द्वारा तुम्हारा मरण नहीं हो सकेगा।"

वर पाने के पश्चात उनका बल और भी बढ़ गया। अपने पिता के पास गए। पुत्र को वर प्राप्त हुआ जानकर उन्होंने कहा कि अब तुम इंद्र से अपने भाई की मृत्यु का बदला ले सकते हो। वृत्रासुर फिर सैना तैयार करके इंद्र से युद्ध करने के लिए पहुंच गए। भयंकर युद्ध हुआ। वृत्रासुर इतना बलवान था कि कोई भी उसका सामना नहीं कर सका। अन्त में उसने इंद्र को ही अपने मुख से अन्दर निगल लिया। सभी देवता घबराकर बृहस्पति जी की शरण में गए। बहुत सोच-विचार करने पर बृहस्पति जी ने "जंभाई" का सृजन किया। देवों ने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी कि वृत्रासुर को जंभाई आई। मुंह खोलते ही इंद्र बाहर आ गए। दोबारा फिर युद्ध आरंभ हो गया। दस हजार वर्षों तक युद्ध चलता रहा। अंत में देवताओं की हार हुई और वृत्रासुर ने देव सदन पर अपना अधिकार कर लिया। सब देवता डरकर कंदराओं में छुप गए। भूख-प्यास से तड़पने लगे। तब इंद्र सभी देवताओं के साथ शंकर जी और ब्रह्मा जी को साथ लेकर श्री हरि के पास पहुंचे। उन्होंने कहा, "तुम सब जाकर वृत्रासुर से मैत्री कर लो और उसका कोई हल नहीं है। आयु समाप्त होने पर ही उसका मरण होगा।"

श्री हरि ने उन्हें समझाया कि मंगलमय भगवती योग माया के पास जाओ। उनके शरणागत होकर मन्त्रों द्वारा उनकी स्तुति करो। देवताओं ने तब निवार्ण मंत्र द्वारा देवी भगवती की स्तुति की और कहने लगे, "मां, तुम्हारे बिना त्रिलोकी में और कोई नहीं, जो हमारे दु:ख दूर कर सके।"

उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर भगवती जगदंबा प्रकट हुईं। तब देवताओं ने उनसे कहा, "हे देवी, आप हमारे प्रबल शत्रु वृत्रासुर को मोहित करने की व्यवस्था करो और उनकी बुद्धि पर ऐसा पर्दा डालो कि वह हम पर पूरा विश्वास करने लगे और हमारे आयुधों में ऐसी शक्ति भर दो कि हम उसे मार सके।"

देवी ने "तथास्तु" कहां और अंतर्धान हो गईं। देवी के प्रभाव से इंद्र और वृत्रासुर में विश्वास उत्पन्न होने लगा। तवष्टा मुनि ने वृत्रासुर को बहुत समझाया कि देवता छल कर रहे हैं, परंतु देवी ने तो उनकी बुद्धि को मोहित कर दिया था। वह इस बात को नहीं समझ सका।

एक बार इंद्र ने वृत्रासुर को समुद्र तट पर देखा। उस समय संध्या थी। इसे न दिन मानते हैं, न रात। उसी समय देवराज इंद्र की दृष्टि "फेन" पर पड़ी। ऐसा लग रहा था, कोई पत्थर का टुकड़ा हो। फेन न सूखा होता है, न गीला। तब उन्होंने देवी जगदंबा का ध्यान किया। ध्यान करते ही देवी ने अपना एक अंश फेन में स्थापित कर दिया। उधर भगवान विष्णु भी इंद्र के वज्र में प्रवेश कर चुके थे। फेनयुक्त वज्र के लगते ही वृत्रासुर के प्राण प्रयाण कर गए। देवता प्रसन्न होकर देवी की जय-जयकार करने लगे। उधर वृत्रासुर की मृत्यु के दुःख से दुखी होकर तवष्टा मुनि ने इन्द्र को श्राप दिया कि, "उसने प्रलोभन में आकर मेरे पुत्र का वध किया है, इसलिए वे भी महान दुःख का भागी बनें।"
इंद्र देवताओं के साथ स्वर्ग में तो थे, परंतु श्रापवश वे सुख का अनुभव नहीं कर पाते थे। स्वर्ग का कोई सुख, यहां तक कि अपनी पत्नी शचि के साथ भी सुखी नहीं होते थे। शोक के कारण उनकी शक्ति क्षीण हो गई। इससे वह स्वर्ग ही छोड़कर चले गए। उनके स्थान पर धर्मात्मा नहुष को इन्द्र के पद पर आसीन कर दिया। राज्य पाकर नहुष विषयों में इतना आसक्त हो गया कि शचि पर भी अधिकार पाने की इच्छा करने लगा। शचि दुखी होकर श्री बृहस्पति के पास आईं। तब बृहस्पति जी ने उन्हें कहा कि तुम कल्याणस्वरूपिणी भगवती जगदंबा की आराधना करो, उसी से तुम्हारे पतिदेव तुम्हारे सामने आ जाएंगे। शचि ने भगवती की आराधना आरंभ कर दी। देवी भगवती शचि की उपासना से प्रसन्न होकर प्रकट हुईं और कहा, "शीघ्र ही तुम्हारी इंद्र से भेंट होगी। मैं नहुष को मोहित करने की व्यवस्था कर दूंगी। वह तुरंत इंद्र पद से च्युत हो जाएगा।"
उसी समय वहां देवी की एक दूती आई और इंद्राणी जी को साथ लेकर इंद्र के साथ मिला दिया। समय बीतने पर नहुष के स्थान पर फिर इंद्र को स्वर्ग का आसन प्राप्त हो गया। इस प्रकार देवी भगवती अपने भक्तों के कष्टों का निवारण करके उन्हें प्रसन्न करती हैं।
त्रिशंकु प्रसंग :--------
राजा हरिश्चंद्र का नाम तो जगतविख्यात है। वह सत्यप्रतिज्ञ महाराज मांधाता, जो सूर्यवंश के प्रसिद्ध चक्रवर्ती सम्राट माने जाते हैं, उनके वंश में उत्पन्न हुए थे। महाराज मांधाता के जन्म का इतिहास भी बहुत विचित्र है। मांधाता के पिता का नाम युवनाश्व था। उनकी कोई संतान नहीं थी। इसलिए वह बड़े दुखी रहते थे। भगवती जगदंबा को खुश करने के लिए उन्होंने कई महान तीर्थस्थानों पर उनके मंदिर बनवाए। युवनाश्व संतान न होने से मानसिक संताप से ग्रस्त रहते थे। तब ऋषियों ने उन्हें पुत्रेष्टि यज्ञ के लिए कहा। यज्ञ होने पर ऋषियों ने एक मंत्रसिद्ध जल से भरा कलश तैयार किया। वह जल रानी के लिए था। परंतु रात को उनको बहुत प्यास लगी। उन्होंने अज्ञानवश वह जल पी लिया। समय आने पर राजा युवनाश्व के शरीर के दाहिने भाग से एक तेजस्वी बालक उत्पन्न हुआ। अब प्रश्न उठा कि बालक को दूध कौन पिलाएगा। तब इंद्र ने अपनी तर्जनी उंगली बालक के मुख में रखकर कहा, "मैं इसका पालन करूंगा।" "मां धास्यामि" इसी शब्द से उनका नाम मांधाता पड़ा।
सत्यव्रत मांधाता के पोते थे। उनके पास अटूट संपत्ति थी। उसी संपत्ति की अधिकता से सत्यव्रत स्वेच्छाचारी, कामी निकल गया और उसके पिता महाराज अरुण ने किसी अपराध के कारण उसे घर से निकाल दिया। अपराधों के कारण वशिष्ठ जी ने भी उन्हें श्राप दिया कि भूमंडल पर तेरी प्रसिद्धि "त्रिशंकु" नाम से होगी और तेरी वृत्ति पैशाचिक हो जाएगी। श्रापग्रस्त होने पर वह बहुत दुखी हो गए। तब किसी मुनि-पुत्र ने उनको एक श्रेष्ठ मंत्र बताया। वह श्रेष्ठ मंत्र नवाक्षर मंत्र था। तब वह इस नवार्ण मंत्र द्वारा प्रकृतिमयी भगवती जगदंबा का ध्यान करने लगे। जाप के बाद जब हवन करना चाहा, तो ब्राह्मणों की शरण में गए और कहने लगे, "आप सब मेरे यज्ञ में ऋत्विज होने की कृपा करें।"
सबने मना कर दिया, "तुम तो वशिष्ठ जी द्वारा श्रापित हो। यज्ञ पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है।"
वह बहुत दुखी हुए। सोचने लगे, पिता ने मुझे त्याग दिया, गुरु ने मुझे श्राप दे दिया, राज्य पर मेरा कोई अधिकार नहीं है, घोर पैशाचिक वृत्ति मुझे घेरे हुए है, इसलिए मुझे जीने का भी कोई अधिकार नहीं है। चिता जलाकर देवी भगवती का स्मरण करते हुए चिता में बैठने लगे। तभी कृपामयी भगवती उनके सामने प्रकट हो गईं। कहने लगीं, "तुम्हारे पिता अब वृद्ध हो चुके हैं। वह तुम्हें ले जाने के लिए मंत्रीगण भेजेंगे और मेरी कृपा के वशीभूत राजा द्वारा तुम्हारा राज्याभिषेक भी होगा। यह बिल्कुल निश्चित है।"
ऐसा ही हुआ। मंत्रीगण उन्हें लेने के लिए पहुंच गए। पिताजी ने उन्हें समझाया कि नित्य स्नान आदि से निपटकर नियमों द्वारा निवृत्त होकर विधिपूर्वक परम आराध्य शक्ति भगवती जगदंबा की आराधना करो। इसी में तुम्हारे जीवन की सफलता है। सत्यव्रत ने हाथ जोड़कर कहा कि मैं ऐसे ही करूंगा। उन्होंने नित्य भगवती जगदंबा की आराधना शुरू कर दी। देवी के प्रसन्न होते ही उनकी प्रकृति में परिवर्तन आ गया। दिव्य रूप से शोभा पाने लगे। पिता के भी पूर्ण प्रेमपात्र बन गए। भगवती की कृपा से वशिष्ठ जी भी प्रसन्न हो गए। कुछ दिनों तक राज्य में सुख भोगते रहे।
अचानक उनके मन में इच्छा जागृत हुई कि मैं मानव शरीर में ही स्वर्ग सुख का भोग करूं। वे वशिष्ठ जी के पास गए और कहने लगे, "मुझसे ऐसा महान यज्ञ करवाइए, जिससे कि मेरी शीघ्र ही मानव शरीर से स्वर्ग जाने की कामना पूरी हो सके।"
वशिष्ठ जी ने उन्हें समझाया, जीते-जी स्वर्ग नहीं जा सकते हो। तुम यज्ञ आदि करो। इस शरीर के शांत हो जाने पर तुम्हें स्वर्ग प्राप्त हो जाएगा।
सत्यव्रत बोले, "आप अभिमानवश मेरा यज्ञ करवाना नहीं चाहते, तो मैं किसी दूसरे को पुरोहित बना लूंगा।"
इस पर वशिष्ठ जी क्रोधित हो उठे और फिर श्राप दे दिया, "तू अभी चांडाल हो जा। तेरी वृत्ति भी चांडाली हो जाए। तू मरने पर भी स्वर्ग प्राप्त नहीं कर सकेगा।"
सत्यव्रत बहुत दुखी हुए। पहले सोचा आत्महत्या कर लूं। फिर विचार किया, आत्महत्या करने से तो जन्म-जन्म तक चांडाल रहूंगा। ऐसा करता हूं, किसी पवित्र स्थान पर जाकर तीर्थस्थान का सेवन करके वहीं आश्रम में रहकर भगवती जगदंबा की आराधना करता हूं।
वे राज्य छोड़कर चले गए। जब वे राज्य वापस नहीं लौटे, तो उनके पुत्र हरिश्चंद्र को पता लगा। उन्होंने मंत्रियों को लाने के लिए भेजा। तब सत्यव्रत ने कहा, "मैं ऐसे वेश में तो राज्य में नहीं लौट सकता। तुम मेरे पुत्र हरिश्चंद्र का राज्याभिषेक राजा रूप में कर दो।"
कुछ समय बाद विश्वामित्र मुनि तपस्या करने के पश्चात आश्रम पर पहुंचे, तो पत्नी द्वारा पता चला कि आपातकालीन स्थिति में सत्यव्रत ने उनकी रक्षा की थी। इस कारण ही वशिष्ठ जी ने कुपित होकर उन्हें श्रापित करके चांडाल रूप में बदल दिया और उनका नाम भी "त्रिशंकु" रख दिया।
तब उन्होंने सत्यव्रत से कहा, "मैं तुझसे प्रसन्न हूं। मैं तुम्हारा यज्ञ करवाऊंगा, जिससे तुम मानव शरीर में ही स्वर्ग जा सकोगे।"
तब विश्वामित्र जी ने यज्ञ करवाया। उस यज्ञ के प्रभाव से वह मानव शरीर में स्वर्गलोक जाने के लिए ऊपर उड़ने लगे। जब इंद्र को इस बात का पता लगा, तो उन्होंने कहा, "तू चांडाल रूप में देवलोक में कैसे आ सकता है? चल, नीचे गिर।"
तब त्रिशंकु स्वर्ग से नीचे गिरने लगा। तब विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के प्रभाव से आधे मार्ग में ही एक दूसरे स्वर्ग की सृष्टि करनी शुरू कर दी। इन्द्र सोच में पड़ गए। दो स्वर्ग कैसे हो सकते हैं? वह स्वयं नीचे आए और सारी स्थिति को समझकर त्रिशंकु को दिव्य देह धारण कराकर अपने साथ स्वर्गलोक ले गए। इस प्रकार भगवती जगदंबा अपने भक्तों की हर कामना को पूरी करने में हमेशा तत्पर रहती हैं।
तारकासुर प्रसंग :------
जब सती का शरीर योगाग्नि में भस्म हो गया था, तब शिव देश-देशांतर में घूमते हुए एक स्थान पर मन को सब ओर से खींचकर भगवती जगदंबा का ध्यान करने के लिए समाधिस्थ हो गए। चराचर जगत के सभी प्राणी सौभाग्य से वंचित हो गए। सभी दुःखरूपी समुद्र में डूब गए। सब रोगी और बलहीन हो गए। ऐसे समय में तारकासुर नाम से प्रसिद्ध एक असुर उत्पन्न हो गया। उसने ब्रह्मा जी की उपासना करके वर प्राप्त कर लिया था कि, "भगवान शंकर के औरस पुत्र द्वारा ही उसकी मृत्यु हो सकेगी।"
भगवान शंकर तो समाधि में स्थित थे। उनके औरस पुत्र की तो कल्पना भी नहीं हो सकती थी। सभी देव इकट्ठे होकर विष्णु की शरण में गए। उन्होंने कहा, "भगवती जगदंबा ही कामनाओं को पूर्ण करने के लिए साक्षात कल्पवृक्ष हैं। तुम सब देव मन को शांत करके भगवती जगदंबा की ही शरण में जाओ। देर करना उचित नहीं है।"
तब देवों के साथ विष्णु जी भी गिरिराज हिमालय पर पहुंच गए। मायाबीज मंत्र का जाप सहित भगवती की पूजा करने में तत्पर हो गए। उसी समय उन्हें एक परम दिव्य मनोहर देवी दृष्टिगोचर हुई। सभी देवता नम्रतापूर्वक सिर झुकाकर देवी जगदंबा की स्तुति करने लगे। देवताओं की स्तुति से देवी जगदंबा प्रसन्न हो गईं। कहने लगीं, "आप सब किस प्रयोजन से यहां पधारे हैं? मैं अपने भक्तों की अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए कल्पवृक्ष हूं।"
उनकी वाणी सुनकर देवता भावविभोर हो गए और कहने लगे, "परमेश्वरी, त्रिलोकी में कोई ऐसी बात नहीं है जो आपसे छिपी हो। तारक नाम का असुर हमें दिन-रात कष्ट पहुंचा रहा है। शंकर द्वारा उत्पन्न पुत्र से ही उसका अंत होगा। परंतु शिव इस समय विरक्त जीवन में रहकर समाधि में स्थित हैं। आप ही इसका निवारण करने में सक्षम हैं।"
देवी कहने लगीं, "तुम शांत हो जाओ। मेरी शक्ति, जो 'गौरी' नाम से विख्यात है, हिमालय के घर प्रकट होगी। आप लोग ऐसा प्रयत्न करें कि उनका शिव के साथ संबंध हो सके। हिमालय का भी कर्तव्य है कि वह भक्ति के साथ मेरी उपासना करता रहे।"
हिमालय ने भी उनका यह वचन सुना, तो गद्गद होकर कहने लगे, "मेरे तो भाग्य ही जाग उठे। भगवती जगदंबा मेरे घर कन्या रूप में प्रकट होंगी।"
वहां पर देवी ने उन्हें अपने विराट रूप का दर्शन भी कराया। इस प्रकार हिमालय के घर पार्वती रूप में भगवती जगदंबा की शक्ति "गौरी" रूप में पधारीं। उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया। शिव प्रसन्न हो गए और उनका विवाह हो गया। भगवान शिव के तेज से एक दिव्य बालक उत्पन्न हुआ, जो कार्तिकेय के नाम से जाने जाते हैं। इन्हें ही स्कन्द नाम से भी जाना जाता है। जब कार्तिकेय युवा हुए, उन्हें देवताओं की सेना का सेनापति बनाया गया। तारकासुर तथा देवताओं के बीच घमासान युद्ध हुआ। कार्तिकेय ने अपनी दिव्य शक्ति के साथ "भाले" से तारकासुर का वध किया। इस प्रकार देवी भगवती की कृपा से देवों को अत्याचार से मुक्ति मिली।

03/07/2026

-------: श्री भगवत्यै नमः :-------

"श्री मद् देवी भागवत पुराण का सार"

तृतीय भाग :------ देवी भगवती जगदंबा की महिमा

श्रीमद् देवी भागवत पुराण के सार रूप के प्रथम भाग में हमने उनका परिचय तथा उनके पांच रूपों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। देवी दुर्गा, देवी लक्ष्मी, देवी सरस्वती, देवी सावित्री तथा श्री राधा जी आदिशक्ति देवी जगदम्बा के मुख्य पांच रूप हैं। इन पांच देवी के रूपों से ही सारी सृष्टि चलायमान है। श्रीमद् देवी भागवत पुराण के सार के द्वितीय भाग में उनके विभिन्न रूपों के अंश, कलाओं तथा कलांशों के बारे में जाना। देवी के अंशों, देवी की कलाओं तथा कालांशों का ज्ञान होने के पश्चात हमने यह भली-भांति समझ लिया कि भगवती जगदंबा से ही श्रीमद् देवी भागवत पुराण प्रसिद्ध है। आध्या, परा, सर्वज्ञा जिनके नामान्तर हैं, जो संसार के आवागमन रूपी बंधन को काटने में कुशल हैं, जो अपनी त्रिगुणात्मक शक्ति के द्वारा इस सत्-असत् रूप जगत की रचना करके उनकी रक्षा में सदा तत्पर रहती हैं, जो प्रलय काल में सब का संहार करके अकेली ही रमण करती हैं, जगत की सृष्टि करने वाली भगवती जगदंबा ही हैं। जब-जब जगत में किसी पर विपदा आई, तो देवी जगदंबा ने ही उन्हें विपदा से बाहर निकाला। अब हम तृतीय भाग में देवी भागवत में दिए गए कुछ प्रसंगों द्वारा समझेंगे कि देवी जगदंबा ही परमब्रह्म हैं। उनकी शक्तियां अनंत हैं। उनकी शक्तियां ही कलाओं में परिवर्तित होकर सभी देवों को आपदा से बाहर निकालती हैं। हम देवी की महिमा को समझेंगे कि किस प्रकार समय-समय पर उन्होंने देवों की कैसे-कैसे सहायता की।

सयमन्तक मणि का प्रसंग :-----

भोजवंशी राजा सत्राजित द्वारिका में सुखपूर्वक रहते थे। उन्होंने सूर्य देव की आराधना की। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने उन्हें सयमन्तक नामक मणि दी। मणि का इतना ज्यादा प्रकाश था कि द्वारका वासियों ने समझा, स्वयं सूर्य देव उनके पास आ रहे हैं। सयमन्तक मणि का इतना प्रभाव था कि सत्राजित जहां-जहां पर भी रखते, वहां महामारी, दुर्भिक्ष इत्यादि किसी भी आपात संबंधी घटना का भय नहीं होता था। एक दिन सयमन्तक मणि को सत्राजित के भाई प्रसेन गले में डालकर शिकार खेलने गए। रास्ते में उन्हें सिंह ने मार कर मणि ले ली। ऋक्षराज जामवंत बड़े शक्तिशाली थे। उन्होंने सिंह को मार कर मणि स्वयं ले ली। जब सत्राजित को इसका पता लगा, तो उन्होंने समझा कि कृष्ण ने प्रसेन को मार कर मणि ले ली है। वह कृष्ण भगवान पर ही दोषारोपण करने लगे। तब अपने ऊपर लगाए दोष को ठीक करने के लिए कृष्ण उस स्थान पर पहुंचे, तो देखा कि जामवंत का लड़का मणि के साथ खेल रहा है। बालक से मणि के छीन लेने पर वह जोर-जोर से रोने लगा। उसकी रोने की आवाज सुनकर जामवंत पहुंच गए। मणि को लेकर कृष्ण तथा जामवंत में 27 दिनों तक युद्ध चलता रहा। कृष्ण के वापस घर न पहुंचने पर वासुदेव बहुत दुखी हुए। तभी वहां नारद जी पहुंच गए। उन्होंने सारी स्थिति बताई और कहने लगे, "जामवंत बहुत बलवान है। तुम्हें इस कष्ट को दूर करने के लिए देवी जगदंबा की आराधना करनी पड़ेगी। देवी ही सत्-चित् और आनंदमय विग्रह वाली है। चराचर जगत की वही स्वामिनी है। मधु-कैटभ से भयभीत होने पर स्वयं पितामह ने भी इस देवी की स्तुति की थी। भगवान विष्णु इन्हीं की कृपा से जगत का पालन-पोषण करते हैं, भगवान रुद्र भी उनकी कृपा-दृष्टि से संसार के संहार में सफल होते हैं। इसलिए तुम भगवती का पूजन करके नौ दिन तक श्रीमद् देवी भागवत पुराण को सुनो।"

वासुदेव जी ने नौ दिन तक नारद जी के कहे अनुसार भाव से देवी भागवत कथा सुनी और देवी के नवार्ण मंत्र का जाप करने लगे। इस प्रकार जाप के प्रभाव से जामवंत और कृष्ण का युद्ध समाप्त हो गया। जामवंत ने श्री कृष्ण की पूजा की और अपनी पुत्री जामवंती का विवाह उनसे करा कर मणि भी उनको सौंप दी। इस प्रकार देवी की कृपा से सयमन्तक मणि उचित स्थान पर पहुंच गई।

सुध्युम्न प्रसंग :-----

विवस्वान मनु के पुत्र श्राद्धदेव थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। वशिष्ठ जी की सहमति से उन्होंने पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। पुत्र के स्थान पर उन्हें ईला नाम की कन्या प्राप्त हुई। श्राद्धदेव जी ने पूछा, "पिताजी, आपका यज्ञ उल्टा फल देने वाला कैसे हो गया?" वशिष्ठ जी ने श्री हरि की उपासना की। उसके फल स्वरुप ईला नाम की कन्या पुरुष रूप में परिवर्तित हो गई। उन्होंने ईला का नाम सुध्युम्न रखा। पैदा होते ही वह प्रकांड विद्वान हो गए। एक बार वह शिकार खेलने के लिए जंगल की तरफ गए। वहां पर एक स्थान पर शिव-पार्वती हास-विलास में व्यस्त थे। कुछ मुनि वहां पर उनके दर्शन की अभिलाषा से पहुंचे। पार्वती जी उनके आगमन से अप्रसन्न हो गए। तब शंकर भगवान ने उन्हें प्रसन्न करने के लिए कहा, "जो भी पुरुष इस क्षेत्र में आएगा, वह स्त्री रूप में परिवर्तित हो जाएगा।"

जब सुध्युम्न जंगल गए, तब वह भी सहसा उस स्थान पर पहुंच गए। पहुंचते ही वह स्त्री रूप में हो गए और उनके साथ सब साथियों का रूप भी स्त्री रूप हो गया। एक बार वे स्त्री रूप में बुध के आश्रम में गए और बुद्ध को अपने पति रूप में स्वीकार कर लिया। उनसे उनको एक पुत्र पैदा हुआ। उसका नाम पूरूरवा था। एक बार उन्होंने वशिष्ठ जी का ध्यान किया और वह उनके आश्रम पर पहुंच गईं। वशिष्ठ जी को अपना सारा वृत्तांत सुनाया। वशिष्ठ जी ने उनकी समस्या के समाधान हेतु सच्चे मन से शिव की आराधना की। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए। शिव ने प्रसन्न होकर उनसे कहा कि ईला एक महीना पुरुष रूप में तथा एक महीना स्त्री रूप में रहेगी। शंकर जी वर पा लेने के बाद वशिष्ठ जी भगवती जगदंबा की आराधना में लग गए कि ईला सदा के लिए पुरुष बन जाए। भगवती साक्षात नारायणी हैं। वशिष्ठ जी की भक्तिपूर्वक स्तुति करने पर देवी प्रकट हो गई और कहने लगी कि, "तुम सुध्युम्न के साथ रहकर उसे देवी भागवत की नौ दिन की कथा सुनाओ और नवार्ण मंत्र का जाप करो, तब उसकी कामना पूर्ण हो जाएगी।"

ऐसा कहकर शिव-पार्वती दोनों वहां से चले गये। अश्विनी मास के शुक्ल पक्ष में नवरात्र विधि का पालन करते हुए देवी के कथनानुसार श्रीमद् देवी भागवत का पाठ करवाया और नवार्ण मंत्र के जाप द्वारा देवी की उपासना की। तब सुध्युम्न सदा के लिए पुरुष रूप में परिवर्तित हो गए। इस प्रकार देवी अपने भक्तों के कार्य में सदा सहायक होती हैं।

ऋतवाक् मुनि का प्रसंग :----

स्वामी कार्तिकेय जी ने अगस्त मुनि जी से कहा भी है कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव सभी देवी जगदंबा की आराधना करते हैं। उन्होंने उन्हें ऋत्वाक् मुनि की कथा सुनाई। ऋत्वाक् मुनि बड़ी विलक्षण बुद्धि के थे। समय अनुसार उनके पुत्र पैदा हुआ। पुत्र के पैदा होते मुनि शोक और रोग से ग्रस्त रहने लगे। उनकी पत्नी की भी यही स्थिति थी। पुत्र इतना उद्दंड था कि एक बार किसी मुनि की स्त्री को भी हठपूर्वक छीन लाया। इस प्रकार दुष्ट पुत्र के नीच व्यवहार से दुखी होकर वे श्री गर्ग मुनि की शरण में गए। तब गर्ग जी ने कहा, "तुम अपने दुख को दूर करने के लिए जग जननी भगवती जगदंबा की आराधना करो। वही एकमात्र दुखों को हरने वाली शक्ति हैं।"

व्यास जी का प्रसंग :-----

एक बार व्यास जी मंदराचल पर्वत पर बैठे विचार करने लगे कि पुत्रहीन की गति नहीं होती। उनके मन में पुत्र की लालसा जागृत हो गई। तभी नारद जी हाथ में वीणा लेकर पहुंच गए। नारद जी ने पूछा, "आप क्यों चिंतित लग रहे हो?" व्यास जी पूछने लगे, "मेरे मनोरथ पूर्ण करने वाले एवं वर देने में कौन सा देवता निपुण है, जिनकी मैं उपासना करूं? भगवान विष्णु, शंकर, ब्रह्मा, इंद्र, सूर्य, गणेश, स्वामी कार्तिकेय, अग्नि अथवा वरुण?"

तब नारद जी ने उन्हें श्री हरि के वचन सुनाएं, जो उन्होंने उनके पिता ब्रह्मा जी को बताया था। श्री हरि ने ब्रह्मा जी को कहा कि सब जानते हैं कि आप सृष्टि की रचना करते हैं, मैं पालन करता हूं तथा शंकर जी संहार करते हैं। लेकिन हमें जो यह शक्ति मिली है सृष्टि रचना की, सृष्टि के पालन की, सृष्टि के संहार की, इसकी अधिष्ठात्री भगवती देवी की शक्ति है। इस भगवती शक्ति से बढ़कर दूसरा कोई देवता नहीं है। पूरे ब्रह्मांड में जो-जो कुछ भी देवताओं द्वारा होता है, वह सब देवी की शक्ति से ही हो रहा है। इसलिए तुम भी अपना पुरुषार्थ सिद्ध करना चाहते हो, तो भगवती के चरण कमल को हृदय में धारण करके उन्हीं की उपासना करो। ऐसा सुनकर व्यास जी भगवती की उपासना हेतु पर्वत चले गए।

मधु-कैटभ का प्रसंग :---

मधु-कैटभ के साथ जब भगवान विष्णु का युद्ध चल रहा था, उनको किसी भी तरह से नहीं हरा सके। तब देवी भगवती के कारण ही विष्णु जी उनका वध करने में सफल हुए। मधु-कैटभ बहुत ही बलशाली दैत्य थे। देवी भगवती की उपासना करने पर देवी ने उन्हें वरदान दिया था, "जब वह मृत्यु को आदेश देंगे, तभी वह उनके पास आएगी।" विष्णु जी सोच-विचार में पड़ गए कि यदि भगवती इनको वर दे चुकी है, तो वह उन्हें मार नहीं सकते। अतः मैं भी अपना मनोरथ पूर्ण करने के लिए भगवती जगदंबा की ही शरण में जाता हूं। उन्हें प्रसन्न किए बिना मेरा कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। उन्होंने देवी की आराधना की, तो वह प्रकट हो गईं। उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर उन्होंने कहा कि, "मैं उन्हें अपने रूप से भ्रमित कर दूंगी। जब वह मेरी माया से मोहित हो जाएंगे, तो अपका कार्य बन जाएगा।"

जब मधु-कैटभ दैत्यों ने मां जगदंबा को अपने सामने पाया, तो दोनों उन पर मोहित हो गए। तब विष्णु जी ने उन दोनों को कहा, "तुम दोनों बहुत बलशाली हो। मैं तो तुम्हें हरा नहीं सकता। मैं तुमसे बहुत खुश हूं। मुझसे कोई वर मांग लो।" वे दोनों काम के वश में थे। बोले, "तुम हमें क्या दोगे? हम तुम्हें कुछ मांगने के लिए कहते हैं। जो चाहो, हमसे मांग लो।"तब विष्णु जी ने मधु-कैटभ से कहा कि, "तुम देना ही चाहते हो, तो मेरे हाथों से अपनी मौत मांग लो।" दोनों काम के वशीभूत थे। कहने लगे, "ठीक है।" तो विष्णु जी ने उनका वध कर दिया। यह है मां जगदंबा की शक्ति का प्रभाव।

विष्णु जी का प्रसंग :------

जब सृष्टि का कार्य संपन्न हो गया, सब देवता अपने-अपने स्थान पर चले गए। विष्णु जी भी लक्ष्मी सहित अपने बैकुंठ पर चले गए। विष्णु जी के मन में ख्याल आया, सृष्टि का कार्य देवी भगवती के आशीर्वाद से संपन्न हुआ है। उनके मन में अंबिका यज्ञ करने की इच्छा जागृत हुई। तब सब देवों सहित उन्होंने विशाल यज्ञ का आयोजन किया। मनोहर सामग्री जुटाकर श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा अभीष्ट पदार्थ का हवन आरंभ हो गया। इसमें महामाया देवी प्रसन्न हो गई और आकाशवाणी सुनाई दी, "विष्णु, तुम सभी देवताओं में सदा सर्वोत्तम स्थान प्राप्त करोगे। तुम परम परमेश्वर कहलाओगे। तुम सबके परम आराध्य देवता होवोगे। जब-जब भूमंडल पर धर्म का नाश होने लगेगा, तब तुम ही अंशावतार धारण करके धर्म की रक्षा के लिए प्रकट होवोगे। संपूर्ण कार्यों को सम्पन्न करने के लिए शक्ति मेरे अंश से प्रकट होगी। तुम कभी भी उन शक्तियों का तिरस्कार मत करना। उनकी पूजा और प्रतिष्ठा करके जो भी कार्य करोगे, वह शुभ होगा और सर्वत्र तुम्हारी महिमा बढ़ जाएगी।"

ऐसी आकाशवाणी सुनकर सभी के मन में भगवती के प्रति भक्ति जाग उठे। सभी उनकी आराधना में तत्पर हो गए। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि देवों की उपलब्धियों में भगवती जगदम्बा ही कारण है।

रावण वध का प्रसंग :---------

श्री राम द्वारा रावण वध से पहले नारद जी ने उन्हें रावण वध का उपाय बताया। उन्होंने राम से कहा कि अश्वनी मास में श्रद्धापूर्वक नवरात्र में उपवास रखकर भगवती की आराधना, सविधी जाप करके श्रद्धापूर्वक नवरात्रि का अनुष्ठान करो। उन्होंने बताया, विश्वामित्र, भृगु, वशिष्ठ, कश्यप ने भी इस व्रत का अनुष्ठान किया था। वृत्रासुर का वध करने के लिए इंद्र तथा त्रिपुर वध के लिए भगवान शंकर ने भी इसी व्रत का अनुष्ठान किया था। तब श्री राम जी ने किष्किंधा पर्वत पर इसके अनुष्ठान की व्यवस्था की। देवी भगवती की श्रद्धापूर्वक आराधना की। नौ दिन तक उपवास किया। इस व्रत से प्रसन्न होकर देवी भगवती प्रकट हुई और कहने लगी कि, "देवताओं की प्रार्थना पर ही तुम्हारा दशरथ के घर पुत्र रूप में जन्म हुआ है, क्योंकि रावण सबको महान कष्ट दे रहा था। तुम नारायण के अंश से प्रकट हुए हो। इससे पहले भी तुम मत्स्यावतार में, कच्छप रूप में, वाराह रुप में, नरसिंह रूप में प्रकट हो चुके हो। क्योंकि तुमने श्रद्धा से नवरात्र व्रत का अनुष्ठान किया है, इसलिए उठो और रावण को मारकर 11000 वर्ष राज्य का सुख भोग कर परमधाम पहुंचो।"

इस प्रकार देवी भगवती, जो परम शक्ति हैं, उनकी प्रेरणा से सुग्रीव के साथ मिलकर समुद्र पर पुल की व्यवस्था करके रावण वध में सफल हुए।

देवासुर संग्राम का प्रसंग :-----

देवताओं तथा दैत्यों के देवासुर संग्राम का निवारण भी भगवती जगदंबा द्वारा किया जाता है। एक बार प्रहलाद के राज्य काल में प्रहलाद सहित दैत्यों को घमंड हो गया और वह देवताओं से युद्ध करने लगे। पूरे 100 वर्ष तक युद्ध चला। इस महायुद्ध में प्रहलाद की प्रधानता रही और शुक्राचार्य से सुरक्षित दैत्य विजय हो गए। तब इंद्र ने भगवती जगदंबा की आराधना की। भगवती उनकी आराधना से प्रसन्न होकर प्रकट हुईं। तब इंद्र कहने लगे, "देवी, तुम विश्व की माता हो। तुम्हारे प्रताप के सामने दुख टिक नहीं सकता। हमारी रक्षा करो।"

तब देवी ने कहा, "देवताओं, निर्भय हो जाओ। मैं तुम्हारा कल्याण अवश्य करूंगी।"

जब दैत्यों ने देवी भगवती को देखा, तो विचार करने लगे, भगवान नारायण से मिलकर यह चंडिका रूप में यहां पर पधारी हैं। जिन्होंने चंड-मुंड, मधु-कैटभ को भी मार डाला, तो हमें भी मार डालेंगी। प्रहलाद जी ने दैत्यों को कहा, "इस समय युद्ध करना ठीक नहीं। यहां से हट जाना चाहिए।"

मैं भी भगवती की स्तुति करता हूं। वे महामाया है। सृष्टि, स्थिति तथा संहार इन्हीं की लीला है। वह केवल देवों की नहीं, हमारी भी आराध्य हैं। भक्तों को अभय देना उनका स्वाभाविक गुण है। प्रहलाद भगवान विष्णु के भक्त थे। वे जगदंबा की स्तुति करने लगे। कहने लगे, "हे देवी, आप धर्म के रहस्य से परिचित हैं। विषय भोग की आसक्ति के कारण हम सदा लड़ते-भिड़ते रहते हैं। आपके सिवा संसार में कोई भी एकमात्र शासक नहीं है। हम सब दैत्य आपकी शरण में आए हैं। हमारी रक्षा करो।"

तब देवी ने उन्हें समझाया कि तुम पाताल में चले जाओ। वहां ही रहने की व्यवस्था कर लो। अभी तुम्हें काल की प्रतीक्षा करनी चाहिए। तुम सभी निर्दोष हो। इस प्रकार देवी ने उनकी भी रक्षा का भार अपने ऊपर ले लिया। उस समय देवों तथा दैत्यों ने आपसी वैर-भाव भी त्याग दिया और सुख से रहने लगे। इस प्रकार देवी भगवती अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहती है।

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