03/07/2026
Continued (2)
सृष्टि उत्पत्ति का प्रसंग :------
सृष्टि के आरंभ में मनु और शतरूपा हुए। मनु को संपूर्ण मन्वन्तरों का प्रवर्तक माना जाता है। सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में जानने के लिए मनु ब्रह्मा जी के पास गए। तब उन्होंने कहा, "बेटा, तुम्हें भगवती जगदंबा की उत्तम उपासना करनी चाहिए। उन्हीं के प्रसन्न होने पर तुम्हारी यह प्रजा-सृष्टि उत्तम रूप से चल सकती है।"
मनु जी ने बड़ी सावधानी के साथ स्तुति की। स्वयंभूव मनु की उपासना से प्रसन्न हो देवी ने उन्हें वर मांगने को कहा। मनु बोले, "देवी, यदि आप मेरी भक्ति से प्रसन्न हैं तो ऐसी कृपा करें कि यह प्रजा-सृष्टि का कार्य निर्विघ्नतापूर्वक संपन्न हो सके।"
देवी ने कहा, "मेरी कृपा-प्रसाद से तुम्हारी प्रजा-सृष्टि बिना बाधा के अवश्य संपन्न होगी और क्रमशः बढ़ती रहेगी।"
ऐसा कहकर देवी अंतर्धान हो गई। इस प्रकार देवी के प्रताप से सर्वप्रथम श्री हरि ने वाराह रूप में आकर पृथ्वी को स्थापित किया। फिर मनु-शतरूपा की संताने हुईं। तीन कन्याएं आकूति, देवहुति तथा प्रसूति हुईं तथा दो पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद। आकूति का विवाह मुनि रुचि के साथ, देवहुति का कर्दम ऋषि के साथ तथा प्रसूति का विवाह प्रजापति दक्ष के साथ हुआ। आकूति से भगवान यज्ञपुरुष उत्पन्न हुए, देवहुति से भगवान कपिल का जन्म हुआ। दक्ष तथा प्रसूति से 64 कन्याएं उत्पन्न हुईं। उन्हीं कन्याओं से देवता, मानव, पशु, नाग, सर्प इत्यादि की सृष्टि उत्पन्न हुई।
स्वयंभूव मनु के बड़े पुत्र का नाम प्रियव्रत था। उनकी दो पत्नियां थीं। एक से दस पुत्र और एक पुत्री उत्पन्न हुईं। दसों पुत्र बड़े ही गुणवान थे। दूसरी पत्नी से तीन पुत्र उत्पन्न हुए। इन तीनों पुत्रों ने एक-एक मन्वन्तर तक राज्य-भार संभाला।
प्रियव्रत बहुत ही तेजस्वी थे। सूर्य के समान इन्होंने तेजस्वी रथ पर बैठकर पृथ्वी की सात प्रदक्षिणाएं की तथा सूर्य के समान प्रकाश फैलाया। रथ के पहियों से जो गड्ढे बने थे, वे सात समुद्र बने, और जो बीच की पृथ्वी थी, वह सात द्वीप बने। उनकी पहली पत्नी बहिर्ष्मती, जो विश्वकर्मा की पुत्री थीं, उनसे उत्पन्न दस पुत्रों में से तीन तो त्यागी पुत्र बने, जो महान परमहंस थे तथा शेष सात पुत्रों को पृथ्वी के सात द्वीपों का राजा बनाया। उनकी पुत्री का विवाह शुक्राचार्य से हुआ।
दूसरे पुत्र उत्तानपाद थे। उनके दो पुत्र थे ध्रुव तथा उत्तम। उत्तम उनकी पत्नी सुरुचि से तथा ध्रुव उनकी दूसरी पत्नी सुनीति से उत्पन्न हुए। ध्रुव 5 वर्ष की अवस्था में ही तपस्या पर निकल पड़े। नारद जी ने उन्हें "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करने के लिए कहा। उनकी तपस्या इतनी प्रबल थी कि भगवान विष्णु को प्रकट होना पड़ा। भगवान विष्णु ने उन्हें वर मांगने के लिए कहा। वर में भगवान से ध्रुव ने उनकी भक्ति का वर मांगा। भगवान बहुत प्रसन्न हुए। वर के साथ भगवान ने उनको आकाश में अटल स्थान प्रदान किया, जो ध्रुवलोक कहलाया।
इस प्रकार मां जगदंबा की कृपा से मनु और शतरूपा की संतानों ने सृष्टि-कार्य में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रियव्रत के रथ द्वारा जो सात द्वीप बने थे, वहां पर जाकर सृष्टि की उत्पत्ति के बाद प्रजा को रहने के लिए स्थान प्राप्त हुए।
जम्बू द्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मली द्वीप, कुश द्वीप, क्रोंच द्वीप, शाक द्वीप और पुष्कर द्वीप सात द्वीपों के नाम हैं। इन सभी द्वीपों के चारों ओर विभिन्न प्रकार के समुद्र बताए गए हैं, जैसे दूध, घृत, मधु, गन्ने का रस, सुरा आदि। इसमें जम्बू द्वीप के मध्य मेरु पर्वत स्थित है। यह इस ब्रह्मांड का केंद्र माना जाता है। मेरु पर्वत स्वर्णमय है। यहां पर देवताओं का निवास है। जम्बू द्वीप नौ खण्डों में विभाजित बताया गया है। इन खण्डों को वर्ष भी कहा जाता है। पहला वर्ष भारतवर्ष है, जहां पर हम रहते हैं। भारतवर्ष को ही कर्मभूमि कहा गया है। यहां मनुष्य कर्म करके मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
भारत के अलावा और जो आठ वर्ष हैं, वहां पृथ्वी पर रहते हुए भी केवल स्वर्ग के फल को ही प्राप्त कर सकते हैं। भगवान नारायण स्वयं कहते हैं, "भारत में मैं आदिपुरुष विराजमान रहता हूं। शेष आठ वर्षों में ब्रह्मा, रुद्र, हयग्रीव, नरसिंह, कामदेव, मत्स्यरूप में श्री हरि, कच्छप रूप में श्री हरि, वाराह रूप में श्री हरि, राम रूप में श्री हरि विराजते हैं। वहां उनकी पूजा होती है।"नारायण स्वयं नारद जी को कहते हैं, "भारतवर्ष में जन्म लेने वाले पुरुष को अपने-अपने सात्त्विक, राजस और तामस कर्मों के प्रभाव से दिव्य मानव एवं नारकीय योनियां मिलती हैं। संपूर्ण निवासियों को भांति-भांति के भोग भोगने को मिलते हैं। अपने-अपने वर्णानुसार कर्म करने पर भारतवासियों को मोक्ष तक भी मिल जाता है। अवश्य ही उन प्राणियों ने उत्तम कर्म किए हैं, जिनको श्री हरि की कृपा प्राप्त हुई है और भारतवर्ष में मनुष्य योनि प्राप्त हुई है। अन्य वर्षों में पैदा होकर दीर्घायु प्राप्त करने के स्थान पर भारतवर्ष में थोड़ी आयु लेकर जन्म होना भी श्रेष्ठ है, क्योंकि मानव शरीर से किए गए कर्म भगवान को अर्पण करके उनके निर्भय पद के अधिकारी बन सकते हैं। वास्तव में भारतवासी बड़े भाग्यशाली हैं क्योंकि उनके द्वारा जो यज्ञ, हवन आदि होते हैं, उनसे अर्पण की हुई सामग्री से देवता भी प्रसन्न हो जाते हैं।"
इस प्रकार स्वयंभूव मनु द्वारा सृष्टि-उत्पत्ति हुई। भगवती की निरंतर आराधना करते हुए पहले मन्वन्तर में स्वयंभूव मनु ने निष्कंटक राज्य भोगा। उनके प्रियव्रत और उत्तानपाद दोनों पुत्रों की भूमंडल पर बड़ी ख्याति हुई। द्वितीय मनु प्रियव्रत के पहले पुत्र थे, जिनका नाम स्वरोचिष था। उन्होंने भी भगवती की मूर्ति बनाकर बारह वर्षों तक तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रभावित होकर देवी उनके सामने प्रकट हुईं। उन्होंने उन्हें दूसरे मन्वन्तर का राजा बना दिया। प्रियव्रत के दूसरे पुत्र उत्तम भी निरंतर देवी भगवती के मंत्र का जाप करते थे। प्रसादस्वरूप उन्हें तीसरे मन्वन्तर का राज्य दे दिया। प्रियव्रत के तीसरे पुत्र तामस ने भगवती माहेश्वरी के कामबीज (क्लीं) को धारण कर नर्मदा के दक्षिणी तट पर उपासना की। वे चौथे मनु हुए। उनके एक और पुत्र रैवत ने भी यमुना के तट पर कामबीज संज्ञक मंत्र "ॐ क्लीं कामदेवाय नमः" पर सिद्धि प्राप्त करके पांचवें मनु के रूप में आए।
राजा अंग उत्तानपाद के वंशज थे। उनकी पत्नी का नाम सुनीथा था। वह मृत्यु देव की पुत्री थीं। उनका एक पुत्र था "वेन"। वह बहुत अत्याचारी था। ऋषियों ने उन्हें मार डाला। उनके शरीर को मथने पर "पृथु" प्रकट हुए, जिनके नाम से पृथ्वी का नाम पृथ्वी पड़ा। इनका एक पुत्र था "चाक्षुष", जो छठे मन्वन्तर के शासक हुए। यह पुलह ऋषि की शरण में गए। उन्होंने इन्हें सरस्वती बीज का अव्यक्त रूप से जाप करने को कहा। "ॐ ऐं क्लीं सरस्वत्यै नमः", जो मानसिक स्पष्टता के लिए होता है। इसे इन्हें सिद्धि प्राप्त हुई।
वैवस्वत मनु सातवें मन्वन्तर के मनु हैं, जो वर्तमान मन्वन्तर है। वैवस्वत का तात्पर्य है विवस्वान के पुत्र, अर्थात् सूर्य तथा संज्ञा के पुत्र हैं। इनका एक नाम "श्राद्धदेव" मनु भी है। श्राद्धदेव इसलिए नाम पड़ा क्योंकि वह श्रद्धा, धर्म तथा यज्ञ के महान प्रवर्तक माने जाते हैं।आठवें मनु सावर्णि हैं। सावर्णि का अर्थ है समान वर्ण वाले। पुराणों के अनुसार सावर्णि सूर्यदेव और उनकी पत्नी छाया के पुत्र हैं। वह वैवस्वत मनु के सौतेले भाई माने जाते हैं। आठवें मन्वन्तर में दैत्यराज बलि इंद्र के पद पर होंगे। वामन अवतार में श्री हरि ने इन्हें पाताल भेजा था। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्होंने इन्हें भविष्य में इंद्र पद पाने का वरदान दिया था। सावर्णि मनु ने भी पूर्व जन्म में देवी की उपासना करके वरदान लिया था कि वे मन्वन्तर के अधिपति होंगे। वैवस्वत मनु के 6 पुत्र थे। इन पुत्रों ने यमुना तट पर देवी भगवती की घोर तपस्या की, जिसके प्रभावित होकर देवी ने वर दिया कि तुम सब मन्वन्तरों के स्वामी बनोगे।
प्रथम पुत्र दक्ष सावर्णि ये नौवें मनु कहलाए। द्वितीय पुत्र मेरु सावर्णि दसवें मनु कहलाए। तीसरे पुत्र सूर्य सावर्णि ये ग्यारहवें मनु कहलाए। चौथे पुत्र इन्द्र सावर्णि बारहवें मनु, पांचवें पुत्र रुद्र सावर्णि तेरहवें मनु तथा छठे विष्णु सावर्णि ये चौदहवें मनु कहलाए। यह सभी मनु भगवती "भ्रामरी" की नित्य उपासना करते थे। भगवती भ्रामरी देवी उस शक्ति का स्वरूप है, जिसमें उन्होंने "अरुणाचल", जो एक महान पराक्रमी दैत्य था, जिसने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या करके वर प्राप्त किया हुआ था कि, "मैं न युद्ध में मरूं, न किसी अस्त्र-शस्त्र से मरूं, न किसी स्त्री-पुरुष से, न दो पैरों तथा चार पैरों वाले प्राणी से मरूं।"ऐसा वर पाकर वह देवों पर शासन करने लगा। तब देवता दुखी होकर मां जगदंबा की शरण में गए। उनकी आर्तवाणी सुनकर मां जगदंबा भगवती ने भ्रमरों को प्रेरित किया, जिन्होंने एकत्रित होकर दैत्यों की छाती छेद डाली और इस प्रकार देवों की रक्षा की।
इस प्रकार श्रीमद् देवी भागवत द्वारा हमें ज्ञान हो गया कि भगवती जगदंबा की अनंत शक्तियां हैं। वही परमब्रह्म हैं। देवी और ब्रह्म एक ही हैं। उनमें किंचित मात्र भी भेद नहीं है। केवल संसार-रचना के समय वह द्वैत रूप को प्राप्त होती हैं। देवताओं में विभिन्न नाम से विख्यात हैं। उनकी अनंत शक्तियों का वर्णन करना असंभव है। श्रीमद् देवी भागवत में उनके मुख्य अंश, कलाओं तथा कलांशों के बारे में हमें जानकारी प्राप्त हुई। वह अपनी विभिन्न शक्तियों को धारण करके पराक्रम दिखलाती हैं। गौरी, ब्राह्मी, रौद्री, वाराही, वैष्णवी, शिवा, वारुणी, नरसिंही सभी उनके ही रूप हैं। विभिन्न कार्यों के उपस्थित होने पर उन देवियों के भीतर अपनी शक्ति स्थापित करके ही वह सारी व्यवस्था करती हैं। बुद्धि, श्री, धृति, कीर्ति, स्मृति, श्रद्धा, कांति, शांति, विद्या, स्पृहा, वसा, मज्जा, त्वचा, दृष्टि इत्यादि सब भगवती जगदंबा के ही रूप हैं। सृष्टि में जब-जब देवताओं पर दुःख या कष्ट आए, मां जगदंबा ने ही विभिन्न शक्तियों को धारण करके उनका निवारण किया। कभी दुर्गा रूप में, कभी काली रूप में, कभी चंडी रूप में, कभी भ्रामरी रूप में, कभी गौरी रूप में प्रकट होकर दैत्यों के संहार के लिए प्रकट हुईं। देवी भगवती से ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश संसार की सृष्टि, पालन और संहार का कार्य संपूर्ण कर रहे हैं। पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, अग्नि पांचों तत्व भी उनकी ही कला हैं। ज्ञानेंद्रियां, कर्मेंद्रियां, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार ये सब देवी की शक्ति से अपना-अपना कार्य कर रहे हैं।
भगवती की माया से ही सारा संसार सजा पड़ा है। जगदंबा की शक्ति से ही सूर्य जगत को प्रकाशित करता है। चंद्रमा की शीतलता, अग्नि की दाहिका शक्ति, वायु में गति, जल में रस, सभी जगदंबा की शक्ति का प्रताप है। बलवानों का बल, तपस्वियों का तप, तेजस्वियों का तेज, धनवानों का धन, बुद्धिमानों की बुद्धि सब भगवती की शक्ति से ही संभव है। भगवती त्रिगुणा, निर्गुणा और प्रकृति से भी परे हैं। जब भगवती ने ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को सृष्टि-उत्पत्ति, पालन तथा संहार का आदेश दिया, तो उन्होंने पहले उन्हें नवार्ण मंत्र का उपदेश दिया। उन्हें वाग्बीज (ऐं), कामबीज (क्लीं) तथा मायाबीज (ह्रीं) देकर कहा कि इनका निरंतर जाप करते हुए आनंदपूर्वक अपने-अपने कार्य करो। ये मंत्र भक्ति और मुक्ति देने वाले हैं। सभी देवों ने भी इन्हीं मंत्रों से आवाहन करके देवी से सहायता लेकर अपने-अपने कार्य किए हैं। सभी मनुओं ने इन मंत्रों का आश्रय लेकर ही अपने-अपने मन्वन्तरों में सफलतापूर्वक राजकाज संभाला है। देवी ने सब देवों को सुचारू रूप से कार्यभार संभालने के लिए नवार्ण मंत्र तथा बीज मंत्रों का आश्रय देकर कहा कि जब प्रलयकाल में संपूर्ण चराचर जगत को मैं अपने में लीन करूंगी, तब तुम भी सब मेरे शरीर में मेरे अंदर प्रवेश कर जाना।
देवी भगवती जगदम्बा की कृपा सब पर बनी रहे।
मंगल कामना सहित
कमला वाधवा