The Geeta Explained

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28/12/2024

----: श्रीमद् भागवत पुराण का परिचय एवं सार:---+

तृतीय भाग:---
भागवत के दशम स्कंध में शुकदेव जी भगवान श्री कृष्ण के जन्म का उद्देश्य और उनकी लीलाओं का वर्णन करते हैं। यह स्कंद श्री कृष्ण का प्रेम स्वरूप है। यह निरोध लीला है। भगवान श्री कृष्ण के जन्म से पूर्व लाखों दैत्यों ने घमंडी राजाओं का रूप धारण करके पृथ्वी को आक्रांत कर दिया था। जब पृथ्वी भगवान की शरण में गई तो उन्होंने सभी देवताओं को आदेश दिया कि वह सभी अपने अपने अंशों सहित यदुकुल में जन्म लें। वे स्वयं वासुदेव जी के घर में पुत्र रूप में प्रकट हुए। स्वयं भगवान शेष भी जो उनका कार्य करने के लिए बड़े भाई बलराम रूप में प्रकट हुए। योग माया भी अंश रूप में उनकी लीला को संपन्न करेंगी। भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं से तो सभी भलीभांति परिचित होंगे । पूतना उद्बार,शकट भंजन, तृणावर्त उद्धार, उखल लीला, बकासुर उद्धार, अघासुर उद्धार,धेनुकासुर उद्धार, कालिया नाग लीला, गोवर्धन धारण, चीरहरण, रास लीला, महारास इत्यादि से सभी परिचित हैं।ये लीलाएं वृंदावन में हुई। उसके बाद मथुरा में उन्होंने कंस का उद्धार किया और द्वारिका का निर्माण किया। इसके बाद भगवान के विभिन्न विवाहों का विवरण और उनकी सन्तति का विस्तार, शिशुपाल का उद्धार, दन्तवक्त्र का उद्धार,तथा सुदामा जी को ऐश्वर्य प्राप्त करा कर मित्रता का स्वरूप दिखाया। एकादश स्कंध "मुक्ति लीला "का है। इसमें भगवान का ज्ञान स्वरूप बताया गया है। भगवान कृष्ण रूप में अवतरित होकर जिस कार्य के लिए आए थे वह सारे कार्य संपन्न हो चुके थे। इसलिए अब उन्होंने देखा कि सारे यदुवंशी मेरे आश्रित हैं और विशाल वैभव के कारण सब अहंकार में आकर गड़बड़ करने लगे हैं। उनकी किसी के द्वारा पराजय भी नहीं हो सकती इसलिए उन्होंने मन में अपने कुल का संघार करके जाना ही उचित समझा। उन्होंने जामवंती नंदन "साम्भ" के माध्यम से लीला रची। सभी ऋषि मुनि भगवान के समीप ही निवास कर रहे थे। सबको ज्ञात था कि भगवान अब अपने धाम जाने की तैयारी कर रहे हैं।इसी समय नारद जी द्वारका में पहुंचे। वहां वासुदेव जी ने प्रश्न किया कि ,"मुझे ऐसा उपदेश दीजिए जिससे जीव का कल्याण हो सके"। तब नारद जी ने उनसे कहा कि यही प्रश्न राजा निमी ने ऋषभ के नौ पुत्र जो योगेश्वर थे उनसे पूछा ।राजा ने पूछा ,"परम कल्याण का क्या स्वरूप है? और इसका क्या साधन है? "उन्होंने बताया परम कल्याण का स्वरूप है "भागवत धर्म का अवलंबन करना" भागवत धर्म है शरीर मन, वाणी, इंद्रियां, बुद्धि, अहंकार से अपने जन्म के स्वभाव वश जो भी कर्म हैं वह भगवान को समर्पित करना ।इसका एक सरल एकमात्र साधन है प्रतिक्षण एकाग्र चित्त के द्वारा भगवान के चरण कमल का भजन करना। जैसे भोजन के प्रत्येक ग्रास के साथ तुष्टि, पुष्टि तथा क्षुधा निवृत्ति तीनों एक साथ हो जाते हैं ,वैसे ही भजन के द्वारा भगवान के प्रति प्रेम में भक्ति, संसार के प्रति वैराग्य तथा भगवान के स्वरूप की स्मृति तीनों हो जाते हैं ।जिससे मनुष्य का परम कल्याण हो जाता है। फिर निमी ने प्रश्न किया कि" मैं उसे माया का स्वरूप जानना चाहता हूं जो बड़े-बड़े ऋषि मुनियों को मोहित कर देती है तथा इस माया से कैसे पार उतर सकते हैं"? योगेश्वरों ने उत्तर दिया" पंच महाभूत, 5 कर्मेंद्रियां, पांच ज्ञानेंद्रियां, 5ज्ञानेंद्रियों के विषय, मन, बुद्धि , चित्त, अहंकार यह 24 तत्व है यह जड़ है यही माया है। इस माया से पार तभी उतरा जा सकता है जब हमें यह विश्वास होने लगे की एक और केवल एक भगवान ही है जो सब क्रिया-कलाप, आचार्य -व्यवहार कर्म इत्यादि सब करा रहे हैं ।स्वयं को कर्ता नहीं मानना है। इस प्रकार राजा निमी प्रश्न करते गए और योगेश्वर उत्तर देते रहे‌ नारायण कौन है? उनका क्या स्वरूप है ?कर्म- विकर्म -अकर्म की क्या व्याख्या है? सब उत्तर जाने के बाद उन्होंने सतयुग ,कलयुग ,त्रेता युग ,द्वापर युग में भगवान की उपासना के तरीके इत्यादि बताए ,भक्तिहीन पुरुषों की गति को भी बताया गया। जब नारद जी चले गए तब सभी देवताओं ने भगवान को स्वधाम लौटने की प्रार्थना की तब श्री भगवान ने सब यदुवंशियों को इकट्ठा करके कहा कि मूसल की घटना से जो ऋषियों ने बालकों को श्राप दिया है उसे द्वारिका में बहुत अपशकुन तथा उत्पात मैं देख रहा हूं। इसलिए हमें शीघ्र ही यहां से निकलना होगा और वह सब के सब प्रभास क्षेत्र जो सौराष्ट्र गुजरात में सो मनाथ मंदिर के साथ लगता है कि ओर निकल पड़े‌। जब उद्धव जी ने सुना तो उन्होंने आभास हो गया कि यदि कृष्ण चाहते तो श्राप को मिटा सकते थे परंतु अब वह यदुवंश का संहार करके स्वधाम जाना चाहते हैं। वह बहुत ही विचलित हो उठे। भगवान ने उन्हें समझाया कि जिस उद्देश्य से मैं पृथ्वी पर आया था वह पूरा हो चुका है ।अब तुम भी सब सगे संबंधियों का मोह छोड़कर सम दृष्टि रखते हुए पृथ्वी पर विचरण करो। गुण तथा दोष बुद्धि से अतीत होकर बालक के समान विहित कर्मों का अनुष्ठान करते रहो। उद्धव जी कहते हैं," प्रभु मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह मैं हूं यह मेरा है इस भाव से आपकी माया के खेल देह और देह के संबंधी ,स्त्री, पुरुष, धन आदि में मैं डूब रहा हूं आप जो मुझे संन्यास का उपदेश दे रहे हैं वह मेरी समझ में नहीं आ रहा आप मुझे इस प्रकार समझाइए कि मैं इसे समझ सकूं"। तब उन्होंने शुद्ध बुद्धि राजा यदु तथा दत्तात्रेय का संवाद सुनाया। दत्तात्रेय सभी स्त्री धन आदि संसार के स्पर्श से रहित थे। हमेशा अपने ही स्वरुप में स्थित रहते थे ।राजा यदु ने दत्तात्रेय से "आत्मा सदा आनंदित रहने का उपाय पूछा" तब दत्तात्रेय ने उनको बताया कि मैं अपनी बुद्धि से बहुत से गुरुओं का आश्रय लिया ।उनसे ही शिक्षा ग्रहण करके मैं सबसे मुक्त हुआ‌ उनके 24 गुरु थे पृथ्वी, वायु, आकाश, अग्नि, जल ,सूर्य ,चंद्रमा, कबूतर ,अजगर ,समुद्र ,पतंगा, भंवरा, मधुमक्खी ,हाथी, हिरण , मछली, पिंगला वैश्या, कुरर पक्षी ,बालक, कुंवारी कन्या, बाण बनाने वाला ,सर्प, मकड़ी, भृगी कीड़ा। उनका कहना था कि जहां से भी कुछ अच्छा सीखने को मिले वही गुरु है। तब उन्होंने उद्धव जी को लौकिक तथा पारलौकिक सुखों के गुण दोष से अवगत कराया बद्ध और मुक्त भक्तों के लक्षणों से अवगत कराया,सत्संग की महिमा को समझाया। उद्धव जी ने फिर प्रश्न किया कि" सब जानते हैं की विषय विपत्तियों का घर है फिर भी वह कुत्ते ,गधे ,बकरे के समान दुख सहन करके भी भोगने की कामना रखते हैं क्यों" इस पर भगवान ने कहा कि बार-बार विषयों का सेवन करने से चित्त विषयों में आसक्त हो जाता है और वह चित्त में प्रविष्ट हो जाते हैं ।जैसे मदिरा पीकर उन्माद पुरुष यह नहीं देख पता कि मेरे द्वारा पहना हुआ वस्त्र शरीर पर है या गिर गया है ।इसलिए परमात्मा का साक्षात्कार नहीं कर पाता। इसके बाद भक्ति योग तथा ध्यान विधि का वर्णन किया। वर्णाश्रम धर्म को समझाया। यम, नियम पर प्रकाश डाला ।ज्ञान योग ,कर्म योग तथा भक्ति योग की व्याख्या की ।गुण तथा दोष की व्यवस्था पर प्रकाश डाला। प्रकृति- पुरुष ,शरीर -आत्मा का भेद समझाया। भगवान कृष्ण कहते हैं संसार में ऐसे संत पुरुष नहीं मिलते जो दुर्जनों की कटु वाणी से बिधें हुए हृदय को संभाल सके ।मनुष्य का हृदय मर्म भेदी बाण से इतना नहीं बिंधता जितना उसे दुष्ट जनों के मर्मान्तक कठोर वाणी से पीड़ा होती है। लेकिन यदि "मैं और मेरे पन "की गांठ खोल दी जाए तो मन शांत रहेगा और शांत मन पीड़ा का अनुभव कम करेगा। तत्पश्चात् भगवान ने उन्हें सांख्य योग का ज्ञान करवाया।
अंत में उद्धव जी कहते हैं कि" सब कुछ जानने के पश्चात भी जीव अपना मन वश में नहीं कर पाते क्योंकि योग साधना तो बहुत कठिन होती है ।आप कोइ ऐसा सरल रास्ता बताइए जिस पर चलकर अनायास ही परम पद प्राप्त हो सके"। तब भगवान ने उत्तर दिया कि," मेरी प्राप्ति के जितने भी साधन है उनमें सबसे श्रेष्ठ साधन है कि समस्त प्राणियों और पदार्थों में मन ,वाणी और शरीर की सभी वृत्तियों में मेरी ही भावना करें। यही मेरा भागवत धर्म है। सारे कर्म मेरे लिए ही करें और करते समय मेरे स्मरण का अभ्यास बनाएं"। तब वह सर्वत्र आत्म बुद्धि, ब्रह्म बुद्धि का अभ्यास करने लगता है। उसे सब कुछ ब्रह्म स्वरूप दिखने लगता है। हरओर मेरा साक्षात्कार करते-करते संसार दृष्टि से उपराम होने लगता है। तत्पश्चात उन्होंने उद्धव जी को बद्रिकाश्रम जाने की आज्ञा दी। वहां उन्होंने तपोमय जीवन व्यतीत कर परमगति प्राप्त की।उनके जाने के पश्चात उन्होंने यदुकुल के संहार के लिए लीला रची। वहां पर यदुवंशियों मेने ऐसी मदीरा पी , जिससे उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई ।आपस में एक दूसरे को मारने लगे ।मारते मारते सबके अस्त्र शस्त्र धनुष आदि समाप्त हो गए। तब मूसल के चूरे से जो समुद्र के किनारे एरक नामक घास थी उसे एक दूसरे पर उसी से वार करने लगे वह घास वज्र के समान कठोर थी। बलराम तथा कृष्ण को ही शत्रु समझने लगे। उनके साथ भी मार काट करने लगे और अंत में सभी यदुवंशी मारे गए। बलराम जी भी उनके नाश के बाद समुद्र तट पर बैठकर एकाग्रचित्त से परमात्म चिंतन करते-करते मनुष्य शरीर छोड़ दिया। जब उन्होंने शरीर छोड़ दिया तब वहां पीपल के पेड़ के नीचे भगवान बैठ गए ।वहां पर एक जरा नाम का शिकारी था उसने भी मूसल के टुकड़े से तीर बनाया हुआ था भगवान के पैर के तलवे को उसने हिरण समझा तीर चलाया। उससे भगवान जी को चोट लगी। इतने में उनका सारथी दारूक वहां पहुंचा। क्या देखते हैं कि भगवान के चारों ओर सभी देव उनकी सेवा में संलग्न है। उनके देखते देखते भगवान का गरुड़ ध्वज रथ घोड़े सहित आकाश में उड़ चला है ।भगवान ने उसको कहा कि तुम द्वारका चले जाओ और बलराम जी की परम गति और मेरे स्वधाम गमन की बात कहो। सब जो वहां स्त्री, बच्चे तथा बुजुर्ग हैं अपनी संपत्ति लेकर अर्जुन के संरक्षण में चले जाएं। भगवान जी के जाने के बाद समुद्र ने श्री कृष्ण का निवास स्थान छोड़कर एक क्षण में सारी द्वारिका डुबो दी। बारहवां स्कंद भगवान की "आश्रय लीला "का है। परीक्षित ने शुकदेव जी से कहा कि, "अब मुझे कलयुग का वर्णन भी बताइए "।तब शुकदेव जी ने कहा कि जिस समय कृष्ण भगवान अपनी लीला संवरण करके परमधाम पधार गए उसी समय कलयुग ने संसार में प्रवेश कर दिया और मनुष्य की मति पाप की ओर चल पड़ी।अधर्म के चारों चरण असत्य, हिंसा, असंतोष तथा कलह उजागर होने लगे और धर्म के चारों चरण सत्य, दया , तप दान क्षीण होने लगे ।सब कामवासना की पूर्ति और पेट भरने की धुन में लगने लगे। धन के लिए सद्भाव, मित्रता ,सगे संबंधियों की हत्या से भी परहेज नहीं करते ।तब परीक्षित जी पूछते हैं," ऐसे वातावरण में जीव भगवान का आश्रय कैसे प्राप्त कर सकेगा "।तब शुकदेव जी कहते हैं ,"कलयुग में दोष तो अनेक है ,किंतु इस कलयुग में एक सबसे बड़ा सद्गुण है जो भगवान का आश्रय प्राप्त करने का उत्तम साधन है। सतयुग में ध्यान धारणा से जो सिद्धि मिलती है, त्रेता युग में यज्ञ करने से और द्वापर में वैदिक विद्या से पूजा करने वालों को जो सिद्धि मिलती है वही सिद्धि कलयुग में बहुत प्रेम से परमात्मा के नाम का संकीर्तन करने पर प्राप्त होती है। प्रभु के नाम के साथ जो अतिशय प्रेम करता है उसकी भक्ति में कली बाधा उत्पन्न नहीं कर सकता। तब उन्होंने परीक्षित जी को अंतिम उपदेश देते हुए कहा ,"मन ही आत्मा के लिए शरीर, विषय और कर्मों की कल्पना कर लेता है और माया मन की सृष्टि उत्पन्न करके जीव को संसार चक्र में पड़ने का कारण बनती है"। इस कारण राजन तुम अपनी विशुद्ध एवं विवेकमयी बुद्धि को परमात्मा के चिंतन से भरपूर कर लो और स्वयं ही अपने अंतर में स्थित परमात्मा का साक्षात्कार करो। तुम चिंतन करो कि मैं ही सर्वाधिष्टान परबृह्म हूं, उसी समय तुम अपने आप को वास्तविक, एक रस अखंड स्वरूप में स्थित कर लोगे और तुम्हें उनका आश्रय प्राप्त हो जाएगा‌। अब परीक्षित जी सुखदेव जी के चरणों में बारंबार वंदन करते हैं और कहते हैं आपने मुझ पर बड़ी कृपा कि मुझे अब कोई शंका नहीं है। अब मुझे तक्षक नाग से डर भी नहीं लग रहा ।मेरे अंदर जो नारायण है वही नाग में भी है।मैं चारों ओर नारायण के दर्शन कर रहा हूं। द्वादश स्कन्द तक कथा सुनते-सुनते मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे भगवान मुझे बुला रहे हैं ,"आजा तू मेरे पास आजा" मुझे उनका आश्रय प्राप्त होने जा रहा है। उसके बाद उन्होंने शुकदेव जी की पूजा की और साष्टांग दंडवत प्रणाम किया‌। गंगा तट पर आए और महायोग की स्थिति में होकर ब्रह्म स्वरूप हो गए। जब तक्षक नाग डसने आया तो श्राप तो पूरा होना था उनका शरीर सबके सामने जलकर भस्म हो गया, परंतु वह तो डसने से पहले ही ब्रह्म में स्थित हो गए थे। इस प्रकार मनुष्यों का सारा शोक चाहे वह समुद्र के समान गहरा तथा विस्तार वाला हो, भगवान के परम पवित्र नाम, धाम, लीला ,यश वाले वचनों के प्रभाव से सदा के लिए समाप्त हो जाता है ।साथ ही उस समय कोई वृद्धावस्था नहीं, कोई युद्ध नहीं, कोई मृत्यु नहीं, कोई शोक नहीं, काम, क्रोध ,लोभ ,मोह ,मद, मत्सर, इर्ष्या, द्वेष की घेरे से बाहर निकलकर केवल एक स्थाई आनंद की अनुभूति होती है, जो सदैव नित्य नवीन रहती है ,जिससे परम शांति का अनुभव होने लगता है। "कुछ और ,कुछ और "पाने,की सोच सदा के लिए समाप्त हो जाती है ।श्री कृष्ण के चरण कमलों की अविचल स्मृति प्रदान हो जाती है, जिससे परम शांति का अनुभव होने लगता है।
मंगल कामनाओं सहित ,
कमला वाधवा

28/12/2024

----: श्रीमद् भागवत पुराण का परिचय एवं सार:-----

प्रथम भाग एवं द्वितीय भाग:-------
संसार में प्रत्येक जीव का प्रथम उद्देश्य होता है "आनंद प्राप्त" करना। उसके लिए आनंद से बढ़कर कोई वस्तु नहीं है। जीव का उठना-बैठना, सोना-जागना, खाना-पीना इत्यादि सभी कार्य आनंद प्राप्ति की ही तरफ उठाते हैं। इस आनंद को प्राप्त करने के लिए जीव भटकता रहता है। उसे संसार में आनंद मिलता भी है परंतु वह स्थाई नहीं होता। जीव के समक्ष दो रास्ते हैं। एक रास्ता संसार की तरफ है, दूसरा रास्ता भगवान की तरफ जाता है। भगवान को ही "सच्चिदानंद" कहा गया है। "सत्त-चित्त-आनंद"। जैसे पानी का गुण शीतलता है, अग्नि का गुण उष्णता है, इसी प्रकार जीव का गुण आनंद प्राप्त करना है। हम उसी सच्चिदानंद के अंश हैं तो आनंद प्राप्ति का गुण होना तो स्वाभाविक ही है। सत्त का तात्पर्य है नित्य आनंद, चित्त का तात्पर्य है ज्ञान युक्त चेतन आनंद तथा आनंद का अर्थ है सदा के लिए आनंद। अब सदा के लिए आनंद तो तभी मिल सकता है जब हम संसार के आश्रय में न रह कर भगवान के आश्रय में रहें। आनंद तो तभी मिलेगा जब हमें भगवान से प्रेम हो जाए। हम भगवान से प्रेम करेंगे तभी वह हमें अपनाएंगे। भौतिक संस्कार संसार में भी हमें उसी से प्रेम होता है जिसके बारे में हमें जानकारी होती है। वह कौन है? कहां रहते हैं? उनके कर्म कैसे हैं? उनके गुण कैसे हैं? उनका स्वभाव क्या है? उनका खाना -पीना, उठना -बैठना, आचार-व्यवहार जानकर ही हमें उससे प्रेम होता है। अब यदि हमें भगवान से रिश्ता बनाना है, उनका साथी बनना है तो हमें उनका नाम रूप, कर्म, धाम इत्यादि की जानकारी होनी चाहिए।
अब प्रश्न उठता है कि हम उनकी जानकारी कैसे प्राप्त करें । "श्री कृष्ण ही भगवान है।" उनसे ही हमने प्रेम करना है ।भागवत ही एक ऐसा शास्त्र है जिसके द्वारा हम भगवान कृष्ण को जान सकते हैं। श्रीमद् भागवत भगवान का वाङ्ममय रूप है। भगवान की प्रत्यक्ष मूर्ति है। एक बार भगवान विष्णु एवं देवताओं के पुण्यक्षेत्र नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषियों ने श्री सूत जी से कलयुगी जीवों के परम कल्याण का आसान साधन पूछा। उन्होंने कहा चिंतामणि केवल लौकिक सुख दे सकती है, कल्पवृक्ष स्वर्गीय संपत्ति दे सकता है परन्तु गुरु द्वारा दिया हुआ ज्ञान ही हमें भगवान की प्राप्ति करा सकता है।तब उन्होंने श्रीमद् भागवत शास्त्र को ही जीवन के कल्याण का हेतु बताया और कहा कि मन की शुद्धि केवल और केवल यह शास्त्र ही कर सकता हैऔर मन ही मोक्ष का कारण बनता है। साथ ही उन्होंने कहा कि जीव के जब जन्म जन्मांतरों के पुण्य उजागर होते हैं तभी इस शास्त्र की प्राप्ति होती है। देवता भी इसके लिए तरसते हैं ।जब श्री शुकदेव जी महाराज परीक्षित को भागवत पुराण का-ज्ञान दे रहे थे, देवता अमृत कलश लेकर आये और कहने लगे यह अमृत कलश लेलो और बदले में कथामृत की मांग कर रहे थे। भगवान की कृष्ण की लीलाओं के रस से आनंद की अनुभूति होने लगती है ।भगवान ही आनंद है वही नित्य आनंद, चेतन आनंद है तभी उनके जन्म पर "नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की" सबके मुख से यही निकला था।
जब श्री कृष्ण जी स्वधाम लौटने की तैयारी में थे, तब उद्धव जी ने उनसे पूछा आपके वियोग में भक्तजन कैसे रहेंगे। उन्हें बड़ा कष्ट होगा। तब भगवान ने अपनी सारी शक्ति भागवत में रख दी और अंतर्धान हो गए‌ इसीलिए भागवत भगवान की साक्षात शब्दमय मूर्ति है।मलिन मन तथा दुष्ट प्रवृत्ति वाले भी, हृदय से पापी भी भागवत के श्रवण से पवित्र हो जाते हैं। भागवत मेंआत्मदेव ब्राह्मण की कथा से स्पष्ट हो जाता है कि कैसे धुंधकारी जो पापमयी वृत्ति वाला था पवित्र हो गया। भागवत के कुल 12 स्कंध हैं।प्रथम तथा द्वितीय स्कन्द में भागवत के वक्ता शुकदेव जी तथा श्रोता परीक्षित जी के बारे में बताया गया है। शुकदेव जी व्यास जी, जो भगवान के 24 अवतारों में से एक हैं, उनके पुत्र हैं। एक बार भगवान शिव पार्वतीजी को अमर कथा सुना रहे थे। उन्हें नींद आ गई वहीं एक शुक पार्वती के स्थान पर हुंकार भरने लगा। जब शिव को यह ज्ञात हुआ तो उसको मारने के लिए त्रिशूल छोड़ा परंतु वह भागते-भागते सूक्ष्म रूप से व्यास जी की पत्नी के गर्भ में प्रवेश कर गया। वह संसार की माया से इतने भ्रमित हो गए थे कि 12 वर्ष तक मां के गर्भ में रहे। सोचा बाहर आऊंगा तो माया लग जाएगी वह गर्भ में ही निवृत्ति पारायण हो गए थे।जब व्यास जी ने उन्हें आश्वासन दिलाया तब वह गर्भ से बाहर आये ।तब व्यास जी ने उन्हें भागवत का उपदेश दिया। भागवत सुनने के बाद वे भागवत के गुणों से इतने प्रभावित हुए कि वह स्वयं ही वक्ता बन गए। इसके पश्चात राजा परीक्षित के जन्म, कर्म, मोक्ष की कथा का वर्णन है। राजा परीक्षित पांडव अर्जुन के पोते तथा अभिमन्यु के पुत्र थे। जब परीक्षित माता उत्तरा के गर्भ में थे, तब अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र द्वारा उन्हें मारने की कोशिश की तब श्री कृष्ण ने गर्भ में उनकी रक्षा की। जब पांडवों द्वारा परीक्षित को राज सिंहासन प्राप्त हुआ कलयुग आरंभ हो गया था। सतयुग के चार चरण तप, पवित्रता, दया तथा सत्य में से केवल सत्य ही शेष बचा था। परंतु असत्य से पुष्ट हुआ कलयुग उसे भी समाप्त करना चाह रहा था।तब परीक्षित ने कलयुग को मारने के लिए तीक्षण तलवार उठाई।वह विनय करने लगा मुझे मत मारो मैं यहां से निकल जाता हूं ।मुझे रहने के लिए स्थान बताएं। राजा परीक्षित ने चार स्थान बताये। जूआखाना, मद्यपान, वैश्यालय तथा हिंसक स्थान। उसने प्रार्थना की यह तो सभी गलत है कुछ तो अच्छा स्थान दो। तब अशुद्ध कमाई से जो स्वणृ प्राप्त हो उसमें स्थित होने के लिए कहा। एक बार आखेट जाने लगे तो सिर पर एक मुकुट धारण किया जिसमें कलयुग का प्रभाव था।उससे उनकी बुद्धि दूषित हो गई तो उन्होंने शमीक ऋषि के गले में मरा हुआ सांप डाल दिया वह समाधि में लीन थे। तब उनके पुत्र श्रृंगी ऋषि ने क्रोध में आकर उन्हें श्राप दिया। श्राप मिलते ही उन्हें समझ आ गई कि मैंने घोर पाप किया है क्योंकि उन्होंने मुकुट उतारा तो कलयुग का प्रभाव समाप्त हो गया‌ था। उसी समय राजसी वस्त्र उतार कर अपने पुत्र को राज्य सौंप कर गंगा जी के दक्षिणी तट पर उत्तर मुख होकर बैठ गए और श्री कृष्ण भक्ति में लीन हो गए। वहीं पर शुकदेव जी का आगमन हुआ। उन्होंने शुकदेव जी से एक प्रश्न किया कि आप कृपा करके मुझे बताइए कि" प्राणी के क्या कर्तव्य हैं , उसे किसका श्रवण करना चाहिए ,किस देवता का जाप करना चाहिए,किन किन बातों का त्याग करना चाहिए।"
यही प्रश्न हम सब जीवों के हैं ।उनके उत्तर हमें केवल भागवत शास्त्र ही दे सकता है। द्वितीय स्कन्ध में हमें इन्हीं प्रश्नों के उत्तर मिलगे। द्वितीय स्कंध में हमें भागवत पुराण के 10 लक्षणों के बारे में बताया गया है सर्ग,विसर्ग,स्थान ,पोषण, ऊति, मन्वंतर ,ईशानु कथा ,निरोध, मुक्ति ,और आश्रय।सर्ग विषय में हमारे शरीर के 24 तत्वों की उत्पत्ति बताई गई है।विसर्ग में ब्रह्मा जी के द्वारा विभिन्न सृष्टियों की उत्पत्ति का वर्णन है। सृष्टियों को मर्यादा में स्थिर रखने के लिए भगवान विष्णु की श्रेष्ठता को दर्शाया गया है। मर्यादित सृष्टि में जो भगवान कृपा करते हैं उसको पोषण कहा गया है। मन्वन्तरों केअधिपति जो धर्म का अनुष्ठान करते हैं उन्हें मन्वन्तर कहा गया है ।जीवो की वो वासनाएं जो जीव को बंधन में डालती है ऊति कहा गया है। भगवान के 24 अवतारों की कथाओं को इशानु कथा कहा गया है। भगवान का योग निद्रा स्वीकार कर के शयन करते हुए लीन हो जाना निरोध है। अनात्मभाव का त्याग करके परमात्मा में स्थित होना मुक्ति है। चराचर जगत की उत्पत्ति तथा प्रलय जिस तत्व से प्रकाशित होते हैं वह परमब्रह्म ही आश्रय है।

द्वितीय भाग :---
तृतीय स्कंध से नौवे स्कंध में भागवत के लक्षण सर्ग,विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वंतर, ईशानू कथा तथा निरोध लक्षणों को विस्तार से समझाया गया है‌। सर्ग में हमारे शरीर की 24 तत्वों को समझाते हुए शरीर की उत्पत्ति की विस्तृत जानकारी दी गई है।विसर्ग में ब्रह्मा जी की सर्वप्रथम उत्पत्ति हुई उसके बाद उनके द्वारा 10 प्रकार की सृष्टियों की उत्पत्ति हुई उनके बारे में बताया गया है।महतत्व,अहंकार ,भूत सर्ग ,इंद्रियों ज्ञानेंद्रियों तथा मन, अविद्या (राग, द्वेष मोह, मद, मत्सर इत्यादि)यह छ: सृष्टियां प्राकृत हैं ।स्थावर वृक्षों की सृष्टि (पेड़ पौधे, लतायेंआदि), त्रियग्योनियां (पशु पक्षी इत्यादि),मनुष्य योनि ,देव सृष्टि (देवता, पितृ, गंधर्व, असुर, यक्ष,सिद्ध ,भूत प्रेत, पिशाच इत्यादि) तत्पश्चात ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि का विस्तार किस प्रकार हुआ बताया गया। सर्वप्रथम अविद्या सृष्टि की उत्पत्ति हुई। किंतु पापमयी सृष्टि को देखकर उन्हें संतोष नहीं हुआ ।फिर योग में चले गए पवित्र होकर फिर उन्होंने चार कुमारों की उत्पत्ति की। सनक, संदन, सनातन, संत कुमार। लेकिन यह निवृत्ति मार्ग के थे ,सृष्टि उत्पत्ति में सहायक नहीं हो सके। तब ब्रह्मा जी को क्रोध आया। उस क्रोध से रूद्र उत्पन्न हुए वह भी उत्पात मचाने लगे। सृष्टि के विस्तार में सहायक ना हो सके। तब भगवान की शक्ति को अर्जित करके उन्होंने 10 पुत्र पैदा किये ।मरीचि, वशिष्ठ ,दक्ष, नारद, अत्री, भृगु,पुलसत्य, पुलह,कृतु। इनके द्वारा ही सृष्टि का विस्तार आरंभ हुआ लेकिन फिर भी प्रजा की वृद्धि नहीं हो पाई। जब वह चिंता मग्न थे ,अकस्मात उनके शरीर के दो भाग हो गए ।उन दोनों भागों से स्त्री पुरुष का जोड़ा प्रकट हुआ जो पुरुष थे वह मनु कहलाए तथा स्त्री शतरूपा कहलाई । मनु तथा शतरूपा की पांच संताने हुई ।तीन पुत्रियां देवहुति, आकूति ,प्रसूति। दो पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद ।देवहुति का विवाह कर्दम ऋषि के साथ हुआ। उनकी 10 पुत्रियां थी तथा एक पुत्र कपिल भगवान थे ।10 पुत्रियों द्वारा सृष्टि का विस्तार होने लगा। प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुआ ।उनकी 24 कन्यायें थी उनसे सृष्टि का विस्तार होने लगा। उनकी एक और पत्नी थी वीरणी उनसे उनकी 60 कन्याएं उत्पन्न हुई जिससे सृष्टि का निरंतर विकास होने लगा ।तीसरी पुत्री आकूति का विवाह प्रजापति रूचि के साथ हुआ। उनकी लड़की दक्षिणा के 12 पुत्र हुए जिनके द्वारा सृष्टि का विस्तार हुआ।इस प्रकार उत्तानपाद का विवाह सुनीति तथा सुरुचि से हुआ। सुनीति के पुत्र ध्रुव थे उनके वंश द्वारा भी सृष्टि विस्तार में बहुत सहायता मिली। तत्पश्चात भिन्न भिन्न मन्वन्तरों में सृष्टि का लगातार विस्तार होने लगा। अलगअलग मन्वन्तरों में विशेष घटनाओं तथा पात्रों की जानकारी मिलती है। दक्ष पुत्री दिती तथा कश्यप ऋषि द्वारा हिरण्यकश्यप तथा हिरण्याक्ष का जन्म तथा उनकी मृत्यु का प्रसंग। दक्ष पुत्री सती का अग्नि प्रवेश। ध्रुव की कथा,तथा ध्रुव वंश के राजा पृथु की कथा प्रियव्रत वंश के ऋषभदेव के 100 पुत्रों की कथा। 9 पुत्र योगेश्वर थे ।महाराज भरत भी उनके पुत्र थे जिनके नाम से भारत नाम पड़ा। नरकों की विभिन्न गतियां का भी वर्णन है। गजेंद्र मोक्ष की कथा जो हमें स्पष्ट करती है हर घटना के पीछे कोई ना कोई पूर्व जन्म का संबंध होता है। गजेंद्र पूर्व जन्म में एक राजा था वह भगवान का श्रेष्ठ उपासक था उन्हें वैराग्य हो गया तो तपस्वी वेश में मौन बैठे थे तभी अगस्त मुनि वहां से गुजरे उन्होंने उठकर स्वागत नहीं किया तब उन्होंने श्राप दिया कि ब्राह्मण का अपमान करने वाला हाथी के समान जड़ बुद्धि है इसलिए उसे हाथी की योनि मिली ।जो ग्राह था ,वह भी" हूं हू,"नाम का एक श्रेष्ठ गंधर्व था , उसे भी देवल ऋषि ने श्राप से ग्रस्त किया हुआ था। समुद्र मंथन की कथा ,राजा बलि की कथा, राजा अमरीश की कथा, मांधाता तथा शोभरी ऋषि की कथा, भागीरथ चरित्र इत्यादि की पूरी जानकारी बतायी गई है। भगवान का वामन अवतार लेकर बली से देवों का हित करना, मोहिनी अवतार लेकर देवो को अमृत दिलाना, मत्स्यावतार लेकर प्रलयकाल में रक्षा करना इत्यादि का विवरण है।सूर्यवंश में भगवान राम की लीलाएं का वर्णन, राजा निमि के वंश का वर्णन,चंद्रवंश में राजा परशुरामजी का चरित्र, राजा ययाति की कथा पर भी प्रकाश डाला गया है।

30/10/2024

WISH YOU A VERY HAPPY DIWALI!

We all light our houses on Diwali. Do spend some time today to light five lamps inside you and sit in silence for sometime because THE MOST SIGNIFICANT SPIRITUAL MEANING BEHIND IT IS THE AWARENESS OF THE INNER LIGHT OR THE ATMA.
Light the first lamp inside you and let it burn your ANGER. Light the second lamp and let it burn away UNWANTED GREED AND DESIRE. According to Geeta ANGER, GREED AND DESIRE ARE THE THREE WAYS TOWARDS HELL. Light the third lamp and let it fade all insecurities that you may have in your mind related to any thing. Light the fourth lamp and move around your body let it burn away all your discarded cells. Light the fifth lamp, consider it as divine light and let it move along around your body, let the love and warmth fill inside you.

DIWALI IS THE FESTIVAL OF LIGHT. IT IS THE VICTORY OF LIGHT OVER DARKNESS.
SO ENJOY THE VICTORY.
GOOD WISHES TO ALL MY BELOVED.

01/10/2023

------:गीता सार :-----
पंचम भाग:-------
गीता सार के प्रथम, द्वितीय, तृतीय भाग, तथा चतुर्थ भाग में" भगवत् गीता" के पहले अध्याय से 17वें अध्याय तक का सार बताया गया था। अब पंचम भाग में 18वें अध्याय का सार बताया जाएगा।
पहले अध्याय से 17वें अध्याय के समापन तक पहुंचते पहुंचते अर्जुन के मन पर जो मोह की परतें जमा हो गई थी, धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही थी। उसे सत्य तथा असत्य का भेद नजर आने लगा था। अब भगवान से प्रश्न किया कि "अब मुझे बताइए कि क्या करूं ताकि इस स्थिति से बाहर निकल सकूं।" विकट स्थिति से बाहर आना ही मोक्ष" है। यहीं से गीता का 18वां अध्याय "मोक्ष -सन्यास- योग" प्रारंभ होता है। यह अध्याय कर्म- योग, ज्ञान- योग तथा भक्ति -योग का मिश्रित अध्याय है। त्याग सहित तप ,यज्ञ, दान ,भक्ति से कर्म करना ही निष्काम कर्म होगा।इसी से गुणातीत होकर हम मोक्ष की तरफ कदम बढ़ाएंगे। सर्वप्रथम उन्होंने त्याग को तीनों गुणों सहित बताया। "कर्तव्य ही है "ऐसा समझकर जो फल तथा संग का त्याग करके नियत कर्म करता है वह सात्विक त्याग है। हर देहधारी समस्त कर्मों के त्यागने में समर्थ नहीं है ।इसलिए जो कर्म फल का त्यागी है वही सच्चा त्यागी है। अब कृष्ण अर्जुन को कर्म का राज समझाने जा रहे हैं। कर्म कैसे सिद्ध हो सकता है?
कर्म के पांच हेतु अधिष्ठान( क्षेत्र) कर्त्ता ,करण (तनो इंद्रियां )नाना प्रकार की चेष्टाएं( वासना तथा अन्य वृत्तियां) तथा दैव (ईश्वरीय नियम विधाता का विधान) है। इनमें से कोई भी हमारे हाथ में नहीं है ।तन जो क्षेत्र है वह हमारे हाथ में नहीं, कर्त्ता का कोई योगदान नहीं क्योंकि प्रकृति कर्म करवा रही है। करण की रचना जीव ने नहीं की ।चेष्टाएं गुणों पर आधारित हैं ।दैव ही रचना करता है, परिस्थितियों बनाता है ,वह भी हमारे हाथ में नहीं ।इन पांच के मिलने पर ही कर्म संभव है। कार भी तभी चलेगी जब पांच हेतु होंगें ।गाड़ी का मालिक अधिष्ठाता, ड्राइवर कर्त्ता ,गाड़ी करण, ड्राइवर की क्रिया चेष्टाएं तथा पेट्रोल दैव । इसलिए "जो मैं कर्त्ता हूं "समझ कर कार्य करता है वह यथार्थ को नहीं देखता ।जो अपने कर्त्ता नहीं समझता वह पापों में नहीं बंधता।
हर कार्य करने के तीन प्रकार के प्रेरक हैं ज्ञान,ज्ञेय तथा ज्ञाता। जानने वाला ज्ञाता, जिसके द्वारा जाना जाए ज्ञान, जानने योग्य वस्तु ज्ञेय।इन तीनों के मिलने पर कार्य करने की इच्छा जागृत होती है। कार्य ,करण और कर्तव्य यह तीन कर्म को भलिभांति करने के अंग हैं।
अब भगवान ज्ञान ,कर्म तथा कर्त्ता को भी गुणों के आधार पर बताने जा रहे हैं ।जिस ज्ञान द्वारा जीव सब भूतों में एक अविनाशी भाव को देखा है वह सात्विक ज्ञान है। जो तन को ही परिपूर्ण समझकर नित्य आसक्त रहते हैं वह तामसिक ज्ञान है ।जो संपूर्ण भूतों में विभिन्न प्रकार के पृथक पृथक भाव देखते हैं वह राजसिक ज्ञान है।जो कर्म स्वधर्म अनुसार, शास्त्र अनुसार ,जीवन यज्ञमय बनाने के लिए, आत्मवान बनने के लिए किए जाएं वह सात्विक कर्म हैं। ऐसे कर्म निष्काम होते हैं ।जो कर्म लोभ पूर्ति ,तृष्णा पूर्ति ,स्वार्थ पूर्ति ,दंभ पूर्ति तथा अपनी स्थापना के लिए होते हैं वह राजसी होते हैं। जो कर्म मोह से आरंभ किया जाए, कर्म -परिणाम, हिंसा, सामर्थय का विचार न रखकर किया जाए वह तामसी कर्म होते हैं। जो कर्त्ता कर्मों की आसक्ति से मुक्त है, अहंकारी नहीं है, धृति तथा उत्साह से पूर्ण है ,सिद्धि असिद्धि को नहीं देखता सात्विक कर्त्ता है। जो राग से युक्त है, कर्म फल की चाहना वाला है, लोभी है वह राजसी कर्त्ता है ।जो कर्त्ता अव्यवस्थित चित्त वाला हो,कुसंस्कारी, घमंडी ,आलसी, द्रोही है वह तामस कर्त्ता है ।
इसके पश्चात भगवान ने बुद्धि तथा धृति को कार्य में ईंधन तथा शक्ति की तरह प्रेरक बताया। बुद्धि तथा धृति को भी तीन गुणों में समझाया।जो बुद्धि कर्तव्य-अकर्तव्य, निवृत्ति- प्रवृत्ति, बंधन- मोक्ष,भय-अभय को जानती है सात्विक है। जो बुद्धि धर्म-अधर्म ,कर्तव्य -अकर्तव्य को यथार्थ नहीं जानती वह राजसिक बुद्धि है ।जो बुद्धि अधर्म को ही धर्म मानती है ,सभी अर्थों को विपरीत जानती है वह तामसी बुद्धि है। धृति से तात्पर्य है धारण करना। जिस धारण शक्ति से जीव ध्यान- योग द्वारा मन ,प्राण इंद्रियों की क्रियाओं को धारण करता है वह सात्विक धृति है। जिस धृति द्वारा जीव अपनी आसक्ति अनुसार फल की इच्छा वाला कर्म तथा उसके अर्थों को धारण करता है राजसिक धृति है ।जिस धारण शक्ति द्वारा जीव निंदा, भय,शोक, चिंता को धारण करता है वह तामसी धृति है।
अब हमें किए गए कर्मों से सुख कैसा प्राप्त होता है उस पर चर्चा करते हैं। जो कर्म पहले विष समान लगता है फिर उसके पश्चात अमृत समान लगने लगे उसके द्वारा उसे सात्विक सुख मिलता है। यह आत्म बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होता है ।जो कर्म पहले अमृत तुल्य और बाद में विष समान लगे उससे जो सुख प्राप्त होगा वह राजसी सुख होगा। यह इंद्रियों का विषयों से सहयोग के कारण होता है। जो कर्म प्रारंभ तथा परिणाम दोनों में मोहित करने वाला हो उसे प्राप्त सुख तामसी होगा ।वह निद्रा, प्रमाद तथा आलस्य से होता है।
भगवान कहते हैं संसार में ऐसा कुछ भी नहीं जो त्रिगुण पूर्ण ना हो। इन्हीं गुणों के आधार पर ही वर्णों का वर्गीकरण हुआ। ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय , शूद्र।किसी भी व्यक्ति के कर्म ,अहंकार, ज्ञान ,बुद्धि, धृति इत्यादि को समझ कर उसके वर्ण का मूल्यांकन हो जाता है ।आगे भगवान चारों वर्णों का गुणों सहित वर्णन करते हैं।
अपने-अपने कर्मों द्वारा ही मनुष्य सिद्धि पाता है कोई भी कम न्यून या उच्च नहीं होता।अपने वर्ण द्वारा न्यून गुण वाले कर्म की श्रेष्ठता दूसरों के धर्म से श्रेष्ठ मानी गई है।हर कर्म किसी न किसी दोष से आवृत्त होता है ।धुएं से अग्नि का भी तेज धूमिल पड़ जाता है। तत्पश्चात उन्होंने कुछ विशेष गुणों की व्याख्या की जिसको धारण करके मनुष्य के अंदर ब्रह्म भाव उत्पन्न हो सकते हैं। जिसमें विशेष हैं "देहात्म बुद्धि का त्याग, अहंकार, काम, क्रोध, लोभ, मोह,मद, मत्सर,ईर्षा, द्वेष जैसी भावनाओं से अप्रभावित होकर अंत:करण को हमेशा शुद्ध रखने का प्रयास, धर्म पालन के लिए कष्ट सहना ,क्षमा करना, मन इंद्रियों को सरल रखना, वेद शास्त्र तथा ईश्वर में श्रद्धा रखना ,शास्त्रों के पठन पाठन द्वारा परमात्व तत्व का अनुभव करना इत्यादि"।यह सभी दैवी गुण है जो दैवी संपदा को बढ़ाते हैं। इन गुणों को हम "समबुद्धि के योग के अवलंबन"से ही धारण कर सकते हैं ।"बुद्धि का द्वंदों के प्रति सम होना ही सम बुद्धि योग" है ।यह तभी संभव होगा जब जीव गुणातीत होने लगेगा ।सिद्धि-असिद्धि से प्रभावित नहीं होगा।
सम बुद्धि का अवलंबन कैसे प्राप्त होगा? भगवान कह रहे हैं तू मुझ में ही चित्त लगाने वाला बन।हर कोई पूर्वकृत स्वभाव से बंधा हुआ परवश होकर कर्म करता है। तू कर्म करेगा या नहीं इसका फैसला तेरा नहीं है ।जब ऐसी सोच से कर्म करोगे तो परमात्मा का दया रूपी प्रसाद प्राप्त कर अवश्य शांति को प्राप्त होवोगे।
यह तभी संभव होगा जब हम 18वें अध्याय के 65वें श्लोक को समझकर जीवन यापन करेंगे ।इस श्लोक में उन्होंने प्रतिज्ञा दी है कि" यदि तू मुझ में मनवाला होगा, मेरा भक्त होगा ,मेरा पूजन करने वाला होगा, मुझे ही प्रणाम करेगा, तब तू मुझको ही प्राप्त होगा यह मैं सत्य प्रतिज्ञा करता हूं "।जिसके साथ मन का संग होगा उसके गुण आप में बहने लगेंगे। शराबी का संग तुम्हें शराब में डुबो देगा। जिसके भक्त होंगे उसका ध्यान हमेशा तुम्हारे मस्तिष्क में छाया रहेगा ।प्रणाम हम तभी करेंगे जब उसके प्रति श्रद्धा होगी। श्रद्धा होगी तो उसके गुणों का प्रभाव होगा। उसके पूजन करने से तात्पर्य है उनकी कथनी पर विश्वास करके उनके हिसाब से चलना ।इन सब भावों को आगे श्लोक 66वें में कह रहे हैं ,"सभी धर्मों को छोड़कर एक मुझ परमेश्वर की शरण ग्रहण कर, तुझ पर किसी भी कर्म का कोई पाप नहीं चढ़ेगा "।
अंत में एक तथ्य और स्पष्ट करना चाह रहे हैं यदि इन श्लोक द्वारा विपरीत असर होता है कि कैसे भगवान है कह रहे हैं सब धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ तो उनके सामने गीता ज्ञान की चर्चा करना व्यर्थ है और साथ ही कह रहे हैं जो श्रद्धावान इस संवाद को समझकर आचरण में उतारता है और दूसरों को भी समझाता है उससे बढ़कर और कोई कर्म नहीं हो सकता ।जहां पर भी ऐसा संवाद सुना जाता है और समझाया जाता है वहां एक ऐसा यज्ञ हो रहा होता है जिसके द्वारा में पूजित होऊंगा और वह मुक्त होकर शुभ लोकों को प्राप्त होगा।ऐसा समझाने पर अर्जुन के सारे संशय दूर हो गए और कहने लगा अब आप जैसा कहोगे मैं वैसा ही करूंगा और अपने स्वाभाविक कर्म "आततायियों का विनाश कर धर्म की स्थापना करना "की पालना के लिए तत्पर हो गए। जहां पर भी "श्री कृष्ण जैसे योगेश्वर भगवान हैं और अर्जुन जैसे धनुर्धारी हैं वहां श्री, विजय, विभूति और अचल नीति हाथ पसारे स्वागत के लिए खड़ी मिलेगी।"
अतः कल्याण चाहने वाले जीवों को चाहिए वह श्रद्धा तथा भक्ति पूर्ण गीता का श्रवण तथा मनन करें ताकि उनके अंतःकरण में नित्य नए-नए परमानंद दायक और दिव्य -भावों की स्फुरणायें होती रहे और इस प्रकार वे सर्वथा शुद्धान्त:करण होकर भगवान की अलौकिक कृपा सुधा का रसास्वादन करते हुए अपने लक्ष्य आनंद प्राप्ति की ओर अग्रसर होते हुए भगवान को प्राप्त हो सकें। अति दुर्लभ मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर अपने अमूल्य समय का एक क्षण भी दुखमूलक, क्षणभंगुर भोगों को भोगने में नष्ट करना उचित नहीं है।
ओइम् नमो भगवते वासुदेवाय नमः
शुभकामनाओं सहित
कमला वाधवा

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