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सबसे पहले उत्पन्न हुए भगवान विश्वकर्माविश्वकर्माऋग्वेद और यजुर्वेद के अलावा महाभारत , वायु पुराण, स्कंद पुराण आदि में भग...
05/03/2022

सबसे पहले उत्पन्न हुए भगवान विश्वकर्मा

विश्वकर्मा
ऋग्वेद और यजुर्वेद के अलावा महाभारत , वायु पुराण, स्कंद पुराण आदि में भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि का निर्माता बताया गया है। ऋग्वेद में 11 ऋचाएं हैं। इन ऋचाओं में एक ऋषि और मंत्रदृष्टा बताया गया है ।
एक ऋषि होने के साथ साथ ऋग्वेद में विश्वकर्मा को ब्रह्मा की जगह आदि देवता माना गया है और सृष्टि के निर्माण की बात कही गई है ।
ऋग्वेद के सूक्तो के मुताबिक विश्वकर्मा की नाभि से ही हिरण्यगर्भ की उत्पत्ति होती है जिससे सृष्टि का निर्माण होता है। सूक्तो के मुताबिक ऐसे देवता के रुप में की गई है जिनके शरीर के हरेक अंग में कई भुजाएं औऱ कई आंखे हैं।
विश्वकर्मा से ही ऋग्वैदिक देवता त्वष्टा की उत्तपत्ति होती है जिनसे सृष्टि की सभी वस्तुओं का जन्म होता है। ऋग्वेद और अन्य वेदों में बाद में यही बातें ब्रह्मा के लिए कही गई हैं। यजुर्वेद में को प्रजापति और अर्थववेद में उनको पशुपति कहा गया है । प्रजापति शब्द बाद में ब्रह्मा के लिए और पशुपति उपाधि बाद में शिव के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है।
ब्रम्हा से भी पहले जन्म हुआ

ऋग्वेद में ऋचाएं उसके प्राचीन भागों से ही मिलती है जबकि ब्रम्हा की स्तुति नासदीय सूक्त ऋग्वेद में अंतिम भाग में आता है। श्वेताश्वरोपनिषद् में श्लोक को निरालंब स्वयंभू देवता कहा है जिन्होंने खुद की ही बलि देकर इस सृष्टि की रचना की ।

वैदिक ग्रंथो में विश्वकर्मा को नारायण भी कहा गया है। मूलस्तंभ पुराण के मुताबिक विश्वकर्मा उस वक्त से विराजमान है जब न सृष्टि थी और न ही काल की उत्पत्ति हुई थी। विश्वकर्मा के ही द्वारा इस ब्रम्हांड की उत्पत्ति हुई है। इस हिसाब से विश्वकर्मा ब्रह्मा, विष्णु और शिव से भी पहले उत्पन्न हुए हैं।

विश्वकर्मा क्यों नहीं रहे सर्वोच्च ईश्वरीय सत्ता

जब ऋग्वेद में आदि देव बताया गया है और उन्ही की नाभि से हिरण्य की उत्पत्ति बताई गई है तो फिर आज सर्वोच्च और प्रथम देवता का दर्जा क्यों हासिल नहीं है ?

दरअसल वैदिक युग के विपरीत आरण्यक, उपनिषदों, रामायण और महाभारत के कालों में विश्वकर्मा, इंद्र , वरुण , मित्र आदि देवताओं का स्थान पहले से कमजोर हो गया और विष्णु , शिव और ब्रह्मा को सर्वोच्च ईश्वरीय सत्ताओ के रुप में मान्यता मिली ।

बदलती गईं देवताओं की शक्तियां

इस क्रम में वैदिक देवताओं की शक्तियों का भी इन त्रिदेवों के बीच हस्तांतरण कर दिया गया । विष्णु को इंद्र, वरुण और सूर्य ( पहले इंद्र, सूर्य, वरुण और विष्णु 12 आदित्यों में एक थे ) की सारी शक्तियां मिल गईं। इसी प्रकार विश्वकर्मा और प्रजापति की शक्तियां ब्रह्मा जी के पास चली गईं जबकि रुद्र और मरुतगणों की शक्तियों को भगवान शिव में समाहित कर दिया गया ।

विष्णु ने ले ली इंद्र, सूर्य और वरुण की शक्तियां

पौराणिक काल तक आते आते भगवान विष्णु सर्वोच्च ईश्वर के रुप में प्रतिष्ठित होते हैं। जहां वैदिक युग में विष्णु का जिक्र ऋग्वेद के प्रथम मंडल की सिर्फ एक ऋचा में है वहीं इंद्र, वरुण और सूर्य को सैकड़ों ऋचाएं समर्पित थीं।

वैदिक युग में इंद्र युद्ध और विजय के देवता हैं। उनके पास वज्र हैं और अपने इंद्रजाल से वो असुरों और पणियों का संहार कर आयों की रक्षा करते हैं। वरुण विष्णु की तरह संसार के चक्र को नियमित रुप से चलाते हैं । सूर्य पालक देवता हैं जो अन्न और जल उत्पन्न करते हैं जिससे सृष्टि का पालन होता है । लेकिन पौराणिक काल आते आते इन सभी देवताओं के अधिकार विष्णु भगवान में समाहित हो जाते हैं ।


इंद्र के पास संहारक वज्र था तो विष्णु के पास चक्र आ गया । इंद्र के पास असुरों को भ्रमित करने के लिए इंद्रजाल था तो विष्णु के पास दैत्यों को भ्रमित करने के लिए माया है । इंद्र का सिंहासन अस्थिर था तो विष्णु अच्युत यानि अपने पद से च्युत या अस्थिर नहीं होने वाले बने । विष्णु के पास वरुण की सृष्टि के नियमन वाली शक्ति आ गई और सूर्य की तरह जगत के पालक बन गएं ।

शिव कैसे बने संहार के देवता

शिव के पास रुद्र और मरुतगणों की संहारक शक्ति आ गई । पूषण जो पशुओं के देवता थे उनकी शक्ति भी शिव के पास आ गई और शिव पशुपति कहलाये । हालांकि ऋग्वेद में पशुपति कहा गया है तो इस हिसाब से पशुपति की उपाधि भी भगवान शिव के पास हस्तांतरित हो गई ।

ब्रम्हा को मिल गई विश्वकर्मा की शक्तियां

समस्त सृष्टि के रचयिता हैं भगवान विश्वकर्मा
ऋग्वेद में आदि देवता कह कर उनकी वंदना की गई है । कई परवर्ती ग्रंथों में उन्हें नारायण, ब्रह्मा , प्रजापति आदि कह कर उनकी स्तुति की गई है । इन्ही को को ही सृष्टि का रचयिता कहा गया है । लेकिन ऋग्वेद के दशम मंडल से ही इंद्र , वरुण, सूर्य के सात साथ विश्वकर्मा जी की भी स्थिति में परिवर्तन हो जाता है ।

हिरण्यगर्भ से हुई सृष्टि की उत्पत्ति

ऋग्वेद के ऋचाओं में तो सृष्टि की उत्पत्ति हिरण्यगर्भ से बताई गई है जिसका वर्णन नासदीय सूक्त में मिलता है । हिरण्यगर्भ भगवान विश्वकर्मा की नाभि से प्रगट होता हैं और सारी सृष्टि का निर्माण हिरण्यगर्भ से ही करते हैं । विश्वकर्मा से ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इंद्र सभी की उत्पत्ति बताई गई है ।

ऋग्वेद के दशम मंडल से बदली स्थितियां

लेकिन ऋग्वेद के दशम मंडल की ऋचाओं की रचना जो बहुत बाद के काल में की गई थी उससे पूरी स्थिति बदल जाती है । ऋग्वदे में जिस परम पुरुष के शरीर से सभी देवताओं और वर्णों की उत्पत्ति बताई गई है उन्हें प्रजापति , परम पुरुष और ब्रह्मा आदि उपाधियों से पुकारा गया ।

परम पुरुष का आविर्भाव

दशम मंडल से सृष्टि की उत्पत्ति विश्वकर्मा की नाभि से निकले किसी अस्पष्ट आकार वाले हिरण्य के पिंड से न होकर एक पुरुष से हो गई। इस पुरुष की ईश्वरीय सत्ता को अपना नाम देने के लिए कई संप्रदायों ने दावा किया।
वैष्णवों के अनुसार वो ‘परम पुरुष’ नारायण विष्णु हैं। तो शैवों के अनुसार वो सदाशिव हैं जिनसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि निकले हैं।
ब्राहम्ण ग्रंथो ने उस परम पुरुष को ब्रह्मा से जोड़ दिया और ब्रह्मा जी को सृष्टि का रचयिता बना दिया । ब्रह्मा से ही विष्णु, शिव सहित सारी सृष्टि का निर्माण हुआ सभी वर्णों की उत्पत्ति हुई। सृष्टि निर्माण और रचने की शक्ति भी ब्रह्मा जी में ही समाहित कर दी गई।
ब्रह्मा जी को विश्वकर्मा जी की सारी शक्तियां मिलते ही देवमंडल में विश्वकर्मा जी का स्थान सृष्टि के रचयिता से हट कर महज नगरों, आयुधों, शिल्पों आदि के निर्माता के रुप में हो गया । हालांकि अभी भी उनका कार्य निर्माण ही था लेकिन सृष्टि का निर्माण नहीं बल्कि नगरों, और वस्तुओं का निर्माण ।
इसके बाद पुराणों में उनकी स्थिति को लेकर भ्रम की स्थिति हो गई। अब चूंकि वो आदि और स्वयंभू ( स्वयं से उत्पन्न ) ईश्वर नहीं रह गए इसलिए उन्हें भी जन्म लेने वाला देवता बनाना था । इसी वजह से बाद के ग्रंथों में विश्वकर्मा के जन्म और उनके वंश को लेकर सारी अस्पष्ता आ गई। इसके बाद एक नहीं कई विश्वकर्मा हो गए जो अलग अलग कुलों से संबधित बताए जाने लगे।
हालांकि ऋग्वेद में विश्वकर्मा ही सृष्टि के रचयिता हैं और उनके हमनाम एक ऋषि भी हैं जिन्होंने कई सूक्तों की रचना की है । लेकिन ईश्वर के रुप में एक ही विश्वकर्मा हैं जो हिरण्यगर्भ से प्रगट हुए हैं।
लेकिन बाद के ग्रंथों में जब विश्वकर्मा जी की सारी शक्तियां ब्रह्मा जी को हस्तांतरित कर दी गईं तब इन ग्रंथों में भुवन, ऋषि, और शिल्पी विश्वकर्मा का जिक्र बार बार आता है। ऋग्वेद की ऋचाओं का ज्ञाता बताया गया है।
एक अन्य विश्वकर्मा हैं जिन्हें प्रभास या शिल्पी विश्वकर्मा भी कहा गया है। ऋषि प्रभास (अंगिरा पुत्र) और बृहस्पति की पुत्री योगसिद्धा के पुत्र ही ऋषि विश्वकर्मा हैं जिन्होंने स्थापत्य वेद या वास्तुवेद की भी रचना की है। इसी लिए विश्वकर्मा को वास्तुकला का देवता माना जाता है।
एक अन्य कथा भी है कि वैदिक देवता या ब्रह्मा से भी पहले हुए शिल्पी के पांच चेहरे थे। इन पांच चेहरों से पांच महान पुरुष पैदा हुए जिनके नाम मनु, माया, त्वस्ट्रा, शिल्पी और विवस्वान हैं। इस कथा को ही बाद में ब्रह्मा के पांच चेहरों से उत्पन्न इन पांचों पुरुषों के साथ जोड़ दिया गया है औऱ दिखाया गया है कि शिल्पी विश्वकर्मा उनसे उत्पन्न पांच पुत्रो में से एक है जिन्होंने वास्तुकला का निर्माण किया।
ये भी कहा जाता है कि जिस प्रकार ब्रह्मा के शरीर से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रों का जन्म हुआ उसी प्रकार शूद्र कन्यों से विवाह कर कई शिल्पी जातियों को जन्म दिया।
अब चाहे तो शिल्पी को ब्रम्हा का पुत्र मानें या फिर ऋषि प्रभास का पुत्र मानें लेकिन ये तय है इन्होनें समस्त नगरों के निर्माण, खेती की शुरुआत कराने, सभी यंत्रों का निर्माता, सभी अस्त्रों का निर्माता और शिल्पवेद का रचयिता माना जाता है।
कृषि क्रांति के पिता

इनके ही पांचों पुत्रों जिन्हें पंच ऋषि कहा जाता है उनकी प्रार्थना के फलस्वरुप शिल्पी ने हल का निर्माण किया था। हल लकड़ी और लोहे से मिल कर बनी होती है जिससे खेती की शुरुआत हुई औऱ सभ्यताओं का निर्माण हुआ।

सभ्यताओं के निर्माता

सभ्यताओ का निर्माण होने से ही नगरों, तकनीकियों और यंत्रो और अस्त्रो का निर्माण हुआ। मतलब यह है कि शिल्पी ये ही सभ्यता के असली निर्माता हैं। इंद्र के वज्र, शिव के धनुष, विष्णु के चक्र के और समस्त तकनीकों को जन्म देने वाले हैं।

किस भगवान विश्वकर्मा ने क्या क्या रचा ?

ऋग्वैदिक सूक्तों में जिन आदि पुरुष विश्वकर्मा का जिक्र आया है उन्होंने ब्रम्हांड की रचना की। अंगिरा पुत्र ने ऋग्वेद की ऋचाओं की रचना की और संभवत उन्होंने ही इंद्र के व्रज जैसे अस्त्रों की रचना की। प्रभास पुत्र ने स्वर्ग, सोने की लंका, द्वारिका और इंद्रप्रस्थ जैसे शहर बसाए। यहीवास्तुशास्त्र के पिता हैं ।

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01/01/2022

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26/03/2021

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29/11/2020

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08/06/2020

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