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हाथी शाला - तिरुमाला मंदिर
02/04/2024

हाथी शाला - तिरुमाला मंदिर

गोशाला ( तिरुमाला) - तिरूपति
02/04/2024

गोशाला ( तिरुमाला) - तिरूपति

Seeking blessing from Kshetra Palaka Shiva : Tirumala
02/04/2024

Seeking blessing from Kshetra Palaka Shiva : Tirumala

11/02/2024

रामायण और रामचरितमानस के 10 बड़े अंतर:

वाल्मीकि कृत रामायण और तुलसीदास कृत रामायण में कई बड़े अंतर हैं।
1. काल का अंतर : महर्षि वाल्मीकि जी ने रामायण की रचना प्रभु श्रीराम के जीवन काल में ही की थी। राम का काल 5114 ईसा पूर्व का माना जाता है, जबकि गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरित मानस को मध्यकाल अर्थात विक्रम संवत संवत्‌ 1631 अंग्रेंजी सन् 1573 में रामचरित मान का लेखन प्रारंभ किया और विक्रम संवत 1633 अर्थात 1575 में पूर्ण किया था। एक शोध के अनुसार रामायण का लिखित रूप 600 ईसा पूर्व का माना जाता है।
2. भाषा का अंतर : महर्षि वाल्मीकि जी ने रामायण को संस्कृत भाषा में लिखा था जबकि तुलसीदासजी ने रामचरित मानस को अवधी में लिखा था। हालांकि रामचरितमानस की भाषा के बारे में विद्वान एकमत नहीं हैं। कोई इसे अवधि मानता है तो कोई भोजपुरी। कुछ लोक मानस की भाषा अवधी और भोजपुरी की मिलीजुली भाषा मानते हैं। मानस की भाषा बुंदेली मानने वालों की संख्या भी कम नहीं है।
3. कथा के आधार में अंतर : महर्षि वाल्मीकि जी ने श्रीराम के जीवन को अपनी आंखों से देखा था। उनकी कथा का आधार खुद राम का जीवन ही था जबकि तुलसीदासजी ने रामायण सहित अन्य कई रामायणों को आधार बनाकर रामचरितमानस को लिखा था। यह भी कहते हैं कि उनकी सहायता हनुमानजी ने की थी।
4.श्लोक और चौपाई : रामायण को संस्कृत काव्य की भाषा में लिखा गया जिसमें सर्ग और श्लोक होते हैं, जबकि रामचरित मानस के दोहो और चौपाइयों की संख्या अधिक है। रामायण में 24000 हजार श्लोक और 500 सर्ग तथा 7 कांड है। रामचरित मानस में श्लोक संख्या 27000 है, चौपाई संख्या 4608 है, दोहा 1074 है, सोरठा संख्या 207 है और 86 छन्द है।
5. रामायण से ज्यादा प्रचलित है रामचरित मानस : वर्तमान में वाल्मीकि कृत रामायण को पढ़ना और समझना कठिन है क्योंकि उसकी भाषा संस्कृत है जबकि रामचरित मानस को वर्तमान की आम बोलचाल की भाषा में लिखा गया है। जनामनस की इस भाषा के कारण ही रामचरित मानस का पाठ हर जगह प्रचलित है।
6.राम के चरित्र का अंतर : वाल्मीकि कृत रामायण में राम को एक साधारण लेकिन उत्तम पुरुष के रूप में चित्रित किया है, जबकि रामचरित मानस में पात्रों और घटनाओं का अलंकारिक चित्रण किया गया है। इस चरित्र चित्रण में तुलसीदास ने हिन्दी भाषा के अनुप्रास अलंकार, श्रृंगार, शांत और वीररस का प्रयोग मिलेगा। इसमें तुलसीदासजी ने भगवान राम के हर रूप का चित्रण किया गया है। रामचरित मानस में राम ही नहीं रामायण के हर पात्र को महत्व दिया गया है। सभी के चरित्र का खुलासा हुआ है। तुलसीदासजी ने राम के चरित को एक महानायक और महाशक्ति के रूप में चित्रित किया।
7. घटनाओं में अंतर : वाल्मीकि कृत रामायण और गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस में घटनाओं में कुछ अंतर मिलेगा। जैसे श्रीराम और सीता जनकपुरी में बाग में एक दूसरे को देखते हैं तब सीताजी शिवजी से प्रार्थना करती हैं कि श्रीराम से ही उनका विवाह हो यह प्रसंग तुलसीकृत रामचरित मानस में है वाल्मीकि रामायण में नहीं।
धनुष प्रसंग भी तुलसीकृत रामचरित मानस में भिन्न मिलेगा। अंगद के पैर का नहीं हिलना, हनुमानजी का सीना चीरकर रामसीता का चित्र दिखाना, अहिरावण का प्रसंग यह तुलसीकृत रामचरित मानस में ही मिलेगा। वाल्मीकि रामायण में इंद्र के द्वारा भेजे गए मातलि राम को बताते हैं कि रावण का वध कैसे करना है जबकि तुलसीकृत रामचरित मानस में यह प्रसंग नहीं मिलता। रावण के वध के लिए ह्रदय में उस समय वार करना जब रावण अति पीड़ा से सीताजी के बारे में विचार न कर रहा हो यह विभीषण द्वारा बताया जाना भी तुलसीकृत रामचरितमानस में है जबकि रामायण में नहीं।
वाल्मीकि रामायण में रावण इत्यादि की तप साधना के बारे में विस्तार से वर्णन है जबकि तुलसीकृत रामायण में नहीं। विश्वामित्र द्वारा दशरथ से राम को राक्षसों के वध के लिए मांगने का प्रसंग भी तुलसीकृत रामायण में भिन्न मिलेगा। विश्वामित्रजी से बला और अतिबला नमक विद्या की प्राप्ति का वर्णन भी तुलसीकृत रामायण में नहीं मिलेगा। ताड़का वध प्रसंग प्रसंग भी थोड़ा अलग है।
कैकेयी द्वारा वरदान का वर्णन भी भिन्न मिलेगा। जब भरत श्री रामचन्द्रजी को लेने वन में जाते हैं तो वहां राजा जनक भी पधारते हैं। जनक का उल्लेख तुलसीकृत रामायण में नहीं मिलेगा। इसी तरह और भी कई प्रसंग है जो या तो तुलसीकृत रामचरित मानस में नहीं हैं और है तो भिन्न रूप में।
दरअस, गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरित मानस को लिखने के पहले उत्तर और दक्षिण भारत की सभी रामायणों का अध्ययन किया था। उन्होंने रामचरित मानस में उसी प्रसंग को रखा जो कि महत्वपूर्ण थे। कहते हैं कि रामायण में जो वाल्मीकि नहीं लिख पाए उन्होने वह आध्यात्म रामायण में लिखी थी। तुलसीदानसजी ने कुछ प्रसंग आध्यात्म रामायण से भी उठाएं थे।
8. रामायण और रामचरित मानस का अर्थ : रामायण का अर्थ है राम का मंदिर, राम का घर, राम का आलय या राम का मार्ग, जबकि रामचरित मानस का अर्थ राम के रचित्र का सरोवर। राम के मन का सरोवर। रामररित मानस को राम दर्शन भी कहते हैं। मंदिर में जाने के जो नियम है वही सरोवर में स्नान के नियम है। मंदिर जाने से भी पाप धुल जाते हैं और पवित्र सरोवर में स्नान करने से भी।
9. ऋषि और भक्त की लिखी रामायण : महर्षि वाल्मीकि प्रभु श्रीराम के प्रशंसक जरूर थे लेकिन वे भक्त तो भगवान शिव के थे। उन्होंने शिव की मदद से ही इस रामायण को लिखा था, जबकि तुलसीदासजी प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त थे और उन्होंने स्वप्न में भगवान शिव के आदेश से रामभक्त हनुमान की मदद से रामचरित मानस को लिखा था।
10. कांड : रामचरित मानस में आखिरी से पहले काण्ड को लंकाकाण्ड कहा गया जबकि रामायण में आखिरी से पहले काण्ड को युद्धकाण्ड कहा गया। कहते हैं कि उत्तरकांड को बाद में जोड़ा गया था।🙂🙏

06/12/2023

जय सियाराम जय जय सियाराम
श्रीरामचरितमानस - बालकाण्ड दोहा
संख्या 18 से आगे .
चौपाई :
बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु
हिमकर को ॥
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम
गुन निधान सो ॥
महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु
उपदेसू ॥
महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत
नाम प्रभाऊ ॥
जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध
करि उलटा जापू ॥
सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेईं
पिय संग भवानी ॥
हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन
ती को॥
नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु
दीन्ह अमी को॥
भावार्थ:-मैं श्री रघुनाथजी के नाम 'राम'
की वंदना करता हूँ, जो कृशानु (अग्नि),
भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु
अर्थात् 'र' 'आ' और 'म' रूप से बीज है। वह 'राम'
नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है। वह वेदों
का प्राण है, निर्गुण, उपमारहित और गुणों
का भंडार है ॥ जो महामंत्र है, जिसे महेश्वर
श्री शिवजी जपते हैं और उनके द्वारा
जिसका उपदेश काशी में मुक्ति का कारण
है तथा जिसकी महिमा को गणेशजी
जानते हैं, जो इस 'राम' नाम के प्रभाव से ही
सबसे पहले पूजे जाते हैं ॥ आदिकवि श्री
वाल्मीकिजी रामनाम के प्रताप को
जानते हैं, जो उल्टा नाम ('मरा', 'मरा') जपकर
पवित्र हो गए। श्री शिवजी के इस वचन को
सुनकर कि एक राम-नाम सहस्र नाम के समान
है, पार्वतीजी सदा अपने पति (श्री
शिवजी) के साथ राम-नाम का जप करती
रहती हैं ॥ नाम के प्रति पार्वतीजी के हृदय
की ऐसी प्रीति देखकर श्री शिवजी
हर्षित हो गए और उन्होंने स्त्रियों में भूषण
रूप (पतिव्रताओं में शिरोमणि) पार्वतीजी
को अपना भूषण बना लिया। (अर्थात् उन्हें
अपने अंग में धारण करके अर्धांगिनी बना
लिया)। नाम के प्रभाव को श्री शिवजी
भलीभाँति जानते हैं, जिस (प्रभाव) के
कारण कालकूट जहर ने उनको अमृत का फल
दिया ॥
दोहा :
बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि
सुदास ।
राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास ॥
19॥
भावार्थ:-श्री रघुनाथजी की भक्ति वर्षा
ऋतु है, तुलसीदासजी कहते हैं कि उत्तम
सेवकगण धान हैं और 'राम' नाम के दो सुंदर
अक्षर सावन-भादो के महीने हैं॥19॥
शेष अगली पोस्ट में...
गोस्वामी तुलसीदासरचित
श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा
संख्या 19,

06/12/2023

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवतमहापुराण
षष्ठ स्कन्ध – तेरहवाँ अध्याय (पोस्ट०५)
इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण
तं च ब्रह्मर्षयोऽभ्येत्य हयमेधेन भारत ।
यथावद्दीक्षयां चक्रुः पुरुषाराधनेन ह ॥ १८ ॥
अथेज्यमाने पुरुषे सर्वदेवमयात्मनि ।
अश्वमेधे महेन्द्रेण वितते ब्रह्मवादिभिः ॥ १९ ॥
स वै त्वाष्ट्रवधो भूयानपि पापचयो नृप ।
नीतस्तेनैव शून्याय नीहार इव भानुना ॥ २० ॥
स वाजिमेधेन यथोदितेन
वितायमानेन मरीचिमिश्रैः ।
इष्ट्वाधियज्ञं पुरुषं पुराण-
मिन्द्रो महानास विधूतपापः ॥ २१ ॥
इदं महाख्यानमशेषपाप्मनां
प्रक्षालनं तीर्थपदानुकीर्तनम् ।
भक्त्युच्छ्रयं भक्तजनानुवर्णनं
महेन्द्रमोक्षं विजयं मरुत्वतः ॥ २२ ॥
पठेयुराख्यानमिदं सदा बुधाः
शृण्वन्त्यथो पर्वणि पर्वणीन्द्रियम् ।
धन्यं यशस्यं निखिलाघमोचनं
रिपुञ्जयं स्वस्त्ययनं तथायुषम् ॥ २३ ॥
परीक्षित् ! इन्द्र के स्वर्ग में आ जाने पर ब्रहमर्षियों ने वहाँ आकर भगवान् की आराधनाके लिये इन्द्रको अश्वमेध यज्ञकी दीक्षा दी, उनसे अश्वमेध यज्ञ कराया ॥ १८ ॥ जब वेदवादी ऋषियोंने उनसे अश्वमेध यज्ञ कराया तथा देवराज इन्द्रने उस यज्ञके द्वारा सर्वदेवस्वरूप पुरुषोत्तम भगवान्की आराधना की, तब भगवान्की आराधनाके प्रभावसे वृत्रासुरके वधकी वह बहुत बड़ी पापराशि इस प्रकार भस्म हो गयी, जैसे सूर्योदयसे कुहरेका नाश हो जाता है ॥ १९-२० ॥ जब मरीचि आदि मुनीश्वरोंने उनसे विधिपूर्वक अश्वमेध यज्ञ कराया, तब उसके द्वारा सनातन पुरुष यज्ञपति भगवान्की आराधना करके इन्द्र सब पापोंसे छूट गये और पूर्ववत् फिर पूजनीय हो गये ॥ २१ ॥
परीक्षित् ! इस श्रेष्ठ आख्यानमें इन्द्रकी विजय, उनकी पापोंसे मुक्ति और भगवान्के प्यारे भक्त वृत्रासुरका वर्णन हुआ है। इसमें तीर्थोंको भी तीर्थ बनानेवाले भगवान्के अनुग्रह आदि गुणोंका सङ्कीर्तन है। यह सारे पापोंको धो बहाता है और भक्तिको बढ़ाता है ॥ २२ ॥ बुद्धिमान् पुरुषों को चाहिये कि वे इस इन्द्रसम्बन्धी आख्यान को सदा-सर्वदा पढ़ें और सुनें। विशेषत: पर्वों के अवसर पर तो अवश्य ही इसका सेवन करें । यह धन और यश को बढ़ाता है, सारे पापों से छुड़ाता है, शुत्रुपर विजय प्राप्त कराता है, तथा आयु और मङ्गल की अभिवृद्धि करता है ॥२३॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां
षष्ठस्कन्धे इन्द्रविजयो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
शेष आगामी पोस्ट में --
गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भागवतमहापुराण (विशिष्टसंस्करण) पुस्तककोड 1535 से

06/12/2023

श्रीराधिका का प्रेमोन्माद - अठाईस

( इधर - आहें भरती बृजभूमि )

*********************************

गतांक से आगे -

ललिता धीरे धीरे बढ़ रही है ...श्रीवृन्दावन की ओर ।

किन्तु उसके पाँव बढ़ नही पा रहे ...उसके पाँव मुड़मुड़ कर मथुरा श्रीकृष्ण के पास ही जाना चाह रहे हैं । उसका मन कह रहा है ...ललिते ! कहाँ जा रही है वृन्दावन....अपनी स्वामिनी को क्या वचन देकर चली थी तू ? यही ना कि मथुरा से लेकर आऊँगी श्याम सुन्दर को ? अब जाकर क्या कहेगी कि नही आए श्याम ! इन वचनों से क्या तू लाड़ली के प्राण बचा पाएगी ?

ओह ! वो ललिता बैठ गयी .....उसके देह से स्वेद बहने लगा ....उसको अब घबराहट हो रही है ....उसके सामने उसकी प्राण प्रिय लाड़ली श्रीराधा रानी का ही रूप आरहा है ।

क्या कहूँगी मैं ? वो पूछेंगीं ...ललिता ! कहाँ है मेरे श्याम ! तो मैं क्या उत्तर दूँगी ।

तभी ....कहाँ हैं श्याम ! कहाँ हैं श्याम ! कहाँ हैं श्याम !

ये ध्वनि चारों ओर से ललिता को सुनाई देने लगी ....वो देख रही है चारों ओर ....ये प्रश्न कौन कर रहा है ! ओह ! हिलकियों से रो पड़ी ललिता ....ये प्रश्न वृक्ष कर रहे थे ...लताएँ कर रहीं थीं ...सूखे वृक्ष-लताएँ ..सब हरे हो गये थे मात्र आशा के कारण ....कि ललिता कहकर गयी थी मैं लेकर आऊँगी श्याम सुन्दर को ...इन्हें पूर्ण आशा थी कि ललिता अपने वचन का पालन करेगी ...किन्तु ! ललिता क्या करे ? वो खड़ी हो गयी ...और चारों ओर चिल्लाकर कह रही है ...ललिता क्या करे ...वो नही आये । ओह ! ललिता के मुख से ये सुनते ही वृक्ष वापस सूख गए ...लताएँ तुरन्त सूख गयीं , ललिता के दुःख का पारावार नही है ...किन्तु क्या करे ललिता !

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आज मेरा दाहिना सुर चल रहा है ....मनसुख अपने सखाओं से कह रहा है ।

तो ? सभी ग्वाल सखा मनसुख से पूछते हैं ।

अपने नाक के दाहिने नथुने में हाथ रखते हुए कहता है .....देख ! देख !

इससे क्या होता है ? अन्य ग्वाल सखा मनसुख से पूछ रहे हैं ।

ये सब ग्वाल बाल मथुरा के मार्ग में खड़े हैं ...नित्य की तरह .....अब इनका यही काम रह गया है .....मथुरा मार्ग में खड़े रहना ....और इस प्रतीक्षा में कि ...आज हमारा श्याम आयेगा ।

तुम क्या जानों ...ये स्वर विज्ञान है .....ज्योतिष में इसकी भी मान्यता है ...मनसुख इतना सहज कृष्ण के मथुरा जाने के बाद आज ही हुआ है । वो थोड़ा बहुत हंस भी रहा है ...ग्वाल सखा इसे देखते हैं तो उन्हें भी आशा बंध रही है ।

अच्छा ! पण्डित मनसुख जी ! बता दो ...इस स्वर विज्ञान से क्या होता है ? अब थोड़े थोड़े सब सहज हो रहे हैं । क्या पता ...पण्डित मनसुख लाल की बात सही हो ।

अजी ! प्रेमी लोगों की साँस आस में ही तो टिकी होती है ।

देखो भैया -

मनसुख बताने लगे ....शुभ होता है ..जब आप कुछ प्रश्न सोचो ...और नाक के नथुने को देखो कि साँस कौन सा चल रहा है ....दाहिना चले तो तुम्हारा प्रश्न सही है ....तुम्हारा काज सफल होगा ...और अगर बायाँ स्वर चले तो सफल नही होगा । मनसुख अब गम्भीर हो गया था ...जब से कृष्ण गया है ना मथुरा मैं बस यही देखता रहता हूँ ....आज आयेगा ? नाक की साँस देखता था तो बायाँ ही चलता था .....आज तक कभी दाहिना नही चला ....किन्तु आज ! मनसुख थोड़ा हंसा ....आज ! क्या ? तू कहना चाहता है - कन्हैया आएगा ? हाँ ।

मनसुख ! तू कैसे बोल सकता है इतने आत्मविश्वास से ! मात्र नथुने के साँस की गति को देखकर ? श्रीदामा ने पूछा ।

अरे ! मनसुख भैया काशी के पण्डित हैं ....वहाँ की गणना सही होती है ....और ! ये सही बात तो कह रहे हैं....मान लो ना ? तोक सखा ने भी कहा ।

श्रीदामा रो पड़े .....बड़ा कष्ट होता है ....मान लें - कन्हैया आएगा ...और नही आया तो ? मृत्यु के समान कष्ट होता है उस समय ।

किन्तु ....कन्हैया आएगा .......मनसुख अपने ही मन को कह रहा है ....एक आंक की डाली तोड़ी उससे आर पार दिखाई देता है .....उसको लेकर वो दूर देखने लगा ।

सब लोगों की दृष्टि मथुरा की ओर है .....कोई तो आये .....तोक सखा कहता है ..मैं सौ गिनती गिनूँगा तब तक तो आही जाएगा कन्हैया ...वो अलग से गिनती गिन रहा है ....उसकी सौ गिनती कब की पूरी हो चुकी वो तीसरी बार गिन रहा है ।

सुना है श्रीदामा ! ललिता सखी गयी है मथुरा ? मनसुख आंक की लकड़ी से दृष्टि मथुरा मार्ग में ही गढ़ाये .....पूछ रहा था ।

हाँ , वो गयी तो हैं ....श्रीदामा ने उत्तर दिया ।

ललिता सखी बहुत तेज है ....वो कुछ भी कर सकती है ...वो जो ठान ले ...उसे पूरा करके ही मानती है ....मनसुख बोले जा रहा है ।

तो तुझे क्या लगता है ...वो ले आयेंगी श्याम सुन्दर को ।

मनसुख ने फिर अपने स्वर को देखा .....हाँ , दाहिना ही चल रहा है । फिर सब मन में आस लिये मथुरा मार्ग की ओर ही देखने लगे थे ।

*******************************************************

हे चन्द्रावली ! हे रंगदेवि ! हे मेरी सखियों !
मुझे लगता है मेरे प्रीतम ने मुझे क्षमा नही किया ।

भानु दुलारी श्रीराधारानी ब्रह्माचल पर्वत में रंग देवि की गोद में लेटी रो रही हैं ।

मैंने उन्हें बहुत कष्ट दिये ....छोटी छोटी बातों में रूठ जाती थी ये राधा ! वो मनाते मनाते थक जाते ...किन्तु मैं निष्ठुर हृदया के मन में दया नही आती ....हे सखियों ! उन्होंने ठीक किया .....मेरे साथ यही होना चाहिये ....ना आयें श्याम सुन्दर मेरे पास ...वहीं सुखी हैं मथुरा में ...तो वहीं रहें । श्रीराधारानी का मुख मलीन हो गया है ....केश जटा बन गए हैं ....श्रीअंग जो सुवर्ण की कान्ति के समान थे वो काला हो चुका है ।

रंगदेवि की गोद में लेटी हैं प्रिया जी ....बोलते बोलते रुक जाती हैं , वाणी अवरुद्ध हो जाती है ...तो रंगदेवि रुई लेकर बिलखते हुए उनके नासिका में रख कर देखती हैं कि ...कहीं प्राण तो नही निकल गये । ओह ! किन्तु न जाने क्या प्रसंग स्मरण हो आता है प्रिया जी को , तो तुरन्त साँस की गति तेज हो जाती है ।

फिर नयन खोलकर वो बोलने लगती हैं .....

क्या रंगदेवि ! यहाँ विष नही मिलता ?

ओह ! सखियों के हृदय में बज्रपात होने लगता है ये सुनकर ....सब रोने लग जाती हैं । फिर धीरे से प्रिया जी कहती हैं ....मैं तुम सबको भी दुःख दे रही हूँ ना ! अच्छा ! ठीक है मैं गिरी गोवर्धन से कूद जाऊँगी ....या किसी विषधर से डसवा लुंगी ।

ये कहते हुए वो फिर असहाय सी शून्य में देखने लग जाती हैं ।

रंगदेवि ! फिर चिल्ला उठी हैं ।

हाँ , अपने अश्रुओं को पोंछकर वो प्रिया जी से पूछती हैं ।

मैं मर गयी ना , तो मेरे पंचतत्व को उसी जगह मिला देना जहां मेरे प्रीतम रहते हों ।

मेरी यही प्रार्थना है ...तुम लोगों ने मेरी बहुत सेवा की है ...आज इतनी सी बात मान लो ...श्रीराधारानी सबको हाथ जोड़ रही हैं । मेरी प्रार्थना है ....मेरे देह के जल तत्व को उसी जल में डाल देना जिस जल से मेरे प्रीतम नहाते हों । और रंगदेवि ! मेरे देह का तेज तत्व ? श्रीराधारानी कुछ देर के लिए रुकीं ...फिर बोलीं .....उस दर्पण में मिल जाये मेरा तेज तत्व जिस दर्पण में मेरे प्यारे अपना मुख चन्द्र निहारते हों .....हे सखियों ! इस राधा का आकाश तत्व उस आँगन में चला जाये ...जिस आँगन में मेरे प्रीतम बैठते हों । और ! सखियाँ बस रो रहीं हैं ...प्रिया जी की एक एक बात उनको शूल के सम चुभ रही है । हे सखियों ! मेरे देह का पृथ्वी तत्व उस पृथ्वी में मिल जाये जिस मार्ग पर मेरे प्रीतम चलते हों ....कहते कहते श्रीराधा की हिलकियाँ बंध गयीं .....हे सखी ! मेरे देह का वायु तत्व उस वायु में मिल जाये ...जिससे प्रीतम पंखा करते हों ।

मुझे अब मर जाने दो .....मुझे जीवित मत रखो । श्रीराधारानी इतना कहकर आह भरने लगीं ।

हे राधा ! तू धैर्य रख .....क्यों इस तरह अधीर हो रही है ....चन्द्रावली को श्रीराधा का इस तरह विलाप अच्छा नही लगा ...इसलिए उसने गम्भीर स्वर में कहा ।

तो मैं क्या करूँ ? श्रीराधा ने पूछा ।

क्या भूल गयी हो राधा ! ललिता सखी गयी है श्याम सुन्दर को लाने । चन्द्रावली ने कहा ।

तुम्हें लगता है ....वो ला पाएगी ? श्रीराधा ने पूछा ।

हाँ , वो लाएगी .....मुझे ललिता पर पूरा विश्वास है । चन्द्रावली दृढ़ता से बोली ।

श्रीराधारानी के हृदय का कष्ट कुछ कम हुआ......चन्द्रावली ! कब आएगी ललिता ?

चन्द्रावली श्रीराधारानी के हाथों को पकड़ कर बोली ....वो आयेगी ...और देखना , साथ में श्याम सुन्दर को भी लाएगी । श्रीराधा रानी अपनी सखियों के साथ ललिता की प्रतीक्षा में बैठ गयीं हैं ।

क्रमशः
MVF

06/12/2023

जय श्री सीताराम जी की🚩
श्री रामचरितमानस सुन्दर काँण्ड काण्ड
लंका जलाने के बाद हनुमानजी का सीताजी से विदा माँगना और चूड़ामणि पाना

दोहा :
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम
धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता कें आगें
ठाढ़ भयउ कर जोरि॥26॥

भावार्थ:-पूँछ बुझाकर, थकावट दूर करके और फिर छोटा सा रूप धारण कर हनुमानजी श्री जानकीजी के सामने हाथ जोड़कर जा खड़े हुए॥26॥

चौपाई :
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा।
जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ।
हरष समेत पवनसुत लयऊ॥1॥

भावार्थ:-(हनुमान्जी ने कहा-) हे माता! मुझे कोई चिह्न (पहचान) दीजिए, जैसे श्री रघुनाथजी ने मुझे दिया था। तब सीताजी ने चूड़ामणि उतारकर दी। हनुमान्जी ने उसको हर्षपूर्वक ले लिया॥1॥

कहेहु तात अस मोर प्रनामा।
सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
दीन दयाल बिरिदु संभारी।
हरहु नाथ सम संकट भारी॥2॥

भावार्थ:-(जानकीजी ने कहा-) हे तात! मेरा प्रणाम निवेदन करना और इस प्रकार कहना- हे प्रभु! यद्यपि आप सब प्रकार से पूर्ण काम हैं (आपको किसी प्रकार की कामना नहीं है), तथापि दीनों (दुःखियों) पर दया करना आपका विरद है (और मैं दीन हूँ) अतः उस विरद को याद करके, हे नाथ! मेरे भारी संकट को दूर कीजिए॥2॥

तात सक्रसुत कथा सनाएहु।
बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
मास दिवस महुँ नाथु न आवा।
तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥3॥

भावार्थ:-हे तात! इंद्रपुत्र जयंत की कथा (घटना) सुनाना और प्रभु को उनके बाण का प्रताप समझाना (स्मरण कराना)। यदि महीने भर में नाथ न आए तो फिर मुझे जीती न पाएँगे॥3॥

कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना।
तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती।
पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥4॥

भावार्थ:-हे हनुमान्! कहो, मैं किस प्रकार प्राण रखूँ! हे तात! तुम भी अब जाने को कह रहे हो। तुमको देखकर छाती ठंडी हुई थी। फिर मुझे वही दिन और वही रात!॥4॥
दोहा :
जनकसुतहि समुझाइ करि
बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि,
गवनु राम पहिं कीन्ह॥27॥

भावार्थ:-हनुमान्जी ने जानकीजी को समझाकर बहुत प्रकार से धीरज दिया और उनके चरणकमलों में सिर नवाकर श्री रामजी के पास गमन किया॥27॥
जय श्री सीताराम जी की 🚩

12/11/2023

श्री बदरी विशाल जी 🙏

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Malaygiri Apartment
Ghaziabad
201010

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