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*अधीनता की सामर्थ्य को समझो।**शैतान अधीनता से घृणा करता है क्योंकि अधीनता परमेश्वर के अधिकार (Authority) को स्वीकार करती...
24/07/2026

*अधीनता की सामर्थ्य को समझो।*

*शैतान अधीनता से घृणा करता है क्योंकि अधीनता परमेश्वर के अधिकार (Authority) को स्वीकार करती है, जबकि शैतान का पूरा स्वभाव विद्रोह* (Rebellion) है। आइए इसे बाइबल के आधार पर समझते हैं।
1. *शैतान स्वयं अधीन नहीं रहना चाहता था*
बाइबल बताती है कि शैतान (जो पहले एक महिमावान स्वर्गदूत था) ने परमेश्वर के विरुद्ध घमंड किया।
Isaiah 14:13–14 में लिखा है:
*"मैं स्वर्ग पर चढ़ूंगा... मैं परमप्रधान के तुल्य हो जाऊंगा।"*
उसने कहा, *"मैं"*। उसने परमेश्वर के अधीन रहने से इनकार कर दिया।
*उसका पहला पाप अहंकार और विद्रोह था।*
इसी प्रकार Ezekiel 28:17 कहता है:
"तेरा मन तेरी सुंदरता के कारण घमंडी हो गया।"
इसलिए शैतान का स्वभाव ही अधीनता का विरोध करना है।

2. *शैतान चाहता है कि मनुष्य भी विद्रोह करे*
जब वह Adam और Eve (हव्वा) के पास आया, तो उसने उन्हें परमेश्वर की आज्ञा मानने के लिए नहीं, बल्कि उसका विरोध करने के लिए उकसाया।
उसने कहा:
*"क्या सचमुच परमेश्वर ने कहा है...?"*
यानी उसने परमेश्वर के वचन पर संदेह पैदा किया। उसका लक्ष्य था कि मनुष्य भी परमेश्वर की अधीनता छोड़ दे।
हर प्रलोभन के पीछे यही विचार होता है:
"तुम अपनी इच्छा पूरी करो, परमेश्वर की नहीं।"

3. *अधीनता शैतान की शक्ति को तोड़ देती है*
James 4:7 एक बहुत महत्वपूर्ण पद है:
*"इसलिए परमेश्वर के अधीन हो जाओ; और शैतान का सामना करो, तो वह तुम्हारे पास से भाग जाएगा।"*

ध्यान दें कि पहले लिखा है:
परमेश्वर के अधीन हो जाओ।
फिर शैतान का सामना करो।
अर्थात आत्मिक विजय का पहला कदम अधीनता है। जो व्यक्ति परमेश्वर के अधीन रहता है, उसके जीवन में शैतान का प्रभाव कमज़ोर पड़ जाता है।

4. *यीशु मसीह ने अधीनता से शैतान को हराया*
जब शैतान ने Jesus की परीक्षा ली (मत्ती 4), तब यीशु ने अपनी इच्छा नहीं चलाई। हर बार उन्होंने कहा:
*"लिखा है..."*
उन्होंने पूरी तरह पिता और परमेश्वर के वचन के अधीन रहकर शैतान को पराजित किया।
जहाँ पहला मनुष्य गिर गया, वहाँ यीशु आज्ञाकारिता में स्थिर रहे।

5. *शैतान आज भी अधीनता से क्यों डरता है?*
क्योंकि जब कोई विश्वासी:
परमेश्वर के वचन के अधीन होता है,
पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में चलता है,
नम्र रहता है,
पाप का विरोध करता है,
तो उसका जीवन परमेश्वर की सामर्थ्य का माध्यम बन जाता है। इसलिए शैतान लोगों में घमंड, आत्मनिर्भरता, विद्रोह, क्षमा न करना और आज्ञा न मानने की भावना भरने की कोशिश करता है।

6. *अधीनता कमजोरी नहीं, सामर्थ्य है*
दुनिया कहती है:
"किसी के आगे मत झुको।"
लेकिन बाइबल कहती है:
*"परमेश्वर के सामने झुको, तब वही तुम्हें ऊँचा उठाएगा।"* (याकूब 4:10)
यीशु ने स्वयं को दीन किया, इसलिए परमेश्वर ने उन्हें सर्वोच्च स्थान दिया (Philippians 2:5–11)।

*निष्कर्ष*
*शैतान अधीनता से घृणा करता है क्योंकि:*
उसने स्वयं परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया।
वह चाहता है कि मनुष्य भी परमेश्वर से स्वतंत्र होकर अपनी इच्छा के अनुसार चले।
परमेश्वर के अधीन रहने वाला व्यक्ति शैतान के विरुद्ध आत्मिक अधिकार और विजय का अनुभव करता है।
*अधीनता मनुष्य को परमेश्वर के निकट लाती है,*
जबकि विद्रोह उसे परमेश्वर से दूर ले जाता है।
इस विषय का एक और गहरा पहलू भी है: बाइबल में "अधिकार (Authority)" और "अधीनता (Submission)" का क्या संबंध है, और परमेश्वर क्यों पहले अधीनता सिखाते हैं, फिर अधिकार देते हैं? यह अध्ययन पूरे बाइबल में एक महत्वपूर्ण आत्मिक सिद्धांत के रूप में दिखाई देता है।

इसके विषय फिर चर्चा करेंगे
सभी भाई बहनौ को जय मसीह की।

Amen
Hallelujah
Holy Christ Church
Delhi

21/07/2026

2 तीमुथियुस अध्याय 3 – गहराई से समझते हैं,
पद 1 – "अन्तिम दिनों में कठिन समय आएंगे।"
"अन्तिम दिन" का अर्थ केवल यीशु के आने से ठीक पहले का समय नहीं, बल्कि वह पूरा युग है जो मसीह के प्रथम आगमन से लेकर उनके दूसरे आगमन तक चलता है।
"कठिन समय" का अर्थ केवल युद्ध, बीमारी या आर्थिक संकट नहीं है, बल्कि ऐसा समय जब आध्यात्मिक पतन बहुत बढ़ जाएगा।
*यूनानी भाषा में "कठिन" (Greek: chalepos) का अर्थ केवल दुखद समय नहीं, बल्कि खतरनाक, हिंसक, आत्मिक रूप से कठिन और धोखे से भरा समय है।*
ध्यान दीजिए, पौलुस ने यह नहीं कहा कि कठिनाई केवल बाहर से आएगी। सबसे बड़ा खतरा कलीसिया के भीतर झूठी शिक्षा और दिखावटी भक्ति से होगा।
यही कारण है कि यीशु ने भी कहा:
"चौकस रहो कि कोई तुम्हें भरमा न दे।" (मत्ती 24:4)
*पहला खतरा युद्ध नहीं, बल्कि धोखा है।*

*पद 2 – 5– *मनुष्यों का स्वभाव पौलुस लगभग 19 प्रकार के पापों की सूची देता है।*

स्वार्थी
धन के लोभी
डींग मारने वाले
अभिमानी
निन्दक
माता-पिता की आज्ञा न मानने वाले
कृतघ्न
अपवित्र
प्रेमहीन
क्षमा न करने वाले
दोष लगाने वाले
असंयमी
कठोर
भलाई से बैर रखने वाले
विश्वासघाती
उतावले
घमण्डी

परमेश्वर से अधिक सुख-विलास से प्रेम रखने वाले

सबसे गंभीर बात (पद 5)
*"भक्ति का भेष तो धरे रहेंगे, पर उसकी शक्ति को न मानेंगे।"*
इसका अर्थ है—
लोग बाहर से धार्मिक दिखाई देंगे, चर्च जाएंगे, प्रार्थना करेंगे, लेकिन उनका जीवन नहीं बदलेगा।
सच्ची भक्ति केवल रीति-रिवाज नहीं, बल्कि पवित्र आत्मा द्वारा बदला हुआ जीवन है।
यीशु ने भी कहा था—
*"ये लोग होंठों से मेरा आदर करते हैं, पर उनका मन मुझसे दूर है।" (मत्ती 15:8)*

पद 6–7
यहाँ पौलुस उन झूठे शिक्षकों की बात करता है जो कमजोर विश्वासियों को बहकाते थे।
वे ऐसे लोगों को चुनते हैं—
जो पापों के बोझ तले दबे हों।
जो सत्य को समझने के बजाय केवल नई-नई बातें सुनना चाहते हों।
आज भी ऐसा होता है।
बहुत लोग बाइबल का गहरा अध्ययन नहीं करते, इसलिए किसी भी झूठी शिक्षा में फँस जाते हैं।

पद 8–9
यहाँ यन्नेस और यम्ब्रेस का उल्लेख है।
इनके नाम पुराने नियम में नहीं लिखे गए, लेकिन यहूदी परंपरा के अनुसार ये वही जादूगर थे जिन्होंने मूसा का विरोध किया था (निर्गमन 7)।
उन्होंने कुछ चमत्कारों की नकल की, लेकिन अंत में परमेश्वर की सामर्थ्य के सामने हार गए।

*सीख: झूठ कुछ समय तक चलता है, लेकिन अंत में सत्य की ही विजय होती है।*

पद 10–13 – पौलुस का उदाहरण
पौलुस तीमुथियुस से कहता है—
तुमने मेरा जीवन देखा है।
मेरा उपदेश
मेरा विश्वास
मेरा प्रेम
मेरा धैर्य
मेरे सताव
मेरे दुःख
फिर भी परमेश्वर ने मुझे बचाया।
पद 12
*"जो कोई मसीह यीशु में भक्तिपूर्वक जीवन बिताना चाहता है, वह सताया जाएगा।"*
इसका अर्थ है—
*यदि आप वास्तव में यीशु के अनुसार जीवन जीते हैं, तो संसार हमेशा आपको स्वीकार नहीं* करेगा।

पद 14–15
पौलुस कहता है—
जिस सत्य को तुमने सीखा है, उसी पर बने रहो।
*तीमुथियुस बचपन से पवित्र शास्त्र जानता था।*
यह हमें सिखाता है कि बच्चों को बचपन से परमेश्वर का वचन सिखाना कितना आवश्यक है।

पद 16–17 (पूरे अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण भाग)
*"सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है।"*
अर्थ—
बाइबल केवल मनुष्यों की पुस्तक नहीं है।
परमेश्वर ने अपने पवित्र आत्मा के द्वारा लेखकों को प्रेरित किया।
बाइबल चार कार्य करती है—
शिक्षा देती है।
पाप का भेद खोलती है।
सुधारती है।
धार्मिक जीवन जीना सिखाती है।
परिणाम
*"ताकि परमेश्वर का जन सिद्ध बने और हर एक भले काम के लिए तैयार हो।"*

अर्थात बाइबल का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि हमें मसीह के समान बनाना है।

Amen
Hallelujah
Holy Christ Church
Ps. Aditya Masih
Delhi

20/07/2026

सबसे गहरी बात
बाइबल में परमेश्वर ने कभी किसी को पहले राजा, भविष्यद्वक्ता या प्रेरित बनने के लिए नहीं बुलाया।
उसने पहले उन्हें दास बनाया।
मूसा पहले दास बना, फिर अगुवा।
यहोशू पहले दास बना, फिर उत्तराधिकारी।
एलीशा पहले सेवक बना, फिर भविष्यद्वक्ता।
चेले पहले दास बने, फिर प्रेरित।
और स्वयं यीशु ने भी सेवक का रूप धारण किया।
परमेश्वर के राज्य का सिद्धांत यह है:
"जो व्यक्ति परमेश्वर के सामने जितना बड़ा दास बनता है, परमेश्वर उसे उतनी ही बड़ी ज़िम्मेदारी और महिमा सौंपता है।"
यही कारण है कि बाइबल में "परमेश्वर का दास" कोई छोटा पद नहीं, बल्कि परमेश्वर की ओर से दिया गया सबसे सम्मानित परिचय है।

20/07/2026

बहुत लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन हर विश्वासी उसका दास नहीं होता।
दास कहता है:
"मेरी इच्छा नहीं, तेरी इच्छा पूरी हो।"
"मेरा समय, मेरा धन, मेरी प्रतिभा, मेरा परिवार—सब तेरा है।"
यही कारण है कि बाइबल में परमेश्वर ने अपने सबसे निकट लोगों को "मेरा दास" कहा।
2. मूसा परमेश्वर का दास क्यों कहलाया?
मूसा केवल नेता नहीं था।
40 वर्ष मिस्र में, 40 वर्ष जंगल में प्रशिक्षण, फिर 40 वर्ष इस्राएल की अगुवाई।
कुल 120 वर्षों में परमेश्वर ने उसे तोड़ा, नम्र बनाया और तैयार किया।
जब लोग उसके विरुद्ध बोले, तब भी उसने बदला नहीं लिया बल्कि उनके लिए प्रार्थना की।
उसने कभी अपनी महिमा नहीं चाही, बल्कि परमेश्वर की महिमा चाही।
इसलिए परमेश्वर ने उसे "मेरा दास" कहा।
3. यहोशू पहले मूसा का दास क्यों बना?
यह परमेश्वर का सिद्धांत है।
पहले सेवा, फिर नेतृत्व।
यहोशू ने वर्षों तक मूसा की सेवा की। उसने मंच नहीं माँगा। उसने पद नहीं माँगा। उसने प्रसिद्धि नहीं माँगी।
उसने केवल विश्वासयोग्य होकर सेवा की।
फिर परमेश्वर ने कहा—
"अब तू लोगों की अगुवाई करेगा।"
बाइबल का सिद्धांत है:
जो छोटे कार्यों में विश्वासयोग्य है, वही बड़े कार्यों के योग्य बनता है।
4. एलीशा को एलिय्याह की सेवा क्यों करनी पड़ी?
एलीशा अमीर परिवार से था।
जब एलिय्याह ने बुलाया, तो उसने सब छोड़ दिया।
कई वर्षों तक उसने भविष्यवाणी नहीं की।
पहले उसने केवल सेवा की।
वह पानी डालता था, यात्रा करता था, गुरु के साथ रहता था।
क्यों?
क्योंकि परमेश्वर केवल ज्ञान नहीं देता, वह चरित्र भी बनाता है।
चरित्र बिना सामर्थ्य खतरनाक हो जाता है।
5. यीशु स्वयं दास क्यों बने?
यही सबसे गहरा रहस्य है।
Philippians 2:6–8 कहता है कि यीशु परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी दास का स्वरूप धारण करके आए।
सोचिए—
जिसने संसार बनाया, उसी ने शिष्यों के पैर धोए।
राजा होकर सेवक बने।
उन्होंने सिखाया—
"नेतृत्व का अर्थ शासन करना नहीं, बल्कि सेवा करना है।"
6. पौलुस अपने आपको प्रेरित से पहले दास क्यों कहता है?
रोमियों 1:1 में वह पहले कहता है—
"मैं मसीह का दास हूँ।"
उसके बाद—
"प्रेरित।"
क्यों?
क्योंकि परमेश्वर के राज्य में पहचान पद से नहीं, समर्पण से होती है।
7. दास और नौकर में क्या अंतर है?
नौकर
वेतन के लिए काम करता है।
समय पूरा हुआ तो चला जाता है।
दास
उसका जीवन स्वामी का होता है।
वह प्रेम और निष्ठा से सेवा करता है।
उसकी पहचान उसके स्वामी से होती है।
इसीलिए प्रेरित स्वयं को यीशु का दास कहते थे।
8. आज हमारे जीवन में इसका क्या अर्थ है?
यदि हम कहते हैं कि यीशु हमारे प्रभु हैं, तो हमें स्वयं से पूछना चाहिए:
क्या मैं उनकी आज्ञा मानता हूँ?
क्या मैं अपनी इच्छा छोड़ सकता हूँ?
क्या मैं बिना नाम और सम्मान चाहे सेवा कर सकता हूँ?
क्या मैं विश्वासयोग्य रह सकता हूँ जब कोई मुझे देख भी न रहा हो?
यही दासत्व है।

20/07/2026

1. मूसा – परमेश्वर का दास
Deuteronomy 34:5 में लिखा है कि "यहोवा का दास मूसा" मर गया।
परमेश्वर ने मूसा को अपना दास इसलिए कहा क्योंकि:
मूसा ने परमेश्वर की इच्छा को अपनी इच्छा से ऊपर रखा।
उसने इस्राएलियों की अगुवाई परमेश्वर की आज्ञा से की।
वह परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य था।
इसलिए "परमेश्वर का दास" कहलाना बाइबल में एक बहुत बड़ा सम्मान है।

2. यहोशू – मूसा का दास
Joshua 1:1 में लिखा है:
"यहोवा के दास मूसा की मृत्यु के बाद, यहोवा ने मूसा के सेवक (दास) यहोशू से कहा..."
यहोशू मूसा का दास था, अर्थात:
वह मूसा की सेवा करता था।
उनसे सीखता था।
उनकी अगुवाई के अधीन रहकर तैयार हुआ।

*बाद में वही यहोशू स्वयं परमेश्वर का दास कहलाया (यहोशू 24:29)। इससे पता चलता है कि जो पहले विश्वासयोग्य सेवक बनता है, परमेश्वर उसे आगे बड़ी ज़िम्मेदारी भी देता है।*

3. एलीशा – एलिय्याह का दास
2 Kings 3:11 में एलीशा के बारे में कहा गया है कि वह एलिय्याह के हाथों पर पानी डालता था।
इसका अर्थ है:
वह एलिय्याह की सेवा करता था।
उनसे शिक्षा और आत्मिक प्रशिक्षण प्राप्त करता था।
नम्रता से सेवा करते-करते वह स्वयं महान भविष्यद्वक्ता बना।
4. यीशु मसीह के चेले
यीशु के चेले स्वयं को प्रभु का दास मानते थे। उदाहरण:
Romans 1:1 — पौलुस कहता है, "मैं मसीह यीशु का दास हूँ।"
James 1:1 — याकूब स्वयं को "परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह का दास" कहता है।
2 Peter 1:1 — पतरस भी स्वयं को यीशु मसीह का दास कहता है।
उन्होंने अपने आपको दास इसलिए कहा क्योंकि:
उनका जीवन अब उनका अपना नहीं था।
वे यीशु की इच्छा पूरी करने के लिए जीते थे।
वे हर परिस्थिति में प्रभु के आज्ञाकारी थे।
इसका आत्मिक अर्थ क्या है?
बाइबल के अनुसार, दास होना का अर्थ है:
अपने अधिकार परमेश्वर को सौंप देना।
उसकी इच्छा को अपनी इच्छा से ऊपर रखना।
नम्रता से सेवा करना।
विश्वासयोग्य रहना।
अंत तक आज्ञाकारी बने रहना।
इसी कारण यीशु ने भी कहा:
"जो तुम में बड़ा होना चाहता है, वह तुम्हारा सेवक बने।" (Matthew 20:26–27)
आज हमारे लिए शिक्षा
यदि हम यीशु मसीह के सच्चे चेले हैं, तो हमें भी:
परमेश्वर के दास के रूप में जीना है।
नम्रता से लोगों की सेवा करनी है।
परमेश्वर की आज्ञा को सर्वोपरि रखना है।
अपने जीवन का उद्देश्य उसकी महिमा बनाना है।
ध्यान देने योग्य बात: बाइबल में "दास" का अर्थ जब परमेश्वर के संदर्भ में आता है, तो वह जबरदस्ती की गुलामी नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और स्वेच्छा से किया गया पूर्ण समर्पण है। यही कारण है कि बाइबल के महान पुरुष—मूसा, यहोशू, एलीशा, पौलुस, पतरस और याकूब—अपने लिए "प्रभु का दास" कहलाना सम्मान की बात मानते थे।

20/07/2026

*वास्तव में, यदि आप पूरी बाइबल पढ़ेंगे तो पाएँगे कि परमेश्वर ने जिन लोगों का सबसे अधिक उपयोग किया, वे पहले "दास" बने, फिर "नेता" बने। आइए कुछ और गहरे उदाहरण देखें।*

1. यूसुफ – पहले दास, फिर मिस्र का शासक

Genesis

यूसुफ को उसके भाइयों ने बेच दिया और वह पोटीपर का दास बन गया।

सोचिए, परमेश्वर ने उसे तुरंत राजा क्यों नहीं बनाया?

क्योंकि परमेश्वर पहले उसके चरित्र को बना रहा था।

उसने ईमानदारी नहीं छोड़ी।

पाप से भागा।

जेल में भी विश्वासयोग्य रहा।

फिर परमेश्वर ने उसे पूरे मिस्र का प्रधान बना दिया।

*सीख: परमेश्वर पहले विश्वासयोग्यता देखता है, फिर अधिकार देता है।*
---

2. दाऊद – पहले चरवाहा, फिर राजा

1 Samuel

दाऊद महल में नहीं, जंगल में तैयार हुआ।

वह भेड़ों की सेवा करता था। उसी समय उसने परमेश्वर पर भरोसा करना सीखा।

*यदि वह भेड़ों का अच्छा सेवक नहीं होता, तो इस्राएल का अच्छा राजा भी नहीं बन पाता।*

---

3. दानिय्येल – राजा का सेवक, लेकिन परमेश्वर का दास

Daniel

दानिय्येल बाबुल के राजा की सेवा करता था, लेकिन उसकी सर्वोच्च निष्ठा परमेश्वर के प्रति थी।

जब राजा और परमेश्वर की आज्ञा में टकराव हुआ, तो उसने परमेश्वर को चुना।

दास का अर्थ लोगों को खुश करना नहीं, बल्कि परमेश्वर को प्रसन्न करना है।
---

4. मरियम – प्रभु की दासी

Luke 1:38

जब स्वर्गदूत ने कहा कि वह यीशु को जन्म देगी, तो मरियम ने उत्तर दिया:

*देख, मैं प्रभु की दासी हूँ; तेरे वचन के अनुसार मेरे साथ हो।*

उसने अपनी योजनाओं से पहले परमेश्वर की योजना को स्वीकार किया।
---

5. यीशु ने शिष्यों के पैर धोए

John 13

उस समय पैर धोना सबसे छोटे दास का काम माना जाता था।

लेकिन यीशु ने वही काम किया।

फिर कहा:

*मैंने तुम्हें उदाहरण दिया है कि जैसे मैंने किया, वैसे ही तुम भी करो।*

*परमेश्वर के राज्य में महानता का रास्ता सेवा से होकर जाता है।*
---

6. यीशु की शिक्षा

यीशु ने कहा:

*जो तुम में बड़ा होना चाहता है, वह तुम्हारा सेवक बने।*

दुनिया कहती है:

पहले कुर्सी।

फिर सेवा।

यीशु कहते हैं:

पहले सेवा।

फिर परमेश्वर तुम्हें जहाँ उचित समझे, वहाँ स्थापित करेगा।
---

बाइबल का एक अद्भुत सिद्धांत

ध्यान दीजिए:

अब्राहम ने वेदी बनाई।

मूसा ने मरुभूमि में सेवा की।

यहोशू ने मूसा की सेवा की।

एलीशा ने एलिय्याह की सेवा की।

दाऊद ने भेड़ों की सेवा की।

पौलुस ने कलीसियाओं की सेवा की।

और यीशु ने सबकी सेवा की।

इन सभी में एक बात समान थी—उन्होंने पहले सेवा करना सीखा।

आज हमारे लिए इसका अर्थ

यदि आप परमेश्वर से कहते हैं, "प्रभु, मुझे इस्तेमाल कीजिए," तो अक्सर परमेश्वर पहले आपको सेवा, नम्रता, धैर्य और विश्वासयोग्यता में प्रशिक्षित करता है। बाइबल का सिद्धांत है:

*जो छोटी बातों में विश्वासयोग्य है, वही बड़ी बातों में भी विश्वासयोग्य होगा।" (Luke 16:10)*

एक गहरा निष्कर्ष

*बाइबल में "दास" होना केवल एक पद नहीं, बल्कि एक पहचान है। दास वह है जो कहता है:*

*प्रभु, मेरा जीवन मेरा नहीं रहा। मेरी सोच, मेरी योजनाएँ, मेरा समय, मेरी सामर्थ्य—सब आपकी महिमा के लिए हैं।*

*यही कारण है कि बाइबल के महान पुरुष अपने नाम के आगे "परमेश्वर का दास" कहलाना सम्मान समझते थे।*

19/07/2026

"मैंने शैतान को बिजली की तरह स्वर्ग से गिरते देखा।"

इस पद के बारे में कई व्याख्याएँ हैं, लेकिन मुख्य अर्थ यह है कि जब परमेश्वर का राज्य आगे बढ़ता है, तो शैतान का प्रभाव और अधिकार पराजित होता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि उसी समय शैतान पहली बार स्वर्ग से गिरा, बल्कि यीशु यह दिखा रहे हैं कि सुसमाचार के प्रचार से शैतान की शक्ति टूट रही है।

19/07/2026

1 कुरिन्थियों 1 : 10 - 17

1. पद 10–17 — कलीसिया में फूट क्यों नहीं होनी चाहिए?
पद 10
"तुम सब एक ही बात कहो, और तुम में फूट न हो।"
अर्थ: यीशु चाहता है कि उसकी कलीसिया एक परिवार की तरह रहे। मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं।
आज भी यही समस्या है—
कोई कहता है मैं इस पास्टर का हूँ।
कोई कहता है मैं उस चर्च का हूँ।
कोई कहता है हमारी ही सभा सही है।
परन्तु बाइबल कहती है कि हम सब केवल मसीह के हैं।
पद 11–12
खलोए के घराने के लोगों ने पौलुस को बताया कि कलीसिया में झगड़े हो रहे हैं।
लोग कह रहे थे—
मैं पौलुस का हूँ।
मैं अपुल्लोस का हूँ।
मैं कैफा (पतरस) का हूँ।
मैं मसीह का हूँ।
समस्या क्या थी?
वे यीशु को छोड़कर मनुष्यों के पीछे चलने लगे थे।
आज भी यही होता है।
मैं फलाँ चर्च का हूँ।
मैं फलाँ प्रचारक का हूँ।
परन्तु हमारा परिचय केवल यह होना चाहिए—
"मैं यीशु मसीह का हूँ।"
पद 13
"क्या मसीह बँट गया?"
पौलुस पूछता है—
क्या तुम्हारे लिए पौलुस मरा?
क्या पौलुस ने तुम्हारे पापों के लिए क्रूस उठाया?
नहीं।
केवल यीशु ने।
इसलिए महिमा किसी मनुष्य की नहीं बल्कि केवल यीशु की होनी चाहिए।
पद 14–17
पौलुस कहता है—
मैं खुश हूँ कि मैंने बहुत कम लोगों को बपतिस्मा दिया।
क्यों?
ताकि कोई यह न कहे कि मैं पौलुस का चेला हूँ।
फिर वह कहता है—
"मसीह ने मुझे बपतिस्मा देने नहीं, बल्कि सुसमाचार सुनाने भेजा।"
अर्थ
सबसे बड़ी सेवा लोगों को यीशु तक पहुँचाना है।

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