22/10/2023
*दायित्व हीनता -2*
*पतंग की छूटती डोर में पिता की दायित्वहीनता*
*"माता बैरी पिता शत्रु येन बालो न पाठितः" अथवा "मात-पिता बैरी भये जिन न पढ़ाये बाल"* इन सूक्तियों को आत्मसात् करते हुए सभी पिता अपनी संतान को श्रेष्ठतम शिक्षा दिलाना अपना दायित्व समझते हैं और इस दायित्व के निर्वहन के लिए जो, जब, जैसे भी करना हो उसे करने के लिए तैयार हैं।😊
जैसे ही बच्चा गर्भ में आता है पहले से ही पिता जागरूक होकर समय-समय पर चैकअप कराना, औषधियाँ देना, किस सामग्री की आवश्यकता होगी उनकी व्यवस्थाएँ करना; फिर जन्म होते ही फोटो लेकर फेसबुक पर अपलोड करना और फिर डेढ़-दो वर्ष का होते ही किड्स केयर, प्लेग्रुप से प्रारंभ करके बीटेक-एमटेक अथवा एम डी, एम-एस या एम बी ए इत्यादि की उच्चतम/श्रेष्ठतम शिक्षा दिलाकर अपने बेटे- बेटियों को 50 लाख- 75 लाख, करोड़- 2 करोड़ के💰💎 पैकेज दिलाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मानते हैं और लगता है मानो हमने गंगा नहा ली ।😞
भाई साहब लौकिक दृष्टि से आपने अपने दायित्व का निर्वहन बहुत अच्छी तरह से कर लिया; परन्तु जैसे- आपके माता-पिता ने आपको बमुश्किल बी ए कराया था और आपने संतान को एमटेक करवा दिया, माता-पिता ने आपको 50 लाख रुपए की प्रॉपर्टी दी थी और आप 5-10 करोड़ की प्रॉपर्टी दे रहे हैं; वैसे ही *आपको माता-पिता यदि मन्दिर ले जाते थे तो आपको अपनी संतान को पूजन करना सिखाना चाहिए, स्वाध्याय में बैठना सिखाना चाहिए, यदि उन्होंने आपको भक्तामर स्तोत्र सिखाया था तो आपका दायित्व बनता है कि आप उसे अर्थ सहित भक्तामर स्तोत्र और तत्वार्थ सूत्र सिखाएँ । धार्मिक संस्कार भी तो बढ़ाकर देना चाहिए।* 🙏
पर हो रहा इससे विपरीत है *हम संतान को संपत्ति और सुविधाएं देने में तो पश्चिमी देशों को भी मात दे रहे हैं और धार्मिक संस्कारों को देने के लिए अपना दायित्व समझ ही नहीं रहे ।*😞😞
क्या विडंबना है?
1- हम बच्चों को स्कूल के लिए तीन-तीन ड्रेस, घर में पहनने के लिए 20-25 जोड़ी कपड़े, सोने के लिए अलग, घूमने के लिए अलग, खेलने के लिए अलग कपड़े दिला सकते हैं लेकिन अपने और बेटे के लिए एक धोती- दुपट्टा नहीं घर में रख सकते ।😳
2- हम बच्चों को स्कूल के अलावा उसके विषय की कोचिंग, छुट्टियों में स्विमिंग, क्रिकेट, कराटे, कंप्यूटर, स्पोकन इंग्लिश, डांस- म्यूजिक ना जाने कितने प्रकार की विशेष कक्षाएं करा सकते हैं लेकिन पाठशाला या शिविर में नहीं भेजते ।😥
3- हम बच्चे को अपने पास में बैठा कर उसका होमवर्क कराते हैं, यूट्यूब या गूगल से प्रोजेक्ट बनाना सिखाते हैं, खेलकूद की सामग्री ला कर देते हैं; लेकिन कभी हम बैठाकर णमोकार मंत्र, चत्तारि मंगल पाठ, 12 भावना आदि पाठ नहीं सिखा पाते? आज तो यूट्यूब पर केवल स्कूल या क्रिकेट या राजनीति की सामग्री उपलब्ध नहीं है, बालबोध भाग से लेकर के बड़े-बड़े ग्रन्थों के सरल सुबोध भाषा में अनेकों प्रवचनकारों के प्रवचन उपलब्ध हैं पर वह हम न सुनते हैं न सुनाते हैं ।🤔
4- हम छुट्टियाँ होने पर उदयपुर, माउंट आबू, मसूरी, ऊटी इत्यादि स्थानों पर बच्चों को घुमाने ले जाते हैं लेकिन तीर्थ यात्रा कराने के भाव क्यों नहीं आते ? और यदि तीर्थ पर ले भी जाते हैं तो उस यात्रा को भी स्वाध्याय/ भक्ति भाव न होने से पर्यटन स्थल बना देते हैं। वहाँ पर भी रात्रि में जाकर भोजन करते हैं, चाट पकौड़ी खाते हैं, खेलते-कूदते हैं ।😳
यह मानसिकता हमारे संस्कारों, हमारी संस्कृति का नाश कर रही है। यह पिता का दायित्व है की *जिस तरह आप अपने द्वारा कमाए हुए पैसे का सदुपयोग उसके लौकिक कैरियर के निर्माण में लगा रहे हैं वैसे ही पुण्य उदय से प्राप्त मनुष्य भव, देव- शास्त्र- गुरु, का उपयोग भी उसके कैरेक्टर निर्माण में लगाएँ तो आपका और उसका जीवन मंगलमय होगा।*🙏🙏🙏
*अन्यथा पतंग की डोर छूट जायेगी और हम देखते रह जायेंगे।*😞😞🤔😳
निवेदक - 🙏🙏🙏 *समर्पण*
समर्पण व्यक्ति नहीं भावना है।
9414103492
22-10-23
*आपकी इच्छा हो तो अग्रेषित कर सकते हैं।*