राज्य समीक्षा के कुछ लेखों में हम आपके लिए उत्तराखंड के उन मंदिरों की कहानी लेकर आते हैं, जहां आज भी ऐसी बातें देखने को मिलती हैं, जिन वजहों से उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। इस बार की कहानी भी बेहद खास है। आज हम जिस मंदिर के बारे में आपको बताने जा रहे हैं, शायद आपने इस मंदिर के बारे में पहले भी सुना होगा, या हो सकता है कि कछ लोग इस मंदिर के बारे में जानते ही ना हों।
टिहरी जिले के भिलंगना ब्लॉ
क की गोनगढ़ पट्टी में एक गांव हैं दयूल, यह गांव पौनाड़ा के पास पड़ता है। यहां स्थित है मां दुध्याडी देवी का मदिर जिसके बारे में कहा जाता है कि भगवती दुध्याड़ी अपने भक्तोँ को किसी भी प्रकार से दु:खी नहीं देख सकती। जो भी भक्त माता के पास अपनी फ़रियाद लेकर आता है वो अवश्य पूरी होती है।एक समय की बात है हाट नाम के स्थान पर हटवाल नाम के दुष्ट बुद्दि वाले व्यक्ति का कब्जा था, वह दुष्ट क्षेत्र के सभी वर्ग के लोगोँ को प्रताड़ित करता रहता था। जिससे बचने के लिए लोगोँ ने भगवती दुध्याड़ी से मिन्नतें मांगी।कहते हैं कि हटवाल की एक गाय थी वह प्रतिदिन जंगल में चरने के लिए जाती, तो एक भिकुले के पेड के नीचे (जहाँ पर आज मन्दिर स्थापित है! जाती और खडी हो जाती, वहाँ उस गाय के थनो से दूध कि धारा स्वयं गिरने लगती थी।कुछ समय बाद जब हटवाल को गाय के घर मे आकर दूध न देने का कारण पता चला तो उसने गाय को घर मे ही बंधवा दिया और उस पेड़ को कटवाकर अपने घर के खंभे बनवा दिये। इस कारण भगवती ने अपना रौद्र रोप धारण कर हटवाल को समाप्त कर क्षेत्रवासियों को भयमुक्त कर दिया। जिससे प्रसन्न होकर क्षेत्रवासियो ने उसी वृक्ष के नीचे वाले स्थान पर मन्दिर बनाने का निश्चय किया। यह स्थान आज पौनाड़ा नाम के गाँव के पास दयूल नाम से प्रसिद्ध है।यहां राणा जाति के व्यक्ति को भट्ट जाति के ब्राह्मण द्वारा त्रीफल व जनेऊ से दीक्षित कर भगवती कि पूजा के लिए नियुक्त किया जाता है। माता की कृपा ऐसी है कि जो कोभी मां के द्वार पर आता है हमेशा सुखी जीवन पाता है। ')}
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*।। आदिशक्ति दुध्याडी़ ।।*
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प्रस्तुतिः शम्भुशरण रतूड़ी
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*या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भुवनेष्वलक्ष्मी,*
*पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः* ।
*श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा,*
*तां त्वां नताः स्म परिपालयदेविविश्र्ववम्* ।।
(अर्थात- जो पुण्य आत्माओं के घरों में स्वयं ही लक्ष्मी रुप से, पापियों के यहां दरिद्रता रुप से, शुद्ध अन्तःकरण वाले पुरुषों के हृदय में बुद्धिरुप से, सुत्पुरुषों में श्रद्धारुप से तथा कुलीन मनुष्य में लज्जा रुप में निवास करती है !)
*उन आप भगवती दुर्गा को हम नमस्कार करते हैं ।*
*हे देवी ! संपूर्ण विश्व का पालन कीजिए ।*
*गढ़वाल* मध्य हिमालय क्षेत्र यद्यपि देवी-देवताओं एवं ऋषि-मुनियों की तपोभूमि है । यहां अनेक *सिद्धपीठ* धार्मिक दृष्टि से ही नहीं आपितु नैसर्गिक सुषमा से संपन्न अनेक तीर्थ भी है । इसलिए इस पावन भूमि को देवभूमि अथवा स्वर्गभूमि के नाम से भी अभिभूत किया गया है ।
यह भी सत्य है कि, मध्य हिमालय गढ़वाल में देवी उपासना का प्रचलन अत्यन्त प्राचीन काल से है । हिमालय- पुत्री *पार्वती, उमा, हेमवती* ही शाक्तों की आराध्य देवी है । और इसका साक्षात् उदाहरण यह कि इस भू -भाग की प्रत्येक ऊंची *डांडी-कांठी* में एक न एक मंदिर देवी का अवश्य मिलेगा ।
प्रत्येक गांव और हर घर में देवी भगवती की पूजा होती है!