Heritage city- Gaya अपना धरोहर - गया शहर

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Heritage city- Gaya        अपना धरोहर - गया शहर Regarding Holly & ancient city Gaya

झारखंड और बिहार की सीमा और फल्गु नदी के तट पर बसा गया बिहार प्रान्त का दूसरा बडा शहर है। वाराणसी की तरह गया की प्रसिद्धी मुख्य रुप से एक धार्मिक नगरी के रुप में है। पितृपक्ष के अवसर पर यहाँ हजारो श्रद्धालु पिंडदान के लिये जुटते हैं। गया सड़क, रेल और वायु मार्ग द्वारा पूरे भारत से अच्छी तरह जुड़ा है। नवनिर्मित गया अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा द्वारा यह थाइलैंड से भी सीधे जुड़ा हुआ है। गया से 17 किलोमी

टर की दूरी पर बोधगया स्थित है जो बौद्ध तीर्थ स्थल है और यहीं बोधी वृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

गया बिहार के महत्वपूर्ण तीर्थस्थानों में से एक है। यह शहर खासकर हिन्दू तीर्थयात्रियों के लिए काफी मशहूर है। यहां का विष्णुपद मंदिर पर्यटकों के बीच लोकप्रिय है। दंतकथाओं के अनुसार भगवान विष्णु के पांव के निशान पर इस मंदिर का निर्माण कराया गया है। हिन्दू धर्म में इस मंदिर को अहम स्थान प्राप्त है। गया पितृदान के लिए भी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यहां फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने से मृत व्यक्ति को बैकुंठ की प्राप्ति होती है।

गया मध्य बिहार का एक महत्वपूर्ण शहर है, जो गंगा की सहायक नदी फल्गु के पश्चिमी तट पर स्थित है। यह बोधगया से 13 किलोमीटर उत्तर तथा राजधानी पटना से 100 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। यहां का मौसम मिलाजुला है। गर्मी के दिनों में यहां काफी गर्मी पड़ती है और ठंड के दिनों में औसत सर्दी होती है। मानसून का भी यहां के मौसम पर व्यापक असर होता है। लेकिन वर्षा ऋतु में यहां का दृश्य काफी रोचक होता है।

23/02/2022

🌹 *प्रेरक कथा:*

*मैं ना होता तो क्या होता ?*

*हम सोचते है, मैं ना होता तो क्या होता?*

पर हनुमान जी, प्रभु श्रीराम से कहते है...
प्रभु, यदि मैं लंका न जाता, तो मेरे जीवन में बड़ी कमी रह जाती। विभीषण का घर जब तक मैंने नही देखा था, तब तक मुझे लगता था, कि लंका में भला सन्त कहाँ मिलेंगे...

"लंका निसिचर निकर निवासा, इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा"

प्रभु, मैं तो समझता था कि सन्त तो भारत में ही होते हैं। लेकिन जब मैं लंका में सीताजी को ढूंढ नहीं सका और विभीषण से भेंट होने पर उन्होंने उपाय बता दिया, तो मैंने सोचा कि अरे, जिन्हें मैं प्रयत्न करके नहीं ढूँढ सका, उन्हें तो इन लंका वाले सन्त ने ही बता दिया। शायद प्रभु ने यही दिखाने के लिए भेजा था कि इस दृश्य को भी देख लो।

और प्रभु, अशोक वाटिका में जिस समय रावण आया और रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर माँ को मारने के लिए दौड़ा, तब मुझे लगा कि अब मुझे कूदकर इसकी तलवार छीन कर इसका ही सिर काट लेना चाहिए, किन्तु अगले ही क्षण मैंने देखा कि मन्दोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया। यह देखकर मैं गदगद् हो गया।

ओह प्रभु, आपने कैसी शिक्षा दी! यदि मैं कूद पड़ता, तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मैं न होता तो क्या होता? बहुधा व्यक्ति को ऐसा ही भ्रम हो जाता है। मुझे भी लगता कि, यदि मैं न होता, तो सीताजी को कौन बचाता? पर आप कितने बड़े कौतुकी हैं? आपने उन्हें बचाया ही नहीं, बल्कि बचाने का काम रावण की उस पत्नी को ही सौंप दिया, जिसको प्रसन्नता होनी चाहिए कि सीता मरे, तो मेरा भय दूर हो। तो मैं समझ गया कि *आप जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं। किसी का कोई महत्व नहीं है।*

आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में बन्दर आया हुआ है, तो मैं समझ गया कि यहाँ तो बड़े सन्त हैं। मैं आया और यहाँ के सन्त ने देख लिया। पर जब उसने कहा कि वह बन्दर लंका जलायेगा, तो मैं बड़ी चिन्ता में पड़ गया कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा नहीं और त्रिजटा कह रही है, तो मैं क्या करूँ? पर प्रभु, बाद में तो मुझे सब अनुभव हो गया।

"रावण की सभा में इसलिए बँधकर रह गया कि करके तो मैंने देख लिया, अब जरा बँधके देखूं, कि क्या होता है। जब रावण के सैनिक तलवार लेकर मुझे मारने के लिए चले तो मैंने अपने को बचाने की तनिक भी चेष्टा नहीं की, पर जब विभीषण ने आकर कहा - दूत को मारना अनीति है, तो मैं समझ गया कि देखो, मुझे बचाना है, तो प्रभु ने यह उपाय कर दिया। सीताजी को बचाना है, तो रावण की पत्नी मन्दोदरी को लगा दिया। मुझे बचाना था, तो रावण के भाई को भेज दिया।

प्रभु, आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बन्दर को मारा तो नहीं जायेगा, पर पूँछ में कपड़ा-तेल लपेट कर घी डालकर आग लगाई जाय, तो मैं गदगद् हो गया कि उस लंका वाली सन्त त्रिजटा की ही बात सच थी। लंका को जलाने के लिए मैं कहाँ से घी, तेल, कपड़ा लाता, कहाँ आग ढूँढता! वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा लिया। जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं, तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !

*इसलिए यह याद रखें, कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है, वह सब इश्वरीय बिधान है। हम आप सब तो केवल निमित्त मात्र हैं।*

हरे कृष्ण! सुप्रभातं!!🙏🙏

10/11/2021

🙏छठ महापर्व 🙏
छठ पूजा की महिमा अपार-अम्पार है और कहा जाता है की छठी मैया हर मनोकामनाए पूर्ण करती है 🌹
*छठ महापर्व: बिहार में क्यों?*🙏

वैदिककालीन मध्य भारतवर्ष के कीकट प्रदेश में गयासुर नामक एक दानव रहता था| वह भगवान विष्णु का उपासक था| गयासुर की काया भीमकाय थी| कहते हैं कि, जब गयासुर पृथ्वी पर लेटता था, उसका सर उत्तरी भारत में होता तथा उसके पैर आंध्र क्षेत्र में होते थे| सबसे महत्वपूर्ण यह कि, उसका हृदयस्थल गया में होता था|🙏

देवता गयासुर से बहुत भयभीत रहते क्योंकि वह उनको अकारण परेशान किया करता था| देवता उससे मुक्ति चाहते थे और इस प्रयोजन के लिए उन्होने भगवान ब्रह्मा से विनती की| परंतु ब्रह्मा ने कुछ भी करने से मना कर दिया| उनका कहना था कि गयासुर भगवान विष्णु का परम भक्त है और बिना विष्णु की सहमति के उसका कुछ भी नहीं हो सकता|🙏

तत्पश्चात देवगण भगवान विष्णु की शरण में गये परंतु उन्होने अपने प्रिय उपासक का अंत करने में कोई रूचि नहीं दिखाई| तब देवों ने विष्णु से अनुरोध किया कि वह कम से कम अपने नाम से गयासुर के हृदयस्थल पर, जो गया में होता था, एक यज्ञ करने की अनुमति दे दें🌹

भगवान विष्णु ने भारी मन से गयासुर से यह बात कही| गयासुर को यह आभास था कि उसके हृदयस्थल पर इस यज्ञ के उपरांत उसका अंत हो जाएगा, परंतु उसने भगवान विष्णु की बात मान ली क्योंकि वह उनका परम उपासक था🙏

इसके बदले में भगवान विष्णु ने गयासुर को यह वरदान दिया कि उसका नाम सदा के लिए अजर-अमर हो जाएगा| भगवान ने कहा कि इस महाबलिदान के पश्चात गयासुर की हृदयस्थली गया में ही प्रत्येक हिंदू को सदैव अपने पितरों का पिन्डदान करना होगा| यह परंपरा गया में आज भी कायम है|🙏

अब देवगण इस महायज्ञ के लिए उचित पुरोहितों की खोज में लग गये परंतु उनको निराशा हाथ लगी| सब देवता नारदमुनि के पास गये, जिन्होने बताया कि ऐसे पुरोहित केवल शाक्य द्वीप (प्राचीन ईरान) से ही लाए जा सकते हैं🙏

शाक्य द्वीप के ये पुरोहित परम सूर्य उपासक होते थे| वे ‘मग ब्राह्मण’ के नाम से भी जाने जाते थे (सन्दर्भ, ‘विष्णुपुराण’ 2, 4, 6, 69, 71)| प्राचीन इरना भाषा मे ‘मग’ का अर्थ अग्नि पिंड, अर्थात सूर्य, होता है| सूर्यदेव को भगवान विष्णु का ही स्वरूप माना गया है| (‘मगध’ शब्द भी मग से ही उद्धरित है|)🙏

इसके उपरांत, सात सूर्य उपासक पुरोहित शाक्य द्वीप से गया क्षेत्र में लाए गये और उन्होने गयासुर के हृदयस्थल पर यज्ञ करके देवताओं को उससे मुक्ति दिलाई| इन पुरोहितों को ‘शाक्दीपी ब्राह्मण’ के नाम से जाना जाता है (सन्दर्भ, ‘महाभारत’, ‘भीष्मपर्व’, 12,33/ ‘भविष्य पुराण’, ‘ब्रह्मपर्व’ 139, 142)| इनके वंशज आज भी मगध क्षेत्र में निवास करते हैं|🙏

यह सात ब्राह्मण गया और आसपास के क्षेत्रों में बस गये| 1937-38 में गया जिले के गोविंदपुर में पाए गये आदेशपत्र में भी इनका वर्णन है|🙏

मग ब्राह्मणों का अनुसरण करते हुए, मगध क्षेत्र के निवासियों ने भी कालांतर में सूर्यदेव की औपचारिक उपासना करनी शुरू कर दी| 🙏

सूर्य ‘प्रत्यक्ष देव’ हैं और ‘सूर्य षष्ठी’ का वैज्ञानिक महत्व है| समय के साथ इस उपासना को ही ‘छठ महापर्व’ के रूप में मनाया जाने लगा|🙏

इस उपासना की पद्धति सरल थी तथा हिंदू जनमानस इसको कर पाने में सक्षम था| हालाँकि इस व्रत के साथ अत्यंत कठोर नियम संलग्न थे, परंतु इसको करने में पुरोहित की मध्यस्थता आवश्यक नहीं थी| कालांतर में सूर्य उपासना का महत्व बढ़ता गया और छठ महापर्व अत्यंत लोकप्रिय होता गया| इसका प्रमुख कारण यह था कि इस व्रत के करने से उपासक और उनके परिवारजनों को लाभ प्राप्त होता था|🙏

तथापि, छठ महापर्व का उद्भव मगध (मगह) क्षेत्र में ही हुआ और कालांतर में यह पर्व बाकी स्थानों में भी मनाया जाने लगा| शाक्दीपी ब्राह्मणों ने मगध क्षेत्र के सात स्थानों पर सूर्य मंदिरों की स्थापना की, जैसे कि देव, उलार, ओंगारी, गया और पंडारक| देव का छठ सबसे पवित्र माना गया है| गया धाम – जो हिंदुओं का एकमात्र पित्रतीर्थ है – के पंडे भी अपने आपको अग्निहोत्री ब्राह्मण कहते हैं| अग्निहोत्री का सीधा सन्दर्भ सूर्य से ही है🙏

छठ महापर्व में सूर्यदेव के साथ-साथ, ‘उषा’ और ‘प्रत्युषा’ की भी उपासना की जाती है| उषा का अर्थ होता है प्रातःकाल, और प्रत्युषा का अर्थ सांध्यकाल| उषा तथा प्रत्युषा – जो छठी मैया के नाम से लोकप्रिय हैं – सुर्यदेव की संगिनी मानी जाती हैं| यही कारण है कि छठ महापर्व के दौरान, उपासक अस्तगामी और उगते सूर्य की भी आराधना करते हैं|🙏

ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण के पुत्र संब और राजा प्रियव्रत ने भी मगध क्षेत्र में छठ व्रत किया और लाभ पाया| 🙏

ॐ सूर्य देवं नमस्ते स्तु गृहाणं करूणाकरं |
अर्घ्यं च फ़लं संयुक्त गन्ध माल्याक्षतैयुतम् ||🙏

परमपिता श्री सूर्यदेव और परममाता श्री प्रत्यूषा एवं श्री ऊषा आपकी सभी मनोकामनायें पूरी करें🙏
लोक आस्था के महापर्व छठ व्रत की मंगलकामनाये🙏

21/10/2021

दिवाली की रात को लक्ष्मी जी हमारे घर आती है...
***

चूंकि मैं सपरिवार पश्चिमी सभ्यता और परिवेश में रहता हूँ, मुझे यह स्पष्ट हो गया था कि सांता क्लॉज़ की कहानी का मेरे पुत्र पे असर पड़ेगा. आखिरकार, प्राइमरी स्कूल और मोहल्ले के मित्र उत्साह के साथ उसे बताएंगे कि उन्होंने सांता से क्या माँगा, रात में सांता उन्हें क्या उपहार देकर चला गया. फिर पुत्र भी सांता की विजिट की प्रतीक्षा करेगा और अगर उसे उपहार ना मिला तो निराश होगा.

लेकिन मुझे यह भी पता था कि दिवाली को लक्ष्मी जी हमारे घर आती है और हमको समृद्धि का आशीर्वाद देकर जाती है. साथ ही, हर सनातनी परिवार में दिवाली की पूजा के बाद बच्चो के हाथ में कुछ रुपये या फिर उपहार देने की परंपरा रही है.

अतः, मैंने बेटे को बताया कि लक्ष्मी जी दिवाली की रात को हमारे घर आएंगी और उसके लिए कुछ धन और खिलौने छोड़कर जायेगी. और जब वह सुबह उठा, तो उसने अपने बिस्तर के निकट लक्ष्मी जी द्वारा छोड़े गए धन और खिलौने को पाया. अब उसके उत्साह और प्रसन्नता का ठिकाना ना था.

अतः इस दिवाली को बच्चो को पूजा के बाद आशीर्वाद अवश्य दीजिये, लेकिन अगर आप उचित समझे तो बच्चो को बताइये कि रात को लक्ष्मी जी उसके रूम में उपहार छोड़कर जायेगी. आज से ही बच्चो को यह बतलाना शुरू कर दीजिये.

अब मैं सोचता हूँ कि लक्ष्मी जी के साथ मैं गणेश जी को भी जोड़ देता और बेटे को बताता कि लक्ष्मी जी उल्लू पे और गणेश जी चूहे पे सवार होकर उसके रूम में आशीर्वाद और उपहार देने आएंगे, तो इससे अधिक रोमांचक घटना किसी बच्चे के लिए हो ही नहीं सकती.

और हाँ, प्रयास कीजिए कि खिलौने भारत में बने (मेड इन इंडिया) हुए होने चाहिए।

हमारे पुराण, हमारी कथाएं, हमारी आस्था पूरे विश्व में अनूठी है, रंगो से भरपूर हमारे विश्वास की डोर से बंधी है.

क्या किसी बेगानी शादी में दीवाने अब्दुल्ला की तरह नाचना आवश्यक है?

26/09/2021

#श्राद्ध_पक्ष :

'वायु पुराण' में आत्मज्ञानी सूत जी ऋषियों से कहते हैं- "हे ऋषिवृंद ! परमेष्ठि ब्रह्मा ने पूर्वकाल में जिस प्रकार की आज्ञा दी है उसे तुम सुनो। ब्रह्मा जी ने कहा हैः 'जो लोग मनुष्यलोक के पोषण की दृष्टि से श्राद्ध आदि करेंगे, उन्हें पितृगण सर्वदा पुष्टि एवं संतति देंगे। श्राद्धकर्म में अपने प्रपितामह तक के नाम एवं गोत्र का उच्चारण कर जिन पितरों को कुछ दे दिया जायेगा वे पितृगण उस श्राद्धदान से अति संतुष्ट होकर देनेवाले की संततियों को संतुष्ट रखेंगे, शुभ आशिष तथा विशेष सहाय देंगे।"

सूक्ष्म जगत के लोगों को हमारी श्रद्धा और श्राद्ध से दी गयी वस्तु से तृप्ति का एहसास होता है। बदले में वे भी हमें मदद करते हैं, प्रेरणा देते हैं, प्रकाश देते हैं, आनंद और शाँति देते हैं। हमारे घर में किसी संतान का जन्म होने वाला हो तो वे अच्छी आत्माओं को भेजने में सहयोग करते हैं। श्राद्ध की बड़ी महिमा है। पूर्वजों से उऋण होने के लिए, उनके शुभ आशीर्वाद से उत्तम संतान की प्राप्ति के लिए श्राद्ध किया जाता है।

18/09/2021

🌹 _*आज (१८/०९/२०२१) वामन द्वादशी के पावन अवसर पर आप सभी को बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं*_

*भगवान विष्णु ने इन्द्र का देवलोक में अधिकार पुनः स्थापित करने के लिए वामन अवतार लिया।* देवलोक असुर राजा बली ने हड़प लिया था। बली विरोचनके पुत्र तथा प्रह्लाद के पौत्र थे और एक दयालु असुर राजा के रूप में जाने जाते थे। यह भी कहा जाता है कि अपनी तपस्या तथा ताक़त के माध्यम से बली ने त्रिलोक पर आधिपत्य हासिल कर लिया था।

वामन देव, एक बौने ब्राह्मण के वेष में बली महाराज के पास गये और उनसे अपने रहने के लिए तीन कदम के बराबर भूमि देने का आग्रह किया। उनके हाथ में एक लकड़ी का छाता और एक कमंडल था। गुरु शुक्राचार्य के चेताने के बावजूद बली महाराज ने वामन को वचन दे डाला।

तदुपरांत वामन देव ने अपना आकार इतना बढ़ा लिया कि पहले ही कदम में पूरा भूलोक (पृथ्वी) नाप लिया। दूसरे कदम में देवलोक नाप लिया। वहाँ ब्रह्मा जी ने अपने कमण्डल के जल से वामन देव के पाँव धोये। इसी जल से गंगा उत्पन्न हुयीं।

तीसरे कदम के लिए कोई भूमि बची ही नहीं। वचन के पक्के बली महाराज ने तब वामन देव को तीसरा कदम रखने के लिए अपना सिर प्रस्तुत कर दिया। वामन देव बली की वचनबद्धता से अति प्रसन्न हुये। चूँकि बली महाराज के दादा प्रह्लाद विष्णु के परम् भक्त थे, वामन देव ने बली को पाताल लोक देने का निश्चय किया और अपना तीसरा कदम बली के सिर में रखा जिसके फलस्वरूप बली पाताल लोक में पहुँच गये।

*विस्तृत कथा जानने के लिये श्रीमद् भागवतम् के आठवें स्कंध का अध्याय १८ तथा १९ पढ़िये।*

🌹 *जय श्री श्री वामन देव आभिर्भाव दिवस की*

हरे कृष्ण!! सुप्रभातम्!!!🙏🙏

15/09/2021

*जीवितपुत्रिका जिउतिया व्रत 29 को है।
28 को नहाय खाय*
29 जिउतिया व्रत
30 को सुबह में प्रातः कालीन पारण

आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जीवित पुत्रिका व्रत मनाया जाएगा। इसे जिउतिया के नाम से भी जाना जाता है। इस बार यह 29 सितंबर को पड़ रहा है। इस दिन महिलाएं संतान की दीर्घायु व मंगल कामना को लेकर 24 घंटे का उपवास रखेंगी। वही खरजीउतिया करने वाली महिलाएं दिनभर उपवास रखकर शाम को तारा देखने के बाद अन्न- जल ग्रहण करेंगी।
महिलाएं पितराइनों को झिगुनी के पत्ते पर खरी व तेल रखकर अर्पण करेंगी। महिलाएं जिउतिया के भोर में चूल्हो, सियार व पितर- पितराइन को व्रती अपने कुल की परंपरा के अनुसार नैवेद्य अर्पण करती है। शाम को नहा- धोकर जीमूत वाहन भगवान की पूजा-अर्चना करेंगी। गले में जितिया की माला भी धारण करेंगी।
आचार्य रत्नेश तिवारी बताते हैं कि वंश वृद्धि व संतान की लंबी आयु के लिए महिलाएं इस व्रत को करती है। इससे संतान की ओर आने वाली विपदा दूर हो जाती है।
यह व्रत का महत्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। जब भगवान श्री कृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में पल रहे पांडव पुत्र की रक्षा के लिए अपने सभी पुण्य कर्मों से पुनर्जीवित किया था। तब से ही स्त्रियां आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को निर्जला व्रत रखती है। नहाए खाए के दिन भोर में दही और चूड़ा खाती है। इस में उदय अष्टमी को व्रत करना चाहिए ।सप्तमी युक्त अष्टमी का त्याग करके अष्टमी युक्त नवमी तिथि को व्रत करना चाहिए और अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत का पारण करना चाहिए।5h*जीवितपुत्रिका जिउतिया व्रत 29 को है।
28 को नहाय खाय*
29 जिउतिया व्रत
30 को सुबह में प्रातः कालीन पारण

आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जीवित पुत्रिका व्रत मनाया जाएगा। इसे जिउतिया के नाम से भी जाना जाता है। इस बार यह 29 सितंबर को पड़ रहा है। इस दिन महिलाएं संतान की दीर्घायु व मंगल कामना को लेकर 24 घंटे का उपवास रखेंगी। वही खरजीउतिया करने वाली महिलाएं दिनभर उपवास रखकर शाम को तारा देखने के बाद अन्न- जल ग्रहण करेंगी।
महिलाएं पितराइनों को झिगुनी के पत्ते पर खरी व तेल रखकर अर्पण करेंगी। महिलाएं जिउतिया के भोर में चूल्हो, सियार व पितर- पितराइन को व्रती अपने कुल की परंपरा के अनुसार नैवेद्य अर्पण करती है। शाम को नहा- धोकर जीमूत वाहन भगवान की पूजा-अर्चना करेंगी। गले में जितिया की माला भी धारण करेंगी।
आचार्य रत्नेश तिवारी बताते हैं कि वंश वृद्धि व संतान की लंबी आयु के लिए महिलाएं इस व्रत को करती है। इससे संतान की ओर आने वाली विपदा दूर हो जाती है।
यह व्रत का महत्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। जब भगवान श्री कृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में पल रहे पांडव पुत्र की रक्षा के लिए अपने सभी पुण्य कर्मों से पुनर्जीवित किया था। तब से ही स्त्रियां आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को निर्जला व्रत रखती है। नहाए खाए के दिन भोर में दही और चूड़ा खाती है। इस में उदय अष्टमी को व्रत करना चाहिए ।सप्तमी युक्त अष्टमी का त्याग करके अष्टमी युक्त नवमी तिथि को व्रत करना चाहिए और अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत का पारण करना चाहिए।

आयें , अपनी धरोहर नगरी, सभ्यता के विकास के समय से आदर्श, गयाजी को अपने जीवन काल में बर्बाद होने से बचाने के लिए,   अब   ...
30/08/2021

आयें , अपनी धरोहर नगरी, सभ्यता के विकास के समय से आदर्श, गयाजी को अपने जीवन काल में बर्बाद होने से बचाने के लिए,
अब
अड़े ,
लड़े
सधन्यवाद

14/08/2021

धरोहर नगरी, गयाजी/ गया शहर का अस्तित्व आज ख़तरे में है । हम गयावासियों का आज .पहला पुनीत कार्य , फल्गु जी के अस्तित्व बचाने का आ गया है । फल्गु जी अंत: सलिला है । किसी भी मौसम में , हम बालू हटा कर , अर्थात गढ़ा कर , पानी पा लेते हैं , मौसम या इन्द्र जी की कृपा से ,गढ़े की गहराई में अन्तर हो सकता हैं ।
शास्त्रानुसार ,नदियाँ स्त्री लिंग होती हैं, पर अपवाद में कुछ नदीयाँ पुलिंग है । उनमें एक फल्गु जी भी है । फल्गु जी का उद्गम, गया— बौद्धगया पथ , जो फल्गु जी के समानांतर है के अवमॉ गाँव से आगे और खिरीयावॉ के बीच , मुहाने, निरंजना और सरस्वती नदी के संगम से प्रारंभ होकर उदेरास्थान ( खिजरसराय ) के पास तक है । फल्गु जी न किसी पहाड़ से प्रारंभ होते है और न किसी बड़ी नदी में जाकर समाप्त । फल्गु जी का सारा पानी खेतों और भूमि में स्वत: जाता है ।फल्गु जी के जल ,पईन द्वारा अपने पूरब और पश्चिम के खेतों में स्वत: पहुँच जाता है ।
फल्गु जी के तट पर महान विस्तारित गया जी / गया शहर बसा है ।
फल्गु जी में रबड़ लाइनिंग किया जा रहा है। रबड़ लाइनिंग को समझने के लिए एक उदाहरण देना चाहता हूँ । गावँ या शहरों में भी आस्था के पर्व छठ में आदित्य को अर्ग देने के लिए, गढ़ा कर हम उसके उपर - अन्दर प्लास्टिक बिछा देते हैं , जिससे प्लास्टिक के उपर का पानी गंदा नहीं होता हैं और न पानी ज़मीन के अन्दर जाता है । अर्थात् फल्गु जी का अस्तित्व अब खतरे में है। फल्गु नदी को अंत: सलिला के नाम से भी जाना जाता है,अंत: सलिला का मतलब अंदर से जल का प्रवाह, जब रबड़ लाइनिंग किया जायेगा तो पानी का रिसाव बालू के अंदर नहीं है पायेगा, जिसका परिणाम गया शहर के जलस्तर की कमी महसूस होगी।
गया जिलावासियों को भूजल स्तर कम होने से आनेवाले समय में अनेक तरह के किल्लत हो सकती है, साथ साथ फल्गु जी के मधुर पानी और श्राद्ध के लिये बालू का महत्व भी कम हो जायेगा। प्रकृति से खिलवाड़ करने का हक किसी को नहीं है ।
प्रकृति से खिलवाड़ के ही कारण ही असामायिक बारिश, भूस्खलन, भूकंप और अनेकों प्रकार वैश्विक महामारी फैलती है। आज़ तक कोई भी देश प्रकृति आपदाओं से बचने में कामयाब नहीं हो सका है। वेद शास्त्रों ने प्रकृति आपदाओं से बचने का उपाय विश्व को बताया है।
अत: यह अत्यंत शोचनीय, विचारणीय हैं ? ? ?

08/08/2021

हिन्दू इतने वफादार है कि आज तक गुलामी कर रहे है
हिन्दुओ को पीर मजार और दरगाहों पर चादर चढ़ाने का बड़ा शोक है !
भले ही मज़ार की कब्रो के अंदर उनके पूर्वजों के कातिल की ही लाश क्यों न सड़ रही हो।

*पीर का अर्थ*
क्यों पूजें जाते हैं पीर, मजार ?
😠😠😠😠😠😠😠😠
आपने भी हरी चादर लेकर घूमते कुछ दाढी वालों को देखा होगा या बहुत लोग पीर की पूजा करने जाते हैं। आखिर क्या है पीर??

👉पीर का मतलब???
मुस्लिम राजा का यह एक अधिकारी होता था, जिसे पीर कहा जाता था। जिसकी नौ गज के घेरे तक सुरक्षा रहती थी, जैसे आजकल सुरक्षा कमांडो मुख्यमंत्री को घेरा बनाकर चलते हैं। गावों में लगान आदि इकट्टा करने का जिम्मा पीर का होता था! रैवैन्यु गांव के एक निश्चित स्थान पर सभी लोग उस पीर के पास जाकर मुगलों का टैक्स देते थे! वो टैक्स केवल हिंदूओं पर ही था जिसको जजिया कर भी कहते थे!

जो हिन्दू परिवार वह जजिया कर देने से मना कर देता था, तो उस पीर के साथ नौ गज के घेरे में रहने वाले सुरक्षा कर्मी , गांव में सबके सामने उस जजिया कर न चुकाने वाले परिवार की सबसे सुंदर बहु या बेटी को नंगा करके लाते थे, व सबके सामने उसके साथ बलात्कार किया जाता था, ताकि किसी की हिम्मत ना पड़े बाद में जजिया कर देने से मना करने से! सबके सामने हो रहे इस घिनौने बलात्कार के समय कुछ लोग उस बहु बेटी के उपर चादर डाल देते थे, व गांव के बाकी लोग डर के मारे लगान व जजिया कर (पैसा) उसी चादर के उपर या उसके पास धड़ाधड़ डालते चले जाते थे!

और हाथ जोड़ लेते थे सिर झुकाते थे कि कहीं उनके उपर भी पीर या उसके नौ गज के घेरे वाले सुरक्षा देने वाले मुल्ले कोई अत्याचार ना करें!

👉क्यू पूजा करते हैं पीर मजार की???
यह है उन पीरों की सच्चाई, जब वह दुष्ट नीच पीर मरे थे तब भी मूर्ख अज्ञानी हिंदुओ में उनके प्रति वही घबराहट व भयंकर खौफ बना रहा, और फिर यह पीढी दर पीढी परम्परा लोगों के दिमाग में बैठ गई। ऐसे राक्षस पीरों के मरने के सदियों बाद भी मूर्ख हिंदु डर के मारे उनकी कब्रों पर वही चादर व पैसा चढ़ाता है!
अर्थात् जिस जिस नीच पीर ने मूर्ख हिंदुओं की बहिन बेटियों की इज्जत लूटी, यह मूर्ख उनकी ही कब्रों (पीरो) पर माथा रगड़ता फिरता है! कहीं नौकरी मांगता फिरता है तो कहीं पुत्र और धन दौलत व व्यापार या तरक्की के लिए माथा रगड़ता है।
क्या इससे अधिक कायरता व मूर्खता की मिसाल दुनियां में कहीं मिल सकती है!

*विशेष:--* पीर से ज्यादा अधिकार और क्षेत्रफल ख्वाजा के पास होता था और वह पीर से भी ज्यादा अत्याचार लुटखसूट करता था और उससे भी ज्यादा अधिकार सैय्यद को मिले होते थे। और वह अपने अधिन जनता पर अत्याधिक अनाचार अत्याचार दुराचार करता था उसी भय से आज भी हिन्दू उनसे डरते हैं और उनकी मजारों पर चदर चढ़ाते हैं और उनकी जय तक बोलते हैं।

इस जानकारी को सार्वजनिक कर के सभी सनातन धर्म के सभी अनुयायियों तक पहुचे यह आप का काम है! ताकि मानसिक गुलामी में जी रहे लोगों तक असलियत का पता चल सके!

*यह जानकारी पूरी तरह से तथ्यों पर आधारित है! आप इस के कुछ इतिहास के हिस्सों की जानकारी बीकानेर के संग्रहालय में रखे दस्तावेज़ों से प्राप्त किया जा सकता है
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21/06/2021

🌹 *आज पांडव / भीमसेनी “ निर्जल एकादशी “ है, पिछले एक वर्ष में यदि किसी एकादशी का व्रत किसी कारण न रख सके हों तो यह एकादशी निर्जल व्रत अवश्य करना चाहिए।*
🙏🙏

21/06/2021

🌹श्रीमद्भागवतं के *महात्म्य* का प्रथम श्लोक -

सच्चिदानन्द रूपाय विश्व उत्पत्यादिहेतवे।
तापत्रय विनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः॥
........उत्पति:– *प्रारम्भ, निर्माण।*

प्रश्न:- *कृष्ण के पहले और कुछ था?*

उत्तर:- *नहीं,* श्रीमद्भागवत में भगवान कहते है कि :-
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद यत् सदसत परम।
पश्चादहं यदेतच्च योSवशिष्येत सोSस्म्यहम।।

*‘मेरे सिवा और कुछ नहीं था, न ही इस सृष्टि के तत्त्व थे, न ही यह सृष्टि’। यह प्रमाण है कि भगवान कृष्ण के अलावा कुछ नहीं था। वो ही इस इस सकल संसार के रचैयता हैं।*

आदि:- इस शब्द को जब हम श्लोक के स्थूल रूप में लेते हैं तो शब्दार्थ होता है ‘इत्यादि’, परन्तु जब हम उसके भावार्थ को समझें तो अर्थ आता है - *‘पोषण एवं संहार’*। क्योंकि उत्पति की पहले व्याख्या की है तो सरल है कि पोषण एवं संहार ही होना चाहिए।

प्रश्न:- *पोषण एवं संहार कौन करता है?*

उत्तर:- *मूल तत्त्व केवल भगवान कृष्ण हैं परन्तु इस सकल संसार के लिया अन्य देवी देवता भगवान की आज्ञा से सृष्टि सेवा में व्यस्त हैं।*

हेतवे:- जिसका हेतु, निर्माता, बीज, कर्ता।

तापत्रय :- तीनों दुःख का विभाजन: अध्यात्मिक, अधिदैविक एवं अधिभौतिक।

विनाशाय:- संपूर्ण नष्ट करता है।

श्री:- श्री राधा।

प्रश्न:- *यह राधा का नाम क्यों?*

उत्तर:- *वैदिक धर्मं अनुसार, जब हम प्रभु का नाम लेते हैं, उसके पहले हम उनकी दिव्य शक्ति का आवाहन एवं स्मरण करते हैं। श्री राधा, श्रीकृष्ण की अविच्छिन्न आह्लादिनी शक्ति हैं। श्री राधाजी की कृपा से ही जीव श्री कृष्ण प्रेम को अनुभव कर सकते हैं।*

कृष्णाय:- उस कृष्ण को जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान है।

वयम:- हम सब जीव।

नुमः :- नमन करते है।

हम जब इस श्लोक का विभाजन करते हैं तो *श्री कृष्ण के तीन लक्षणों के दर्शन होते हैं, वो हैं - स्वरूप, कार्य और स्वभाव।* सत, चित और आनंद, श्री कृष्ण का स्वरूप दर्शन है। श्री कृष्ण का कार्य दर्शन है इस सकल संसार की उत्पत्ति, पालन एवं अंत में संहार, एवं तीसरा दर्शन है भगवान का स्वभाव, जो संतों, भक्तों एवं साधकों के तीनों दुःख को मूल से विनाश कर देते है।

हरे कृष्ण! सुप्रभातं!!🙏🙏

20/06/2021

*गंगा दशहरा पर्व*
आप सभी सनातनीयों को सादर प्रणाम🙏
आज *20 जून 2021(रविवार)* को गंगा दशहरा का पर्व मनाया जाएगा। इस वर्ष गंगा दशहरा पर्व पर चित्रा नक्षत्र के साथ सर्वार्थ सिद्धि (रवि योग व आंनदादि) योग बन रहे हैं।
*क्यों मनाया जाता है गंगा दशहरा ?*
हर वर्ष हम गंगा दशहरा पर्व मनाते हैं “ गंगा दशहरा गंगा मैय्या को समर्पित “ एक पर्व है, जिसे ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। गंगा दशहरा मां गंगा के पृथ्वी पर अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है।
(गंगा दशहरा के दिन प्रातःकाल उठकर गंगा जी में स्नान करना चाहिए परन्तु *(वर्तमान में कोराना के चलते केवल सांकेतिक स्नान ही किया जा सकता है * ) यदि यह संभव न हो तो स्नान करने वाले पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। उसके बाद सूर्य देव को गंगा जल मिले जल से जल अर्पित करें। घर में पूजा स्थल पर जाकर यथावत पूजा संपन्न कर भोग व आरती पूर्ण श्रद्धा से अर्पित करें )
*कैसे आई धरती पर गंगा ?*
स्कन्दपुराण के अनुसार माना जाता है भागीरथ अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए धरती पर गंगा को लाना चाहते थे *(गंगा को धरती पर लाना इसलिए जरूरी था क्योंकि पृथ्वी का सारा जल अगस्त्य ऋषि पी गये थे और पुर्वजों की शांति तथा तर्पण के लिए कोई नदी धरती पर बची नहीं थी।)* क्योंकि एक श्राप के कारण केवल मां गंगा ही उनका उद्धार पर सकती थी। जिसके लिए उन्होंने मां गंगा की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा ने दर्शन दिए और भागीरथ ने उनसे धरती पर आने की प्रार्थना की। फिर मां गंगा ने प्रसन्न होकर कहा “मैं धरती पर आने के लिए तैयार हूं , लेकिन मेरी तेज धारा धरती पर प्रलय ले आएगी। जिस पर भागीरथ ने उनसे इसका उपाय पूछा और मां गंगा ने भगवान भोलेनाथ जी को इसका उपाय बताया। मां गंगा के प्रचंड वेग को नियंत्रित करने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में समा लिया जिससे धरती को प्रलय से बचाया जा सके और तत्पश्चात गंगा मां को नियंत्रित वेग से पृथ्वी पर जनमानस के उद्धार के लिए प्रवाहित किया। जिसके बाद भागीरथ ने अपने पूर्वजों की अस्थियां प्रवाहित कर उन्हें मुक्ति प्रदान की व पवित्र मां गंगा को धरती पर ला कर जनमानस का कल्याण किया।
*उत्तराखंड में कैसे बनाया जाता है गंगा दशहरा*
उत्तराखण्ड में गंगा दशहरा पर्व मनाने का एक अलग ही उत्साह है, यहां पर गांव-कस्बों में दशहरा पर्व पर मंदिरों के चैखटों में रंग-बिरंगे द्वार पत्र लगाये जाते हैं गांव के कुल पुरोहित अपने हाथों से द्वार पत्र बनाते है व अपने हाथों से इन्हें यजमानों को दिया करते हैं और बदले में उन्हें यजमानों द्वारा श्रद्धा पूर्वक दक्षिणा प्रदान की जाती है। उन द्वार पत्रों को घर के मुख्य द्वार पर मंदिर व घर के सभी द्वार पर चिपकाया जाता है। मान्यतानुसार यह द्वार पत्र सुरक्षा कवच की तरह काम करता है इससे सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है दशहरा द्वार पत्र रंग-बिरंगी आकृतियों में बनाए जाते है परंतु अब बाज़ार से छपे हुए दशहरा पत्र चलन में दिखाई देते हैं। दशहरा पत्र को पुरोहितों द्वारा सुरक्षा मंत्र से पूरित किया जाता है इसमें लिखा एक मंत्र इस तरह का है-
अगस्त्यश्च पुलस्त्यश्च वैशम्पायन एव च
सुमन्तुजैमिनिश्चैव पञ्चते वज्रवारकाः
मुनेः कल्याणमित्रस्य जैमिनेश्चापि कीर्तनात्
विद्युदग्निभयं नास्ति लिखितं गृहमण्डले
यत्राहिशायी भगवान् यत्रास्ते हरिरीश्वरः
भङ्गो भवति वज्रस्य तत्र शूलस्य का कथा ।।
आप सभी को गंगा दशहरा पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं घर पर रहिए सुरक्षित रहिए 🙏

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