31/05/2023
#अष्टावक्र_की_कहानी_प्रभु_की_जुबानी
नोट=अगर आप सच में एक पाठक हैं तब ही इसे पढ़िएगा। समय निकाल जरूर पढ़ें ज्ञान चक्षु खुल जायेगा
एक ऋषि हुए कहोड़ नामक। वो राजमहल पहुंचना चाहते थे वो कहीं सुनें थे की राजा जनक (यहां बता दूं जनक एक नहीं हुए रामायणकालीन जनक ये नहीं हैं ,जनक १९ हुए हैं इस पृथ्वी पर)।विद्वान ब्राह्मणों को सम्मान करते हैं संकट के समय उन्हें आर्थिक सहायता करने में किंचित भी विलंब नहीं करते।
आज कहोड को भी राज सहायता की आवश्यकता थी। उनकी पत्नी सुजाता गर्भवती थी और किसी भी दिन शिशु को जन्म दे सकती थी। आसन्न शिशु के संस्कार के लिए धनाभाव था और राजा जनक से यह धन उन्हें सहज ही उपलब्ध हो सकता था। यद्यपि गर्भस्थ शिशु से कहोड को कोई विशेष मोह नहीं था, बल्कि वह उससे क्षुब्ध थे, किंतु शिशु जन्म के विधि-विधानों का पालन करना उनकी विवशता ही नहीं, कर्त्तव्य भी था।
कहोड वेदशास्त्र के निष्णात विद्वान और सुप्रसिद्ध वेदांताचार्य उद्दालक के परमप्रिय शिष्य थे। कहोड की वेद ज्ञान के प्रति उत्कट उत्कंठा देखकर उद्दालक चकित थे। आज तक उन्होंने ऐसा शिष्य नहीं देखा था, जो वेदों के प्रत्येक शब्द को, उसके अर्थ को और उसकी मीमांसा को अत्यंत आतुरतापूर्वक हृदयंगम करता हो। अध्ययन के प्रति उसकी रुचि से वह मुग्ध थे।
कहोड ने शीघ्र ही वेदों का सांगोपांग अध्ययन पूर्ण कर लिया तो उद्दालक यह सोचकर चिंतित हो गए कि कहोड स्नातक होकर उन्हें छोड़कर चला जाएगा। कहोड के बिना आश्रम निस्संदेह सूना हो जाएगा, किंतु वह कर ही क्या सकते थे। शिष्य उनके यहां विद्यार्जन के लिए आते थे और स्नातक होने के पश्चात चले जाते थे। ऐसा ही वर्षों से होता आ रहा था। कहोड़ का जाना भी निश्चित था, किंतु ऐसा ज्ञानपिपासु शिष्य उन्हें पुनः नहीं मिलेगा। योग्य, विवेकवान और वेद-निष्णात था और प्रत्येक गुरु ऐसा शिष्य पाकर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करता है।
जिस दिन कहोड को आश्रम से विदा होकर जाना था, उद्दालक का हृदय बैठा जा रहा था। आंखें सूनी थीं और चेहरे पर विषाद छाया हुआ था।
"विदा की बेला में कहोड उनके निकट आया और चरण स्पर्श करने के पश्चात हाथ जोड़कर बोला, "गुरुदेव, आज्ञा दीजिए।" उद्दालक ने उसके दोनों हाथ थामकर कंपित स्वर में कहा, "बत्स मुझे
प्रसन्नता है कि तुमने स्वयं को वेदों का उत्तम ज्ञाता सिद्ध कर दिया। तुम जहाँ
भी जाओगे, विजयश्री का वरण करोगे। किंतु तुम्हें यहां से विदा करने को जी
नहीं चाहता।' " "गुरुदेव ! विदाई का समय सदैव पीड़ादायक होता है। मैं भी आपसे विलग होते हुए अत्यंत कष्ट का अनुभव कर रहा हूं।"
एकाएक उद्दालक की दृष्टि सुजाता पर पड़ी। वह नदी से कलश भरकर
आश्रम की ओर आ रही थी। जैसे ही वह भोजन कक्ष में प्रविष्ट हुई, उद्दालक - का मुखमंडल खिल उठा। उन्होंने कहोड से कहा, "वत्स! मेरी हार्दिक इच्छा थी कि तुम आश्रम छोड़कर कभी न जाओ। मैं तुम्हारी अनुपस्थिति सहन नहीं कर सकूंगा।"
"गुरुदेव! सच तो यह है कि आपके सान्निध्य में रहते हुए मुझे भी अत्यंत हर्ष होता, किंतु मेरा अध्ययन काल समाप्त हो गया है, अतः यहां रहने का प्रयोजन ही कहां रहा?"
"ऐसा मत सोचो वत्स! कोई भी आश्रम तुम्हारे जैसे विद्वान शिक्षक को
पाकर प्रसन्नता का अनुभव करेगा।' कहोड चकित होकर बोला, "मैं कुछ समझा नहीं, गुरुदेव! "
'वत्स! यहां से जाकर तुम जीविकोपार्जन के लिए कोई तो उद्योग करोगे. ही मैं चाहता हूं, तुम इसी आश्रम में रहकर अध्यापन का कार्यारंभ करो।'
हर्षावेग से कहोड़ की आंखें चमकने लगीं, बोला, "यह तो मेरा अहोभाग्य है गुरुदेव! वर्षों से मैं इस आश्रम से संबद्ध रहा हूं, इसे छोड़ने की कल्पना से मेरा हृदय विगलित हो रहा था।"
"यही दशा मेरी भी थी वत्स! तुमने यहां रहने का निश्चय कर मुझ पर उपकार ही किया है।"
"ऐसा मत कहिए गुरुदेव ! वस्तुतः मैं कृतार्थ हूं कि आपने मुझे यहां रहने का स्वर्णिम अवसर प्रदान किया। आपके सान्निध्य में मुझे ज्ञान-प्राप्ति हुई है, अब इसी ज्ञान को अन्य शिष्यों के साथ पुनः मनन करना निस्संदेह मेरे लिए
नई अनुभूति होगी। मैं आश्रम का भाग था, भाग हूं और जब तक आपकी अनुमति होगी, तब तक रहूंगा।"
उद्दालक ने कहोड को आलिंगनबद्ध किया और स्नेहपूर्वक बोले, "तुम सदैव आश्रम के अटूट भाग बने रहोगे, मेरे पुत्र! मैं चाहता हूँ, तुम सुजाता को पत्नी के रूप में अंगीकार करो।
"गुरुदेव! " कहोड को अपने कानों पर मानो विश्वास ही नहीं हुआ। "हां पुत्र! तुम्हारे जैसे योग्य दामाद को पाकर किसे प्रसन्नता नहीं होगी।"
कहोड़ आगे कुछ बोल नहीं पाया था।
राजमहल की ओर जाते हुए कहोड को सबकुछ याद था। यह एक वर्ष पहले की बात थी। गुरुपुत्री सुजाता को उन्होंने आश्रम में कई बार देखा था और कभी कल्पना तक नहीं की थी कि एक दिन वह उनके जीवन में पत्नी के रूप में प्रवेश करेगी। सुजाता अनिंद्य सुंदरी और सुघड़ थी। गुरुपुत्री के नाते वह उसका सम्मान करते थे।
उद्दालक ने विलंब नहीं किया था, उसी सप्ताह वह कन्यादान के कर्त्तव्य से मुक्त हो गए। पाणिग्रहण के समय सुजाता अपूर्व लावण्यमयी प्रतीत हो रही थी।
कहोड सोच रहे थे, कितना शीघ्र एक वर्ष की अवधि व्यतीत हो गई थी। इसी बीच उद्दालक के पुत्र का भी विवाह हो गया था। कहोड आश्रम में शिष्यों को वेदाध्ययन कराते थे। शिष्य उनकी पांडित्यपूर्ण शिक्षणशैली से अत्यंत प्रभावित थे। वे उनका आदर करते थे।
कुछ माह पश्चात सुजाता गर्भवती हो गई। उसका चेहरा अद्भुत गर्व से दीप्त हो गया था। कहोड भी पिता बनने की अनुभूति से अत्यंत हर्षित थे।
कहोड सदैव रात को वेदों का अध्ययन-मनन करते थे। निकट ही चटाई पर सुजाता लेटी होती थी और पति को श्लोकोच्चार करते देखती सुनती थी। गर्भधारण करने के पश्चात भी उसका यह अभ्यास बना हुआ था। वह कहोड के होंठों से निकले श्लोकों को ध्यानपूर्वक सुनती थी। पहले वह अधिक रुचि नहीं लेती थी, किंतु अब उसे मानो कोई अपरिचित शक्ति प्रेरित करती थी और वह पति की जिल्ला से निसृत एक-एक शब्द को हृदयंगम करती थी।
गर्भकाल के आठवें महीने सुजाता को एकाएक वेदों से विरक्ति होने लगी। उसे श्लोक निरर्थक प्रतीत होते थे। एक रात विचित्र घटना घट गई। सुजाता को समझ में नहीं आया कि पलभर में स्वयं को ही कैसे विस्मरण कर
बैठी थी। पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था। पति की अवमानना करने की तो वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी।
नित्य की भांति उस रात भी कहोड वेदाभ्यास कर रहे थे। अभी कुछ क्षण ही बीते थे कि उन्होंने सुजाता को वितृष्णा से बोलते सुना, "वेदों का ज्ञान मिथ्या है। वेद और कुछ नहीं, अर्थहीन शब्दों का निरर्थक भंडार है। आत्मज्ञान ही परम सत्य है, अतः ग्रंथों में ज्ञान मत खोजो, ज्ञान तुम्हारे अंतर्मन में ही समाहित है, आत्मानुभूति करते ही परम ज्ञान की उपलब्धि हो जाएगी।"
कहोड का वेदाध्ययन बाधित हो गया। वह चकित होकर सुजाता की ओर देख रहे थे। आज अचानक सुजाता को क्या हो गया? पति-पत्नी में सामंजस्य था। पत्नी ने कभी भी पति की विद्वता पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया था। वह पति की योग्यता से परिचित थी और उनका सम्मान करती थी। कहोड कुछ समझ नहीं पाए कि अचानक उसमें यह परिवर्तन कैसे आ गया?
स्वयं सुजाता आश्चर्यचकित थीं। यह क्या कह बैठी वह ? बचपन से उसने वेदों के श्लोक सुने थे। वह इसी वातावरण में पली-बढ़ी थी। वेदों क प्रति उसकी असीम निष्ठा थी। वेदशास्त्र उसकी दृष्टि में श्रद्धेय और ज्ञान के स्रोत थे।
कहोड की दृष्टि एकाएक पत्नी के गर्भ की ओर उठ गई। कुछ सोचकर उनकी आंखें संकुचित हो गईं। कई पलों तक उनकी दृष्टि गर्भ से नहीं हटी तो सुजाता विचलित हो गई। अपनी असमंजसता से सायास मुक्त होती हुई बोली.
'क्षमा करें, मैं स्वयं विस्मित हूं कि मेरे मुख से कुबोल कैसे निकल गए ?" कहोड़ चौंककर सचेत हुए। उन्होंने सुजाता को तीक्ष्ण दृष्टि से देखते हुए.
कहा, "मैं जानता हूं, तुम्हारे मुख से कुबोल कैसे निकल गए ?"
पति को क्षुब्ध होते देखकर सुजाता ने सिर झुका लिया। धीरे से बोली, "मैं मूढ़ हूं देव, आपकी विद्वता से भला कौन परिचित नहीं, मेरी मूढ़ता पर चित्त न धरें, स्वामी।"
"मैं तुमसे तनिक भी क्षुब्ध नहीं सुजाता, यह तुम नहीं बोली थी, यह गर्भस्थ शिशु था, जिसने अपने विचार तुम्हारे माध्यम से अभिव्यक्त किए हैं। " 'यह क्या कहते हैं, नाथ?"
"यही सत्य है। मुझे समझ में नहीं आता, जहां वेदों का पठन-पाठन होता है, ऐसे वेदमय वातावरण में यह वेदविरोधी कैसे जन्म ले रहा है?" सुजाता का सर्वांग कांप गया। उसे लगा, जैसे उसने ऐसे शिशु को गर्भ में
धारण करके कोई जघन्य अपराध किया है। बोली, "संभव है, शिशु के बारेमें आपकी धारणा मिथ्या हो जो कुछ अनजाने में मेरे मुख से निकला, वह मेरी मूढ़ता का ही परिणाम हो, शिशु का इसमें कोई दोष न हो।"
'नहीं सुजाता, तुम्हें मैं वर्षों से जानता हूं। वेदों के प्रति तुम्हारी निष्ठा से " भी परिचित हूं। मुझे विश्वास है कि यह शिशु वाणी ही थी, जो तुम्हारे माध्यम से प्रकट हुई।"
"यदि ऐसा है तो इसमें शिशु का भी कोई दोष नहीं। गर्भस्थ शिशु अभी निर्बंध है। जन्मोपरांत जब वह आपके सान्निध्य में आएगा तो धीरे-धीरे वेदों के प्रति उसकी धारणा बदल जाएगी। वह आपकी भांति ही वेदों का निष्णात पंडित बनेगा।' 'क्या पता, " कहोड असहाय होकर बोले, "हम क्या कर सकते हैं।
प्रारब्ध को जो स्वीकार्य होगा, उसे शिरोधार्य करना हमारी विवशता है। "
पहली बार जब उन्होंने सुजाता के मुख से शिशु का विद्रोही स्वर सुना था, उन्हें दुख पहुंचा था। ऐसा केवल उसी रात को हुआ होता तो वह इसे दुःस्वप्न मानकर भुला चुके होते, किंतु उस रात के बाद ऐसा कई बार हुआ कि जब भी वह वेदाभ्यास आरंभ करते, गर्भस्थ शिशु वेदों की कटु आलोचना करता ।
इस विघ्न को सहन कर पाने में वह असमर्थ थे। वह वेदाभ्यास के समय स्वयं को आत्मकेंद्रित नहीं कर पाते थे। उनका हृदय सदैव आशंकित रहता कि किसी भी पल अजन्मा शिशु बोल पड़ेगा। उस रात वह बड़ी कठिनाई से वेदाभ्यास में लीन होने का प्रयास कर रहे थे कि सुजाता के मुख से शिशुवाणी उच्चरित हुई, "वेदाध्ययन से ज्ञान की प्राप्ति नहीं होगी, तात! आत्मा को जानो, सबको जान जाओगे।"
कहोड क्रोध से उठ खड़े हुए। उनकी आंखों में लाली उतर आई थी। जिस शिशु का अभी जन्म तक नहीं हुआ था, वही उन्हें उपदेश देता है? जिसने वेद का एक अक्षर तक नहीं पड़ा, वह वेदों की आलोचना करने का दुस्साहस कर रहा है? क्या जानता है वह वेदों के बारे में? नहीं, उसे इस अपराध का उचित दंड अवश्य मिलना चाहिए। उन्होंने सुजाता के गर्भ की और उंगली उठाकर कहा, "रे मूढ़, निस्संदेह तेरा मस्तिष्क विकल है, तभी तेरे विचार रुग्ण हैं। वेदों की आलोचना करने का दंड तुझे मिलेगा... अवश्य मिलेगा। मैं श्राप देता है, जब तू जन्म लेगा, तेरा शरीर आठ स्थानों से विकल होगा। जैसे तेरे विचार भ्रष्ट हैं, उसी प्रकार तेरा शरीर भी भ्रष्ट होगा।"
उस रात के पश्चात गर्भस्थ शिशु मौन हो गया। सुजाता के मुख से वेदों की आलोचना करने वाला स्वर पुनः सुनाई नहीं दिया। कहोड ने राहत की सांस ली। उनका वेदाभ्यास बाधारहित पुनः आरंभ हो गया।
पिछली रात जब कहोड ने वेदाभ्यास निर्विघ्न समाप्त किया तो सुजाता बोली, "सुनिए, शिशु का जन्म आसन्न है, वह कभी भी जन्म ले सकता है। घर में धनाभाव है और हमें शिशु के जन्म संस्कार पूर्ण करने के लिए धन की आवश्यकता होगी।"
'मुझे इस शिशु से कोई लगाव नहीं। तुम जानती हो, संस्कार विधि वेद- सम्मत है और इस अजन्मे शिशु की वेदों के प्रति कोई निष्ठा नहीं। संस्कारों की बात रहने ही दो।"
'अजन्मा शिशु क्या जाने सांसारिक व्यवहार, किंतु आप तो ऐसा न कहें। आश्रमवासी क्या कहेंगे? यही नहीं, बड़े भाई की पत्नी भी उसी समय शिशु का जन्म देंगी, जब मैं वे शिशु का संस्कार करेंगे और हम नहीं, भला क्या यह शोभा देगा?"
कहोड एक पल सोचते रहे। सुजाता सच कह रही थी। भले ही उन्हें शिशु से मोह नहीं था, पर सांसारिक रीति-नीति की अनदेखी कैसे की जा सकती है। वेदों का स्पष्ट निर्देश है कि जब तक शिशु का संस्कार न किया जाए, वह अशुभ और अस्पृश्य है।
उन्होंने असहाय स्वर में कहा, "ठीक है, मैं धन की व्यवस्था करता हूँ। राजा जनक अत्यंत प्रजावत्सल हैं। विशेषकर विद्वानों का बहुत आदर करते हैं। ब्राह्मणों की याचना अनसुनी नहीं करते। उनके दरबार से आज तक कोई ब्राह्मण निराश नहीं लौटा।"
दूर से ही कहोड को राजप्रासाद के कंगूरे नजर आने लगे। उनके चरणों की गति मंद हो गई। वह गर्भस्थ शिशु के लिए राजा जनक से धन की याचना करने जा रहे थे, किंतु वह तनिक भी उत्साहित नहीं थे। उन्हें याद था, जब पहली बार सुजाता के गर्भवती होने का समाचार मिला था तो वह कितने रोमांचित हुए थे, किंतु जैसे-जैसे शिशु जन्म का समय निकट आ रहा था, वह उसके प्रति विरक्त होते जा रहे थे। उन्हें लगता था, शिशु के रूप में पत्नी के गर्भ से शत्रु अवतरित हो रहा है। वह चकित थे कि वेदांताचार्य उद्दालक की पुत्री वेद विद्वेषी को कैसे जन्म दे रही है? उनका शिशु शीघ्र ही जन्म लेने वाला था और उसके प्रति वह जरा भी मोहित नहीं थे। उन्हें यह भी खेद नहीं था कि शिशु जन्म से विकलांग होगा और उसके लालन-पालन में विशेष सतर्कता की आवश्यकता है। किंतु नहीं, शिशु की विकलांगता से वह किंचित भी मर्माहत नहीं थे। उन्होंने ही अजन्मे शिशु को शाप दिया था कि वह आठ अंगों से विकल (टेढ़ा) पैदा होगा। वेद-विद्वेषी को उचित दंड मिलना ही चाहिए।
कहोड राजप्रासाद के मुख्य द्वार पर पहुंचकर खड़े हो गए। वह आशान्वित थे। राजा जनक उदार हृदय थे। उनकी दानशीलता की चर्चा चतुर्दिक फैली हुई थी। सामान्य जन राजा की प्रशंसा करते हुए अघाते नहीं थे।
प्रासाद में राजा जनक का अधिकतर समय विद्वानों के सान्निध्य में व्यतीत होता था। वह ज्ञान-पिपासु थे। उनके महल में अनेक विद्वान थे, जो अध्यात्म, जीवन व्यवहार और ज्ञान-विज्ञान की चर्चा करते थे।
कहोड ने दरबानों से कहा, "कृपया महाराज को सूचित करें कि ऋषि
उद्दालक के आश्रम से एक ब्राह्मण उनके दर्शनार्थ आया है।"
राजा को सूचित करने की आवश्यकता नहीं थी। दरबानों को आदेश था कि द्वार पर कोई ब्राह्मण आए तो उसे ससम्मान राजदरबार में ले आया जाए।
एक दरबान आगे बढ़कर बोला, “आपका स्वागत है, ब्राह्मण देवता!
आइए, मैं आपको महाराज के पास पहुंचा देता हूं।" कहोड जब दरबान के साथ राजदरबार की ओर प्रस्थान कर रहे थे तो दूसरा दरबान उन्हें एकटक जाते हुए देख रहा था। उसकी दृष्टि में कहोड के प्रति सहानुभूति थी, जैसे वह चिंतित हो कि पता नहीं इस ब्राह्मण की राजदरबार में क्या गति हो ।
राजदरबार भव्य और वैभवशाली था। सामने स्वर्ण जड़ित सिंहासन पर राजा जनक आसीन थे। उनके मुकुट से मणिमाणिक्य की रश्मियां विकीर्ण हो रही थीं। उनके आभामय चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान खिली हुई थी। नेत्र असीम ज्ञान से आलोकित थे। विराट ललाट के मध्य में चंदन का टीका तृतीय नेत्र की भांति चमक रहा था।
राजा जनक के अप्रतिम व्यक्तित्व से कहोड चमत्कृत हो गए। उन्होंने हाथ जोड़कर उनका अभिनंदन किया।
राजा जनक सस्मित बोले, "स्वागत है ब्राह्मणराज, आसन ग्रहण करें। " कहोड ने चारों तरफ देखा। राजा जनक के सम्मुख दोनों तरफ राजदरबारी, अनेक ब्राह्मण व विद्वान पंक्तिबद्ध बैठे थे। कहोड रिक्त आसन पर बैठ गए। उन्हें विश्वास था कि जब वह यहां से विदा होंगे तो उनके पास राजा जनक का दिया हुआ पर्याप्त धन होगा और वह शिशु का संस्कार करने में समर्थ होंगे।
राजा जनक ने पूछा, "कहिए ब्राह्मणराज, आपके आने का प्रयोजन क्या है?"
कहोड ने उत्तर दिया, "राजन! मैं ऋषि उद्दालक का शिष्य एवं दामाद कहोड हूं। मेरी पत्नी प्रसवासन्न है, वह किसी भी समय शिशु को जन्म दे सकती है। जन्मोपरांत शिशु का संस्कार करना अपरिहार्य है, किंतु धनाभाववश मैं संस्कार निभाने में असमर्थ हूं। अब आप ही मेरी समस्या का समाधान कर सकते हैं। आशा है, आप मुझे निराश नहीं करेंगे।"
राजा जनक ने एक बार राजदरबारियों व विद्वजनों को देखा, तदुपरांत उनकी दृष्टि बंदी पर टिक गई। बोले, "आप कुछ कहना चाहेंगे, श्रेष्ठ प्रवर।"
बंदी राजदरबार में उत्कट विद्वान के रूप में परम आदृत थे। राजा जनक की दृष्टि में वह ब्राह्मण शिरोमणि थे। महल व दरबार की ज्ञानचर्चाएं उन्हीं के नेतृत्व में संपन्न होती थीं।
बंदी ने राजा को उत्तर देते हुए कहा, "राजन! आप तो जानते हैं कि मुझे शास्त्रार्थ में कितनी रुचि है। फिर कहोड तो ऋषिवर उद्दालक का शिष्य है। कौन नहीं जानता कि वे प्रकांड वेदांताचार्य हैं। निस्संदेह उनका शिष्य व दामाद उनसे ज्ञान में कम नहीं होगा। ऐसे विद्वान ब्राह्मण से शास्त्रार्थ का आनंद ही कुछ और है। यदि आप अनुमति दें तो हम शास्त्रार्थ आरंभ करें।"
राजा जनक ने कहोड से पूछा, "क्या आप शास्त्रार्थ के लिए सहमत हैं?" कहोड वेदों में पारंगत थे। वेदों की मीमांसा करने में वह दक्ष थे। अतः उन्होंने उत्तर दिया, "राजन! मुझे कोई आपत्ति नहीं, मैं शास्त्रार्थ के लिए प्रस्तुत हूं।"
"ठीक है।" राजा जनक बंदी से बोले, "आप शास्त्रार्थ प्रारंभ करें। दो
विद्वानों के शास्त्रार्थ से मुझे सदैव नए ज्ञान की उपलब्धि होती है।"
बंदी ने कहोड की ओर देखते हुए, "शास्त्रार्थ आरंभ करने से पूर्व मैं आपको यह बताना अपना कर्त्तव्य समझता हूं कि यदि आप शास्त्रार्थ में विजयी हुए तो महाराज की ओर से आपको बहुमूल्य पारितोषिक की प्राप्ति होगी, इसके विपरीत यदि आप पराजित हुए तो नदी में जल समाधि लेने को बाध्य होंगे। ऐसा ही यहां का नियम है। पहले भी अनेक ब्राह्मणों ने यहां शास्त्रार्थ में भाग लिया है, जिसमें कुछ विजयी हुए और कुछ पराजित।' "
कहोड को अपने वेद ज्ञान पर विश्वास था। उन्होंने बंदी की चुनौती स्वीकार कर ली।
शास्त्रार्थ प्रारंभ हुआ। आरंभिक दौर में वेदों को केंद्र बनाकर चर्चा हुई।
कहोड की वेद मीमांसा से न केवल दरबार के उपस्थित जन प्रभावित हुए, अपितु राजा जनक की भी कहोड के प्रति रुचि बढ़ गई।
बंदी ने वेदेतर चर्चा आरंभ की तो कहोड विचलित हो गए। उनकी दृष्टि में वेदों की पारंपरिक मीमांसा का कोई अन्य विकल्प था ही नहीं, किंतु बंदी के प्रश्न सुनकर उन्हें भ्रम हुआ कि क्या ब्रह्मांड में और भी बहुत कुछ है, जिनके बारे में वेद मौन हैं। तो क्या ज्ञान की अंतिम सीमा वेद नहीं? क्या वेदों के पृष्ठों पर उल्लेखित ज्ञान के अतिरिक्त भी कुछ ऐसा है, जिसे केवल विचार-मंथन से ही प्राप्त किया जा सकता है।
अचानक कहोड को याद आया, सुजाता के गर्भस्थ शिशु ने भी वेदशास्त्रों की सिद्धता पर प्रश्नचिह्न लगाया था? अजन्मे शिशु ने कहा था कि आत्मा को जानो, सबकुछ जान जाओगे, आत्मज्ञान के पश्चात किसी ज्ञान की आवश्यकता ही नहीं रहेगी।
तब कहोड ने इस कथन को अज्ञानी की मूढ़ता समझा था और वेद श्लोकों को परम सत्य मानकर वहीं तक सीमित रहे थे। यदि आत्म-मीमांसा करते तो निस्संदेह वेदों की सीमा के उस पार भी कुछ नए ज्ञान की अनुभूति कर सकते थे। उन्हें खेद हुआ कि रात-दिन वेदों में निमग्न होकर उन्होंने कभी भी आत्ममंथन को महत्त्व ही नहीं दिया।
जबकि सत्य यह था कि बंदी वेदों को ज्ञान की अंतिम सीमा मानता था। उसकी चर्चा वेदों पर ही केंद्रित थी, किंतु वह कुतर्कों का आश्रय लेकर कहोङ को दिग्भ्रमित करने में सफल हो गया था।
कहोड ने अपनी पराजय स्वीकार कर ली। वचनानुसार उन्होंने जलसमाधि लेकर देह त्याग दी।
राजा जनक ने कहोड के अजन्मे शिशु के संस्कार के लिए आवश्यक धन भेज दिया।
आश्रम में कहोड की दुखद मृत्यु का समाचार पहुंचा तो चतुर्दिक शोक की लहर व्याप्त हो गई।
सुजाता की आंखों के सामने अंधकार छा गया। वह अचेत हो गई। उसी रात उसने व उसकी भाभी ने पुत्रों को जन्म दिया। ऋषि उद्दालक ने बेटे की संतान को नाम दिया श्वेतकेतु। वह जानते थे, दामाद ने अपनी उद्दंड संतान को आठ स्थानों से विकल होने का शाप दिया था। वह विकलांग ही पैदा हुआ था। अतः उन्होंने उसे अष्टावक्र का नाम प्रदान किया।
अष्टावक्र का शरीर आठ स्थानों से विकल अवश्य था, किंतु उसके नेत्रों में विचित्र प्रकार की चमक थी, जो किसी को भी सहज ही आकृष्ट करती थी। अलौकिक ओज से मुखमंडल सदैव उद्दीप्त रहता था। प्रतीत होता था, मानो वह स्वयं सिद्ध है, सबसे निस्पृह, निरंजन और निरपेक्ष, जन्मजात ज्ञान का अक्षय भंडार।
अष्टावक्र और श्वेतकेतु की बालसुलभ क्रियाओं में पृथ्वी-आकाश का अंतर था। श्वेतकेतु अन्य बच्चों के साथ खेलता था, जबकि अष्टावक्र वृक्ष के नीचे बैठा पता नहीं किन विचारों में खोया रहता था।
अल्पायु में बच्चे जो कुछ करते हैं, अष्टावक्र भी वही करता। श्वेतकेतु के साथ खेलता भी था। किंतु किसी कर्म में श्वेतकेतु की भांति संलिप्त नहीं होता था । श्वेतकेतु को व्यंजन भाते थे, जबकि अष्टावक्र शरीर की मांग को पूरा करने के लिए ही खाता था।
12 वर्ष की आयु तक अष्टावक्र ने समस्त वेदों का परायण कर लिया। ज्ञान के प्रत्येक स्रोत के प्रति वह सहज ही आकृष्ट हो जाता था। विभिन्न प्रकार के ज्ञान-भंडार थे, जिनका वह आलोड़न-विलोड़न करता। यह अलग बात थी कि वह सबसे सहमत नहीं होता। मन ही मन तर्क-वितर्क करता, आत्ममंथन के उपरांत सत्य उसके सम्मुख साक्षात उपस्थित होता और भ्रमों का अंधकार छंट जाता था।
(चूंकि अष्टावक्र को वेदों में निपुणता तथा आत्मज्ञान की प्राप्ति हो चुकी है, अत: अब हम उन्हें आदरसूचक संबोधन दे रहे हैं, शेष पुस्तक में भी यही आदरसूचक संबोधन है।)
अष्टावक्र शनैः-शनैः आत्मकेंद्रित हो गए। उन्होंने कभी भी भय की अनुभूति नहीं की, कभी भी उन्हें किसी की सहायता लेने की इच्छा नहीं हुई। उन्हें आश्चर्य था कि लोग क्योंकर आतुरता से परमात्मा की स्तुति करते हैं? निस्संदेह भय से मुक्ति पाने के लिए और सहायता पाने की इच्छा से भय भी किसका ? मृत्यु का, हानि का, रोग और शोक का ।
अष्टावक्र सोचते, मृत्यु से भय कैसा? मृत्यु तो अवश्यंभावी है, अंतिम और चिरंतन सत्य, जबकि हानि, रोग और शोक मायावी और भ्रामक अवधारणाएं। परमात्मा की स्तुति का एक ही प्रयोजन था, कुछ पाना, ईश्वर से कुछ पाने
की याचना करना। ऐसी स्वार्थ से परिपूर्ण स्तुति का क्या लाभ? इसके अतिरिक्त ईश्वर से सहायता की याचना ही क्यों? क्या मानव इतना शक्तिहीन है कि वह अपनी सहायता स्वयं न कर सके।
अष्टावक्र परमात्मा की सहायता लेने को इच्छुक क्यों नहीं थे? क्योंकि वे अनुभव कर चुके थे कि वे आत्मविश्वस्त हैं, आत्मनिर्भर हैं, अपने परमात्मा स्वयं हैं।
आत्मज्ञान की इस प्रतीति से वे लोक में रहते हुए भी लोकेतर हो गए।
श्वेतकेतु अपने पिता के साथ खेलता था। अष्टावक्र को पता नहीं था कि उनके पिता का दुखद परिस्थितियों में देहांत हो चुका है। वह श्वेतकेतु के पिता को ही अपना सर्वस्व मानते थे।
श्वेतकेतु जब भी अष्टावक्र को अपने पिता के साथ देखता तो बुरा मान जाता। वह येन केन प्रकारेण अष्टावक्र को पिता से दूर कर देता। अष्टावक्र बुरा नहीं मानते थे। उनका विचार था, श्वेतकेतु पिता के प्रति मोहासक्त है, जबकि उन्हें किसी के प्रति मोह नहीं था।
एक दिन अष्टावक्र श्वेतकेतु के पिता के साथ बैठे थे कि श्वेतकेतु वहां आया । अष्टावक्र को पिता के साथ बातें करते देख उसने कहा, "यह मेरे पिता हैं, इनके साथ बैठने का अधिकार मेरा है। तुम अपने पिता के पास क्यों नहीं जाते?"
श्वेतकेतु की बात उचित थी। अष्टावक्र ने तर्क-वितर्क नहीं किया। वहां से उठकर वह सीधे मां के पास गए, पूछा, "मां, श्वेतकेतु को पिता का सान्निध्य उपलब्ध है, पिता की निकटता से उसे प्रसन्नता भी होती है। मेरे पिता कहां हैं?''
प्रश्न सहज व सरल था, किंतु सुजाता का चेहरा कुछ सोचकर शोकाकुल हो गया। वह भूली नहीं थी कि इसी पुत्र के संस्कार के लिए धन का प्रबंध करने वह राजा जनक के दरबार में गए थे, किंतु वहां बंदी से शास्त्रार्थ में परास्त होने के बाद उन्हें जल-समाधि लेनी पड़ी थी।
एक क्षण के उपरांत सुजाता ने जब सिर उठाया तो उसकी आंखों में आंसू झिलमिला रहे थे।
अष्टावक्र चकित थे, पिता के बारे में पूछने पर मां रो क्यों पड़ी? उसने पूछा, "क्या हुआ मां, अचानक उदास क्यों हो गईं?" रहे।
वह होंठ भींचकर धीरे से बोली, "कुछ नहीं पुत्र, तुम्हारे पिता नहीं उनका दुखद परिस्थितियों में निधन हो गया।"
"कब?"
"तुम्हारे जन्म से एक दिन पूर्व?"
दुखद परिस्थितियों में उनका निधन हो गया, इसका तात्पर्य?"
"हां पुत्र, तुम्हारे पिता राजा जनक के प्रासाद में गए थे, जहां बंदी नामक विद्वान से शास्त्रार्थ में परास्त हो जाने के कारण उन्हें जल समाधि लेने को विवश किया गया था।"
अष्टावक्र को आश्चर्य हुआ। यह कैसा शास्त्रार्थ हुआ? शास्त्रार्थ का अर्थ तो यही है कि शास्त्रों में निहित ज्ञान की चर्चा की जाए। विद्वान एक-दूसरे को ज्ञानानुभव सुनाएं, एक-दूसरे के ज्ञान का पारस्परिक लाभ उठाएं। शास्त्रार्थ में विजय-पराजय का क्या स्थान? कैसा है यह बंदी नामक विद्वान? यह तो कोई विद्वता नहीं हुई कि शास्त्रार्थ में उससे जो हीन सिद्ध हो, उसे जल-समाधि लेने को विवश किया जाए। यह तो विशुद्ध हिंसा है। विद्वान कभी हिंसक नहीं हो सकता, उसका हृदय उदार और विनम्र होता है। मुझे तो उसकी विद्वता संदिग्ध प्रतीत होती है। निस्संदेह उसे अपनी विद्वता पर अहंकार है। वह विद्वान होने का प्रदर्शन करके अपने अहं को तुष्ट करता है। विद्वजन विद्वता का प्रदर्शन नहीं करते, उनका अहंकार तिरोहित हो जाता है, वे आत्मतुष्ट होते हैं, अतएव अहं से मुक्त' भी।
अष्टावक्र का मन यह मानने को तैयार नहीं था कि बंदी विद्वानों की श्रेणी में रखे जाने योग्य ब्राह्मण है। अवश्य वह तर्क-कुतर्क में पारंगत होगा और शास्त्रार्थ में अपने प्रतिद्वंद्वी को वाग्जाल में फांसकर परास्त करता होगा। जरा मैं भी तो जाकर देखूं, कितना बड़ा विद्वान है।
अष्टावक्र ने मां के आंसू पोंछकर कहा, "रो मत मां, मैं राजमहल जाऊंगा और बंदी से शास्त्रार्थ करूंगा।"
सुजाता भय से सिहर गई, बोली, "नहीं पुत्र, मैं तुम्हें वहां नहीं जाने दूंगी। तुम्हारे पिता को मैं खो चुकी हूं, अब तुम्हें नहीं खोना चाहती। एक तुम्हीं तो मेरे अवलंबन हो। "
"मां, चिंता मत करो, मुझे कुछ नहीं होगा। "
"पुत्र, तुम बंदी को नहीं जानते। वह अनेक ब्राह्मणों को शास्त्रार्थ में परास्त कर जल-समाधि दे चुका है। तुम्हारे पिता उसके सम्मुख टिक न सके, और तुम तो अभी बालक हो।"
"मुझ पर विश्वास रखो मां, मैं बालक अवश्य हूं, किंतु आत्मशक्ति मेरा सबसे बड़ा संबल है। मां, जो आत्मविश्वस्त होते हैं, वही विजयश्री का वरण , करते हैं। "
सजाता को समझ में नहीं आया कि वह पुत्र को ऐसा दुस्साहस करने से कैसे रोके । अष्टावक्र की मुद्रा से स्पष्ट था कि वह प्रासाद जाने को कृतसंकल्प हैं। वह हताश हो गई, कांपते स्वर में बोली, "ठीक है पुत्र, जाओ। परमात्मा तुम्हारी रक्षा करे। "
"मां, परमात्मा को कष्ट मत दो। प्रत्येक व्यक्ति अपना परमात्मा आप होता है, किंतु खेद है कि कोई भी स्वयं को परमात्मा रूप में अनुभूत करने में सक्षम नहीं। और मां, पुत्र की रक्षा हेतु परमात्मा का स्मरण करना स्वार्थ है। परमात्मा की स्वार्थवश स्तुति करने से कोई पुण्य नहीं मिलता।"
सुजाता बात के मर्म को समझने में असमर्थ थी। उसे केवल पुत्र के अनिष्ट की आशंका सता रही थी। सोच रही थी, पुत्र प्रतिशोध की भावना के वशीभूत होकर राजप्रासाद जा तो रहा है, पता नहीं इसका क्या परिणाम हो। हे प्रभु, इसका मंगल हो ।
अष्टावक्र जाते-जाते रुक गए, "मां, यह मत सोचना कि मैं प्रतिशोध लेने जा रहा हूं। नहीं मां, मैं जय-पराजय और प्रतिशोध की भावनाओं से मुक्त हूं। सांसारिक प्रवृत्तियां मुझे लेशमात्र भी प्रभावित नहीं करतीं। मैं केवल कर्त्तव्य निर्वहन हेतु जा रहा हूं। शेष प्रारब्ध के अधीन है। "
इसके अतिरिक्त, अष्टावक्र ने मन-ही-मन सोचा, बंदी की हिंसा पर अंकुश लगाना अनिवार्य है, अन्यथा वह न जाने और कितने ब्राह्मणों को अकाल मृत्यु का वरण करने को विवश करेगा। अष्टावक्र राजप्रासाद के मुख्यद्वार पर पहुंचे। दरबानों से बोले, "कृपया महाराज से जाकर कहें कि एक ब्राह्मण उनके दर्शन करना चाहता है।"
दरबानों की दृष्टि विकलांग बालक पर पड़ी तो वे उलझन में पड़ गए। उन्होंने एक-दूसरे की आंखों में झांका, तदुपरांत एक बोला, "हमें खेद है बालक, हम आपका संदेश महाराज तक नहीं पहुंचा सकते।"
'क्यों, मैंने सुना है कि ब्राह्मणों का दरबार में प्रवेश अबाधित है।"
'आपने सत्य सुना है, किंतु दरबार में केवल वयस्क ब्राह्मण ही प्रवेश कर सकते हैं। बालकों का अंदर जाना निषिद्ध है।"
अष्टावक्र के चेहरे पर कोई मुद्रा नहीं उभरी। न उन्हें क्रोध हुआ और न विस्मय। निर्विकार भाव से बोले, "वयस्क और बालक ब्राह्मण की यह तुलना मेरी समझ में नहीं आई, द्वारपाल। कृपया इस भेद को स्पष्ट करें। "
"बालक, दरबार में बड़े-बड़े उत्कट विद्वान ब्राह्मण उपस्थित हैं। उनके सान्निध्य में महाराज ज्ञान-चर्चा का लाभ उठाते हैं। ऐसे ज्ञानमय वातावरण में आपकी उपस्थिति विघ्न पहुंचाएगी।"
"द्वारपाल, क्या ज्ञान केवल बड़ी आयु का प्राणी ही प्राप्त कर सकता है। तुमने अवश्य बड़ी आयु के ऐसे प्राणियों को भी देखा होगा, जो आजीवन मूढ़ता से मुक्त नहीं हो पाते। मैं दरबार में उपस्थित विद्वानों की भांति ज्ञानवान नहीं हूं। किंतु क्या मुझे उनसे ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार नहीं। कृपया मुझे भी उनके ज्ञान से लाभान्वित होने दें। "
दोनों दरबानों ने एक-दूसरे को देखा। वे असमंजस में थे कि बालक को अंदर भेजना उचित होगा या नहीं। दस-बारह साल के इस बालक ने दरबार में जाकर कुछ बालसुलभ क्रिया की तो विद्वानों की सभा में व्यवधान पहुंचेगा। फिर यह बालक शरीर से विकलांग भी था।
एक दरबान ने कुछ बोलना चाहा, किंतु इससे पूर्व ही अष्टावक्र ने कहा, "मुझसे पूर्व यहां एक बार व्यास पुत्र शुकदेव भी आए थे। वे मुमुक्षु थे और राजा जनक से तत्त्वज्ञान प्राप्त करने आए थे। उनकी आयु भी उतनी थी, जितनी मेरी। राजा जनक ने शुकदेव को तत्त्वज्ञान देना स्वीकार किया था। क्या आप मुझे ज्ञान प्राप्ति से वंचित करेंगे?"
दरबान ने ध्यानपूर्वक अष्टावक्र को देखा। बालक के मुखमंडल पर विचित्र आभामंडल देदीप्यमान हो रहा था। नेत्रों में ओज का आलोक था। उसके स्वर में आग्रह नहीं था, याचना भी नहीं थी, बस, केवल सहज-सा प्रश्न था।
दरबान मानो सम्मोहित-सा हो गया। वह बालक को अंदर जाने से रोक नहीं सका। हाथ जोड़कर बोला, "आपका स्वागत है ब्राह्मण देवता । आइए, मैं आपको दरबार तक ले चलता हूं।'
अष्टावक्र ने जैसे ही दरबार में प्रवेश किया, वहां उपस्थित सभी लोगों की दृष्टि उनकी ओर उठ गई ।
अष्टावक्र ने पलटकर किसी को नहीं देखा, वह चुपचाप आगे बढ़े। उनकी चाल देखकर दोनों पाश्र्वों में बैठे राजदरबारी और विद्वजन अट्टहास करने लगे। सारा दरबार कहकहों से गूंज उठा।
अष्टावक्र इस सबसे निष्प्रभावित राजा जनक के सम्मुख पहुंचे और हाथ जोड़कर अभिवादन किया। राजा जनक गंभीर थे। उन्हें उपस्थित जनसमुदाय का