Shri Chitragupta Ashram, Brijghat

Shri Chitragupta Ashram, Brijghat Shri Chitragupta Ashram is situated at the holy river Ganga, Brijghat District Hapur (U.P.)

25/10/2025
आज श्री चित्रगुप्त आश्रम बृजघाट में स्थित मंदिर श्रृंखला में माँ दुर्गा जी के मंदिर में नवमी हवन में मुख्य यज़मान के रूप...
01/10/2025

आज श्री चित्रगुप्त आश्रम बृजघाट में स्थित मंदिर श्रृंखला में माँ दुर्गा जी के मंदिर में नवमी हवन में मुख्य यज़मान के रूप में हवन एवं कन्या भोज संपन्न कराया गया।
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प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी से लगभग चार मील दूर लमही नामक ग्राम में हुआ था. इनका संबंध एक गरीब कायस्थ परि...
31/07/2025

प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी से लगभग चार मील दूर लमही नामक ग्राम में हुआ था. इनका संबंध एक गरीब कायस्थ परिवार से था. इनके पिता अजायब राय श्रीवास्तव डाकमुंशी के रूप में कार्य करते थे. प्रेमचंद ने अपना बचपन असामान्य और नकारात्मक परिस्थितियों में बिताया. जब वह केवल आठवीं कक्षा में ही पढ़ते थे, तभी इनकी माता का लंबी बीमारी के बाद देहांत हो गया. माता के निधन के दो वर्ष बाद प्रेमचंद के पिता ने दूसरा विवाह कर लिया. लेकिन उनकी नई मां उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करती थीं. पंद्रह वर्ष की छोटी सी आयु में प्रेमचंद का विवाह एक ऐसी कन्या से साथ करा दिया गया. जो ना तो देखने में सुंदर थी, और ना ही स्वभाव की अच्छी थी. परिणामस्वरूप उनका संबंध अधिक समय तक ना टिक सका और टूट गया.
लेकिन अपना पहला विवाह असफल होने और उसके बाद अपनी पूर्व पत्नी की दयनीय दशा देखते हुए, प्रेमचंद ने यह निश्चय कर लिया था कि वह किसी विधवा से ही विवाह करेंगे. पश्चाताप करने के उद्देश्य से उन्होंने सन 1905 के अंतिम दिनों में शिवरानी देवी नामक एक बाल-विधवा से विवाह रचा लिया. गरीबी और तंगहाली के हालातों में जैसे-तैसे प्रेमचंद ने मैट्रिक की परीक्षा पास की. जीवन के आरंभ में ही इनको गांव से दूर वाराणसी पढ़ने के लिए नंगे पांव जाना पड़ता था. इसी बीच उनके पिता का देहांत हो गया. प्रेमचंद वकील बनना चाहते थे. लेकिन गरीबी ने उन्हें तोड़ दिया. उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य, पर्सियन और इतिहास विषयों से स्नातक की उपाधि द्वितीय श्रेणी में प्राप्त की थी.
प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों में देश-प्रेम की यह स्थिति प्रचुर मात्रा में दिखायी देती है. गांधी की प्रेरणा से सरकारी नौकरी से इस्तीफा देने के बाद प्रकाशित उनके ‘प्रेमाश्रम’, ‘रंगभूमि’, ‘कर्मभूमि’ आदि उपन्यासों में गांधी के हृदय-परिवर्तन, सत्याग्रह, ट्रस्टीशिप, स्वदेशी, सविनय अवज्ञा, राम-राज्य, औद्योगीकरण का विरोध तथा कृषि जीवन की रक्षा, ग्रामोत्थान एवं अछूतोद्धार, अहिंसक आन्दोलन, हिन्दू-मुस्लिम एकता, किसानों-मजदूरों के अधिकारों की रक्षा आदि का विभिन्न कथा-प्रसंगों तथा पात्रों के संघर्ष में चित्रण हुआ है.

3 दिसम्बर/जन्म-दिवसआत्मविश्वास के धनी राजेन्द्र बाबूबिहार के एक विद्यालय में परीक्षा समाप्ति के बाद कक्षाध्यापक महोदय सब...
02/12/2023

3 दिसम्बर/जन्म-दिवस
आत्मविश्वास के धनी राजेन्द्र बाबू

बिहार के एक विद्यालय में परीक्षा समाप्ति के बाद कक्षाध्यापक महोदय सबको परीक्षाफल सुना रहे थे। उनमें एक प्रतिभाशाली छात्र राजेन्द्र भी था। उसका नाम जब उत्तीर्ण हुए छात्रों की सूची में नहीं आया, तो वह अध्यापक से बोला - गुरुजी, आपने मेरा नाम तो पढ़ा ही नहीं।

अध्यापक ने हँसकर कहा - तुम्हारा नाम नहीं है, इसका सीधा अर्थ है तुम इस वर्ष फेल हो गये हो। ऐसे में मैं तुम्हारा नाम कैसे पढ़ता ? अध्यापक को ज्ञात था कि वह छात्र कई महीने मलेरिया ज्वर के कारण रोगी रहा था। इस कारण वह लम्बे समय तक विद्यालय भी नहीं आ पाया था। ऐसे में छात्र का अनुत्तीर्ण हो जाना स्वाभाविक ही था।

लेकिन वह छात्र साहस से बोला - नहीं गुरुजी, कृपया आप सूची को पुनः देख लें। मेरा नाम इसमें अवश्य होगा।

अध्यापक ने कहा - नहीं राजेन्द्र, तुम्हारा नाम सूची में नहीं है। तुम इस बार उत्तीर्ण नहीं हो सके हो।

राजेन्द्र ने खड़े होकर ऊँचे स्वर में कहा - ऐसा नहीं हो सकता कि मैं उत्तीर्ण न होऊँ।

अब अध्यापक को भी क्रोध आ गया। वे बोले - बको मत, नीचे बैठ जाओ। अगले वर्ष और परिश्रम करो।

पर राजेन्द्र चुप नहीं हुआ - नहीं गुरुजी, आप अपनी सूची एक बार और जाँच लें। मेरा नाम अवश्य होगा।

अध्यापक ने झुंझलाकर कहा - यदि तुम नीचे नहीं बैठे तो मैं तुम पर अर्थदंड लगा दूँगा।

पर वह छात्र भी अपनी बात से पीछे हटने को तैयार नहीं था। अतः अध्यापक ने उस पर एक रु. अर्थदंड कर दिया। लेकिन राजेन्द्र बार-बार यही कहता रहा - मैं अनुत्तीर्ण नहीं हो सकता।

अध्यापक ने अब अर्थदंड दो रु. कर दिया। बात बढ़ती गयी। धीरे-धीरे अर्थदंड की राशि पाँच रु. तक पहुँच गयी। उन दिनों पाँच रु. की कीमत बहुत थी। सरकारी अध्यापकों के वेतन भी 15-20 रु. से अधिक नहीं होते थे; लेकिन आत्मविश्वास का धनी वह छात्र किसी भी प्रकार से दबने का नाम नहीं ले रहा था।

तभी एक चपरासी दौड़ता हुआ प्राचार्य जी के पास से कोई कागज लेकर आया। जब वह कागज अध्यापक ने देखा, तो वे चकित रह गये। परीक्षा में सर्वाधिक अंक उस छात्र ने ही पाये थे। उसका अंकपत्र फाइल में सबसे ऊपर रखा था; पर भूल से वह प्राचार्य जी के कमरे में ही रह गया।

अब तो अध्यापक ने उस छात्र की पीठ थपथपाई। सब छात्रों ने भी ताली बजाकर उसका अभिनन्दन किया। यही बालक आगे चलकर भारत का पहला राष्ट्रपति बना। उनका जन्म ग्राम जीरादेई( जिला छपरा, बिहार) में 3 दिसम्बर, 1884 को श्री महादेव सहाय के घर में हुआ था। छात्र जीवन से ही मेधावी राजेन्द्र बाबू ने कानून की परीक्षा उत्तीर्णकर कुछ समय वकालत की; पर 33 वर्ष की अवस्था में गांधी जी के आह्वान पर वे वकालत छोड़कर देश की स्वतन्त्रता के लिए हो रहे चम्पारण आन्दोलन में कूद पड़े।

सादा जीवन, उच्च विचार के धनी डा. राजेन्द्र प्रसाद को ‘भारत रत्न’ से विभूषित किया गया। राष्ट्रपति पद से मुक्ति के बाद वे दिल्ली के सरकारी आवास की बजाय पटना में अपने निजी आवास ‘सदाकत आश्रम’ में ही जाकर रहे। 28 फरवरी, 1963 को वहीं उनका देहान्त हुआ। उनके जन्म दिवस तीन दिसम्बर देश में अधिवक्ता दिवस के रूप में मनाया जाता है। राष्ट्रपति के रूप में वे प्रधानमन्त्री नेहरू जी के विरोध के बाद भी सोमनाथ मन्दिर की पुनर्प्रतिष्ठा समारोह में सम्मिलित हुए, जिस कारण से जवाहर लाल ने पूरे जीवन भर इनका अपमान करते रहे। कांग्रेस ने इन्हे कोई सम्मान नहीं दिया।

मुंशी प्रेमचंद जी (गुलाब राय) की अपनी पत्नी के साथ फोटो जिसमें उन्होंने फटे जूते पहने हुए हैं। इस फोटो को देखकर महान लेख...
02/06/2023

मुंशी प्रेमचंद जी (गुलाब राय) की अपनी पत्नी के साथ फोटो जिसमें उन्होंने फटे जूते पहने हुए हैं। इस फोटो को देखकर महान लेखक हरिशंकर परसाई जी ने एक एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने कहा था "सोचता हूं, यदि फोटो खिंचवाने की अगर यह वेश-भूषा है, तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग-अलग वेश-भूषा नहीं होंगी।इसमें वेश-भूषा बदलने का गुण नहीं है। यह जैसा है, वैसा ही फोटो में खींच जाता है।
यह व्यक्ति पोशाक बदल भी नहीं सकता क्योंकि इसने भारत की जनता के मर्म को छुआ है इस की पोशाक के पीछे #गोदान जैसे महाकाव्य की आदरांजलि भी तो है। इसलिए महान् लेखक मुंशी प्रेमचन्द जी को सादर प्रणाम व शत शत नमन् करता हूं..🙏🙏🇮🇳🇮🇳

घास फूस खाने वाले हिंदू में क्या औकात है जो हमारा मुकाबला करेंगें, वह भी शास्त्री, वह बहुत कमजोर प्रधानमंत्री है – जुल्फ...
25/08/2022

घास फूस खाने वाले हिंदू में क्या औकात है जो हमारा मुकाबला करेंगें, वह भी शास्त्री, वह बहुत कमजोर प्रधानमंत्री है – जुल्फिकार अली भुट्टो।
राष्ट्रपति अयूब खान ने पूछा क्या भारत अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार करके हमला कर सकता है?
सारे कमांडर ठहाके लगाने लगे। अमेरिका हमारे साथ है, वह अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार किये तो दिल्ली भी हाथ से चला जायेगा।

इस विचार से पाकिस्तान ने 1965 में लाइन ऑफ कंट्रोल को पार करके ऑपरेशन जिब्राल्टर शुरू किया।
अखनूर सेक्टर में पैटन टैंकों ने भारी तबाही मचा रखी थी। हमारे पास हथियार भी नहीं थे।
पाकिस्तान को शुरुआती बढ़त मिल गई।
सेना अध्यक्ष जनरल चौधरी, वेस्टर्न कमांडर जनरल हरबख़्स सिंह को आदेश दिया कि अखनूर में अमृतसर से सेना भेजें।
हरबख़्स सिंह ने इनकार कर दिया! यह बहुत बड़ी घटना थी।
जनरल हरबख्श सिंह इस बात पर अड़ गये की आप प्रधानमंत्री से बात करिये।

जनरल चौधरी आधी रात को प्रधानमंत्री शास्त्री से मिलने गये।
उन्होंने कहा, प्रधानमंत्री जी हम कश्मीर खो देंगें।
प्रधानमंत्री ने पूछा क्या करना चाहिये?
जनरल चौधरी ने कहा वेस्टर्न कमांडर हरबख़्स सिंह चाहते हैं हम अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार करें।
लेकिन इससे व्यापक युद्ध छिड़ सकता है। अमेरिका पाकिस्तान का साथ देगा।
हमें अखनूर में और सेना भेजनी चाहिये।
शास्त्री जी ने कहा – भारत कश्मीर को बचाने के लिये सब कुछ करेगा। जनरल हरबख्श सिंह की राय ठीक है।
आप अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार करके लाहौर पर आक्रमण करिये।
यह लिखित आदेश शास्त्री जी ने प्रोटोकॉल तोड़कर बिना मंत्रिमंडल की बैठक के दिया।
सुबह 6 बजे हरबख्श सिंह के नेतृत्व में भारतीय सेना ने लाहौर पर आक्रमण कर दिया।
सारी दुनिया आश्चर्यचकित हो गई।
पाकिस्तान ने घुटने टेक दिये।
'In the line of duty' हरबख्श सिंह ने अपनी किताब में विस्तार से लिखा है। पद्मविभूषण, पद्मश्री, वीरचक्र से हरबख्श सिंह को सम्मानित किया गया।

घास फूस खाने वाले, छोटेकद के शात्री जी ने अपने निर्णय से बता दिया कि वीरता किसे कहते हैं।।

20/06/2021

ग्रन्थों में कायस्थ
कायस्थों का वर्णन धार्मिक और धर्म निरपेक्ष दोनों प्रकार के ग्रन्थों में मिलता है। इनमें कुछ इस प्रकार है :-
हिन्दुओं के प्राचीनतम ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ के अनुसार कायस्थों के पूर्व पुरुष श्री चित्रगुप्त एक शकितशाली क्षत्रिय थे। वह राजा कहलाते हैं। ‘कृष्ण यजुर्वेद’ की ‘मैत्रायनी संहिता’ में उनको एक आश्चर्य जनक शासक के रुप में दर्शाया गया है। वह ब्रह्राा के पुत्र थे तथा इन्द्र से भी अधिक शकितशाली थे। इन्द्र परिवर्तित होते रहते हैं जबकि वह स्थायी हैं। ऋग्वेद के अस्वालयन गृह सूत्र में मंत्र का उल्लेख जिसका उच्चारण बलि देते समय चित्रगुप्त के आवहान हेतु किया जाता है –

‘मैं श्री चित्रगुप्त का आव्हान करता हू जो सरस्वती नदी के उत्तर-पशिचम (यहां अल्तार्इ पर्वत से संकेत है जहा यम की राजधानी थी) में रहने वाले लोगों की वेशभूषा धारण करते हैं, जो देखने में सुन्दर, कागज कलम धारी दो हाथों वाले हैं, जिनकी विरोधी देवी केतु है।’

श्री चित्रगुप्तजी की पूजा में उच्चारित मंत्रों का उल्लेख ‘दाना मन्जुखां’ के अधिकांश भागों में वर्णित है। चित्रगुप्तजी का आव्हान नियमित रुप से भोजन के समय किया जाता है। स्तुति पश्चात प्रत्येक व्यकित 4 या 5 ग्रास भोजन अपनी दाहिनी ओर, धरती पर रखता है। यह चित्र अथवा चित्रगुप्तजी हेतु आहुतिया कहलाती हैं। ग्रास रखते समय यों कहना चाहिए ‘समिर्पित है चित्र को चित्रगुप्त को, यम को, यम धर्म को भूर्भ बटेश्वर को’। सभी ब्राह्राण भोजन से पूर्व चित्रगुप्त को चावल के पिण्ड समर्पित करते हैं।

सोलह कनागतों में श्राद्व के समय भी उनका आव्हान किया जाता है। अथर्ववेद (सायण भाष्य) के अनुसार राजा चित्र वैवस्वत, विवास्व या आदित्य के पुत्र थे। उन्होंने यज्ञ अगिनहोत्र और तप द्वारा धर्मराज का पद प्राप्त किया। सभी प्राणियों में श्रेष्ठ चित्र ने सूर्य भगवान की तपस्या की जिन्होंने प्रसन्न होकर राजा चित्र से वर मांगने को कहा। इस पर चित्र ने कहा ‘भगवान यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो ऐसी शकित प्रदान करें जिससे मैं कायस्थ अथवा सर्वज्ञ हो जाऊं।

4. चित्रगुप्त वंश निर्णय भाग-। पृष्ठ 49-53 और भाग।। बा-कामता प्रसाद बनारस द्वारा
5. इथनोलाजिकल हैण्डबुक फार एन0 डब्लू पी0 एण्ड अवध 1890 पृष्ठ 90-105 डबल्यू क्रुक द्वारा।
(वस्तुत: तीसरी शताब्दी में जब याज्ञवल्कय स्मृति का संकलन हुआ, कायस्थ एक भिन्न प्रकार के पदाधिकारी थे। वे लेखपाल अथवा लेखाकार थे। वे मुख्य प्रशासकीय अधिकारी भी थे। मनुस्मृति में जिसमें समय मिश्र जातियों का वर्णन है, कायस्थ शब्द का न होना यह दर्शाता है कि वे ब्राह्राण अथवा क्षत्रिय वर्ण के अन्तर्गत आते हैं। मनु से सम्बनिधत विभिन्न ‘भाष्यों’ में सबसे प्राचीन ‘मेघातिषि’ द्वारा सन 1500 र्इ0 में लिखी गर्इ। इसमें भी कायस्थ जाति का उल्लेख नहीं है। किन्तु कुलुकभटट ने जिन्होेंने अपना भाष्य बनारस में सन 1550 र्इ0 में लिख, सर्व प्रथम बिना किसी आधार के शब्द ‘करन’ को कायस्थ का पर्यायवाची बताया। उन्होने ‘करन’ को मनुस्मृति में वर्णित क्षत्रिय वृतित का न होकर एक वैश्य पिता और शूद्र माता से उत्पन्न बताया। मनु के दूसरे भाष्यकार कामधेनु ने चित्रगुप्त कायस्थों का क्षत्रिय रुप दर्शाया है। इसी प्रकार याज्ञवल्कय के सर्वप्रमुख टीकाकार और मित्ताक्षर के संग्राहक बिजनेश्वर ने लिखा है कि एक राजा अपने प्रजाजनों को विशेषकर कायस्थों के उत्पीड़न से बचावे जो कि राजवल्लभ (राजा के कृपापात्र) चतुर और उदण्ड हैं। याज्ञवल्कय के एक अन्य टीकाकार ने अपनी ‘दपिकालिका’ में लिखा है कि शासकों से सम्बन्ध के कारण कायस्थ अत्यन्त प्रभावशाली थे।)
(अपनी पुस्तक ‘ट्राइब्स एण्ड कास्टस आफ बंगाल ‘भाग-। पृष्ठ 438-453 में मिस्टर एच0 एच0 राइजेल ने कायस्थो का वर्णन एक बहुसंख्यक प्रभावशाली जाति के रुप में किया है उनकी उत्पतित बहुत विवादित रही है। मनु ने कहीं भी इनका उल्लेख नहीं है और वे स्वयं उस सिद्वान्त को नकारते रहे हैं, जिसके अनुसार उनके पूर्वज करन एक वैश्य पिता और शूद्र माता की सन्तति कहे जाते है।

कायस्थों का वर्ण एक जाति विशेष के रुप में सर्व प्रथम याज्ञवल्क्य (राज्य धर्म का श्लोक 336) में मिलता है जिसके अनुसार वे लेखपाल और ग्राम लेखाकार थे। इसी स्मृति में संंकलन कर्ता ने कहा है कि एक राजा का कर्तव्य है कि वह अपनी प्रजा को ठग, चोर, दुष्ट तथा अन्य लोगों, विशेष कर कायस्थों के उत्पीड़न से बचावें।)
मनु पर आधारित नारद स्मृति में पहली बार न्याय व्यवस्था में धर्म को सीमित किया गया है। इसके अनुसार कायस्थ शानित एवं युद्व के मंत्री थे। कायस्थों के विषय में दूसरा उल्लेख विष्णु स्मृति में मिलता है (अपपप.3) जहां कायस्थों को न्यायाधीश के साथ संयुक्त कर निर्धारक अथवा आयुक्त कहा गया, (इसमें कहा गया है कि कोर्इ भी आलेख राजा द्वारा प्रमाणित माना जावेगा यह वह राजकीय न्यायालय में राजा द्वारा नियुक्त कायस्थ ने लिखा हो और उस पर स्वंय न्यायाधीश ने हस्ताक्षर किया है।) ठीक उसी प्रकार जैसा कि हम नि:सन्देह ‘मृच्छकटिका’ के अंक में श्रेषिठन के साथ पाते हैं। इस संस्कृत नाटक में कायस्थ और श्रेषिठन पात्रों की भांति ही गुप्त कालीन (म्चण् प्दकण् खण्ड प्ग् पृष्ठ 113-145) दामोदर ताम्रपत्र लेखों में भी उनको नगर व्यवस्था हेतु सहयोगी के रुप में दर्शाया गया है। यह भी उल्लेखनीय है कि ‘मृच्छकटिका’ के अंक 9 में चारुदत्त ने कुशाल की न्यायवस्था से सम्बद्व श्रेषिठन और कायस्थों हेतु आदेश दिया था। किन्तु मनु (प्प्.26) के अनुसार केवल ब्राह्राण ही कुशाल थे। अत: ऐसा प्रतीत होता है कि श्रेषिठन और कायस्थ दोनों ही ब्राह्राण थे। मृच्छकटिका’ का लेखक मनु से परिचित था और उनका आदर भी करता था। जो उसी अंक में न्यायाधीश और कानून के प्रति कहे गये वाक्यों से स्पष्ट होता है। द इंडियन एण्टीकैरीं फार मार्च 1982 डा0 भण्डारकर (बम्बर्इ संस्करण)।
‘पाराशर स्मृति’ में कायस्थों का उल्लेख मजिस्ट्रेट, न्यायाधीश और मुख्य कार्यकारी के रुप में मिलता है। इसमें शासक को निर्देश दिया गया है कि वह लेखन कला में निपुण कायस्थों की उत्पतित करें। सुक्रनिता (420) में शासक को आदेश है कि वह गावों की रक्षा हेतु ब्राह्राण लेखन कार्य के लिए कायस्थ, कर वसूलने के लिए वैश्य और सेवक के रुप में शूद्र की नियुकित करे। व्यास स्मृति के अनुसार जैसा कि मित्र मिश्रा ने ‘वीरमित्रोदय’ में कहा है, लेखक और लेखाकार को भाषा में प्रवीण, शारीरिक व मानसिक रुप से स्वस्थ तथा क्रोध पर नियंत्रण रखने वाला होना चाहिए। वह कायर न हो, सत्यवादी हो, और स्पष्ट रुप में लेखन कार्य कर सके। ऐसे ही व्यकित को राजकीय न्यायालय में नियुक्त किया जाना चाहिए। लेखपाल के रुप में ऐसे व्यकित को नियुक्त किया जावे जो खगोल विधा में पारंगत हो, नक्षत्रों की अक्षांश और देशान्तर रेखाओं परिसिथति से पूर्णतया भिन्न हो और र्इश्वरीय आदेशों यथा वेद, पुराण और स्मृति की शिक्षा प्राप्त हो। लेखकों और लेखाकारों के विषय में ऐसा ही मत बृहस्पति स्मृति का भी है। ‘उष्ना स्मृति’ के अनुसार प्रत्येक नगर और प्रमुख गाव में 6 अधिकारी होना चाहिए – पुलिस प्रमुख, ग्राम प्रमुख, लगान वसूली करने वाला, लेखाकार, कर संग्राहक और प्रहरी। लेखाकार गणना में पारंगत हो और उस प्रदेश की भाषा से भलीभांति परिचित हो। ‘व्यास स्मृति’ में आदेश हैं कि शासक को लेखक और लेखाकार के पद पर ऐसे व्यकित को नियुक्त करना चाहिए जो वेद, पुराण और स्मृतियों में पारंगत हो। किसी भी आलेख पर शासक द्वारा हस्ताक्षर करने के लिए यह आवश्यक है कि वह न्यायालय से सम्बद्व कायस्थ अधिकारी द्वारा लिखा गया हो। अतएव स्मृतियों के अनुसार कायस्थ एक राज्य अधिकारी के रुप में कार्यरत थे। वे लेखक, लेखाकार, कर संग्रहक, मजिस्ट्रेट और शांति और युद्व के मंत्री भी हो सकते थे।’
‘वशिष्ठ पद्वति’ में हम पाते हैं कि अयोध्या के राजा रामचन्द्र के विवाह के अवसर पर चित्रगुप्त के लिए आहुति दी गर्इ थी। पंडित शिवराम द्वारा बनार्इ गयी ‘कायस्थ वंशावली’ के अनुसार श्री रुद्र माथुर, अयोध्या के राजा अम्बरीष के मंत्री थे। यह पद उनकी 19 पीढि़यों तक बना रहा। उन्नीसवें मंत्री राजा बाल प्रताप स्वतंत्र होकर स्वंय राजा बन गये। उन्होंने अश्वमेघ यज्ञ किया। उन्हीं के वंशज श्रुत्सखा राजा रघु के मंत्री थे। तत्पश्चात श्री रंगा राजा आज के मंत्री हुए। उनके पुत्र कमलदल महाराज दशरथ के मंत्री रहे और उनका पुत्र विचिकश महाराज रामचन्द्र का।

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Near Modi Bhawan, Brijghat Distt. Hapur (U. P. )
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