26/08/2025
पुज्य उर्गेन संघरक्षित जन्म शतापब्दी निमित्या गडचिरोली येथे एक दिन का ध्यान शिबिर आयोजन केला आहे सर्वाना निमंत्रण.*"मैं जब तक आपके साथ रहूंगा तब तक मैं संघ और धम्म का अनुवाद शिक्षक बना रहूंगा"*
*....भंते संघरक्षित जी.*
भविष्य में मेरा आपके साथ रिश्ता होना मेरे उस रिश्ते को निभाने के लिए आपके बीच मेरे रहने पर निर्भर करता है। और चूंकि मुझे नहीं पता कि मैं कब तक आपके साथ रहूंगा, मैं इस विषय पर कुछ भी पक्का नहीं बोल सकूंगा। युवा हो या बूढ़े, मज़बूत हो या कमजोर, हमे किसी भी क्षण मृत्यु आ सकती हैं।
भविष्य वर्तमान का परिणाम है, जैसे वर्तमान अतीत का परिणाम होता है। इस बात को ध्यान में रखते हैं, भविष्य में संघ के साथ मेरा रिश्ता इसके पहले के और वर्तमान के रिश्ते से ज्यादा अलग नहीं होगा। इसमें कोई संदेश नहीं है कि संघ मेरे लिए तब भी महत्व का रहेगा। आप व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से मेरे लिए तब भी महत्वपूर्ण रहेंगे। मैं संस्थापक, उपाध्याय और उपाध्याय के उपाध्याय के रिश्ते में संघ में कायम रहूंगा। हालांकि मैं नियमित तौर पर दीक्षाए नहीं दूंगा। मुझे आशा है कि एक दिन, मैं संघ के एक बड़े हिस्से के लिए उपाध्याय के उपाध्याय के उपाध्याय के रिश्ते में अपने आपको पाऊंगा। मे संघ का शिक्षक भी बना रहूंगा और धर्म को स्पष्ट करना और अनुवाद करना जारी रखूंगा।
१९६९ में भंते जी ने लिखी हुए कविता:
मैं बोलना चाहूंगा,
नई आवाज में
बगीचे में एडम की तरह,
पुराने ऋषियों की तरह,
बुलंद हर्षित सुरों में सूर्य, चंद्रमा, तारे,
भोर, हवाएं, आग और तूफान बोलना चाहूंगा
स्वर्गीय सोम का उन्नत परमानंद बोलना चाहूंगा।
दिव्य पुरुषों की तरह
दिव्य नामों के साथ
दिव्य ब्रह्मांड का जश्न मनाते हुए बोलना चाहूंगा.
मैं बोलना चाहूंगा,
जो मैं जानता हूं
नई आवाज में,
नई बातें नए लोगों के लिए
नये क्षितिज, नई दृष्टि, नई सुबह, नया दिन अतुल्य सुरों में गाना चाहूंगा.
मैं बोलना चाहूंगा,
नये शब्द,
पवित्र और आदिम बर्फ के क्रिस्टल की तरह शुद्ध ओर चमकदार
संगीत की सांसों में जो बसते है
जो एलियन बनाते हैं,
(पुराने शब्द थके हारी, बांसी और निष्प्राण है)
नये शब्द
आपकी आंखों से
आसमां से
तारों से आते हैं,
नये शब्द
गूंजनेवाले, उज्ज्वल,
नये मैं को व्यक्त करनेवाले,
नये मनुष्यों के लिए
नया विश्व बनाने वाले।
.....मैंने खुद को बादलों में जाने की इजाजत दे दी है अब मुझे धरती पर वापस लौटना होगा. मुझे संघ के साथ अपनी रिश्ते के विषय को छोड़कर अंत में, शेष बौद्ध जगत के साथ संघ के रिश्ते के विषय पर आना होगा.
*....भंते संघरक्षित जी.*