22/06/2025
पूरी दुनिया आज युद्धों में झोंक दी गई है।
कहीं यह युद्ध तेल के लिए है, कहीं जल के लिए, कहीं ज़मीन के लिए, और कहीं तो बस इस भ्रम के लिए कि ‘हम सबसे बड़े हैं’।
अरे, इस ब्रह्मांड की विराटता में तू है कहाँ, मनुष्य?
तू तो कहीं है ही नहीं!
इस अनंत आकाशगंगा में तेरा अस्तित्व एक धूलकण भी नहीं।
फिर तू किस भ्रम में है?
किस पहचान की लड़ाई लड़ रहा है?
जो स्वयं को जानता है, वह जानता है – पहचान तो अहंकार का दूसरा नाम है।
तू लड़ा रहा है धर्म के नाम पर,
राष्ट्र के नाम पर,
रंग के नाम पर,
भाषा के नाम पर –
और हर युद्ध का कारण बाहर दिखाई देता है, लेकिन उसका मूल तुझमें है – तेरे भीतर।
तू अपने भीतर के अधूरेपन को जीतने की कोशिश करता है बाहर की लड़ाई में।
लेकिन बाहर की कोई भी जीत तेरे भीतर के खोखलेपन को भर नहीं सकती।
मनुष्य की पूरी सभ्यता एक अजीब मज़ाक बन चुकी है –
क्या तूने कभी रात के आकाश को देखा है?
तू जहाँ खड़ा है, वह बिंदु भी नहीं, वह तो खालीपन का भी खालीपन है।
तेरा अहंकार तो ऐसा है जैसे कोई बुलबुला, जो समुद्र पर खुद को महासागर समझ बैठे।
युद्ध तो उसी का धर्म है जो भीतर से दरिद्र है।
जिसके पास ध्यान नहीं है, वह ही तलवार उठाता है।
जिसे भीतर की सत्ता का स्वाद नहीं मिला, वह ही बाहरी सत्ता की भूख से पागल हो जाता है।
लेकिन सुनो, मनुष्य:
संसाधनों के लिए लड़ी गई हर लड़ाई तुझे और दरिद्र बनाएगी।
ताक़त के लिए लड़ा गया हर युद्ध तुझे भीतर से और अधिक निर्बल कर देगा।
पहचान के लिए लड़ी गई हर जंग तुझे तेरे मूल स्वरूप से और दूर ले जाएगी।
ध्यान की आँख खोलो, और देखो —
इस अस्तित्व ने तुम्हें हथियार चलाने के लिए नहीं,
प्रेम करने के लिए जन्म दिया है।
युद्ध में कुछ नहीं मिलेगा।
जो मिलेगा वह भीतर के मौन में है,
जहाँ कोई झंडा नहीं होता,
कोई सीमा नहीं होती,
न धर्म, न राष्ट्र —
बस शुद्ध चैतन्य होता है।
वहीं तुम्हारा असली घर है।
बाकी सब भ्रम है, सपना है — और सपना भी इतना छोटा कि नींद खुलते ही गायब हो जाए।
जागो…
युद्ध में नहीं, शांति में तुम्हारा भविष्य है।
बाहर नहीं — भीतर ही सारी जीत है।