Shree Varasiddhi Vinayaka Mandir

Shree Varasiddhi Vinayaka Mandir Ganpati Bappa Morya Mangal Moorti Morya The Temple SHREE VARASIDDHI VINAYAKA is dedicated to SHREE GANESH.

This temple was built on Phagun Krishan Pakshya Ditiya, Vikram Samvat 2049 and this is one of the biggest temples in Dona Paula, Goa." The Temple renovation started on 28th of September 2009 and completed in September 2013

।। ॐ नमो पार्वती पतये हर हर महादेव ।।महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं महाशिवरात्रि व्रत महापर्व   १५ फरवरी २०२६ 🌹🌹🌹   ...
14/02/2026

।। ॐ नमो पार्वती पतये हर हर महादेव ।।
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं
महाशिवरात्रि व्रत महापर्व १५ फरवरी २०२६ 🌹🌹🌹
देवों के देव भगवान भोले नाथ के भक्तों के लिये श्री महाशिवरात्रि का व्रत विशेष महत्व रखता हैं। यह पर्व फाल्गुन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन मनाया जाता है। इस दिन का व्रत रखने से भगवान भोले नाथ शीघ्र प्रसन्न हो, उपवासक की मनोकामना पूरी करते हैं। इस व्रत को सभी स्त्री-पुरुष, बच्चे, युवा, वृद्धों के द्वारा किया जा सकता हैं। इस दिन विधिपूर्वक व्रत रखने पर तथा शिवपूजन, शिव कथा, शिव स्तोत्रों का पाठ व ‘ॐ नम: शिवाय’ का पाठ करते हुए रात्रि जागरण करने से अश्वमेघ यज्ञ के समान फल प्राप्त होता हैं। व्रत के दूसरे दिन यथाशक्ति वस्त्र-क्षीर सहित भोजन, दक्षिणादि प्रदान करके सन्तुष्ट किया जाता हैं।

शिवरात्री व्रत की महिमा
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इस व्रत के विषय में यह मान्यता है कि इस व्रत को जो जन करता है, उसे सभी भोगों की प्राप्ति के बाद, मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत सभी पापों का क्षय करने वाला है, व इस व्रत को लगातार 14 वर्षो तक करने के बाद विधि-विधान के अनुसार इसका उद्धापन कर देना चाहिए।
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महाशिवरात्री व्रत का संकल्प
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व्रत का संकल्प सम्वत, नाम, मास, पक्ष, तिथि-नक्षत्र, अपने नाम व गोत्रादि का उच्चारण करते हुए करना चाहिए। महाशिवरात्री के व्रत का संकल्प करने के लिये हाथ में जल, चावल, पुष्प आदि सामग्री लेकर शिवलिंग पर छोड़ दी जाती है।
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महाशिवरात्री व्रत की सामग्री
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उपवास की पूजन सामग्री में जिन वस्तुओं को प्रयोग किया जाता हैं, उसमें पंचामृ्त (गंगाजल, दुध, दही, घी, शहद), सुगंधित फूल, शुद्ध वस्त्र, बिल्व पत्र, धूप, दीप, नैवेध, चंदन का लेप, ऋतुफल आदि।
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महाशिवरात्री व्रत
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महाशिवरात्री व्रत को रखने वालों को उपवास के पूरे दिन, भगवान भोले नाथ का ध्यान करना चाहिए। प्रात: स्नान करने के बाद भस्म का तिलक कर रुद्राक्ष की माला धारण की जाती है। इसके ईशान कोण दिशा की ओर मुख कर शिव का पूजन धूप, पुष्पादि व अन्य पूजन सामग्री से पूजन करना चाहिए। इस व्रत में चारों पहर में पूजन किया जाता है। प्रत्येक पहर की पूजा में ‘ॐ नम: शिवाय’ व ‘शिवाय नम:’ का जाप करते रहना चाहिए। अगर शिव मन्दिर में यह जाप करना सम्भव न हो, तो घर की पूर्व दिशा में, किसी शान्त स्थान पर जाकर इस मंत्र का जाप किया जा सकता हैं। चारों पहर में किये जाने वाले इन मंत्र जापों से विशेष पूण्य प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त उपावस की अवधि में रुद्राभिषेक करने से भगवान शंकर अत्यन्त प्रसन्न होते है।
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शिव अभिषेक विधि
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महाशिव रात्रि के दिन शिव अभिषेक करने के लिये सबसे पहले एक मिट्टी का बर्तन लेकर उसमें पानी भरकर, पानी में बेलपत्र, आक धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर शिवलिंग को अर्पित किये जाते है। व्रत के दिन शिवपुराण का पाठ सुनना चाहिए और मन में असात्विक विचारों को आने से रोकना चाहिए। शिवरात्रि के अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेलपत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है।

पूजन करने का विधि-विधान
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महाशिवरात्री के दिन भगवान शिव लिंग रूप में प्रकट हुए थे। भगवान भोले नाथ अत्यधिक प्रसन्न होते है, जब उनका पूजन बेल- पत्र आदि चढाते हुए किया जाता है। व्रत करने और पूजन के साथ जब रात्रि जागरण भी किया जाये, तो यह व्रत और अधिक शुभ फल देता है। इस दिन भगवान शिव ने विषपान किया था इसलिये रात्रि जागरण किया जाता है । सभी वर्गों के लोग इस व्रत को करके पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।


॥ॐ नमः शिवाय्॥

ॐ नमो पार्वती पतये हर हर महादेवशुभ शिव नवरात्रि
08/02/2026

ॐ नमो पार्वती पतये हर हर महादेव
शुभ शिव नवरात्रि

।।  गणपति बप्पा मोरया । मंगल मूर्ति मोरया ।।शुभ द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी फाल्गुन मास की  संकष्टी चतुर्थी को द्विजप्रिय...
04/02/2026

।। गणपति बप्पा मोरया । मंगल मूर्ति मोरया ।।
शुभ द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी
फाल्गुन मास की संकष्टी चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाता है. इस दिन गणपति के द्विजप्रिय रूप की आराधना की जाती है. मान्यता है कि विघ्नहर्ता द्विजप्रिय गणेश के चार मस्तक और चार भुजाएं हैं. उनका पूजन और व्रत करने से सभी तरह के कष्ट दूर हो जाते हैं. साथ ही अच्छी सेहत और सुख समृद्धि प्राप्त होती है.

व्रत कथा
एक बार माता पार्वती और भगवान शिव नदी के पास बैठे हुए थे तभी अचानक माता पार्वती ने चौपड़ खेलने की अपनी इच्छा ज़ाहिर की. लेकिन समस्या की बात यह थी कि वहां उन दोनों के अलावा तीसरा कोई नहीं था जो खेल में निर्णायक की भूमिका निभाए. इस समस्या का समाधान निकालते हुए शिव और पार्वती ने मिलकर एक मिट्टी की मूर्ति बनाई और उसमें जान डाल दी.

मिट्टी से बने बालक को दोनों ने यह आदेश दिया कि तुम खेल को अच्छी तरह से देखना और यह फैसला लेना कि कौन जीता और कौन हारा. खेल शुरू हुआ जिसमें माता पार्वती बार-बार भगवान शिव को मात दे कर विजयी हो रही थीं. खेल चलते रहा लेकिन एक बार गलती से बालक ने माता पार्वती को हारा हुआ घोषित कर दिया.

बालक की इस गलती ने माता पार्वती को बहुत क्रोधित कर दिया जिसकी वजह से गुस्से में आकर उन्होंने बालक को श्राप दे दिया और वह लंगड़ा हो गया. बालक ने अपनी भूल के लिए माता से बहुत क्षमा मांगी. तब माता ने कहा कि अब श्राप वापस तो नहीं हो सकता लेकिन वे एक उपाय बता सकती हैं जिससे श्राप मुक्ति हो सकती है. माता ने कहा कि संकष्टी वाले दिन इस जगह पर कुछ कन्याएं पूजा करने आती हैं, तुम उनसे व्रत की विधि पूछना और उस व्रत को सच्चे मन से करना.

बालक ने व्रत की विधि को जान कर पूरी श्रद्धापूर्वक और विधि अनुसार उसे किया. उसकी सच्ची आराधना से भगवान गणेश प्रसन्न हुए और उसकी इच्छा पूछी. बालक ने माता पार्वती और भगवान शिव के पास जाने की अपनी इच्छा को ज़ाहिर किया. गणेश ने उस बालक की मांग को पूरा कर दिया और उसे शिवलोक पंहुचा दिया, लेकिन जब वह पहुंचा तो वहां उसे केवल भगवान शिव ही मिले.

माता पार्वती भगवान शिव से नाराज़ होकर कैलाश छोड़कर चली गयी थीं. जब शिव ने उस बच्चे को पूछा की तुम यहां कैसे आए तो उसने उन्हें बताया कि गणेश की पूजा से उसे यह वरदान प्राप्त हुआ है. ये जानने के बाद भगवान शिव ने भी पार्वती को मनाने के लिए उस व्रत को किया जिसके बाद माता पार्वती भगवान शिव से प्रसन्न हो कर वापस कैलाश वापस लौट आयीं. इस तरह संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने वाले की गणपति सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं.
जय श्री गणेश।
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शुभ माघ पूर्णिमामाघ मास के अंतिम दिन की तिथि को माघी पूर्णिमा कहा जाता है। यह तिथि धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।...
01/02/2026

शुभ माघ पूर्णिमा

माघ मास के अंतिम दिन की तिथि को माघी पूर्णिमा कहा जाता है। यह तिथि धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। इस बार माघी पूर्णिमा 1 फरवरी, रविवार को पड़ रही है। इस दिन भगवान विष्णु और चंद्रदेव की पूजा करने का महत्व है। माघ पूर्णिमा के दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से पुण्य मिलता है। वह व्रत और दान करने का भी महत्व है। मान्यताओं के अनुसार इस दिन देवता पृथ्वी पर आते हैं। इस दिन मां लक्ष्मी को प्रसन्न किया जा सकता है।

- शुभ योग : कर्क राशि में चंद्रमा और आश्लेषा नक्षत्र की युति होने से शोभन योग बनेगा।

माघ पूर्णिमा का महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार माघ महीने में सभी देवी-देवता पृथ्वी पर आते हैं। मनुष्य रूप धारण करके प्रयागराज में स्नान, दान और तप करते हैं। मान्यता है कि इस दि प्रयागराज में स्नान करने से जातकों की मनोकामना पूरी होती है। वह जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

माघ पूर्णिमा पर माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के उपाय

- माघ पूर्णिमा के दिन सुबह स्नान कर तुलसी को भोग, दीपक और जल चढ़ाएं। ऐसा करने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती है।

- पूर्णिमा के दिन माता लक्ष्मी के मंत्र ऊं श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नमः का जाप करना चाहिए।

- माता लक्ष्मी की मूर्ति पर 11 कौड़िया चढ़ाकर उनपर हल्दी से तिलक करें। दूसरे दिन कौड़ियों को एक लाल कपड़े में बांधकर अलमारी में रख दें। ऐसा करने से देवी की कृपा बनी रहती है।

- माघ पूर्णिमा के दिन सुबह पीपल पर जल चढ़ाएं।

- पूर्णिमा के दिन गरीबों या जरूरतमंद को वस्त्र दान करें।

माघ पूर्णिमा व्रत नियम-

- इस दिन लोग लोग पवित्र नदियों के तट पर सुबह-सुबह स्नान करते हैं।
- इसके बाद माघ पूर्णिमा व्रत नियमों का पालन करते हैं।
- भगवान विष्णु की पूजा मंदिर में या अपने घरों में करनी चाहिए।
- विष्णु पूजा पूरी होने के बाद, भक्त सत्यनारायण कथा का पाठ करते हैं।
- गायत्री मंत्र ’या ओम नमो नारायण’ मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए।
- गरीबों या जरूरमद को वस्त्र दान करें।

जय श्री सोमनाथ महादेव शुभ  77 गणतंत्र दिवस
26/01/2026

जय श्री सोमनाथ महादेव
शुभ 77 गणतंत्र दिवस

ll जय श्री सरस्वती माँ llबसंत पंचमी (२३ जनवरी २०२६) की हार्दिक शुभ कामनाएं "माँ शारदा स्तुति" विद्या दाती शारदे, दो विद्...
22/01/2026

ll जय श्री सरस्वती माँ ll
बसंत पंचमी (२३ जनवरी २०२६) की हार्दिक शुभ कामनाएं

"माँ शारदा स्तुति"

विद्या दाती शारदे, दो विद्या का दान
मोह लोभ का नाश हो , मिटे दंभ अभिमान

वागीश्वरि माँ शारद प्यारी| पूजें तुमको सब नर नारी ।।
माँ सब तुमसे वाणी पाते| देव दनुज नर सारे ध्याते ।।
श्वेत वर्ण सम चन्द्र सुशोभित| चार भुजा मुख मंडल मोहित।।
श्वेत हंस में मात विराजी | माला वीणा पुस्तक साजी ।।
श्वेत वस्त्र दिनकर से उज्जवल| वर मुद्रा धारण कर निर्मल ।।
ज्ञान कला विज्ञान धात्री| मनो बुद्धि शुभ शुचिता दात्री|
दो वर शारद माँ वरदानी| हरो क्लेश सब सुख की खानी ।।
काट तमस दुःख का अँधियारा| बिखरा दे माँ सुख उजियारा ।।
दीप खडा है आस लगाए| कौन यहाँ से खाली जाए ।।
आज लुटा भण्डार शारदे| भव सागर से हमें तारदे ।।

माँ वरदानी शारदे, देना इतना ज्ञान
कला और विज्ञान से, सबका हो कल्याण
छंद त्रिभंगी "माँ शारद वंदन"

दोनों कर जोड़े, मन के घोड़े, मोड़े शारद, वंदन में
नत आज चरण में, मात शरण में, श्रद्धा धारे, तन मन में
तुम वीणापाणी, माँ वरदानी, व्याप्त धरा के, कण कण में
सुन टेर हमारी, शारद प्यारी, शुभ सुचिता दो, जीवन में..................................
आदिशक्ति के विद्यास्वरूप को बारंबार नमस्कार है ।

शुभ माघ गुप्त नवरात्रि💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐🌼इस वर्ष 19 जनवरी 2026 से माघ गुप्त नवरात्रि का प्रारंभ हो रहा है। पंचांग के अनुसार वर्ष...
18/01/2026

शुभ माघ गुप्त नवरात्रि
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🌼इस वर्ष 19 जनवरी 2026 से माघ गुप्त नवरात्रि का प्रारंभ हो रहा है। पंचांग के अनुसार वर्षभर में कुल 4 नवरात्रि आती हैं, जो माघ, चैत्र, आषाढ और आश्विन माह में पड़ती है। इनमें से 2 गुप्त नवरात्रि होती है। इस नवरात्रि में मां त्रिपुर भैरवी, धूमावती, काली, तारा देवी, त्रिपुरा सुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, मातंगी और माता कमला देवी की पूजा की जाती है।

नवरात्रि मां दुर्गा की साधना के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं। नवरात्रि के दौरान साधक विभिन्न तंत्र विद्याएं सीखने के लिए मां भगवती की विशेष पूजा करते है। तंत्र साधना की दृष्टि से गुप्त नवरात्रि बेहद विशेष मानी जाती हैं। आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है।*

*इस नवरात्रि के बारे में बहुत ही कम लोगों को जानकारी होती है। मान्यतानुसार गुप्त नवरात्रि में भी अन्य नवरात्रि की तरह ही पूजन करना चाहिए। गुप्त नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा का पूजन आधी रात को किया जाता हैं। अत: सुबह के पश्चात रात्रि में गुप्त रूप से माता की आराधना करें।*

*इन 9 दिनों के उपवास का संकल्प लेते हुए प्रतिप्रदा यानी पहले दिन घटस्थापना करके प्रतिदिन सुबह और सायं में मां दुर्गा की पूजा करनी चाहिए। अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन के साथ नवरात्रि व्रत का उद्यापन करना चाहिए। अगर आप भी देवी दुर्गा की कृपा पाना चाहते हैं तो इन 9 दिनों में ये 9 खास उपाय कर लीजिए।*

*🪔गुप्त नवरात्रि के उपाय-*
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1. गुप्त नवरात्र‍ि के दिन मां दुर्गा और महाविद्याओं का स्मरण करते हुए एक स्वच्छ, नया, सुंदर सजा हुआ मिट्टी का घड़ा लें। उसमें सप्तधान के थोड़े से दाने, 1 रुपए का या चांदी का सिक्का डालें। फिर उसमें गंगा जल मिश्रित पानी भरें। कलश के भीतर एक-एक सुपारी, पूजा बादाम और हल्दी की गांठ भी डालें। अब इस पानी पर थोड़ा-सा कुमकुम, अबीर और चावल छिड़कें। अब इसें दीये से ढंक दें। इस दीये पर छोटा पूजा नारियल रखें। नारियल पर मौली बांधकर इस कलश की विधिवत पंचोपचार पूजा करें।

कलश के सामने हाथ जोड़ कर, आंखें बंद कर प्रतिदिन की महाविद्या का स्मरण करें और अपनी गुप्त मनोकामना मन ही मन देवी से व्यक्त करें। जब पूजन से उठें तो आसन को प्रणाम कर आसन साथ में उठाएं। ऐसा 9 दिन की गुप्त नवरात्रि में प्रतिदिन करें। नौवें दिन कलश का जल अपने ऊपर और पूरे घर में छिड़कें। बचा हुआ जल तुलसी, पीपल या किसी भी पवित्र पौधे में अर्पित करें।

अगर संभव हो तो यह जल नदी या स्वच्छ सरोवर में भी बहा सकते हैं। कलश की पूजा सामग्री में से निकला सिक्का अपने पास रख लें, शेष सभी विसर्जित कर दें। कलश उठाने से पहले अंतिम दिन 108 बार अपनी कामना बोलें।

2. यदि आप बच्चे की बुरी नजर से रक्षा करना चाहते हैं, तो गुप्त नवरात्र‍ि में हनुमान चालीसा का निरंतर जप करना चाहिए और बच्चे के बाएं पैर पर बजरंगबली को अर्पित किया हुआ काजल और माथे पर हनुमान जी का सिंदूर लगाना चाहिए।

3. यदि आप बेरोजगार हैं और रोजगार की तलाश कर रहे है तो गुप्त नवरात्र‍ि में भैरव बाबा मंदिर में प्रार्थना करनी चाहिए। निश्चित रूप से नौकरी दिलाने में यह उपाय सहायता करेगा।

4. गुप्त नवरात्रि के दिनों में मां दुर्गा को लाल पुष्प अवश्य चढ़ाएं, ऐसा करना बहुत ही शुभ माना जाता है।

5. सर्वविघ्न दूर करने के लिए गुप्त नवरात्रि में सरसों के तेल से दीया जलाएं तथा अधिक से अधिक इस मंत्र का जाप करें। मंत्र- *•'ॐ दुं दुर्गायै नमः'।*

6. हर तरह की सुख-समृद्धि, सफलता, खुशी और प्रेम के लिए घर के मंदिर में शिव-पार्वती की एक मूर्ति स्थापित करके निम्न मंत्र का 5 बार जाप करें। मंत्र- *•'ॐ शंकराय सकल जन्मार्जित पाप विध्वंसनाय, पुरुषार्थ चतुष्ठाय लभाय च पति मे देहि कुरु कुरु स्वाहा।*'

7. आर्थिक लाभ के लिए, गुप्त नवरात्र‍ि के 9 दिनों तक पीपल पेड़ के पत्ते पर राम का नाम लिखें और उन्हें हनुमान मंदिर में अर्पित करें, इससे आपकी आर्थिक स्थिति में सुधार होगा।

8. गुप्त नवरात्रि के 9 दिनों तक इस मंत्र का जप करें। *•'सब नार करहि परस्पर प्रीति चलहि स्वधर्म नीरत श्रुति नीति'*। इससे पति-पत्नी के बीच का तनाव कम होता है। घी की 108 आहुति दें। बाद में जब भी आवश्यकता हो 21 बार इस मंत्र का जप करना चाहिए।

9. गुप्त नवरात्रि में आप अपने घर मोरपंख लाकर रखें, क्योंकि मां लक्ष्मी की सवारी में से मोर को भी एक माना गया है। मोर पंख घर लाने से यहां की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है तथा माता लक्ष्मी आपके ऊपर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखती हैं।

🚩ऊँ श्री दुर्गाय नम:🚩
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।। ॐ नमो पार्वती पतये । हर हर महादेव ।।।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।।।। जय गंगा माता । जय यमुना माता । जय सरस्वती माता ।।शु...
18/01/2026

।। ॐ नमो पार्वती पतये । हर हर महादेव ।।
।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।।
।। जय गंगा माता । जय यमुना माता । जय सरस्वती माता ।।
शुभ मौनी अमावस्या

।। ॐ नमो पार्वती पतये । हर हर महादेव ।।शुभ माघ शिवरात्रि ll ॐ नमः शिवाय ll"ॐ मृत्युंजय महादेव त्राहिमाम शरणागतम जन्म मृत...
16/01/2026

।। ॐ नमो पार्वती पतये । हर हर महादेव ।।
शुभ माघ शिवरात्रि

ll ॐ नमः शिवाय ll
"ॐ मृत्युंजय महादेव त्राहिमाम शरणागतम जन्म मृत्यु जरा रोगेन पीड़ितम कर्म बंधने "
अर्थात हे महादेव में सांसारिक दुःख दुविधाओं में फसा हुआ हूँ रोग, शोक,भय और मृत्यु मेरा पीछा नही छोड़ रही में आपकी शरण में हूँ आप मेरी रक्षा कीजिये l

“निरंजनो निराकरो एको देवो महेश्वर:।
मृत्यू मुखम् गतात् प्राणं बलात रक्षति:॥

अर्थात :- निरंजन एंव निराकार महेश्वर ही एक मात्र देव हैं जो मृत्यू के मुख मे गए हुए प्राणों की बलपूर्वक रक्षा करने में समर्थ हैं।”
मार्कण्डेय ऋषि का पुत्र अत्यंत अल्प आयु था तब अन्य ऋषियों ने मार्कण्डेय ऋषि के पुत्र को पूर्ण श्रद्धा के साथ किसी भी महादेव मंदिर में महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने की सलाह दी.जाप करते करते जब मार्कण्डेय ऋषि के पुत्र की आयु पूर्ण होने लगी तो समय पर प्राण हरने यमराज आये लेकिन जिसने महादेव की शरण ले रखी हो उसे भला कौन छू सकता है ये देख यमराज लौट गए और बाद में ऋषि द्वारा मार्कण्डेय पुराण की रचना की गयी ll
ll हर हर महादेव ll

मकर संक्रांति की हार्दिक शुभ कामनाएंll जय सूर्यदेव llll ॐ नमो भगवते सूर्याय नमःllll ॐ आदित्य च विद्महे l सहस्त्र किरणाये...
13/01/2026

मकर संक्रांति की हार्दिक शुभ कामनाएं
ll जय सूर्यदेव ll
ll ॐ नमो भगवते सूर्याय नमःll
ll ॐ आदित्य च विद्महे l सहस्त्र किरणाये च धीमहि l तन्नो सूर्य प्रचोदयात् ll
भगवान श्री सूर्य समस्त जीव-जगत के आत्मस्वरूप हैं। ये ही अखिल सृष्टि के आदि कारण हैं।
भगवान सूर्य नित्य सबको प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। इसलिये प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य की नित्य उपासना करनी चाहिये। भगवान सूर्य के अर्ध्यदान की विशेष महत्ता है। प्रतिदिन प्रात:काल रक्तचन्दनादि से मण्डल बनाकर तथा ताम्रपात्र में जल, लाल चन्दन, चावल, रक्तपुष्प और कुशादि रखकर सूर्यमन्त्र का जप करते हुए भगवान सूर्य को अर्ध्य देना चाहिये। सूर्यार्घ्य का मन्त्र ॐ एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर है। अर्ध्यदान से प्रसन्न होकर भगवान सूर्य आयु, आरोग्य, धन-धान्य, यश, विद्या, सौभाग्य, मुक्ति- सब कुछ प्रदान करते हैं।
महर्षि कश्यप लोक पिता हैं। उनकी पत्नी देवमाता अदिति के गर्भ से भगवान विराट के नेत्रों से व्यक्त सूर्यदेव जगत में प्रकट हुए। सूर्य मण्डल का दृश्य रूप भौतिक जगत में उनकी देह है। विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से उनका परिणय हुआ। संज्ञा के दो पुत्र और एक कन्या हुई- श्राद्धदेव वैवस्वतमनु और यमराज तथा यमुना जी। संज्ञा भगवान सूर्य के तेज़ को सहन नहीं कर पाती थी। उसने अपनी छाया उनके पास छोड़ दी और स्वयं घोड़ी का रूप धारण करके तप करने लगी। उस छाया से शनैश्चर, सावर्णि मनु और तपती नामक कन्या हुई। भगवान सूर्य ने जब संज्ञा को तप करते देखा तो उसे तुष्ट करके अपने यहाँ ले आये। संज्ञा के बड़वा (घोड़ी) रूप से अश्विनीकुमार हुए। त्रेता में कपिराज सुग्रीव और द्वापर में महारथी कर्ण भगवान सूर्य के अंश से ही उत्पन्न हुए। पक्षिराज गरुड़ के बड़े भाई विनता नन्दन अरुण जी भगवान सूर्य के रथ को हाँकते हैं। रथ में सात उज्ज्वल घोड़े जुते हैं। अहर्निश यह रथ पूर्ण वेग से चलता रहता है।
सौर सिद्धान्त भी वस्तुत: सूर्य को गतिशील मानता है। विज्ञान के महान विद्वान अभी परस्पर इस सम्बन्ध में सहमत नहीं हैं। उनका अन्वेषण चल रहा है। नित्य नये सिद्धान्त वहाँ बनते जा रहे हैं।
भगवान सूर्य अपने रथ पर आसीन अविश्रान्त भाव से मेरू की प्रदक्षिणा करते रहते हैं। उन्हीं के द्वारा दिन, रात्रि, मास, ऋतु, अयन, वर्ष आदि का विभाग होता है। वही दिशाओं के भी विभाजक हैं।
भगवान सूर्य की उपासना बारह महीनों में बारह नामों से होती है। उस समय उनके पार्षद भी परिवर्तित हो जाते हैं। इन पार्षदों में ऋषि, अप्सराएँ, गन्धर्व, राक्षस, भल्ल और नाग हैं।
ऋषि रथ से आगे चलते हुए भगवान की स्तुति करते हैं।
गन्धर्व गान करते हैं।
अप्सराएँ नाचती हैं।
राक्षस रथ को पीछे से ठेलते हैं।
भल्ल रथयोजक बनते हैं और
नाग रथ को ले चलते हैं।
सन्ध्या भगवान आदित्य की ही उपासना है और वह द्विजाति मात्र का अनिवार्य कर्तव्य है।
भगवान सूर्य साक्षात नारायण हैं। उन श्रुति धाम ने वाजि (अश्व)-रूप धारण करके महर्षि याज्ञवल्क्य को शुक्ल यजुर्वेद का उपदेश किया। श्री हनुमान जी के विद्या गुरु भी वही हैं।
सूर्य को मानव/अवतार/देवता मानते हुए उसका जन्म अदिति (प्रकृति) से हुआ माना गया है।
सूर्य की दो पत्नियाँ अर्थात सहचरी बतायी गयीं हैं।
संज्ञा( चेतना या ऊर्जा) और
छाया ।
छाया की कोख़ से शनि का जन्म हुआ। गुणों में पिता से विपरीत धर्म-कर्त्तव्य वाला होने के कारण शनि पिता सूर्य के साथ मनमुटाव जैसा व्यवहार करता बताया गया है, परंतु सूर्य पुत्र के अवगुणों को तो कुदृष्टि से देखता है पर पुत्र के साथ तट्स्थ बना रहता है।
श्रीमद्भागवतपुराण में सूर्य के विषय में विस्तार से वर्णन किया गया है। सूर्य की स्थिति बतायी है - 'अंडमध्यगतः सूर्यो द्यावाभूम्योर्यदन्तरम।
सूर्याण्डगोलयोर्मध्ये कोट्यः स्युः पञ्चविंशतिः॥'
स्वर्ग और पृथ्वी के बीच में जो ब्रह्माण्ड का केंद्र है वहीं सूर्य की स्थिति है।
'मृतेऽण्ड एष एतस्मिन यद भूत्ततो मार्तण्ड इति व्यपदेशः।
हिरण्यगर्भ इति यद्धिरण्याण्डसमुद्भवः॥'
अर्थ
भगवान सूर्य, सूर्य मंदिर, कोणार्क
इस अचेतन में विराजने के कारण इसे 'मार्तण्ड' भी कहा जाता है। यह ज्योतिर्मय(हिरण्यमय) ब्रह्मांड से प्रकट हुए हैं इसलिए इन्हें 'हिरण्यगर्भा' भी कहते हैं। सूर्य ही दिशा, आकाश, द्युलोक (अंतरिक्ष) भूलोक, स्वर्ग और मोक्ष के प्रदेश , नरक, और रसातल और अन्य भागों के विभागों का कारण है। सूर्य ही समस्त देवता, तिर्यक, मनुष्य, सरीसृप और लता-वृक्षादि समस्त जीव समूहों के आत्मा और नेत्रेन्द्रियके अधिष्ठाता हैं, अर्थात सूर्य से ही जीवन है। 'सूर्येण हि विभज्यन्ते दिशः खं द्यौर्मही भिदा। स्वर्गापवर्गोनरका रसौकांसि च सर्वशः॥' 'देवतिर्यङ्मनुष्याणां सरीसृपसवीरुधाम। सर्वजीवनिकायानां सूर्य आत्मा दृगीश्वरः॥'
सूर्य की स्थिति
सूर्य ग्रहों और नक्षत्रों का स्वामी है। सूर्य उत्तरायण, दक्षिणायन और विषुवत नाम वाली क्रमशः मंद, शीघ्र और समान गतियों से चलते हुए समयानुसार मकरादि राशियों में ऊँचे-नीचे और समान स्थानों में जाकर दिन रात को बड़ा,छोटा करता है। जब मेष या तुला राशि पर आता है तब दिन-रात समान हो जाते हैं। तब प्रतिमास रात्रियों में एक-एक घड़ी कम होती जाती है और दिन बढ़ते जाते हैं। जब वृश्चिकादि राशियों पर सूर्य चलते हैं तब इसके विपरीत परिवर्तन होता है। श्रीमद्भागवपुराण में सूर्य की परिक्रमा का मार्ग नौ करोड़, इक्यावन लाख योजन बताया है। समय के साथ सूर्य को स्पष्ट करने के लिए रुपक है:'सूर्य का संवत्सर नाम का एक चक्र (पहिया) है, उसमें माह रुपी बारह अरे हैं, ऋतु रुपी छह नेमियाँ हैं और तीन चौमासे रुपी तीन नाभियाँ हैं।'
ज्योतिष में सूर्य
ज्योतिष के अनुसार सूर्य सबसे तेजस्वी, प्रतापी और सत और तमो गुण वाला ग्रह कहा गया है। यह आत्मा का कारक और हृदय एवं नाड़ी संस्थान का अधिपति है। सूर्य समस्त ब्रह्मांड का केंद्र ज्योतिष में भी माना गया है। प्राचीन ज्ञान का हर विषय मानवीकरण और रूपक के माध्यम से स्पष्ट किया गया मिलता है। सूर्य भी इससे अछूता नहीं है।
सूर्य कृतिका, उत्तराषाढ़ा और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रों का स्वामी है।
कृतिका नक्षत्र ज्ञानार्जन, पशुपालन, रोग, अनासक्ति, अशांत और तार्किकता इत्यादि गुण-प्रधान बताया गया है।
उत्तराषाढ़ा चित्रकला, सफ़ाई, यश-कीर्ति, प्रज्ञा, पुष्टता, गर्वीलापन, दृढ़ता और निपुणता जैसे विषयों का प्रधान बताया गया है।
उत्तराफाल्गुनी तेज-स्मरणशक्ति, कला-कुशलता, व्यवहार-कुशलता, एकांतप्रेमी, माता-पिता के सुख से वंचित जैसे गुणों की प्रधानता वाला बताया गया मिलता है।
सूर्य सिंह राशि, जो काल-पुरुष( समय का मानवीयकरण) का आमाशय/ पेट माना गया है और गणना से पांचवी राशि है, का स्वामी माना गया है और भावों के अनुसार पाँचवाँ भाव शिक्षा, संतान, शौक़ और आदत का है।
ll ॐ नमो भगवते सूर्याय नमः ll

Greetings on 163rd birth anniversary of Swami Shri Vivekanand Ji Maharaj
11/01/2026

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विश्व हिंदी दिवस की शुभ कामनाएं
10/01/2026

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