Maa Pitambara Peeth- मां पीतांबरा पीठ

Maa Pitambara Peeth- मां पीतांबरा पीठ मां पीतांबरा पीठ, नयाबांस, खैरगढ़, फिरोजाबाद, उत्तर प्रदेश,

16/08/2026

अपने आराध्य को नाचते देखकर कैसा सुख मिलता है

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं व बधाई
16/08/2026

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं व बधाई

अधर्म क्या है? गैर-धार्मिक कृत्यों का परिणाम और जीवन में नकारात्मकता बढ़ने के कारणमनुष्य के जीवन में सुख-दुःख, शांति-अशा...
09/08/2026

अधर्म क्या है? गैर-धार्मिक कृत्यों का परिणाम और जीवन में नकारात्मकता बढ़ने के कारण

मनुष्य के जीवन में सुख-दुःख, शांति-अशांति, सकारात्मकता-नकारात्मकता इन सबका संबंध केवल बाहरी परिस्थितियों से नहीं होता। हमारे विचार, व्यवहार, कर्म, संगति और जीवन जीने का तरीका भी हमारे भीतर के वातावरण को प्रभावित करता है।

सनातन परंपरा में इसी संदर्भ में धर्म और अधर्म की चर्चा की गई है। धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ, मंदिर जाना या धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं है। धर्म का व्यापक अर्थ है ऐसा आचरण जो सत्य, न्याय, मर्यादा, करुणा, कर्तव्य और लोककल्याण के अनुरूप हो।

इसके विपरीत जब मनुष्य जानबूझकर सत्य, न्याय, मर्यादा और अपने कर्तव्य से दूर होकर ऐसा आचरण करता है जिससे स्वयं या दूसरे को अनुचित हानि पहुंचती है, तो उसे अधर्म की श्रेणी में रखा जा सकता है।

अधर्म आखिर है क्या? बहुत सरल शब्दों में कहें तो— धर्म वह है जो जीवन को सही दिशा देता है और अधर्म वह है जो मनुष्य को सही दिशा से हटाता है।

झूठ बोलना, छल करना, किसी के अधिकार को छीनना, निर्दोष को परेशान करना, अन्याय करना, विश्वासघात करना, अपने स्वार्थ के लिए किसी का नुकसान करना, माता-पिता और गुरुजनों का अपमान करना, कमजोर व्यक्ति का शोषण करना—ऐसे कर्म जीवन में अधर्म की प्रवृत्ति को बढ़ा सकते हैं।

लेकिन यहां एक बात समझना बहुत जरूरी है। हर धार्मिक दिखने वाला व्यक्ति धार्मिक आचरण वाला हो, यह जरूरी नहीं।

कोई व्यक्ति रोज पूजा करे लेकिन दूसरों के साथ धोखा करे, गरीब का शोषण करे या अपने स्वार्थ के लिए किसी निर्दोष को नुकसान पहुंचाए, तो केवल पूजा-पाठ उसके व्यवहार की कमी को पूरा नहीं कर देता।

इसी प्रकार कोई व्यक्ति बहुत साधारण जीवन जीता हो, लेकिन सत्य बोलता हो, जरूरतमंद की मदद करता हो, अपने कर्तव्य का पालन करता हो और किसी के अधिकार का हनन न करता हो, तो उसके आचरण में धर्म की भावना दिखाई दे सकती है।

धर्म पहले आचरण में दिखाई देता है, उसके बाद पूजा में। गैर-धार्मिक कृत्य केवल पूजा न करने का नाम नहीं, कई लोग धर्म को केवल मंदिर, पूजा, व्रत और अनुष्ठान से जोड़कर देखते हैं। लेकिन धर्म का संबंध हमारे रोजमर्रा के व्यवहार से भी है।

यदि कोई व्यक्ति मंदिर में जाकर पूजा करता है और बाहर निकलकर किसी गरीब का अपमान करता है, कर्मचारी के साथ अन्याय करता है या अपने व्यापार में धोखाधड़ी करता है, तो उसे अपने आचरण पर विचार करना चाहिए।

इसी तरह परिवार में लगातार झूठ, क्रोध, अपमान, विश्वासघात और स्वार्थ का वातावरण भी धीरे-धीरे घर की शांति को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए धर्म का पहला स्थान हमारे विचार और व्यवहार में है।

कर्म का परिणाम हमेशा उसी क्षण दिखाई नहीं देता। कई बार किसी गलत काम का परिणाम तुरंत सामने आ जाता है और कई बार उसका प्रभाव धीरे-धीरे जीवन में दिखाई देता है।

उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति लगातार झूठ बोलता है। शुरुआत में शायद उसे कोई बड़ा नुकसान न हो, लेकिन धीरे-धीरे लोगों का विश्वास उसके ऊपर से उठने लगता है।

कोई व्यक्ति हर जगह क्रोध करता है तो लोग उससे दूरी बनाने लगते हैं। कोई व्यक्ति लगातार दूसरों का शोषण करता है तो उसके रिश्ते कमजोर होते जाते हैं।

कोई व्यक्ति छल और धोखे को अपनी सफलता का माध्यम बना लेता है तो बाहर से वह सफल दिखाई दे सकता है, लेकिन भीतर से भय, असुरक्षा और अविश्वास बढ़ सकता है। यही कर्म के सामाजिक और मानसिक परिणाम हैं।

धार्मिक दृष्टि से भी सनातन परंपरा कर्मफल के सिद्धांत को महत्व देती है—अर्थात मनुष्य के कर्मों का फल किसी न किसी रूप में उसके जीवन को प्रभावित करता है।

आजकल हम अक्सर कहते हैं कि घर में नकारात्मक ऊर्जा है, व्यक्ति के आसपास नकारात्मकता है या मन में भारीपन बना रहता है।

इसे समझने का एक संतुलित तरीका यह है कि "नकारात्मक ऊर्जा" को केवल किसी अदृश्य शक्ति के रूप में न देखें। कई बार यह शब्द हमारे लगातार नकारात्मक विचारों, तनाव, भय, क्रोध, ईर्ष्या, गलत संगति और अशांत वातावरण के लिए भी इस्तेमाल होता है।

नकारात्मकता बढ़ने के कई कारण हो सकते हैं।

1. लगातार झूठ और छल

जब व्यक्ति बार-बार झूठ बोलता है तो उसे अपने ही झूठ को संभालने के लिए लगातार मानसिक दबाव में रहना पड़ता है।

एक झूठ को छिपाने के लिए दूसरा झूठ और दूसरे को बचाने के लिए तीसरा झूठ—यह क्रम मन को अशांत कर सकता है।

2. अत्यधिक क्रोध

क्रोध कुछ परिस्थितियों में स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, लेकिन जब क्रोध स्वभाव बन जाए तो वह व्यक्ति के संबंधों, निर्णयों और मानसिक शांति को प्रभावित करता है। क्रोध में बोले गए शब्द कई बार वर्षों के रिश्ते खराब कर देते हैं।

3. ईर्ष्या और द्वेष

दूसरे की सफलता देखकर प्रसन्न होने के बजाय लगातार जलन महसूस करना व्यक्ति को भीतर से परेशान करता है। ईर्ष्या की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें नुकसान दूसरे का कम और स्वयं का अधिक होता है।

4. गलत संगति

मनुष्य जिस वातावरण में अधिक समय बिताता है, उसका प्रभाव उसके विचारों पर पड़ता है। यदि संगति में हर समय नशा, अपराध, अश्लीलता, गाली-गलौज, नकारात्मक चर्चा, दूसरों की बुराई और गलत कार्यों को सामान्य माना जाता है, तो धीरे-धीरे व्यक्ति की सोच भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए सनातन परंपरा में सत्संग को इतना महत्व दिया गया है।

5. अधर्म से प्राप्त धन

धन जीवन की आवश्यकता है, लेकिन धन प्राप्त करने का रास्ता भी महत्वपूर्ण है। यदि किसी का धन धोखे, भ्रष्टाचार, शोषण या किसी अन्य व्यक्ति के अधिकार को छीनकर प्राप्त किया गया है, तो उस धन से बाहरी सुविधा तो मिल सकती है, लेकिन उससे जुड़ी चिंता, विवाद और सामाजिक परिणाम जीवन में परेशानी पैदा कर सकते हैं।

इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितना कमाया? प्रश्न यह भी होना चाहिए— कैसे कमाया?

6. गलत आदतें

नशा, जुआ, अत्यधिक भोग-विलास, अनियंत्रित क्रोध और समय का लगातार दुरुपयोग व्यक्ति की जीवनशैली को कमजोर कर सकते हैं। जब शरीर, मन और व्यवहार का संतुलन बिगड़ता है तो व्यक्ति को हर चीज में नकारात्मकता महसूस होने लग सकती है।

7. दूसरों को लगातार अपमानित करना

जो व्यक्ति हर समय दूसरों को छोटा दिखाने की कोशिश करता है, उसके संबंध धीरे-धीरे कमजोर हो सकते हैं। सम्मान मांगने से पहले सम्मान देना सीखना पड़ता है।

8. घर में लगातार कलह

घर का वातावरण मनुष्य के जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है यदि परिवार में हर समय झगड़ा, अपमान, अविश्वास और कटुता बनी रहे तो घर में रहने वाले लोगों के मन पर उसका असर पड़ना स्वाभाविक है इसलिए घर की शांति केवल पूजा से नहीं, बल्कि व्यवहार की शुद्धता से भी आती है।

जब नकारात्मक विचार और गलत आचरण लंबे समय तक चलते हैं तो कई प्रकार के परिणाम सामने आ सकते हैं। व्यक्ति चिड़चिड़ा हो सकता है। रिश्तों में दूरी बढ़ सकती है। लोगों का विश्वास कम हो सकता है। निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। मन में भय, असुरक्षा और बेचैनी बढ़ सकती है। व्यक्ति छोटी-छोटी बातों पर प्रतिक्रिया देने लग सकता है और सबसे बड़ी बात—उसे अपने भीतर शांति महसूस होना कम हो सकता है। धार्मिक भाषा में इसे कई बार चित्त की अशुद्धि या अशांति से जोड़कर देखा जाता है।

जीवन में बीमारी, आर्थिक समस्या, पारिवारिक विवाद, तनाव या असफलता आने पर तुरंत यह निष्कर्ष निकाल लेना कि किसी ने नकारात्मक ऊर्जा भेज दी है या कोई अदृश्य शक्ति परेशान कर रही है—उचित नहीं है।

कई समस्याओं के पीछे वास्तविक सामाजिक, आर्थिक, व्यवहारिक या मानसिक कारण होते हैं।

इसलिए आध्यात्मिक उपायों के साथ-साथ वास्तविक कारणों को पहचानना भी जरूरी है।

यदि घर में विवाद है तो संवाद की आवश्यकता हो सकती है।

यदि आर्थिक परेशानी है तो वित्तीय योजना की आवश्यकता हो सकती है।

यदि मन लगातार परेशान रहता है तो किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना भी उचित हो सकता है।

आध्यात्मिकता और विवेक एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।

अधर्म से बचने का सबसे सरल रास्ता

इसके लिए बहुत कठिन नियमों की आवश्यकता नहीं है।

सत्य बोलने का प्रयास करें।

अपनी कमाई के साधनों को ईमानदार रखें।

किसी के अधिकार का अनुचित हनन न करें।

माता-पिता, गुरुजनों और बुजुर्गों का सम्मान करें।

जरूरतमंद की सहायता करें।

क्रोध में निर्णय न लें।

गलत संगति से दूरी रखें।

प्रतिदिन कुछ समय ईश्वर का स्मरण, प्रार्थना या ध्यान करें।

और सबसे महत्वपूर्ण—अपने कर्मों की समीक्षा करें।

रात को सोने से पहले स्वयं से केवल तीन प्रश्न पूछना भी बहुत उपयोगी हो सकता है—

आज मैंने किसका भला किया?
आज मैंने किसका दिल दुखाया?
और कल मुझे अपने भीतर क्या सुधारना है?

यदि मनुष्य रोज इन तीन प्रश्नों पर ईमानदारी से विचार करे तो उसके जीवन में धीरे-धीरे बहुत परिवर्तन आ सकता है।

धर्म का उद्देश्य मनुष्य को डराना नहीं, बल्कि उसे बेहतर बनाना है।

यदि पूजा के बाद हमारा व्यवहार बेहतर नहीं हो रहा, तो हमें अपने धार्मिक आचरण पर फिर से विचार करना चाहिए।

यदि मंत्र जाप के साथ हमारा क्रोध कम हो रहा है, यदि पूजा के साथ सेवा की भावना बढ़ रही है, यदि मंदिर जाने के साथ हमारा व्यवहार विनम्र हो रहा है, तो समझिए धर्म हमारे जीवन में उतर रहा है।

धर्म केवल माथे पर तिलक लगाने का नाम नहीं है। धर्म माथे के तिलक से लेकर हमारे व्यवहार तक दिखाई देना चाहिए।

अधर्म का अंत केवल बाहरी संघर्ष से नहीं होता। उसका वास्तविक अंत तब होता है जब मनुष्य अपने भीतर झूठ के स्थान पर सत्य, द्वेष के स्थान पर करुणा, अहंकार के स्थान पर विनम्रता और स्वार्थ के स्थान पर सेवा को स्थान देता है।

इसीलिए जीवन में सकारात्मकता बढ़ाने का पहला उपाय किसी बाहरी व्यक्ति को बदलना नहीं, बल्कि अपने विचार और कर्मों को बदलना है।

जब विचार शुद्ध होते हैं, आचरण सुधरता है।
जब आचरण सुधरता है, संबंध सुधरते हैं।
जब संबंध सुधरते हैं, घर का वातावरण बदलता है।
और जब घर का वातावरण बदलता है तो जीवन में शांति का अनुभव बढ़ने लगता है।

यही धर्म की वास्तविक शक्ति है।

जय माँ पीताम्बरा।

सनातन धर्म में दान की परंपरा बहुत पुरानी है। बचपन से ही हम सुनते आए हैं कि दान करने से पुण्य मिलता है लेकिन क्या हमने कभ...
08/08/2026

सनातन धर्म में दान की परंपरा बहुत पुरानी है। बचपन से ही हम सुनते आए हैं कि दान करने से पुण्य मिलता है लेकिन क्या हमने कभी यह सोचने की कोशिश की कि दान किसे देना चाहिए? हर उस व्यक्ति को जो हाथ फैलाकर मांग रहा है, क्या उसे दान देना ही पुण्य है? और अगर दान गलत व्यक्ति या गलत काम में चला जाए तो उसका क्या परिणाम हो सकता है?

मेरे विचार से दान की सबसे पहली शर्त है—श्रद्धा के साथ विवेक।

दान करते समय मन में यह भावना होनी चाहिए कि मेरे पास जो कुछ है, उसमें जरूरतमंद और धर्म के काम का भी हिस्सा है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बिना सोचे-समझे किसी को भी पैसा बांटते रहें।

ऐसे में कई बार ये प्रश्न उठता है कि दान का पात्र कौन है? पात्र वह है जिसे वास्तव में सहायता की आवश्यकता है और जो उस सहायता का सही उपयोग करेगा।

किसी गरीब परिवार की बेटी की पढ़ाई में मदद करना, किसी जरूरतमंद व्यक्ति के इलाज में सहयोग करना, भूखे को भोजन देना, किसी विद्यार्थी की फीस जमा कराना, किसी वृद्ध या असहाय व्यक्ति की मदद करना—ऐसे कार्यों में किया गया सहयोग सीधे किसी के जीवन में परिवर्तन ला सकता है।

इसी तरह धार्मिक और जनकल्याण के ऐसे कार्य भी दान के पात्र हो सकते हैं, जिनका उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ न होकर समाज और धर्म की सेवा हो।

लेकिन यहां एक बात बहुत स्पष्ट है—गरीबी कुपात्र होने की निशानी नहीं है।

कई बार हमारे आसपास ऐसे लोग होते हैं जो साधनहीन होते हुए भी ईमानदार और मेहनती होते हैं। उन्हें सहायता देना पुण्य का काम है।

फिर कुपात्र कौन?

कुपात्र वह नहीं जो गरीब है, बल्कि वह हो सकता है जो मिली हुई सहायता का गलत इस्तेमाल करे।

यदि किसी व्यक्ति को मालूम है कि पैसा नशे, जुए या किसी गलत काम में खर्च होगा और फिर भी हम उसी उद्देश्य से उसे पैसा देते हैं, तो यह सहायता उसके जीवन को सुधारने के बजाय बिगाड़ सकती है।

ऐसी स्थिति में बेहतर तरीका यह हो सकता है कि उसे सीधे पैसा देने के बजाय भोजन कराया जाए, इलाज कराया जाए, उसके परिवार से संपर्क किया जाए या उसे किसी उपयोगी कार्य में सहायता दी जाए।

यानी दान में केवल दया नहीं, दया के साथ बुद्धि भी जरूरी है।

दान का फल क्या है?

दान का सबसे बड़ा फल शायद यह है कि मनुष्य के भीतर से केवल अपने लिए जीने की भावना कम होती है।

जब हम किसी की जरूरत पूरी करने में अपना हिस्सा लगाते हैं तो हमें यह अहसास होता है कि समाज में हमारी भी कोई जिम्मेदारी है।

शास्त्र दान को पुण्य कर्म बताते हैं। लेकिन दान का फल केवल भविष्य में मिलने वाले किसी फल की उम्मीद में नहीं देखना चाहिए।

जब किसी भूखे के पेट में भोजन जाता है, किसी बच्चे की पढ़ाई जारी रहती है, किसी बीमार को उपचार मिलता है या किसी धार्मिक स्थल का निर्माण होता है—वहीं दान का प्रत्यक्ष फल हमारे सामने दिखाई देता है।

इसलिए दान करते समय यह नहीं सोचना चाहिए कि मैंने कितना दिया।

सोचना चाहिए—मेरे दिए हुए से किसी का कितना भला हुआ।

दान में दिखावा क्यों नहीं होना चाहिए?

आज के समय में दान भी कई बार प्रदर्शन का विषय बन जाता है। फोटो खिंचवाना, नाम लिखवाना और सोशल मीडिया पर प्रचार करना गलत नहीं कहा जा सकता, लेकिन यदि पूरा उद्देश्य ही प्रसिद्धि प्राप्त करना हो जाए तो दान की मूल भावना कमजोर पड़ जाती है।

दान ऐसा हो जिसमें देने वाले के मन में अहंकार न आए और लेने वाले को अपमान महसूस न हो।

किसी की मदद करके उसे बार-बार यह याद दिलाना कि हमने तुम्हारे लिए क्या किया, सेवा की भावना नहीं है।

सच्चा दान वही है जिसमें सहयोग हो, सम्मान हो और सद्भाव हो।

आज इसी भावना के साथ एक धार्मिक कार्य के लिए आप सभी से सहयोग का आग्रह है।

माँ पीताम्बरा पीठ, नयाबांस, खैरगढ़, फिरोजाबाद में माँ के मंदिर के निर्माण का कार्य चल रहा है।

मंदिर केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं होता। यह आस्था का केंद्र होता है। यहां पूजा होगी, साधना होगी, धार्मिक आयोजन होंगे और आने वाली पीढ़ियां अपनी संस्कृति और सनातन परंपरा से जुड़ेंगी।

इस कार्य को किसी एक व्यक्ति का कार्य मानने के बजाय हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में देखना चाहिए।

किसी के पास अधिक सामर्थ्य है तो वह अधिक सहयोग कर सकता है और किसी के पास कम है तो वह अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग कर सकता है।

दान की कीमत रकम से नहीं, भावना से तय होती है।

आप ₹51 से सहयोग करें या ₹501 से, ₹1100 से करें या अपनी सामर्थ्य के अनुसार अधिक—महत्वपूर्ण यह है कि उस सहयोग में माँ के प्रति श्रद्धा और मंदिर निर्माण में सहभागी बनने की भावना हो।

और यदि आर्थिक सहयोग करना संभव नहीं है, तो इस धार्मिक कार्य की जानकारी दूसरे श्रद्धालुओं तक पहुंचाना भी एक प्रकार की सेवा है।

आइए, हम सब मिलकर माँ पीताम्बरा पीठ के मंदिर निर्माण में अपना छोटा-सा योगदान दें।

क्योंकि आने वाले समय में जब यहां माँ का भव्य मंदिर खड़ा होगा, तब शायद हमें यह संतोष होगा कि इस निर्माण में हमारे परिवार की श्रद्धा का भी एक छोटा-सा हिस्सा शामिल था।

माँ के मंदिर में लगाया गया एक-एक पत्थर केवल निर्माण सामग्री नहीं होगा, वह किसी न किसी श्रद्धालु की आस्था की निशानी होगा।

माँ पीताम्बरा पीठ, नयाबांस, खैरगढ़, फिरोजाबाद

मंदिर निर्माण में सहयोग करें।
अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहयोग करें।
श्रद्धा से सहयोग करें।

माँ पीताम्बरा सभी भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखें।

जय माँ पीताम्बरा।

#माँ_पीताम्बरा_पीठ #नयाबांस #खैरगढ़ #फिरोजाबाद #दान #सनातन_धर्म #मंदिर_निर्माण #धर्म_सेवा #सेवा

॥ ॐ श्रीं ह्रीं बगलामुख्यै नमः ॥सनातन धर्म में मनुष्य की महानता उसके धन, पद अथवा प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि उसके आचरण (व्य...
07/08/2026

॥ ॐ श्रीं ह्रीं बगलामुख्यै नमः ॥

सनातन धर्म में मनुष्य की महानता उसके धन, पद अथवा प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि उसके आचरण (व्यवहार) और चरित्र (नैतिक जीवन) से आँकी जाती है। शास्त्र कहते हैं कि ज्ञान, तप, यज्ञ और पूजा तभी सार्थक होते हैं जब व्यक्ति का जीवन सत्य, शुद्धता और सदाचार से युक्त हो। जो व्यक्ति अपने आचरण को पवित्र रखता है, वही समाज में सम्मान, परिवार में विश्वास और ईश्वर की कृपा प्राप्त करता है।

महाभारत में कहा गया है— "वृत्तं यत्नेन संरक्षेत्।" अर्थात् मनुष्य को अपने चरित्र और आचरण की रक्षा सबसे अधिक सावधानी से करनी चाहिए, क्योंकि एक बार चरित्र पर लगा कलंक जीवनभर पीछा नहीं छोड़ता।

आचरण वह है जो संसार देखता है, जबकि चरित्र वह है जिसे केवल ईश्वर और हमारी अंतरात्मा जानती है। यदि मन, वचन और कर्म में एकरूपता हो, तभी वास्तविक चरित्र का निर्माण होता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में दैवी गुणों—सत्य, दया, क्षमा, विनम्रता, अहिंसा और आत्मसंयम—को दिव्य जीवन का आधार बताया है।

चरित्र जन्म से नहीं मिलता, बल्कि सत्संग, संस्कार, अनुशासन और निरंतर आत्मचिंतन से बनता है। माता-पिता का सम्मान, गुरु की सेवा, सत्य का पालन, संयमित जीवन और दूसरों के प्रति करुणा—ये चरित्र निर्माण के प्रमुख स्तंभ हैं।

मनुस्मृति में भी शुद्ध आचरण को धर्म का आधार माना गया है।

सनातन परंपरा में प्रतिदिन के कुछ नित्यकर्म बताए गए हैं, जिनका उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा का संतुलन है। इनमें प्रमुख हैं—

- ब्रह्ममुहूर्त में जागना।
- स्नान एवं शारीरिक स्वच्छता।
- संध्यावंदन या प्रार्थना।
- दीप प्रज्वलन।
- गायत्री मंत्र या इष्ट मंत्र का जप।
- ध्यान और प्राणायाम।
- स्वाध्याय।
- भोजन से पूर्व ईश्वर का स्मरण।
- रात्रि में आत्मचिंतन।

इनसे मन में अनुशासन, स्थिरता और सकारात्मकता का विकास होता है।

सनातन धर्म में कुछ लोकपरंपराएँ और शुभ प्रतीक प्रचलित हैं, जिन्हें सामान्य भाषा में "टोटके" कहा जाता है। जैसे दीपक जलाना, तुलसी की पूजा, गौसेवा, अन्नदान, घर की स्वच्छता या शुभ अवसरों पर मंत्रोच्चार।

इनका मूल उद्देश्य ईश्वर-स्मरण, सकारात्मक वातावरण और सद्भावना का निर्माण है। किन्तु यह मान लेना कि केवल किसी टोटके से बिना परिश्रम, बिना सदाचार और बिना कर्म के जीवन की सभी समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी—यह शास्त्रसम्मत नहीं है। सनातन धर्म कर्म, भक्ति और विवेक—तीनों पर समान बल देता है।

यदि कोई व्यक्ति भय दिखाकर धन की मांग करे, हर समस्या का कारण प्रेतबाधा बताए, या बिना प्रमाण के चमत्कारों का दावा करे, तो उससे सावधान रहना चाहिए। शास्त्र विवेक (विवेकबुद्धि) को धर्म का महत्वपूर्ण अंग मानते हैं।

किसी भी आध्यात्मिक उपाय का उद्देश्य व्यक्ति को धर्म, सदाचार और ईश्वर की ओर ले जाना होना चाहिए, न कि भय और भ्रम में डालना।

शुद्ध जीवन के सात नियम

1. सत्य बोलें।
2. किसी का अनावश्यक अहित न करें।
3. माता-पिता और गुरु का सम्मान करें।
4. नशा और दुर्व्यसनों से दूर रहें।
5. प्रतिदिन कुछ समय जप, ध्यान और स्वाध्याय करें।
6. सेवा और दान को जीवन का हिस्सा बनाएँ।
7. प्रतिदिन अपने कर्मों का आत्मनिरीक्षण करें।

आचरण की शुद्धता से चरित्र बनता है, चरित्र से विश्वास बनता है, विश्वास से समाज का निर्माण होता है और ऐसे ही जीवन में ईश्वर की कृपा का अनुभव होता है। दैनिक नित्यकर्म मनुष्य के भीतर अनुशासन, संयम और आध्यात्मिक चेतना का विकास करते हैं। वहीं लोकपरंपराओं के शुभ उपाय तभी सार्थक हैं जब वे श्रद्धा, सदाचार और विवेक के साथ किए जाएँ।

अंततः मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण उसका चरित्र है, सबसे बड़ा धन उसका सदाचार है और सबसे बड़ा रक्षक उसका धर्मयुक्त आचरण है।

॥ सत्यं वद। धर्मं चर। ॥
— तैत्तिरीय उपनिषद्

॥ जय माँ पीताम्बरा । जय माँ बगलामुखी ॥

कर्म और कर्मफल : सनातन धर्म की दृष्टि में जीवन का शाश्वत सिद्धांतसनातन धर्म का मूल आधार केवल पूजा-पाठ या कर्मकाण्ड नहीं,...
06/08/2026

कर्म और कर्मफल : सनातन धर्म की दृष्टि में जीवन का शाश्वत सिद्धांत

सनातन धर्म का मूल आधार केवल पूजा-पाठ या कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि कर्म है। मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल उसे अवश्य प्राप्त होता है। यही ईश्वर की अटल व्यवस्था है। भगवान किसी के साथ पक्षपात नहीं करते, बल्कि प्रत्येक जीव को उसके कर्मों के अनुसार ही फल प्रदान करते हैं। इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है।

भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता (4.17) में कहते हैं—

"कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥"

अर्थात् कर्म, विकर्म और अकर्म—तीनों का ज्ञान आवश्यक है, क्योंकि कर्म की गति अत्यंत गहन है।

कर्म का अर्थ केवल शरीर से किया गया कार्य नहीं है। मन से सोचना, वाणी से बोलना और शरीर से किया गया प्रत्येक कार्य कर्म है। यही कारण है कि शास्त्र मन, वचन और कर्म—तीनों की शुद्धता पर बल देते हैं।

धर्मानुकूल कर्म सत्कर्म कहलाते हैं और अधर्मयुक्त कर्म दुष्कर्म। यही दोनों आगे चलकर सुख और दुःख का कारण बनते हैं।

सनातन धर्म में कर्म को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया गया है—

1. संचित कर्म – अनेक जन्मों के संचित कर्मों का भंडार।

2. प्रारब्ध कर्म – संचित कर्मों का वह भाग जिसका फल वर्तमान जन्म में भोगना निश्चित है।

3. क्रियमाण (आगामी) कर्म – वर्तमान समय में किए जा रहे कर्म, जो भविष्य का प्रारब्ध बनेंगे।

इसीलिए मनुष्य वर्तमान कर्मों द्वारा अपने भविष्य को श्रेष्ठ बना सकता है।

वेद, उपनिषद्, गीता, महाभारत और पुराण सभी एक स्वर में कहते हैं कि कोई भी कर्म निष्फल नहीं जाता।

"यथा बीजं तथा फलम्।"

जैसा बीज बोया जाएगा, वैसा ही फल प्राप्त होगा। यदि कोई व्यक्ति दूसरों को दुःख देता है तो किसी न किसी रूप में वही दुःख उसके जीवन में लौटकर आता है। इसी प्रकार दया, सेवा, सत्य और दान का फल भी अवश्य मिलता है।

ईश्वर करुणामय हैं, किन्तु कर्मफल का सिद्धांत भी उनकी ही व्यवस्था है। सच्चा पश्चाताप, प्रायश्चित, सेवा, दान और ईश्वर-भक्ति मनुष्य के अंतःकरण को शुद्ध करते हैं तथा आगे के जीवन को धर्ममय बनाते हैं। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य जानबूझकर अधर्म करता रहे और केवल पूजा के बल पर उसके परिणाम समाप्त हो जाएँ।

बहुत से लोग कहते हैं—"जो भाग्य में लिखा है वही होगा।" परन्तु गीता मनुष्य को कर्मयोग का संदेश देती है।

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।"
(भगवद्गीता 2.47)

अर्थात् मनुष्य का अधिकार कर्म करने में है। वर्तमान के श्रेष्ठ कर्म भविष्य के जीवन की दिशा बदल सकते हैं। इसलिए भाग्य और पुरुषार्थ दोनों का संतुलन आवश्यक है।

सत्य बोलना, भूखे को भोजन देना, गौसेवा, गुरु सेवा, माता-पिता की सेवा, वृक्षारोपण, रोगियों की सहायता, धर्म की रक्षा और ईश्वर का स्मरण—ये पुण्य कर्म हैं।

वहीं झूठ, छल, भ्रष्टाचार, हिंसा, नशा, अन्याय, लोभ, विश्वासघात और निर्दोषों को कष्ट देना पाप कर्म हैं। ऐसे कर्म अंततः मन की अशांति और जीवन की कठिनाइयों का कारण बनते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्म को सर्वोच्च बताया है। जो व्यक्ति केवल कर्तव्य समझकर, बिना अहंकार और बिना फल की आसक्ति के कर्म करता है, वही वास्तविक कर्मयोगी है। ऐसा कर्म मन को शुद्ध करता है और ईश्वर के समीप ले जाता है।

जप, तप, पूजा और यज्ञ तभी सार्थक हैं जब उनके साथ सदाचार जुड़ा हो। यदि व्यवहार में सत्य, दया और विनम्रता नहीं है, तो केवल बाहरी धार्मिक आडंबर आत्मिक उन्नति नहीं दे सकते। धर्म का वास्तविक स्वरूप जीवन के प्रत्येक कर्म में प्रकट होना चाहिए।

कर्म ही मनुष्य की वास्तविक पहचान है। धन, पद और प्रसिद्धि क्षणिक हैं, किन्तु कर्मों का प्रभाव जन्म-जन्मांतर तक साथ चलता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन आत्मचिंतन करना चाहिए कि आज उसने कितने ऐसे कार्य किए जिनसे किसी का भला हुआ।

अंत में भगवान श्रीकृष्ण का यह संदेश प्रत्येक साधक के लिए मार्गदर्शक है—

"तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः॥"
(भगवद्गीता 3.19)

अर्थात् आसक्ति का त्याग करके अपने कर्तव्य का पालन करो। ऐसा निष्काम कर्म ही मनुष्य को परम कल्याण की ओर ले जाता है।

॥ कर्म ही भाग्य का निर्माता है, और धर्मयुक्त कर्म ही मोक्ष का मार्ग है। ॥

मानसिक अशांति : शास्त्र, साधना और आत्मकल्याण॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थित...
05/08/2026

मानसिक अशांति : शास्त्र, साधना और आत्मकल्याण

॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

देवी ही समस्त प्राणियों के भीतर बुद्धि, श्रद्धा, शांति, करुणा और शक्ति के रूप में विराजमान हैं। जब मनुष्य देवी से विमुख होकर केवल इन्द्रिय-सुखों का दास बन जाता है, तब उसके जीवन में मानसिक अशांति, भय, असंतोष और आध्यात्मिक रिक्तता प्रवेश करने लगती है। सनातन धर्म का उद्देश्य केवल कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और आत्मा का शुद्धीकरण है।

उपनिषद् कहते हैं—

"मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।"
— अमृतबिन्दु उपनिषद्

मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है। विषयों में आसक्त मन जीव को संसार में बाँधता है, जबकि ईश्वर में स्थित मन मुक्त कर देता है।

भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं—

"असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥"
(भगवद्गीता 6.35)

अर्थात् मन अत्यंत चंचल है, किन्तु अभ्यास और वैराग्य से उसे वश में किया जा सकता है।

शास्त्रों के अनुसार मानसिक अशांति के प्रमुख कारण हैं—

- ईश्वर से विमुख होना।
- माता-पिता, गुरु और देवताओं का अनादर।
- असत्य, हिंसा, छल और अधर्म।
- अत्यधिक लोभ, क्रोध, काम और अहंकार।
- अशुद्ध आहार एवं दूषित संगति।
- अनियमित जीवनचर्या।
- जप-तप में अहंकार और प्रदर्शन।
- पापकर्मों से चित्त का मलिन होना।

गीता (2.62–63) स्पष्ट करती है कि विषयासक्ति से क्रोध, मोह, स्मृति-भ्रंश और अंततः बुद्धि का नाश होता है। यही मानसिक अशांति की जड़ है।

गरुड़ पुराण तथा धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि पुण्य केवल तीर्थयात्रा से नहीं, बल्कि सत्कर्मों से बढ़ता है।

पुण्य क्षय के कारण बताए गए हैं—

- गुरु का अपमान।
- गौ, ब्राह्मण, स्त्री, बालक एवं निर्बलों को कष्ट देना।
- माता-पिता की सेवा न करना।
- दान का अहंकार।
- झूठी गवाही।
- अन्यायपूर्वक धन अर्जित करना।
- ईश्वर का उपहास।
- वचनभंग।

ऐसे कर्म मन को भारी बना देते हैं और आध्यात्मिक प्रगति में बाधा उत्पन्न करते हैं।

शास्त्र कहते हैं कि भक्ति-भाव से की गई सामान्य पूजा और नामस्मरण कल्याणकारी हैं। किंतु तंत्र, विशेष बीजमंत्रों, पुरश्चरण या उग्र साधनाओं में गुरु की दीक्षा और विधि का महत्व बताया गया है।

शिवपुराण तथा तांत्रिक परंपराओं में यह निर्देश मिलता है कि गूढ़ साधनाएँ स्वेच्छा से नहीं करनी चाहिए। बिना उचित मार्गदर्शन के साधक भय, भ्रम या मानसिक अस्थिरता का अनुभव कर सकता है। इसलिए साधना का मूल नियम है—"गुरुमुखात् लब्धो मन्त्रः सिद्धिदः।"

गरुड़ पुराण, अग्नि पुराण तथा कुछ अन्य ग्रंथों में प्रेतयोनि का वर्णन मिलता है। इनके अनुसार असामान्य परिस्थितियों में मृत्यु, अत्यधिक आसक्ति या कुछ अन्य कारणों से जीव प्रेतावस्था में रह सकता है।

किन्तु प्रत्येक मानसिक कष्ट को प्रेतबाधा मान लेना उचित नहीं है। भय, अवसाद, अनिद्रा, घबराहट या भ्रम के अनेक शारीरिक और मानसिक कारण भी हो सकते हैं। इसलिए विवेक आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति गंभीर मानसिक या शारीरिक लक्षण अनुभव कर रहा हो तो योग्य चिकित्सक से परामर्श लेना भी उतना ही आवश्यक है।

दुर्गा सप्तशती में देवी स्वयं कहती हैं कि जो श्रद्धापूर्वक उनका स्मरण करता है, उसके भय और संकट दूर होते हैं।

नवरात्र, चंडीपाठ, सप्तशती पाठ, श्रीसूक्त, लक्ष्मीसूक्त तथा बगलामुखी उपासना मन में आत्मबल, धैर्य और श्रद्धा का संचार करती है। साधना का लक्ष्य किसी पर प्रभाव जमाना नहीं, बल्कि स्वयं को शुद्ध करना होना चाहिए।

शिवपुराण में भगवान शिव को भूतनाथ और आशुतोष कहा गया है। महामृत्युंजय मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप मानसिक धैर्य, निर्भयता और आध्यात्मिक स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

सोमवार का व्रत, रुद्राभिषेक, बिल्वपत्र अर्पण और "ॐ नमः शिवाय" का जप मन को सात्त्विक बनाता है।

माँ बगलामुखी दशमहाविद्याओं में आठवीं महाविद्या हैं। उनका मूल स्वरूप दुष्ट प्रवृत्तियों का स्तम्भन है। वास्तविक साधना का अर्थ है—अपने भीतर के क्रोध, लोभ, भय, मोह और अहंकार का स्तम्भन।

बिना दीक्षा के गूढ़ बगलामुखी तांत्रिक अनुष्ठानों का प्रयास नहीं करना चाहिए। सामान्य भक्त पीतवस्त्र धारण कर, हल्दी की माला से, गुरु-परंपरा के अनुसार या केवल "जय माँ बगलामुखी" का श्रद्धापूर्वक स्मरण कर सकते हैं।

मानसिक शांति के दस दिव्य नियम

1. ब्रह्ममुहूर्त में जागें।
2. प्रतिदिन स्नान के बाद दीप प्रज्वलित करें।
3. कम से कम एक माला इष्ट मंत्र का जप करें।
4. प्रतिदिन गीता का एक अध्याय या कुछ श्लोक पढ़ें।
5. सप्ताह में एक दिन सेवा या दान अवश्य करें।
6. नशा, असत्य और अपशब्दों का त्याग करें।
7. माता-पिता और गुरु का सम्मान करें।
8. सात्त्विक भोजन और संयमित जीवन अपनाएँ।
9. प्रतिदिन 15–20 मिनट ध्यान करें।
10. सोने से पहले ईश्वर का स्मरण और आत्मचिंतन करें।

मानसिक शांति किसी चमत्कार का परिणाम नहीं, बल्कि शुद्ध जीवन, सतत साधना और ईश्वर में समर्पण का फल है। जो व्यक्ति धर्म, सत्य, सेवा, संयम और भक्ति को अपनाता है, उसका अंतःकरण धीरे-धीरे निर्मल होता है। यही निर्मलता शांति बनकर प्रकट होती है और वही शांति अंततः ईश्वर के साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करती है।

॥ सर्वे भवन्तु सुखिनः । सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु । मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥

॥ जय माँ पीताम्बरा । जय माँ बगलामुखी ॥

🌼 सोमवार विशेष 🌼🌼 शुभता क्या है? क्या हमारे रोज़मर्रा के कार्य शुभ या अशुभ हो सकते हैं? 🌼सुबह एक बुज़ुर्ग मुझसे बोले, "ब...
03/08/2026

🌼 सोमवार विशेष 🌼

🌼 शुभता क्या है? क्या हमारे रोज़मर्रा के कार्य शुभ या अशुभ हो सकते हैं? 🌼

सुबह एक बुज़ुर्ग मुझसे बोले, "बेटा, शुभ मुहूर्त कब होता है?"
मैंने सहज ही पूछ लिया, "आपके अनुसार शुभ मुहूर्त किसे कहते हैं?"
वे कुछ क्षण चुप रहे। फिर बोले, "जब काम सफल हो जाए, वही शुभ।"

उनकी बात सुनकर मन में एक विचार आया—शायद हममें से अधिकांश लोग शुभता को केवल परिणाम से जोड़कर देखते हैं, जबकि हमारे ऋषियों ने शुभता की शुरुआत मन, वचन और कर्म से मानी है।

हम अक्सर सोचते हैं कि शुभता केवल मंदिर जाने, पूजा करने या कोई विशेष अनुष्ठान करने से आती है। लेकिन यदि घर लौटकर हम अपने ही परिवार से कठोर व्यवहार करें, किसी ज़रूरतमंद की उपेक्षा करें या किसी का दिल दुखा दें, तो क्या केवल पूजा से जीवन शुभ हो जाएगा? सनातन परंपरा हमें सिखाती है कि पूजा से पहले व्यवहार पवित्र होना चाहिए।

कई लोग पूछते हैं—"क्या हमारे रोज़मर्रा के कार्य भी शुभ और अशुभ हो सकते हैं?"
मेरी समझ से उत्तर है—हाँ, हमारे छोटे-छोटे कर्म ही धीरे-धीरे हमारे जीवन का स्वरूप बनाते हैं। किसी भूखे को भोजन कराना शुभ है, किसी निराश व्यक्ति को हिम्मत देना शुभ है, माता-पिता का सम्मान करना शुभ है, सत्य बोलना शुभ है और अपने कर्तव्य को ईमानदारी से निभाना भी शुभ है। उसी प्रकार छल, क्रोध, अपमान, ईर्ष्या और अहंकार मन की शांति को कम करते हैं।

मैंने मां पीताम्बरा पीठ में आने वाले अनेक श्रद्धालुओं को देखा है। बहुत से लोग बड़ी-बड़ी समस्याएँ लेकर आते हैं। वे समाधान तो चाहते हैं, लेकिन कई बार अपने आचरण पर ध्यान नहीं देते। जब आचार्य उन्हें नियमित साधना के साथ-साथ संयम, सेवा, दान और मधुर व्यवहार अपनाने को कहते हैं, तब धीरे-धीरे वे स्वयं अपने भीतर परिवर्तन महसूस करने लगते हैं। कई बार सबसे बड़ा समाधान किसी विशेष अनुष्ठान में नहीं, बल्कि अपने स्वभाव को बदलने में छिपा होता है।

गुरुजन हमेशा कहते हैं कि शुभता खरीदी नहीं जा सकती, उसे कमाया जाता है। जिस प्रकार एक किसान रोज़ बीज बोता है और समय आने पर फसल काटता है, उसी प्रकार हम प्रतिदिन अपने कर्मों के बीज बोते हैं। आज बोया गया एक अच्छा व्यवहार, एक सच्चा वचन और एक निस्वार्थ सेवा का कार्य आने वाले समय में हमारे जीवन को सुगंधित कर सकता है।

यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन केवल पाँच मिनट भी ईश्वर का स्मरण करे, माता-पिता के चरण स्पर्श करे, अपने भोजन का एक अंश किसी जीव के लिए निकाले, किसी दुखी व्यक्ति को सांत्वना दे और दिनभर ईमानदारी से अपना काम करे, तो यही उसके जीवन की सबसे बड़ी शुभ साधना बन सकती है। शुभता केवल दीपक जलाने में नहीं, बल्कि किसी के जीवन में आशा का दीप जलाने में भी है।

आज की दुनिया में लोग सफलता के पीछे भाग रहे हैं, लेकिन शांति कहीं खोती जा रही है। इसका कारण यह नहीं कि हमारे पास साधन कम हैं, बल्कि यह है कि हम साधना से दूर होते जा रहे हैं। जब मनुष्य का आचरण पवित्र होता है, तब उसके शब्दों में भी मधुरता आ जाती है और उसके कर्मों में भी ईश्वर की झलक दिखाई देने लगती है।

मां पीताम्बरा की साधना हमें केवल शक्ति का संदेश नहीं देती, बल्कि विवेक, संयम और धर्म का भी मार्ग दिखाती है। सच्ची साधना वही है जो हमें अधिक विनम्र बनाए, दूसरों के प्रति करुणा जगाए और अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रखे। यदि हमारी भक्ति से हमारे स्वभाव में परिवर्तन नहीं आया, तो हमें अपनी साधना पर फिर से विचार करना चाहिए।

इसलिए आज स्वयं से केवल एक प्रश्न पूछिए—मैंने आज ऐसा कौन-सा शुभ कार्य किया, जिससे किसी और के चेहरे पर मुस्कान आई?

यकीन मानिए, यही प्रश्न धीरे-धीरे हमारे जीवन को बदल देगा। क्योंकि शुभता किसी विशेष दिन की नहीं, बल्कि हर दिन के छोटे-छोटे अच्छे कर्मों की पहचान है।

आइए, इस सोमवार मां पीताम्बरा के श्रीचरणों में यह संकल्प लें कि हम केवल शुभ फल नहीं, बल्कि शुभ विचार, शुभ वचन और शुभ कर्म भी अपने जीवन में उतारेंगे। यही सच्ची साधना है, यही धर्म है और यही वह मार्ग है जो मनुष्य को भीतर से समृद्ध बनाता है।

🙏 जय मां पीताम्बरा।
🌼 जय मां बगलामुखी।
🕉️ जय गुरुदेव।

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🚩 आधी रात का साया और मां पीताम्बरा का चमत्कार 🚩बरसात की एक अंधेरी रात थी। एक छोटे से गांव में वर्षों से बंद पड़ी एक पुरा...
02/08/2026

🚩 आधी रात का साया और मां पीताम्बरा का चमत्कार 🚩

बरसात की एक अंधेरी रात थी। एक छोटे से गांव में वर्षों से बंद पड़ी एक पुरानी हवेली के बारे में कहा जाता था कि वहां रात होते ही किसी औरत के रोने की आवाज़ सुनाई देती है। गांव वाले सूर्यास्त के बाद उस रास्ते से गुजरने की भी हिम्मत नहीं करते थे। कहते थे कि जो भी वहां गया, वह कभी पहले जैसा लौटकर नहीं आया।

एक दिन चार दोस्त रोमांच की तलाश में उस हवेली तक पहुंच गए। उन्हें लगा कि यह सब अंधविश्वास है। जैसे ही रात के बारह बजे, हवेली का टूटा हुआ दरवाजा अपने आप चरमराकर खुल गया। भीतर घना अंधेरा था, लेकिन किसी के धीरे-धीरे चलने की आहट साफ सुनाई दे रही थी। अचानक ऊपर की मंजिल से पायल की आवाज़ आने लगी। चारों के चेहरे का रंग उड़ चुका था।

उन्होंने बाहर निकलने की कोशिश की, लेकिन हवेली का दरवाजा जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने बंद कर दिया था। दीवारों पर अजीब परछाइयां दौड़ रही थीं। एक दोस्त ने कांपते हुए मोबाइल की टॉर्च जलाई तो सामने सफेद कपड़ों में खड़ी एक धुंधली आकृति दिखाई दी। उसकी आंखें लाल थीं और चेहरा क्रोध से भरा हुआ था।

कुछ ही पलों में हवेली का तापमान असामान्य रूप से ठंडा हो गया। ऐसा लग रहा था जैसे कोई अदृश्य शक्ति उनके चारों ओर घूम रही हो। अचानक एक दोस्त बेहोश होकर गिर पड़ा और दूसरे ने चीखते हुए कहा कि कोई उसका गला दबा रहा है। डर इतना बढ़ गया कि सभी भगवान का नाम लेने लगे।

किसी तरह वे सुबह होने से पहले गांव लौट आए, लेकिन असली भय तब शुरू हुआ। बेहोश हुआ युवक रात-रात भर चीखने लगा। उसे ऐसा महसूस होता कि कोई साया उसके पीछे-पीछे चलता है। घर में अपने आप चीजें गिरने लगीं, दरवाजे खुलने-बंद होने लगे और अजीब आवाज़ें आने लगीं। पूरे परिवार पर भय का साया मंडराने लगा।

कई तरह के उपाय किए गए, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। आखिर किसी बुजुर्ग ने सलाह दी कि मां पीताम्बरा की शरण में जाओ। वहां श्रद्धा और साधना के बल पर अनेक लोगों को भय और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिली है।

परिवार युवक को लेकर मां पीताम्बरा पीठ पहुंचा। वहां सबसे पहले उसे धैर्य रखने और मां पर पूर्ण विश्वास करने को कहा। विधि-विधान से मां बगलामुखी का पूजन और विशेष मंत्रों का जप कराया गया। पूरे वातावरण में मंत्रों की दिव्य ध्वनि गूंजने लगी।

हवन की पूर्णाहुति के समय युवक अचानक जोर-जोर से कांपने लगा। कुछ ही क्षणों बाद उसका शरीर शांत हो गया। उसने आंखें खोलीं और कहा, "अब मुझे कोई नहीं दिखाई दे रहा... जैसे कोई भारी बोझ उतर गया हो।" वहां उपस्थित सभी लोग इस परिवर्तन को देखकर आश्चर्यचकित रह गए।

उस दिन के बाद न तो हवेली का भय उसके जीवन में लौटा और न ही घर में कोई विचित्र घटना हुई। युवक पूरी तरह स्वस्थ हो गया। परिवार ने इसे मां पीताम्बरा की असीम कृपा माना और जीवन भर उनकी आराधना करने का संकल्प लिया।

आज भी गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि भय कितना भी बड़ा क्यों न हो, यदि मन में सच्ची श्रद्धा, गुरु का मार्गदर्शन और मां पीताम्बरा का आशीर्वाद हो, तो सबसे घोर अंधकार भी प्रकाश में बदल जाता है। जहां मां की कृपा होती है, वहां हर नकारात्मक शक्ति स्वयं नष्ट हो जाती है और भक्त का जीवन फिर से सुख, शांति और विश्वास से भर उठता है।

॥ जय मां पीताम्बरा ।
!! जय मां बगलामुखी ॥

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