04/06/2026
*राजराजेश्वरी माँ शाकम्भरीजी, सांभर (शाकम्भर): चाहमान वंश की कुलदेवी*
© आलेख - दयालसिंह चौहान - सिलारी
अनंत आद्यशक्ति राजराजेश्वरी शाकम्भरी देवी, आदिशक्ति योगमाया का एक सौम्य अवतार हैं। इन्हें चार भुजाओं और कही पर अष्टभुजाओं वाली देवी के रुप में भी दर्शाया गया है। इनका प्राकाट्य स्थान देहरादून के निकट शिवालिक पर्वत श्रृंखला में हैं जहां भगवती का भव्य मंदिर है। शताक्षी, शाकम्भरी तथा दुर्गा इन तीनों का प्रादुर्भाव शिवालिक पर्वत में ही है। पौष मास की पूर्णिमा को शाकम्भरी देवी ने अवतार लिया था। मार्कंडेय पुराण के अनुसार, इस दिन माता शाकम्भरी देवी की जयंती मनाई जाती है। स्कंद पुराण में शाकम्भरी क्षेत्र और शाकेश्वर महादेव की प्रत्यक्ष महिमा बताई गई है जो शिवालिक पर्वतमाला में स्थित शाकम्भरी क्षेत्र है। वे मुख्य रूप से प्रकृति और पोषण की देवी के रूप में पूजी जाती हैं। "शाकंभरी" नाम संस्कृत से लिया गया है, जहाँ "शाक" का अर्थ है वनस्पति और "अंभरी" का अर्थ है वह जो धारण करती है या प्रदान करती है। इस तरह, शाकंभरी माता को वह देवी माना जाता है जो जीवन को बनाए रखने के लिए भोजन और वनस्पति प्रदान करती हैं। देवी शाकंभरी उस युग की भगवती है, जबकि मानव ने शाकाहार को महत्व दिया और प्रकृति को उसके शाक उत्पादन और अद्भुत गुणों के कारण आभार ज्ञापित किया। माता शाकम्भरी देवी के स्वरूप का विस्तृत वर्णन श्री दुर्गा सप्तशती के अंत में मूर्ति रहस्य के श्लोक में मिलता है, जो श्लोक निम्न है :
शाकंभरी नीलवर्णानीलोत्पलविलोचना। मुष्टिंशिलीमुखापूर्णकमलंकमलालया।।
इसके अनुसार शाकंभरी देवी नीलवर्णा है। नील कमल के समान उनके नेत्र हैं। गंभीर नाभि है। त्रिवल्ली से विभूषित सूक्ष्म उदर वाली है। यह माता कमल पर विराजमान हैं। उनके एक हाथ में कमल है जिन पर भंवरे गूंज रहे हैं ये परमेश्वरी अत्यंत तेजस्वी धनुष को धारण करती हैं। ये ही देवी शाकम्भरी है। शाकम्भरी देवी का वर्णन स्कंद पुराण, भागवत् पुराण, शिव पुराण, मार्कण्डेय पुराण, कालिका पुराण, हिंगलाज पुराण, कनक धारा स्तोत्र, देवी पुराण, महाभारत के वन पर्व आदि ग्रंथों मे मिलता है। देवीभागवतपुराण के अनुसार राक्षसों के दुष्प्रभाव के कारण एक बार पृथ्वी पर भयंकर अकाल पड़ा और लोग भूख से मरने लगे। जिसके बाद सभी देवताओं और मनुष्यों ने आदिशक्ति की अराधना की। तब आदिशक्ति नवरूप धारण कर मां शाकंभरी स्वरूप में प्रकट हुईं और उन्होंने पृथ्वी पर दृष्टि डाली और उनकी दिव्य ज्योति से बंजर धरती में भी शाक उत्पन्न हो गई और धरती को हरा-भरा कर शाक, सब्जियाँ, फल और अन्न उत्पन्न किए ताकि लोग भूख से मुक्त हो सकें। यही कारण है की उन्हें मां "शाकंभरी" (शाक अर्थात वनस्पति की धारिणी) कहा गया।
एक अन्य दंत कथा के अनुसार मां शाकम्भरी के तप से यहां अपार धन-संपदा उत्पन्न हुई। समृद्धि के साथ ही यहां इस प्राकृतिक सम्पदा को लेकर झगड़े शुरू हो गए। जब समस्या ने विकट रूप ले लिया तो मां ने यहां बहुमूल्य सम्पदा और बेशकीमती खजाने को नमक में बदल दिया। इस तरह से माँ के नाम से शाकम्भर झील की उत्पत्ति हुई जो कालांतर में अपभ्रंश होकर सांभर झील कही जाने लगी। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार शाकम्भर ही वह स्थान है जहां राजा ययाति ने शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और शर्मिष्ठा के साथ विवाह किया था।
जन जन की आराध्य व क्षत्रिय चहुआँण (चाहमान) वंश की कुलदेवी मां शाकम्भरी जी, सांभर ही कालांतर में राव लाखण चौहान द्वारा अपनी कुलदेवी शाकंभरी जी की कृपा से नाडोल राज्य प्राप्त किया, इसलिए राव लाखण की आशा पूर्ण होने पर उनके द्वारा शाकंभरी देवी को आशापुराजी (आशा पूर्ण करने वाली देवी) नाम से संबोधित किया गया व इसी नाम से पूजी जाने लगी, जिनका पाटस्थान नाडोल, जिला पाली में हैं। जयपुर से करीब 100 किलोमीटर व सांभर रेलवे स्टेशन से करीब 15 किमी की दूरी पर सांभर झील के मध्य में कोरसीना गांव की देवगिरी नामक पहाड़ी पर यह पौराणिक धाम स्थित है। यहां शाकम्भरी देवी की यह प्रसिद्ध अलौकिक दिव्य मूर्ति पहाड़ से स्वत: प्रकट हुई है, जो चार भुजाओं वाली और प्रकृति की प्रतीक के रूप में पूजी जाती है। शाकम्भरी माताजी के देशभर में तीन शक्तिपीठ है, इनमेें से सबसे प्राचीन शक्तिपीठ यह है। यहां स्थित मन्दिर करीब 2500 साल या उससे भी ज्यादा पुराना बताया जाता है। शाकम्भरी देवी के पीठ के रूप में सांभर की प्राचीनता महाभारत काल तक चली जाती है, क्योंकि महाभारत के वन पर्व में भी देवी शाकम्भरी के नाम का उल्लेख है। विभिन्न लेखों के अनुसार, चाहमान वंश के शासक वासुदेव चहुआँण को 551 ई में शाकम्भरी माताजी ने दर्शन दिए थे। आमजन में सदियों से प्रचलित दंत कथाओं व जनश्रुतियों अनुसार किवंदती इस प्रकार से है की चहुआँण वंश के यशस्वी शासक वासुदेव चहुआँण को मां शाकम्भरी जी का आशीर्वाद प्राप्त था। जनश्रुति हैं की एक बार मां शाकम्भरी जी ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वरदान दिया की एक दिन में सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक जितनी दूरी में तुम घोड़े पर घूम कर वापस आओगे, उस जगह में चांदी हो जाएगी लेकिन पीछे मुड़कर नहीं देखना होगा। महाराज वासुदेव चहुआँण ने पूरे दिन घोड़े से 12 कोस दूरी में चक्कर लगाया, लेकिन सूर्यास्त के समय महाराज वासुदेव को अपने पीछे समुद्र की लहरों की तेज आवाज सुनाई दी तो वासुदेव चहुआँण ने वचन का उल्लंघन करते हुए पीछे मुड़कर देखा। तब देवी शाकम्भरी ने कहा तुमने मेरे वचन पर विश्वास नहीं किया इसलिए अब चांदी तो नहीं होगी लेकिन चांदी जैसा ही पदार्थ होगा, उतनी दूरी में आज विश्वप्रसिद्ध नमक की सांभर झील बनी हुई है। कहते हैं उस दिन से नमक जिसे मारवाड़ी में हम लूण व कच्ची चांदी के नाम से भी जानते है। तभी से एक प्रसिद्ध कहावत बनी की, "अन्न भगवान का दिया हुआ और लूण चहुआँण का दिया हुआ"।
सन् 1170 ई के बिजौलिया शिलालेख के अनुसार, इसके बाद ही महाराज वासुदेव चहुआँण ने शाकम्भरी माताजी के आशीर्वाद से अपनी प्रारंभिक राजधानी अहिछत्रपुर यानि वर्तमान के नागौर से चहुआँण(चौहान) राजवंश की नई राजधानी मां शाकम्भरी के नाम से बसाए शाकम्भर को बनाई व कुलदेवी मां शाकम्भरीजी का शाकम्भर झील में पहाड़ी पर मंदिर का निर्माण भी करवाया। यही शाकम्भर कालांतर में सांभर नाम से जाना जाने लगा। मां शाकम्भरी जी के सम्मान में ही चहुआँण वंश के राजाओं ने 'शाकम्भरीश्वर' की उपाधि भी धारण करी थी। राव लाखण को 1282 ई के सुंधा अभिलेख में ' शाकम्भरीन्द्र ' व आबूराज शिलालेख में ' शाकंभरी माणिक्य ' उपाधि से सुशोभित किया गया है। इसके बाद 551 ई से लेकर 1113 ई तक सांभर यशस्वी चहुआँण राजवंश की राजधानी रही। वर्ष 1113 ई में चहुआँण राजवंश के महाराज अजयराज द्वितीय ने राजधानी सांभर से अजयमेरू (अजमेर) को अधिक सुरक्षित मानकर वहां स्थानांतरित कर दी। इस मंदिर का पुनर्निर्माण 12 वी शताब्दी में सम्राट पृथ्वीराज चहुआँण तृतीय द्वारा भी करवाया गया था और वह हर युद्ध से पहले देवी शाकंभरी की पूजा करते थे। चाहमान काल में सांभर और उसका निकटवर्ती क्षेत्र सपादलक्ष (सवा लाख की जनसंख्या या सवा लाख गांवों या सवा लाख की राजस्व वसूली क्षेत्र) कहलाता था। समय समय पर चौहान शासकों ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण व जीर्णोद्धार कार्य करवाए थे।
वर्तमान में करीब 90 वर्गमील में यहां नमक की झील है। इसमें चार नदियाँ (रुपनगढ, मेंथा, खारी, खंड़ेला) आकर गिरती हैं। मंदिर के ठीक सामने सांभर झील के मध्य में लाखड़िया भेरूजी का मंदिर स्थित है, जहां जाने का रास्ता झील की मध्य से होकर गुजरता है। ऐसा माना जाता है की भेरूजी के दर्शन के बिना माताजी के दर्शन अधूरे रहते है, इसलिए माता शाकम्भरी जी के मंदिर में दर्शन हेतु आने वाले भक्त भैरवनाथ के मंदिर में दर्शन कर उनका भी आशीर्वाद लेते है।
मां शाकम्भरी मंदिर, सांभर की पहाड़ी की चोटी पर एक 8 खम्बो की छतरी बनी हुई है। छतरी पर एक लेख खुदा हुआ है। लेख काफी ऊपर लगा हुआ था, इसलिए अच्छी तरह से पढ़ नहीं पाया। पर मंदिर के पुजारीजी व स्थानीय लोगो ने बताया की एक बार मुगल बादशाह जहांगीर की सेना माताजी के मंदिर को ध्वस्त करने आई थी, लेकिन मधुमक्खियों के झुंड ने सेना पर हमला कर दिया और मुगल सेना भाग खड़ी हुई। जब यह खबर जहांगीर तक पहुंची तो उसे इस घटना पर भरोसा नहीं हुआ। वह खुद माताजी के मंदिर पहुंचा, उसने मंदिर में जल रही ज्योत पर लोहे के सात मोटे तवे रखवा दिए। लेकिन इन सात तवो को पार करके भी ज्योत जलने लगी, ये देख जहांगीर भी नतमस्तक हो गया। माताजी का चमत्कार देखने के बाद पहाड़ी पर यह छतरी जहांगीर द्वारा बनवाई गई थी। शाकम्भरी देवी के अन्य प्रसिद्ध मंदिर सहारनपुर, त्रियुगीनारायण उत्तराखण्ड, नागेवाडा, कटक, नाडोल, हरिद्वार, कुरालसी उत्तर प्रदेश, बीदर (कर्नाटक), उदयपुर, शाहबाद मारकंडा, कांधला, भरूच, पचपदरा आदि जगह भी है।
सेवग गहरो सांभरी, प्रण राखण प्रतिपाल।
कीरत चहुँदिस आपरी, पसरे प्रिय दयाल।।
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