03/05/2026
काशी के एक छोटे से गाँव में एक वृद्धा रहती थी जिसका नाम था, गोमती माँ। उसके पास रहने को एक टूटी झोपड़ी और भगवान कृष्ण की एक छोटी सी पत्थर की मूर्ति थी। गोमती माँ बहुत गरीब थी, लेकिन उसका नियम अटूट था—वह हर दोपहर भगवान को 'मालपुआ' का भोग लगाती थी।
पर हकीकत यह थी कि उसके पास न घी था, न शक्कर, और न ही आटा।
भाव की रसोई
गोमती माँ रोज़ दोपहर को चूल्हा जलाती, उस पर एक खाली मिट्टी की कड़ाई रखती और अपनी आँखें बंद कर लेती। वह कल्पना में भगवान के लिए मालपुए तलती। वह बड़े प्रेम से कहती:
"प्रभु, देखो घी गर्म हो गया है, अब मैं इसमें घोल डाल रही हूँ... देखो कान्हा, मालपुआ कितना सुनहरा और कुरकुरा बना है!"
वह घंटों तक इसी 'मानसिक पूजा' में मग्न रहती और अंत में एक खाली थाली भगवान के सामने रख देती। उसकी आँखों से आंसू बहते और वह कहती, "कान्हा, आज का मालपुआ सबसे मीठा बना है, चख कर देखो।"
राजा का अहंकार और पंडितों का क्रोध
गाँव के बड़े मंदिर में राजा ने एक विशाल भंडारा रखा। हज़ारों किलो असली घी और केसर से बने मालपुए तैयार हुए। लेकिन मंदिर के पंडित ने देखा कि भगवान की मूर्ति के चेहरे पर वह चमक नहीं थी, जो अक्सर होती थी।
राजा ने अहंकार में कहा, "मैंने इतना वैभव अर्पित किया है, फिर भी भगवान खुश क्यों नहीं दिख रहे?"
उसी समय मंदिर के द्वार पर गोमती माँ पहुँची। वह फटे कपड़ों में थी और उसके हाथ में एक खाली दोना (पत्तल) था। पंडितों ने उसे धक्के देकर बाहर निकाल दिया, "हटो यहाँ से बुढ़िया! यहाँ राजसी भोग लग रहा है, तेरी गरीबी यहाँ अपवित्रता फैलाएगी।"
अनोखा चमत्कार
जैसे ही गोमती माँ को बाहर निकाला गया, अचानक मंदिर के गर्भगृह से शुद्ध घी और इलायची की वैसी ही खुशबू आने लगी जैसे ताज़े मालपुए बन रहे हों। राजा और पंडित हैरान रह गए क्योंकि मंदिर की कड़ाइयाँ तो ठंडी हो चुकी थीं।
तभी आकाशवाणी हुई:
"राजन्, तुम्हारे पकवानों में केसर तो है पर प्रेम नहीं। मैं तो अभी गोमती माँ की झोपड़ी में उस 'अदृश्य कड़ाई' से निकले मालपुए खा रहा था। उसने मुझे अपने आँसुओं से सींचकर और अपनी भक्ति से तलकर खिलाया है।"
राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह दौड़कर गोमती माँ के पास गया और उसके पैर पकड़ लिए। उसने देखा कि गोमती माँ की उस खाली मिट्टी की कड़ाई में सचमुच घी की एक अद्भुत चमक और दिव्य सुगंध बाकी थी।
कहानी की अनोखी सीख:
ईश्वर वैभव के भूखे नहीं हैं। आप उन्हें क्या चढ़ाते हैं, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आप किस भाव से चढ़ाते हैं। श्रद्धा की एक खाली कड़ाई भी अहंकार के सोने के थाल से बड़ी होती है।