20/04/2024
महफिल ए समां बुजुर्गानेदीन की याद में होती है इस अकीदत से होती है की सभी बुजुर्गानेदीन वहां मौजूद होते सरवर ए कायनात वहा होते है हजरत अली वहा होते है इसलिए उनकी शान में कलाम पड़े जाते है सलाम पड़ा जाता है।इसलिए जरूरी है की महफिलों का अदब उसी तरह से किया जाए महफिलों में बा वुजू एतराम से बैठा जाए जिस से फैज और नूर हासिल किया जा सके। मगर आज कल जिस तरह महफिलों में मुंह में पान और गुटखा भर के लोग बैठते है और बीच बीच में महफिल से उठकर जाना मोबाइल चलाना ये सब करते है उससे वो किस तरह फैज पाएंगे मैं नहीं समझ सकता जब महफिल के बाद मुंह में गुटखा और पान भर के दुआ की जाएगी तो वो किस तरह कुबूल होगी ये समझ से परे है। मैंने जनाब हजरत पीरजादा रईस मियां चिश्ती साहब को देखा है वो महफिल में जब बा वुजु होकर जिस पोजीशन में बैठते है तो आखिर तक उसी तरह बैठे रहते है हर कलाम को बड़े गौर से सुनते है और कभी जो कव्वाल ऊंच नीच करते है तो फोरन टोक देते है ऐसे एग्जाम्पल फोलो करने चाहिए तभी महफिल ए समां का फैज मिलेगा। वरना अब तो बहुत से लोग छोटी छोटी जगह पर महफिलों के नाम पर अपनी दुकान चला रहे है और वहा के हालात देख कर तो सिर्फ तौबा ही की जा सकती है। सुफिज्म को मजाक नहीं बनाना है उसे हर दिल तक पहुंचाना है और दिलों तक नूर पहुंचता है अदब पहुंचता है एहतराम पहुंचता है। बेअदबी धीरे धीरे लोगों को इन महफिलों से दूर कर देगी । मेरे इस पोस्ट का मतलब किसी पर उंगली उठाना नही है मेरा मकसद उस बुराई को उस बेअदबी को महफिलों से दूर करना है जो अब बहुत आम होती जा रही है। जिम्मेदार लोग अपनी जिम्मेदारी को समझे अब इसे रोकने के लिए कुछ करे।
*पीरजादा हैदर अजीम फरीदी*