16/05/2026
क्या नाम जप ही परम कल्याणकारी और पर्याप्त है ?
आज के समय हम सब सोशल मीडिया ,कथावाचकों और कई विद्वानों के द्वारा नाम जप की महत्ता और महिमा के विषय में सुनते है सामान्यतः ये उचित भी है गोस्वामी तुलसीदास भी कहते है कलियुग केवल नाम आधार सुमिर सुमिर नर उतरही पारा। किंतु रामायण में ही कहा गया है 'मंत्र महामनि बिषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के॥ इसका तात्पर्य है कि मंत्रों की महिमा को नकारा नहीं जा सकता है अब प्रश्न आता है कि सामान्य जन क्या करे किस और जाए ।क्या केवल नाम जप ही पर्याप्त है और यदि है तो फिर धार्मिक अनुष्ठान,यज्ञ हवन अभिषेक इन सबका क्या तात्पर्य है क्यों वेद में मंत्र के विषय में लिखा है बहा नाम जप की महिमा है ही नहीं ।के अल नाम जप की और जाएंगे तो हमारे धार्मिक अनुष्ठान और संस्कृति का लोप हो जाएगा फिर मंदिरों की आवश्यकता ही कहा रह जाएगी ,न पूजा न अर्चना बस नाम जप
जहां तक मेरा अनुभव है दोनों को साथ लेकर चलना ही श्रेष्ठ है केवल नाम जप या केवल क्रिया दोनों ही अपूर्ण है क्योंकि ज्यादातर लोगों को धार्मिक क्रियाओं ,मंत्र का ज्ञान ही नहीं है ना ही गुरु शिष्य परंपरा है जो ज्ञान का विस्तार हो सके ,किंतु जो मंदिरों में बैठे है या घरों में मूर्ति रूप में विराजे है उनकी सेवा ,अर्चन भी आवश्यक है जिसके लिय मंत्र या क्रिया की आवश्यकता होगी ।यानी कि अपनी योग्यता ,आवश्यकता के अनुरूप हमे दोनों का चयन करना होगा हम सामर्थ्यवान है ,और ज्ञान रखते है तो हमें धार्मिक संस्कृति को लोप होने से बचाना होगा वरना अगली।पीढ़ीहवन ,अर्चन,अभिषेक ,साधना ,और सिद्धि जिसे शब्दों को मात्रा किताबों में ही पड़ेगी मंदिरों का लोप समय के साथ होता चला जाएगा , और एक समृद्ध चेतना में संस्कृति का लोप हो जाएगा ।नाम जप तब उत्तम है जब आप सामर्थ्य ना रखते हो ,जब आप भगवत सेवा करने में अक्षम हो , जब आप असहाय हो ना कि तब जब आप सामर्थ्य रखते है ।
मेरा उद्देश्य किसी विधा का विरोध नहीं है किंतु उस सत्य को उजागर करना है जो आवश्यक है ।