19/09/2025
बाबा सूरदास की तपोस्थली गाँव तिलपत का इतिहास...
गोहाना के निकट बडोता गाँव के पाराशर गोत्रिय ब्राह्मणों को लगभग 700 वर्षों पूर्व 52000 बीघा जमीन समेत गाँव का खेड़ा इनाम में मिला था!गाँव का पौराणिक नाम तिलप्रस्थ था जो बाद में बिगड़ कर तिलपत हो गया! सिद्धोलाल पाराशर गाँव के संस्थापक थे जिनके परिवार ने गाँव का खेड़ा स्थापित किया! बाद में पाराशर ब्राह्मणों के पास उनके मित्र सहयोगी और रिश्तेदार अत्रि और वशिष्ठ गोत्र के ब्राह्मण भी आ बसे और कुछ जमीन उनको भी मिली! वर्तमान में गाँव का कुल क्षेत्रफल 52000 बीघा है! गाँव में 2 पट्टियां हैं! उद्धव सिंह और धर्म सिंह पट्टी! बाबा ज्ञासी गाँव के प्रसिद्ध व्यक्ति थे!
आइन-ए-अकबरी में दर्ज विवरण के अनुसार तिलपत एक परगना था। यह तिलपत का परगना दिल्ली सूबे के अंतर्गत पड़ता था। यहां पक्की ईंटों का एक दुर्ग था। शासन की और से यहां 40 घुड़सवार और 400 पैदल सिपाही नियुक्त थे। 1595 ईस्वी में तिलपत के नंबरदार ब्राह्मण थे। इस परगने की कुल कृषि योग्य भूमि 1,19,578 बीघा थी। इस तिलपत के परगने से अकबर को 30,77,913 दाम की सालाना आय होती थी। 40 दाम का मूल्य एक रुपये के बराबर होता था। बाद के वर्षों में इस परगने का दफ्तर तिलपत से हटाकर फरीदाबाद स्थानांतरित कर दिया गया। उसके बाद तिलपत का राजनीतिक महत्त्व घट गया।
मुगल शासन ने हिंदू विरोधी नीतियों के तहत इस्लाम धर्म को बढावा दिया और किसानों पर कर बढ़ा दिया। गोकुला जाट ने किसानों को संगठित किया और कर जमा करने से मना कर दिया। औरंगजेब ने बहुत शक्तिशाली सेना भेजी।ईस्वी 1666 को गोकुला जाट के नेतृत्व में तिलपत गाँव में किसानों और औरंगजेब की सेना के मध्य लड़ाई हुई। गोकुला जाट के साथ तिलपत के पाराशर और आस पास के ब्राह्मण, जाट, राजपूत, गुज्जर किसानों ने वीरतापूर्वक लड़ते हुए बलिदान दिया! गोकुला जाट को बंदी बना लिया गया और 1 जनवरी 1670 को आगरा के किले पर जनता को आतंकित करने के लिये टुकडे़-टुकड़े कर मारा गया।