25/05/2021
सत्य,अहिंसा,करुणा,दया,मैत्री,विश्वशांति,सद्धभाव के उद्धघोषक महामानव बुद्ध की 2565वीं "त्रिविधि पावनी" वैशाखी पूर्णिमा (बुद्ध पूर्णिमा)की पूर्व संध्या पर विशेष!!
कुशीनगर में दो शाल के वृक्षों के बीच लेटे
बुद्ध परिनिर्वाण की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
इस अंतिम वियोग को सहन करने की शक्ति
आनंद में नहीं थी।
वह कोठरी में जाकर खूँटी पकड़ कर रोने लगे।
बुद्ध ने पूछा-आनन्द कहाँ है?
"कोठरी में जाकर रो रहे हैं "
बुद्ध ने बुला कर कहा -'नहीं आनंद'
मत शोक करो,मत रोओ!
मैंने तो पहले ही कह दिया है,
सभी प्रियो से जुदाई अवश्य होती है।
जो जन्मा है, जो बना है, वह नाश होने वाला है
'हाय यह नाश न हो यह चाहना ठीक नहीं।'
उसी समय बूढ़े सुभद्द को मालुम हुआ
वो बुद्ध के पास जाकर अपनी शंकाओ का
समाधान करना चाहता था
आनंद ने कहा नहीं साथी सुभद्द
तथागत को तकलीफ मत दो।
वे थके हैं।तीन बार इनकार मिला।
सुभद्द की विनती तथागत के कानों में पहुँच गयी।
उन्होंने कहा- नहीं आनंद,सुभद्द को मना मत करो।
वह ज्ञान की कामना से ही पूछेगा,तकलीफ देने की इच्छा से नहीं।
सुभद्द ने उस 80 वर्ष के तेजोमय बृद्ध शरीर को देखा,
उस मुख से जो सुना,उससे वह कृतकृत्य हो गया।
सारनाथ में कौडिन्य को बुद्ध का सबसे पहला और
कुशीनगर में सुभद्द को अंतिम शिष्य होने का सौभाग्य मिला।